कोयल अर कागलो (व्यंग्य) – बुलाकी शर्मा

कथेतर विमर्श पर आज पढिए बुलाकी शर्मा जी का व्यंग्य, जो राजस्थानी लोक में बेहद प्रचलित है।
इतरो बाबो-सा रो लाड
कोयल बाई सिध चाल्या ओ
आयो सगां रो सुवटो अे
लेयग्यो टोळी मांय सूं टाळ’र
कोयल बाई सिध चाल्या ओ…
ब्यांव हुयां पछै बाबुल रो घर छोड’र लाडकंवरी आपरै जीवणहार साथै पैलपोत सासरै सारू बिदा हुवै जणै भावुक हुयनै परिवार-कड़ूंबै री लुगायां रोंवती-बसका भरती ओ गीत गावै। गीत सुण’र मजबूत काळजैआळै री ई आंख्यां भरीज जावै।
राजस्थानी लोक गीतां में बेटी नै कोयल रूप मान दिरीजै क्यूंकै सगळा पाखियां में स्सैं सूं मीठो अर सुरीलो सुर कोयल रो हुवै। आ मंगळकामना करीजै कै बा आपरै सासरै में आपरी मीठी बाणी सूं सगळां रो मन जीतनै राजस करै।
जिको मीठो, मधरो अर मनभावण बोलै, बीं रा दूजा अवगुण लुक जावै। बो भलो अर भोळो मानीजै। बीं री नुगराई कानी ध्यान ई कोनी जावै। कोयल अर कागळो, दोनां रो रंग काळो हुवै पण मीठा बोल बोळणआळी कोयल री आपां तारीफ करां अर बाड़ो पण खरो बोळणियै कागलै नै भूंडता रैवां।
कोयल रो रंग ई काळो कोनी, बीं रो मन ई काळो है जदकै कागलो बोलण में बाड़ो है पण मन सूं भोळो है। बीं रै भोळापै रो फायदो कोयल उठावती रैई है। कोयल काम करण में इत्ती माठी है कै आपरै रैवण सारू घोंसलो बणावतां ई बीं री ज्यान निकळै। बिना आपरै घोंसलै ई बा मीठै सुर में गांवती च्यारूं कूंट कुदड़का मारती रैवै। रात ढळ्यां किणी पेड़ माथै डेरो जमाय लेवै। पण जद ‘पेटसुणी’ हुवै जणै ‘धणी-लुगाई’ नै भोळोभाळो कागलो याद आवै।
नर कोयल कागलै-कागली रै घोंसलै रै आसै-पासै चक्कर निकाळतो बां नै तंग करणो सरू करै। बां नै इत्ती भूंडी रीस आवै कै बे दोनूं बीं नै भगावण सारू बीं रै लारै उडार भरै। मादा कोयल फुरती सूं कागलां रै घोंसलै में आपरा अंडा राखै। कागली रा अंडा बठै पैला सूं हुवै। बा बठै आपरा जे दो अंडा राखै तो कागली रा दो अंडा रो जीमण कर’र बठै सूं पट्टी। कागलो’र कागली सुधा-सरल पाखी। बे नर कोयल नै दूर तांई भगाय’र पाछा आवै। गिणती में अंडा पैला जित्ताई देखै जणै बां नै नैहचो हुय जावै।
धोखैबाज कोयल रै अंडां नै आपरा मान’र कागलो-कागली सैवै-गरमास देवै। बदमास कोयलड़ी मस्ती करै। जद अंडां सूं बच्चिया निकळै जणै ल्याई बां दोनां नै धोखो देयनै आपरा बच्चिया बठै सूं चोर’र लेय जावै।
मादा कोयल री बडाई करणिया कवि’र लोक कवि इण साच सूं ई अणजाण है कै मीठो सुर नर कोयल रो हुवै। मादा कोयल तो बेसुरी हुवै। फेर ई बे मीठै -सुरीलै सुरआळी लुगायां नै सुर कोकिला कैय’र आदरै।
कोयल जियां मीठा बोल बोलणआळां कै बोलणआळ्यां रै चकारै में आय’र धोखो खावण रो डर घणो रैवै जदकै कागलै जियां बाड़ा पण खरा बोलणिया सूं धोखै रो डर कमती अर सीख रा चांस बेसी रैवै।
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