“युवा लेखन विशेष में प्रखर शर्मा की कविता पर विमर्श”
प्रखर शर्मा समकालीन हिन्दी के उदीयमान युवा कवि, साहित्यकार एवं शोधार्थी हैं। मूलतः उत्तर प्रदेश के अमेठी जनपद के निवासी प्रखर शर्मा वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोधार्थी के रूप में अध्ययनरत हैं। उनकी रचनाओं में समकालीन जीवन, प्रकृति, लोक-संवेदना और मानवीय सरोकारों का सशक्त एवं संवेदनशील चित्रण मिलता है। उनकी कविताएँ एवं लेख दैनिक जागरण, अमर उजाला, भावक पत्रिका (केंद्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा), वीणा, संकल्पना, पल्लव सहित अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।

जीवन और सफर
सफर महसूस करना हो
तो देखो,
बगीचे में खिले फूलों के क्रम
कि जो आज कली हैं,
कल फूल होंगे
और जो फूल हैं
वो फल।
सफर तय करना हो
तो देखो,
अपने सर के बाल और नाखून
कि जो पिछले दिनों छोटे थे,
आज बड़े हुए हैं।
सफर का इंतजार हो
तो देखो
छीमियों में आने वाले दाने को
कि जो कल तक ठूठे थे
आज रसीले हैं।
सफर में खुशी ढूँढ़नी हो
तो देखो,
उस चिड़िया को
जो कई सालों से अकेली थी,
आज उसका एक परिवार है।
जीवन में,
सफर देखना और सफर करना,
दोनों,
बेहतर क्रियाएँ हैं;
सफर खत्म होने से।
दिन-दोपहरिया और रातरानी
तुमने कभी दिन-दोपहरिया देखा है?
चमचमाती धूप में
उसके प्रज्ज्वलित कलेवर
मणिधारक नाग की तरह
फुफकारते हैं
और शाम होते ही
सिकुड़ जाते हैं।
उसके आभामंडल पर लगे
जल मिश्रित मृदा के छींटे
दब जाते हैं उसी सिकुड़न में
आज की भूख और
कल की ताजगी के लिए।
इतने में उत्तर मिलता है
अरे भाई! मैंने नहीं देखा है दिन-दोपहरिया।
मैंने हँसकर कहा—
जिसने सही से दिन नहीं देखा है
वह दिन-दोपहरिया क्या देखेगा।
अच्छा, तो क्या तुमने रातरानी देखा है?
उसने जवाब दिया—
हाँ, श्वेत वर्ण, नर्म चिकनी बनावट
लगभग कृशकाय महिला की भाँति उसका कलेवर
उसके पराग से गिरा एक कण भी
सुगंधित करता है
पूरा वातावरण।
और सुबह होते ही
गुम हो जाता है बीती रात में।
मैंने कहा—
दिन-दोपहरिया सोख लेता है
दिन की धूप और हवा की धूल
और रातरानी
उसी परिवेश में बिखेर देती है
केवल और केवल
दिखावटी महक।
