‘नियति’ : ( कविता )

महीनों बाद 

अस्पताल से छूटकर 

आज काम पर 

फिर वापस आई

गुलबिया 

एक बच्ची को 

गोद में थामे

दो और बच्चे उसका 

आँचल पकड़े

एकटक ताक रहे थे मुझे 

उनकी नाक बह रही थी 

और आँखों में तैर रहा था 

भय भूख जिल्लत 

और ढेर सारे 

अनुत्तरित प्रश्न 

गुलाबिया भूल चुकी थी 

अपने पति के लात जूते 

और वह लुकाठी भी 

जो उसके सिर पर 

जा लगी थी बेरहमी से 

वह भूल चुकी थी 

सास ने झोंटा पकड़ 

निकाला था घर से 

छिहतरी और रंडी कहकर 

सारे गाँव के सामने 

यह भी भूल चुकी थी 

सउरी में दो रात 

बिना कुछ खाए 

काट दिए थे उसने 

बेटी जनने पर 

वह भूल चुकी थी 

पीठ पर पड़े निशान

जो बनाए गए थे 

इन कुछेक सालों में

लेकिन कैसे!

भर मांग सेनुर किए

काजर टिकुली और 

चटकार लाली लगाए

खुलकर नाचती है वह 

जब गाँव में जाती है 

घर -घर सोहर गाने

हर बात भूल जाना 

हर दर्द भूल जाना 

हर चोट भूल जाना 

बार-बार भूल जाना 

क्यों है उसकी नियति?

स्त्री का उत्सवधर्मी होना

क्या इतना जटिल है!

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