सिखों के पाँचवें गुरु – श्री गुरू अर्जुन देव जी का जीवन और उपदेश : डॉ. चरनजीत सिंह

श्री गुरू नानक देव जी की पाँचवीं जोत साहिब श्री गुरू अर्जुन देव जी ने श्री गुरू नानक देव जी के आदर्शों के अनुरूप सिख धर्म की नींव पर उच्च विचारों और सिद्धांतों की इमारत खड़ी की , और इसकी रक्षा के लिए अपना आप भी कुर्बान कर दिया। श्री गुरू अर्जुन देव जी ने धर्म की नींव को मजबूत बनाने और समाज के बुनियादी सिद्धांतों की ख़ातिर अपनी कुर्बानी देकर सिद्ध कर दिया कि कोई भी धर्म या देश बड़ी इमारतों से बड़ा नहीं बनता बल्कि बड़ी कुर्बानियों की बुनियाद पर ही निर्मित होता है।
श्री गुरू अर्जुन देव जी ने गुरुगद्दी पर विराजमान हो कर गुरू धर्म, गुरू शक्ति, गुरू लहर और गुरू संस्था को स्थापित और उजागर करने के लिए जो योग्य अगुवाई की और जो योजनाएं बनाईं उन्हें अध्यात्मिक और आदर्शक रूप से साकार किया। उनका सिर्फ़ ऐतिहासिक गौरव ही नहीं बल्कि अध्यात्मिक जगत में तथा सिख धर्म की विशेषता और विलक्षणता का प्रदर्शन भी हुआ है।
श्री गुरू अर्जुन देव जी चौथे गुरू श्री गुरू रामदास जी के सबसे छोटे सुपुत्र थे। बड़ा भाई पृथी चंद आप जी से ईर्ष्या करता था, क्योंकि आप अधिक प्रतिभाशाली व दूरदर्शी थे। आपको पिता से दूर रखने के लिए वो हर समय कोई न कोई योजना बनाता रहता था। एक बार श्री गुरू अर्जुन देव जी ने अपने पिता को लाहौर से चिट्ठियाँ लिखी थीं जिनमें पिता के प्रति प्रेम और मिलने की लालसा के अद्वितीय रस के रंग में डूबे मन के जज़्बात प्रकट किए थे। पृथी चंद ने गुरू अर्जुन देव जी द्वारा भेजी गई तीनों चिट्ठियाँ छिपा लीं। पिता श्री गुरू रामदास जी को जब चिट्ठी पर पड़े अंकों से पहली चिट्ठियों के बारे में पता चला तो उन्होंने दोनों को एक चिट्ठी और लिखने को कहा। गुरु अर्जुन देव जी की लिखी चिट्ठी में पहले की तीनों चिट्ठियों जैसे काव्यात्मक गुण और अलौकिक भावनाएँ थीं।
पहली तीनों चिठ्ठियों में जहाँ गुरू पिता को मिलने की तीव्र इच्छा और लालसा का शानदार चित्र देखने को मिलता है, वहीं गुरू अर्जुन देव जी की लिखी चौथी चिट्ठी में पिता मिलाप के बेमिसाल वर्णन सहजता और गुरू पिता के प्रति दर्शन व समर्पण की भावना उजागर होती है:

“भाग होवा गुरु संत मिलाया
प्रभ अबिनासी घर महि पाया
सेव करी पल चसा न विछड़ा
जन नानक दास तुम्हारे जीओ
।।(४)।।
हऊ घोली जीओ घोल घुमाई
जन नानक दास तुम्हारे जीओ”

श्री गुरू अर्जुन देव जी का जीवन सच, सिमरन, सेवा, सहज और गुरु के प्रति समर्पित कमाई वाला था।आप गुरमत ब्रह्म और गुरमत प्रकाश थे साथ ओतप्रोत होने के कारण आत्मिक मंडल के रस और आनंद से सरोबार, मिथ्या, वैर-विरोध, लोभ- मोह, अहम-अहंकार की वृत्ति की पकड़ से ऊपर थे।यही कारण है कि श्री गुरू रामदास जी ने अपनी जीवन-शैली और उच्च आत्मिक उड़ान को देखते हुए अपनी जागृत जोत अध्यात्मिक जुगत से आप में टिकाने का निर्णय लिया।
गुरू घर की महिमा में रंगे समकालीन भट्टों ने इस संबंध में गुरू धर्म, गुरू शक्ति, गुरू लहर और गुरू संस्था का वर्णन निम्न प्रकार से किया है:

रामदास गुरू जग तारन कऊ
गुरू जोत अर्जुन माहि धरी।।

भन मंथरा कछु भेद नहीं
गुरू अर्जुन प्रतख हरि।।

छत्र सिंहासन पृथ्मी
गुरू अर्जुन को दे आयो।।

श्री गुरू अर्जुन देव जी ने गुरू सिंहासन पर शोभायमान होकर उसी अध्यात्मिक जुगत को जारी रखा, जिसकी नींव श्री गुरू नानक देव जी ने रखी थी। श्री गुरू अर्जुन देव जी ने सरबत के भले के लिए, मानस-जाति के उत्थान के लिए, मानव धर्म की रक्षा के लिए, उच्च साहित्य , खुशहाल जीवन दर्शन और इतिहास के क्षेत्र में ऐसे सार्थक और सृजनात्मक कार्य किए, जिसकी मिसाल और कहीं नहीं मिलती।
श्री गुरू रामदास जी के समय तक सिख धर्म का काफी प्रचार हो चुका था। सिख धर्म के उसूलों और उपदेशों के प्रचार करके लोग सिख धर्म के अनुयायी बन चुके थे। गुरू साहिब की बानी का निरंतर बढ़ता प्रभाव जन-साधारण में पसार पा चुका था। श्री गुरू अर्जुन देव जी के समय सिख धर्म अपने पूरे यौवन पर उभर कर सामने आया। सन् 1588 ईस्वी में सचखंड श्री हरिमंदिर साहिब श्री अमृतसर की नींव रखी गई। इसके स्थापन से सिख धर्म का एक केन्द्रीय स्थान बन गया। बड़ी गिनती में श्रद्धालु दर्शनों हेतु आने लगे।
हरिमंदिर साहिब गुरू जोत की जीवन-पद्धति, सोच, चिंतन और ज्ञान-प्रकाश का प्रतीक है। इसकी विशेषता और विलक्षणता इसके रूप, स्वरूप का हर रंग अपने आप में संपूर्ण है।

हरिमंदिर में हरि वसै
सब निरंतर सोई
नानक गुरमुख वणजिए
सच्चा सौदा होई।।
(प्रभाती महला 3)

हरिमंदिर सोई आखीए
जिथे हर जाता
मानस देह गुरबचनी पाया
सब आत्म राम पछाता।।
(रामकली सिरी वार महला3)

हरिमंदिर हरि का हाट है
रखिया सूद सवारि
दिल विच सौदा इक नाम
गुरमुख लैन सवार।।
(प्रभाती महला3)

श्री गुरू अर्जुन देव जी ने सन् 1604 ईस्वी में सरब सांझीवालता के लिए जुगो-जुग अटल , दीन-दुनिया के रक्षक, शब्द-रूपी बानी को बड़ी कलात्मक और दूरगामी दृष्टि से श्री गुरू ग्रंथ साहिब जी का संपादन कार्य सम्पन्न कर दिया।इसका प्रकाश भी सचखंड श्री हरिमंदिर साहिब में कर दिया गया। इस ग्रंथ में बिना किसी भेद-भाव के गुरू साहिबान के इलावा हिंदुस्तान के और सच व धर्म से जुड़े संतों, महापुरुषों, पीरों -फ़कीरों और दरवेशों की बानी शामिल की गई।
श्री गुरू अर्जुन देव जी आप एक महान साहित्यकार थे। श्री गुरू ग्रंथ साहिब में आप द्वारा रचित बानी सबसे अधिक है। आप जी ने अनेकों छंद बेमिसाल ढंग से निभाए हैं।आप जी को रस, अलंकार वो रागों की गहरी समझ थी। इसके अतिरिक्त केंद्रीय पंजाबी, मुल्तानी, लहिंदी, फ़ारसी और संस्कृत का ज्ञान – आपको महान भाषा विज्ञानी होता दर्शाता है।
सिख धर्म की दिन-ब-दिन बढ़ रही शोभा समय के हुक्मरान जहाँगीर के कानों तक भी पहुँची। अपने दरबारियों और दीवान चंदू की बातें सुनकर जहाँगीर ने गुरू जी को लाहौर बुलवा भेजा। चंदू ने मौक़ा देख कर जहाँगीर को भड़का दिया कि गुरु ग्रंथ साहिब में इस्लाम के विरुद्ध बातें दर्ज हैं और गुरू अर्जुन देव हुक़ूमत के ख़िलाफ़ बग़ावत की तैयारी कर रहे हैं। जहाँगीर ने गुरू अर्जुन देव जी को श्री गुरू ग्रंथ साहिब में हज़रत मुहम्मद साहिब की प्रशंसा लिखने को कहा पर गुरू जी ने साफ़ इंकार कर दिया और कहा कि इस ग्रंथ में मात्र एक परमात्मा की महिमा की गई है न कि किसी व्यक्ति विशेष की। गुरू जी की दृढ़ता और निर्भयता को देख कर गुरू जी पर दो लाख रुपए जुर्माना भरने और सज़ा भुगतने के लिए तैयार रहने को कहा। गुरू जी सच के मार्ग से विचलित न हुए और अपनी कुर्बानी देनी उचित समझी।
जहाँगीर ने गुरू जी को अपने दीवान चंदू के हवाले कर दिया ।अब चंदू के हाथ अपनी निजी दुश्मनी निकालने का मौक़ा हाथ लग गया, क्योंकि गुरू जी की दिन-ब-दिन बढ़ती कीर्ति को देखते हुए लाहौर के दीवान चंदू लाल की तरफ से भेजे ब्राह्मण ने चंदू की लड़की की रिश्ता गुरू जी के सुपुत्र हरिगोबिंद जी के साथ पक्का कर दिया था। जब चंदू को इस बात का पता चला तो उसे बहुत बेइज़्ज़ती लगी, अपने आपको बड़ा जान कर चंदू ने गुरू घर के बारे में अपशब्द कहने और बुरा-बला कहने में कोई कसर न छोड़ी। नम्रता और परोपकार की मूरत श्री गुरू अर्जुन देव जी तो स्तुति और निंदा से ऊपर थे पर सिख संगत को अहंकारी चंदू की गुरू -घर के बारे में उसकी की गई निंदा बुरी लगी और उन्होंने गुरू जी से निवेदन किया कि वे अहंकारी चंदू का यह रिश्ता तोड़ दें। गुरू जी की ओर से रिश्ते के इंकार होने पर चंदू जल-भुन गया और गुरू जी का दुश्मन बन गया था।
चंदू ने अपनी निजी दुश्मनी और हाक़िम के हुक़्मों की पालना की आड़ में गुरू अर्जुन देव जी को असहनीय कष्ट देने का निर्णय कर लिया। अति भीष्ण गर्मी में आग से तपे तवे पर गुरू जी को बिठाया गया। उनके सिर पर गरम रेत डाली गई और देग़ में उबाला गया।
शांति के मसीहा , नम्रता और परोपकार की मूरत गुरू जी अपने उसूलों पर कायम रहे। गुरू जी धर्म को कायम रखने की ख़ातिर प्रभु -चरणों में जा बिराजे।।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »