मनोज श्रीवास्तव ( साक्षात्कार ) : मानस के अनछुए पहलू


डॉ. संध्या सिलावट जी ने लिया मनोज श्रीवास्तव जी, मुख्य चुनाव आयुक्त, मध्य प्रदेश का साक्षात्कार
भारतीय समाज में तुलसीदास कृत रामचरितमानस के सुंदरकांड की पंक्तियों ‘ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥’ पर दीर्घकाल से चली आ रही अत्यंत कर्कशता व कोलाहल एवं अर्थ-भ्रॉंतियों पर ज्ञान परंपरा के प्रकाण्ड विद्वान् एवं वर्तमान में मुख्य चुनाव आयुक्त, म.प्र. श्री मनोज श्रीवास्तव से डॉ. संध्या सिलावट की बातचीत।
प्रश्न – ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥ पंक्तियों का वास्तविक अर्थ क्या है, क्या इसमें वर्णित पॉंचों को ताड़ना (पीटने) का अधिकारी बताया गया है?
उत्तर – ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥ वे जिन पर सबसे ज्यादा कोलाहल और कर्कशता चली आई है।
इसमें पहले यह देखना चाहिए कि यह पंक्तियाँ रामचरितमानस के सुंदरकांड में किस संदर्भ में कब और क्यों आई हैं?
इन पंक्तियों का संदर्भ यह है कि राम समुद्र से रास्ता मांग रहे है। समुद्र रास्ता नहीं दे रहा है। वे विभीषण की सलाह पर चल रहे हैं, हालांकि लक्ष्मण की राय किंचित् भिन्न है। विनय करने के खिलाफ है। तीन दिन बीत जाने पर भी जड़ जलधि नहीं पसीजता। तब राम ‘सकोप’ बोलते है कि ‘भय बिनु होइ न प्रीति’ बिना भय के प्रीति नहीं होती। शठ के साथ विनय का कोई अर्थ नहीं। जैसे ‘ऊसर बीज भए फल जथ’ बंजर भूमि पर बीज नहीं फलते। वे लक्ष्मण को आदेश देते हैं कि ‘लछिमन बान सरासन आनू’- कि वह उनके धनुष बाण लेकर आये ताकि वे ‘सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू’- समुद्र को सुखा दें। ‘संघानेउ प्रभु बिसिख कराला’ फिर राम के प्रत्यंचा तानते ही उसके शर से जो ऊष्मा पैदा होती है, अग्नि पैदा होती है तो उसके ताप से समुद्री जीव जन्तु सब अकुलाने लगते हैं। शर संधान मात्र से, शर अभी छोड़ा नहीं है केवल संधान किया है। राम समुद्र को दंड देने को प्रस्तुत हैं।
अब समुद्र प्रकट होता है, कहता है कि सृष्टि के महाभूत (तत्त्व) ‘तव प्रेरित मायाँ उपजाए हैं’ सब तो आपकी माया से प्रेरित है और ‘मरजादा पुनि तुम्हरी कीनी’ है। इन सब का अपना स्वभाव है और यह स्वभाव जो है तुम्हारा दिया हुआ है सृष्टि के तत्व भी आप के हैं, उनकी मर्यादा भी आप की है। ‘सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।‘ सृष्टि हेतु सब उपाय किया गया है। समुद्र के कहने का आशय यह है कि ‘गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।‘ गगन, समीर, अनल, जल, धरणी ये पांच तत्व महाभूत हैं। इन सब पंच महाभूतों की एक भौतिकी है ये प्रकृति का विज्ञान है प्रकृति का एक फिजिक्स है और उस भौतिकी के नियमों को समझे बिना आप ये काम (सेतु बनाना) नहीं कर पाओगे। विभीषण की सलाह के अनुसार यदि आप तीन दिन वहां पर प्रावकेशन (अन्न-जल त्याग देना) पर बैठ जाओ तो भी नहीं हल होगा और यदि आप क्रोध करो तो भी हल नहीं होगा। वह हल होगा कैसे? इन महाभूतों को समझने से महाभूतों को ऑब्जर्व करने से ।
विज्ञान क्या है? विज्ञान ऑब्जर्वेशन है किसी चीज को बारीकी से देखना। प्रकृति के यथार्थ स्वरूप को जानना-समझना ही तो विज्ञान है।
जिस तरह से आप ढोल, गंवार, शूद्र, पशुओं व नारी के बारे में जो कंसर्न (चिंता) दिखाते हो, जो केअर (परवाह) दिखाते हो, जो इनको ढंग से ताड़ते हो ओब्जर्व (ध्यान देना या देखना) करते हो जैसे ढोल को आप ओब्जर्व नहीं करोगे तो ढोल बजेगा नहीं। ढोल बजाने वाला धीरे धीरे थाप देकर देखता है जोर से नहीं मारता है।
जिस तरह से ये पांचों ढोल, गंवार, शूद्र, पशु व नारी आपकी विशेष अवेक्षा के पात्र हैं, आपकी विशेष आब्ज़र्वैशन के पात्र हैं। ये आपकी विशेष केयर और कन्सर्न के पात्र हैं,उसी तरह से ये पांचों तत्त्व गगन, समीर, अनल, जल व धरणी भी हैं। आपमें यह संवेदनशीलता होनी चाहिए। यह उपक्रम जितना मनुष्य पर गुजरता है, उतना ही समुद्र पर भी गुजरता है। समुद्र की संवेदनशीलताओं को भी उतने ही अवधान से, उतने ही कन्सर्न से, देखना होगा जैसे ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और नारी को देखना जरूरी होता है। क्या ऐसी परियोजना हाथ में लेने से पहले कोस्टल शॉरलाइन सेंसिटिविटी देखना जरूरी नहीं रहा होगा? लगभग उसी ममता और स्नेह के साथ जिस का अधिकार इन वर्गों को है। हैं कुछ लोग जो इन्हें अवमानवीकृत (डी-ह्यूमनाइज़) करते हैं, उन जैसे कठोर हृदयों के लिए समुद्र भी एक कमोडिटी है।
जब तक इस भौतिकी के नियमों को आप ढंग से नहीं समझोगे और ओब्जर्व नहीं करोगे आप पुल नहीं बना पाओगे। एक साइंटिफिक प्रोजेक्ट किया जा रहा था उस समय का सबसे बड़ा वैज्ञानिक प्रकल्प था। इंजीनियरिंग प्रकल्प था कि हम पुल बना रहे थे। जब समुद्र तत्वों- पंच महाभूतों की बात कहता है- प्रकृति की मर्यादा की बात करता है, तब वह ल्यूसी जोंस (न्यूजवीक, अक्टूबर 15, 2007) की बात को ही सच कर रहा है कि “साइंस इज़ द प्रोसेस ऑफ़ ट्राइंग टू अंडरस्टैंड द नेचर ऑफ़ रियल्टी।” यह यथार्थ की प्रकृति समझने की बात है। पंच महाभूतों की भौतिकी को समझने की। आप पुल बना रहे हैं तो इस स्थान की जो फिजिक्स है उसको समझे बिना नहीं हो सकता। फॉस्टर दे मोल्टन ने यही कहा: ….. “ऑल द ग्रेट साइंटिस्ट्स हैव वन थिंग इन कॉमन: ईच स्नैच्ड फ्रॉम द सटल मोशन्स ऑफ़ नेचर वन इरवोकेबल सीक्रेट; ईच कॉट वन फेदर ऑफ़ द प्लूमेज ऑफ़ द ग्रेट वाइट बर्ड दैट सिंबलाइज़ेज़ एवरलास्टिंग ट्रुथ।” यह कार्य कि प्रकृति के स्वरूप को जाना जाये, प्रकृति का नहीं है; मनुष्य का है।
तो ताड़ने का अर्थ होता है देखना, गौर से देखना, ऑब्जर्व करना। इन पांचों तत्वों ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और नारी को जिस तरह से आप गौर से देखते हो वैसा ही आप इन पंचमहाभूतों को देखो फिर बनाओ पुल तो राम पूछते हैं कि भईया तुम बताओ क्या करें?
समुद्र ‘नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।‘ नल और नील दोनों भाइयों का नाम लेता है, जिन्होंने अपने यौवनावस्था में शिक्षा प्राप्त की है कि ‘तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।‘ उस तरह की इंजीनियरिंग करेंगे कि उनके छूने से पत्थर तैरने लगेंगे। इस मामले में भारत का वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।
हमारे यहां वैसे नहीं हो रहा है कि जैसे बाइबल में होता है कि लॉर्ड मूसा हैं। वह लाल सागर के पास पहुंचते हैं। उनके पीछे-पीछे इज़राइली भी चले आ रहे हैं सब के सब इज़राइलियों का ‘ए़क्सोडस’ (पलायन) हो रहा है, उनको निकाल रहे हैं। इज़राइलियों के पीछे इजिप्शियन सेना आ रही है और लॉर्ड मूसा को इज़राइलियों को बचाना है तो वह समुद्र के पास पहुंचकर पुल नहीं बनाते सिर्फ छड़ी घुमाते हैं तो समुद्र दो भागों में फट जाता और इज़राइली उससे पार हो जाते हैं। उस पार पहुंचकर जो लॉर्ड मूसा हैं फिर एक बार छड़ी घुमाते हैं तो जो इजिप्शियन सेना उनका पीछा करते आ रही थी बीच समुद्र में डूब के मर जाती है और उनकी समस्या हल हो जाती है। लेकिन जो तुलसी हैं किसी चमत्कार पर यकीन नहीं रख रहे हैं और न ही वाल्मीकि किसी चमत्कार पर यकीन रख रहे हैं। जो पुल बना रहे हैं तो एक वैज्ञानिक बात कर रहे हैं। चमत्कार की डेविड ह्यूम की परिभाषा ही यह है : “अ मिरेकल इज़ अ वॉयलेशन ऑफ द लॉज़ ऑफ नेचर।” रामकथा में ऐसा कोई चमत्कार नहीं है। वहां आयाम प्रकृति और तत्वों के मूल स्वरूप को ऑब्जर्व करने और समझने का है और उसके आधार पर एक बड़ा इंजीनियरिंग प्रकल्प हाथ में लिया जाता है।
यदि हम पूर्वोल्लिखित मूसा के चमत्कार से इसकी तुलना करें तो वहां एक इजिप्शियन आर्मी द्वारा इज़राइलियों का पीछा करना रोकने के लिए खुला हुआ समुद्र बंद हो गया था और यहां राम की सेना को पार कराने के लिए कोशिश की जा रही है। प्रश्न यह है कि क्या राम का प्रताप समुद्र के शोषण से ही सिद्ध होगा? या कोई और रास्ता है? रास्ते के लिए रास्ता?
बात इसी देखने की है, छुपे हुये को, आवृत को ताड़ने की। अल्बर्ट आइंस्टीन इसी ताड़ने की बात कर रहे थे, जब उन्होंने कहा “लुक डीप इंटू नेचर, एंड देन यू विल अंडरस्टैंड एवरीथिंग बेटर।” विज्ञान का मूल यही ताड़ना, यही आब्जर्वेशन है। क्रिस्टोफर पाओलिनी ने यही सूत्र दिया था : लर्न टू सी वॉट आर यू लुकिंग ऐट [1] विज्ञान में ईक्षण प्रयोगशाला में है। सूक्ष्मदर्शी यंत्रों में है, दूरदर्शी उपकरणों में है विज्ञान का मुख्य तत्व क्या है- हम ऑब्जर्व करते हैं, हम चाहे तो टेलिस्कोप से करें माइक्रोस्कोप से करें लेकिन हम चीजों को बारीकी से देखें ताड़ना वही होता है। और वह साधारण देखना नहीं है, ताड़ना है। उसमें थोड़ी सावधानी है, केअर है, अवेक्षा है, कन्सर्न है। यहां पर ताड़ने का मतलब ऑब्जर्वेशन हो गया है, सकल ताड़ना ‘कंप्रहेंसिव ऑब्जर्वेशन’ है सकल ताड़ना के अधिकारी से अभिप्राय हैं कि कंप्रहेंसिव ऑब्जर्वेशन (क्लॉज ऑब्जर्वेशन) करो, इन पांचों के लिए ढोल, गंवार, शूद्र, पशुओं व नारी की जैसे आप कंप्रहेंसिव ऑब्जर्वेशन करते हो जैसे ढोल के बारे में आप ऑब्जर्वेशन करते हो, गंवारों के बारे में भी आपको विशेष रूप से उनका ऑब्जर्वेशन करना पड़ेगा, शूद्र के लिए भी, पशुओं के लिए भी, नारी के लिए भी ये सब आपकी विशेष अवेक्षा के पात्र हैं। जो जिस तरह से जिस विशेष अवेक्षा के पात्र हैं उसी तरह से करना होगा। प्रकृति के पांचों तत्वों को भी बहुत बारीकी से देखना है। जो भौतिकी है इस पर निर्भर रहती है कि आप उसको बारीकी से देखते हो कि नहीं।
पूरी तरह से देखना पड़ेगा इतना बड़ा प्रोजेक्ट जो है मजाक मजाक में नहीं बन जाएगा तो इसलिए इसे उस संदर्भ विशेष में कंप्रहेंसिव ऑब्जर्वेशन (केअर, अवेक्षा, कन्सर्न, परवाह) हेतु कहा गया अन्यथा इस संदर्भ में इस बात का क्या मतलब है ढोल, गंवार, शूद्र, पशुओं व नारी को तुम पीटो यहाँ पीटने से मतलब क्या है, उस प्रसंग में पीटने क्या मतलब है इस बात में।
आज ऑफिस मे गहमागहमी का माहौल है आज नये मैनेजर ने ज्वाइन किया है। सब टेबिलों के आसपास झुंड बनाये सिर में सिर घुसाये खुसुरपुसुर कर रहे थे। तभी पाटिल जी की आवाज आई ‘’अरे सुनो मुझे पता लगा है कि हमारे नये मैनेजर गिरीश काफी कड़कमिजाज और नियम कायदे वाले हैं।‘’
‘’हुँ ! इसमें क्या खास है यह तो हर अफसर का अपना अपना काम करने का तरीका होता है जी मगर खास बात तो मेरे पास है।‘’ व्यास जी ने अपनी आँखें चारों और घुमाते हुये धीमे स्वर में कहा ‘’सुनो वह बहुत र्स्माट हैं और अभी तक शादी भी नहीं की।‘’
सबकी आँखें अचरज से फैल गईं ’’इतनी उम्र तक शादी नहीं हुई जरूर कोई वजह होगी वर्ना इतना र्स्माट बड़ी पोस्ट वाला आदमी अभी तक।‘’ संध्या सब चुपचाप सुन रही थी। उसने थोडे तेज स्वर में बोला ’’अरे! आप सब अभी नये मेनेजर सर से मिले ही नहीं हैं और तरह तरह के अनुमान लगाने लगे? ‘’
आज वह दिन आ ही गया जब नये मैनेजर यानी गिरीश वर्मा ने कार्यभार ग्रहण किया है। आज संध्या ऑफिस आने में लेट हो गई। वह टेबिल पर आकर बैठी ही थी कि रमेश ने आकर कहा ”संध्या मैडम। नये मैनेजर साहब बुला रहे हैं आपको कई बार पूछ चुके हैं।” धीमी भेद भरी आवाज़ में वह उसके कानों में फुसफुसा रहा था। संध्या सहम सी गई- हे भगवान! नये मैनेजर के पहले ही दिन वह लेट। कहीं कुछ कह-वह दिया उन्होंने तो कितनी बइज्जती हो जायेगी उसकी। चलो उनके कुछ कहने के पहले ही वह सॉरी बोल देगी खुद को आश्वस्त करती वह खुद से ही बोल रही थी। कहीं ना कहीं उसके कानों मे अपने पति कमलेश के स्वर उभर रहे थे ‘’संध्या ! क्या यार तुम यूँ ही परेशान होती रहती हो इस नौकरी में। अब मैं इस पोजीशन पर तो हूँ ही कि हम सब अच्छे से जी सकें। क्या कमी है भला हमारे जीवन में? ‘’
‘’हाँ कमलेश! तुम सही कहते हो जीवन में कोई कमी नहीं है मगर इतनी पुरानी नौकरी है मेरी और फिर हमारी बेटी दिया भी तो अब बड़ी हो रही है उसके लिये ही सही।‘’ यह सब याद करते करते वह मैनेजर के केबिन तक पहुँच गई थी रूमाल से अपने चेहरे का पसीना पोंछ और चेहरे के हाव भाव दुरूस्त कर उसने दरवाजा खोल ”मे आई कम इन” कहा। सामने मैनेजर की कुर्सी दीवार की तरफ घूमी हुई थी ।
अचानक ही कुर्सी घूमी और जो चेहरा सामने आया वह हतप्रभ रह गई ‘’गिरीश तुम आप।‘’ अचानक इतने समय बाद यह चेहरा फिर उसके सामने था।
‘’अरे हाँ! मैं ही हूँ, वही गिरीश ! नहीं नहीं कभी तुम्हारा गिरीश। सरप्राइस हुई ना मगर मैं सरप्राइस नहीं हूँ मुझे पता था कि तुम यहीं हो। सब पता है तुम्हारे बारे में। एक बेटी भी है तुम्हारी बिल्कुल तुम पर ही गई है सुंदर सलोनी कहो ठीक कहा ना मैने। ”उसके कानों में लगातार गिरीश की आवाज़ पड रही थी और वह अंदर ही अंदर अस्तव्यस्त हो रही थी अपने को संभाल उसने धीमे स्वर में कहा था ‘’ कैसे है आप।‘’
’’हुम्म ! अच्छा हूँ बहुत अच्छा।‘’ सामने रख पेपरवेट को घुमाते हुये वह बोलते जा रहे थे ‘’और हाँ अभी तक शादी भी नहीं की। कारण कोई बड़ी गहराई तक दिल में उतर गया था और आज़ तक वहीं है इसी कारण शायद कोई और मेरे दिल तक पहुँच ही नहीं सका।‘’
संध्या चुपचाप सब सुनती रही, कहने को था ही क्या? अचानक ही उसने कहा ’’सर मैं जा सकती हूँ ।‘’
‘’अरे क्या सर सर लगा रखी है संध्या गिरीश कहो ना।‘’ मगर संध्या का मन कुछ व्यग्र हो उठा था । शाम को घर आकर भी संध्या को गिरीश का ही ध्यान आ रहा था बिल्कुल भी नहीं बदला वह। वही बेबाकी, वही मन मोहने वाला अंदाज़ और अभी तक कितना र्स्माट व फिट है, वैसा ही कसा हुआ शरीर, घने बाल। वह सिर झटक बार बार उसे अपनी नजरों से, ख्यालों से दूर करना चाह रही थी मगर उसका बेबाक अंदाज फिर उसे कहीं दूर अपने अतीत की तरफ खींच लिये जा रहा था तो क्या अभी तक गिरीश उसके मन की किसी दराज में छुपा बैठा है। कालेज के दिनों में वह गिरीश से पूरे चार साल जूनियर थी। कालेज में ही न जाने कब हुई हल्की सी पहचान ने पहले दोस्ती और फिर प्रेम का रूप ले लिया था पता ही नहीं चला था। गिरीश उस समय भी पढ़ ही रहा था जबकि उसकी पोस्ट ग्रेज्येुशन के बाद जब उसने अपने पिता को गिरीश के बारे में बताया था तो उन्होंने कहा था ‘’संध्या ! गिरीश अभी पढ़ रहा है जब तक वह अपनी नौकरी में सेट होगा तब तक मैं इंतजार नहीं कर सकूंगा। एक बहुत अच्छा रिश्ता तुम्हारे लिये आया हुआ है।‘’
और जब संध्या ने यह बात गिरीश को बताते हुये शहर से कहीं दूर जाकर एक नई दुनिया बसाने की बात कही थी तो उसने कहा था ”नहीं ! संध्या ऐसा कुछ नहीं करेगें, हम इंतजार कर सकते हैं वक्त बदलने का।‘’ और फिर यह इंतजार लंबा होता देख और गिरीश की बेपरवाही देख संध्या की शादी कमलेश से हो गई थी ।कमलेश का प्यार और अपनत्व उसे जीवन के सुखों की सुरभि से भर देता था फिर तुरंत ही दिया की पैदाइश ने उसे संपूर्णता से भर दिया था। कभी कभी वह कमलेश के शहर के बाहर लगातार चल रहे टूर से परेशान होती तो कमलेश ही उसे प्यार से समझा देता ‘’ओ हो संध्या! इस तरह मुँह मत फुलाया करो आखिर यह सब मेहनत मैं तुम्हारे और दिया के लिये ही तो करता हूँ।” और उसका गुस्सा कहीं दूर चला जाता फिर उसने भी तो यह नौकरी ज्वाइन कर ली थी। समय भी मानो पंख लगाकर उडता चला जा रहा था। नन्ही सी दिया पहले स्कूल और फिर अब कालेज के सेकंड ईयर में आ गई दिया हूबहू संध्या का प्रतिंबिंब ही थी मानो।
ऑफिस में संध्या जितना गिरीश से दूरी बनाकर चलना चाहती उतनी ही गिरीश की उससे नजदीकियाँ बनाने की कोशिशें तेज हो जातीं।
‘’अरे संध्या ! इतने दिन हो गये मुझे इस शहर में आये और तुमने मुझे कभी अपने घर भी आने को नहीं कहा। भई! कभी हमें भी तो अपने पति महोदय और बेटी से मिलवाओ ना।‘’कई बार लगातार इसी तरह सुनने के बाद आखिरकार संध्या ने उसे अपने घ्रर खाने पर बुला ही लिया।
और आज शाम गिरीश संध्या के घर पर उपस्थित था समय से पहले ही। कमलेश भी घर पर ही रूके हुये था और फिर गिरीश के जादुई व्यक्त्वि और लच्छेदार बातों ने पता नहीं कब औपचारिकता की दूरी मिटा उन्हें आपस में दोस्ताना व्यवहार करने पर मजबूर कर दिया। अचानक ही गिरीश ने दिया की तरफ मुड़ कर कहा ‘’वाह दिया बेबी! आप तो बड़ी प्यारी हो।‘’
अपनी उम्र से मजबूर दिया ने ठिनकते हुये कहा था ‘’क्या अंकल। अब आप भी मुझे बेबी कहेगें।‘’ उसके गोरे चेहरे पर हल्की सी नाराजगी झलक उठी जिससे उसका रंग गुलाबी सा हो उठा था। गिरीश ने ध्यान से गहरी नज़रों से उसके रक्तिम होते चेहरे को देखा और अपने कान पकड़ लिये ‘’नो नो स्वीट हार्ट तुम तो एक यंग और प्रिटी गर्ल हो।’’ गिरीश ने उसके गालों को सहलाते हुये कहा था। दिया का चेहरा दमक उठा और गिरीश के जादुई स्पर्श ने उसके तन के साथ साथ उसके युवा अछूते मन में भी अजीब सी थरथराती हुई लहरें उठा दी थीं। पता नहीं क्यों संध्या गिरीश का यूँ दिया को छूना अंदर तक कचोट सा गया था मगर उसने इसे अपने मन का वहम मान इस ख्याल को कहीं दूर झटक दिया था। सब खाना खाने बैठे डायनिंग टेबिल गिरीश की पसंदीदा चीजों से भरी हुई थी जाने कैसे आज़ संध्या के हाथों ने स्वमेय ही यह सब तैयार कर दिया था, कुछ पुरानी यादें उभर आई थीं। गिरीश ने ध्यान से गहरी नजरों से संध्या को देखा था मानो कहना चाह रही हो तो अभी तक तुम्हें मेरी पसंद याद है गर्व भरी चमक गहरी हो उठी थी।
‘’अंकल।‘’ तभी दिया की आवाज को काटते हुये एक और आवाज उभरी यह गिरीश था ‘’ओफ अंकल ना कहो प्लीज। प्रिटी गर्ल क्या मैं तुम्हें इतना ओल्ड एज दिख रहा हूँ यू नो किस एंगल से अंकल लगता हूँ देखो मुझे गिरीश ही कहो।‘’ और फिर एक जोर की हँसी। संध्या ने कनखियों से देखा था वह उसी की तरफ देख रहा था संध्या का दिल लरज गया जाने क्यों। अब अक्सर ही गिरीश का आना जाना होने लगा कभी कमलेश मिलते कभी टूर पर गये होते। अब तो दिया और गिरीश में काफी बातें होने लगीं थीं। मोबाइल पर भी अब बातों का समय बढने लगा था। संध्या यह सब महसूस कर अब बैचेन रहने लगी थी एक अनाम सी आशंका उस घेरे रहती। जब रहा नहीं गया तो उसने एक दिन गिरीश से कह ही दिया ‘’गिरीश ! यह सब क्या है? तुम मेरी गैरहाजरी में भी यहाँ आते हो? ‘’
’’ क्या हो गया? कैसी दकियानूसी सोच है तुम्हारी। अरे भई! मैं और दिया अच्छे दोस्त बन गये हैं दोस्ती में उम्र आड़े नहीं आती मुझे खुशी मिलती है उससे बातें करके, उसके साथ समय बिताकर। अब क्या यह भी खुशी मुझसे छीन लेना चाहती हो तुम?।” बात अधूरी छोड़ दी गिरीश ने।
‘’मैं दकियानूस नहीं हूँ गिरीश मगर तुम्हारी और दिया की इतनी गहरी दोस्ती, यह लंबी लंबी बातें। चल क्या रहा है तुम लोगों में? मुझे जानने का पूरा हक है आखिर बेटी है वह मेरी।” वह उत्तेजित हो उठी।
‘’हाँ हाँ! पता है वह तुम्हारी बेटी है मगर उसे भी अपनी पसंद का जीवन जीने का हक है या नहीं कितनी प्यारी व खूबसूरत है वह।‘’
और फिर गिरीश का और भी ज्यादा परिवार में आना जाना उसे और बैचेन कर देता, वह उग्र हो उठती।दिया और गिरीश की बढ़ती नजदीकी के बारे में सोच सोच कर उसके दिमाग की नसें ही ना फट जायें यही सोच उसने आखिर अपनी नौकरी छोडने का फैसला कर लिया बस यही एक तरीका है गिरीश से दूरी बनाने का मगर उसका त्यागपत्र स्वीकार नहीं हुआ था वह और भी ज्यादा आशंकित हो उठी।
आज़ संध्या ऑफिस नहीं गई थी। कमलेश ऑफिस और दिया कालेज गई थी। आज़ संध्या ने फोन करके गिरीश को घर बुलाया है। गिरीश आया खुश-खुश और आश्चर्य से भरा हुआ मगर संध्या कुछ और ही सोचे बैठी थी।आज उसने गिरीश और दिया की इस दोस्ती के मायने गिरीश से जानने चाहे थे। गिरीश भी उत्तेजित हो उठा ’’देखो संध्या! तुम्हें अब कोई हक नहीं बनता मेरी किसी से दोस्ती पर उंगली उठाने का,खुद तुमने तो लिहाज रखा नहीं हमारी दोस्ती प्यार का, मेरे भरोसे का, मैने कहा था कि इंतजार करेगें और तुमने तुमने तो अपना घर संसार बसा लिया ।
संध्या चुप रहकर गिरीश की जलती हुई बातें, उसके मन के ताप को महसूस करती रही। अचानक ही उसने मुँह खोला ’’तुम? तुम कह रहे हो। मैने तो लड़की होकर भी भागकर कहीं दूर चले जाने की बात की थी मगर तुमने तब तुमने ही मेरे खाते में इंतज़ार डाल दिया था । मुझे इंतज़ार करने का कह तुम मानो मुझे भुलाकर अपनी पढ़ाई में खो ही गये। मैं मानो तुम्हारे जीवन का हिस्सा ही नहीं थी, तब मैं क्या करती? और फिर जो हो गया वो हो गया है काफी पानी बह चुका तब से अब तक। अब हम दोनों को आगे बढ़ना चाहिये।‘’
‘’आगे बढ़ना चाहिये, आगे तो तुम बढ़ गईं, अगर मैं बढ़ गया होता तो मेरा भी एक ऐसा ही तुम्हारे जैसा सुखी, रिश्तों की गर्माहट से भरा परिवार और जीवन होता मगर आज़ मेरे पास क्या है? मैं तो जीवन के इस मोड़ पर अकेला ही।‘’
‘’तो तुम यही चाह रहे हो कि मैं भी इस मोड़ पर अकेली? गिरीश नहीं ! तुम तो यह नहीं थे, नहीं हो।” वह आश्चर्य से भर गई थी।
गिरीश। जीवन के इस मोड़ पर आकर तुम मुझसे अतीत का प्रतिकार लेने की कोशिश क्यों कर रहे हो? तुम जानबूझकर मेरी बेटी से नजदीकी बढ़ा रहे हो उसके जरिये मुझे बरबाद करने की सोच रहे हो और अगर उसे मेरे और तुम्हारे अतीत के संबंधों का पता चला तो क्या होगा वह खुद टूटेगी, तुम्हारा अक्स उसकी नज़र में टूटेगा साथ ही वह अपनी माँ का प्रतिंबिंब भी टूटते हुये देखेगी। तुम उसके कच्चे मन पर अपनी ज़िंदगी के पुराने कड़वे अनुभवों का लेप चढ़ाना चाहते हो मगर मैं इस लेप के नीचे बहती जलती हुई भावनाओं को अच्छी तरह समझ चुकी हूँ और अब मैं अपनी बच्ची को इस जलन भरे लेप से बचाकर रहूँगीं। हाँ, इतना जरूर है कि उसके मन में तुम्हारी जो छवि बनी है उसे मैं बचाकर रखूगीं और उसकी नज़रों और मन में तुम्हारा स्थान आदर सब वैसा ही होगा मगर अब और नहीं। तुम आज़ के बाद यहाँ कभी नहीं आना, सुना तुमने।‘’
‘’वह छवि तो कब की टूट चुकी मम्मी, वह स्थान भी खाली हो गया है।‘’ दिया ने कमरे में दाखिल होते हुये कहा था। ‘’और अंकल।‘’ उसने ‘’अंकल ‘’ शब्द पर जोर देते हुये कहा था ’’मैने सब सुन और समझ लिया है अब आप भी समझ लीजिये अंकल और हम सबको अकेला छोड़ दीजिये।‘’ दिया अपनी माँ के गले लग रो रही थी और संध्या के जीवन में चल रहे इस नाटक का अंत हो गया था।
