“खोया-खोया चिंतन” : डॉ. सरोजिनी प्रीतम
खोया-खोया चिन्तन
सगुणी बोली, ‘‘यों खोये-खोये से क्यों लग रहे हो जी?’’
रूपकचन्द तेजी से बोले, ‘‘हां हां मैं तो खोया-खोया ही हूँ। मिलाओ चीनी … बनाओ खोये की बर्फी …।
तो हम पहले इसी खोये के रूप् पर ही क्यों न चिन्तन करें… कुछ विज्ञापनी टंकार … शब्दों की चमकार और रूपकचन्द दार्शनिक की मुद्रा में आ गये बोल उठे, ‘‘देखो जी दूध … की सफेदी … इस पर मुई मलाई की मोटी चादर … उसके नीचे धीमी धीमी आंच …. अन्दर ही अन्दर उफनता, उबलता अपने बिखरेपन को एकत्रित करता हुआ, सम्बन्धों को गाढ़ा करता हुआ … यह दूध जब इकट्ठा होता है … रबड़ी होकर और अधिक सिमटकर छुई मुई गठरी सा … सिमटता-सिमटता जाता है। दूध का जैसा अस्तित्व ही समाप्त हो गया हो अब दूध, दूध नहीं रहा अपना नया रूप रंग नई पहचान बनाने को आतुर ऐसा खोया कि खो जाने के चरमबिन्दु पर आ पहुंचा। तन्मय और तल्लीन अपनी प्रगाढ़ श्रद्धा, अनन्य भक्ति एकीकृत रूप में आ जाता है तो … इसका रूप खोया खोया हो होने की यही स्थिति होती है, यह स्थिति भाग्य से ही प्राप्त होती है। उत्कर्ष का यही चरमबिन्दु है … यहीं पर तू तू नहीं रहता, मैं मैं नहीं रहता। जीवन की तू-तू मैं-मैं समाप्त होकर एक परमगति को प्राप्त हो जाती है – खोया आनन्द की चरमावस्था है जो कभी इसे चीनी की सफेद चादर में लपेटता है तो कभी
रूपकचन्द के मुंह में पानी आ गया’ तो सगुणी बोली, ‘‘ठहरो जी, चीनी के सफेद चादर में इसे लपेट ही रहे हो तो ऐसा करो, इस खोये को बर्फी पर पहुचते हैं के रूप में संवार दो। पहले हम खोये से सफेद बर्फी पर पहुँचने हैं तो इसका चैकोर रूप सम्मुख आता है। वर्ग और आयत बनाने वाले ज्यामिति के छात्रों को इसी वर्ग का क्षेत्रफल निकालने को कहा जाय। एक नया गणित, नया अल्जबरा, नया ज्यामिति का पाठ्यक्रम हो … नया शब्दकोष तैयार हो। बर्फी के शब्द को धातु से लेकर विभिन्न प्रयोगों तक का एक वृहद कोष बन सकता है।
बर्फीला …. खाने का मौसम यह, मौसम यह, मौसम यह बर्फीला – चल जल्दी से जाकर बर्फी, ला-ला बर्फी ला../ इसका रूप खोया खोया… हम खोये से सफेद बर्फी तक का एक वृहद कोष बन सकता है। उत्कर्ष का यही चरमबिन्दु है—- खोया आनन्द की चरमावस्था है
