स्वरांगी साने : नाम ही बदला है, घटना नहीं, कल सोनम थी, आज सिया, कल कोई और …
इस बार नाम सिया है, पिछले साल सोनम थी। अगली बार कोई और होगी। यह किस्सा नहीं थमेगा। यदि इसे थमना होता तो सोनम के पकड़े जाने से सिया कुछ सीख ले चुकी होती। मुक्तिबोध जब कहते हैं कि ‘अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने होंगे’ तो वे केवल सियासी अभिव्यक्ति की बात नहीं करते। हमारे घर-परिवार, समाज में भी हमें अभिव्यक्त होना होगा। माता-पिता से कह देती, प्रेमी-प्रियकर से कह देती, होने वाली पति से कह देती, दोस्तों-सहेलियों को मन की बात बता देती। घर की चाचियाँ-मामियाँ, बुआएँ-भाभियाँ क्या कोई ऐसा क़रीबी नहीं बचा, जिससे वे कहने का ख़तरा उठा लेती। हो सकता है घर वाले नहीं मानते, पर बागी बनना था तो घर पर बगावत कर लेती, ऐसी अफरा-तफरी क्यों मचा दी?
ऐसा नहीं है कि अभिव्यक्ति नहीं हो रही। पहले की तुलना में कहीं अधिक हो रही हैं। समाज बहुत मुखर हो चुका है लेकिन क्या बोलना है और कब बोलना है की समझ नहीं है। महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष राहुल नार्वेकर मानसून सत्र के पहले दिन सदन में शोक प्रस्ताव पढ़ते हुए दीनानाथ मंगेशकर को दीनदयाल कह देते हैं और उन्हें इसका अहसास भी तब होता है जब दूसरे इस ओर इंगित करते हैं। गंगोत्री ही मैली हो गई है। हम क्या बोल रहे हैं, क्या कर रहे हैं, इसका क्या परिणाम होगा, इसकी किसी को चिंता ही नहीं है। भविष्य में इसके क्या दूरगामी परिणाम होंगे यह सोचना तो बहुत दूर की बात है, घर-परिवार, समाज पर इसका क्या असर होगा यह सोचना तक हम नहीं चाहते। हमें जो ठीक लगा, हमने किया, भाड़ में गई जनता, अपना काम बनता। यह कुतर्क, आज का तर्क बन गया है। इन दोनों लड़कियों ने भी यही किया। उन्हें उनके लिए चुने गए वर से शादी नहीं करनी थी, उन्होंने नहीं की, या कर ली तो निभाई नहीं। पहले लड़कियाँ गर्दन झुकाकर सब मान लेती थीं, सुन लेती थीं, संस्कारी थीं या नहीं, यह नहीं कह सकते, बस उनमें इतनी हिम्मत नहीं थीं, उन्हें इतनी आज़ादी नहीं थी। अब कुछ आज़ादी उन्हें मिली है, कुछ उन्होंने हासिल की है। इस आज़ादी का सही-ग़लत इस्तेमाल करने की समझ आना शेष है। सही-ग़लत की समझ से परे आज की पूरी पीढ़ी हैं। युवा तात्कालिकता में अधिक विश्वास करते हैं। घर पर खाना बनाने में एक घंटा लगेगा तो दस मिनट में फूड ऐप से मँगवा लेते हैं, ऐसी तात्कालिकता उनकी पूरी जीवनचर्या में आ गई है। कोरोना के सालों ने भी इस तात्कालिकता को बढ़ावा दिया है। आज मौज करने मिल रही है, कर लो, कल का किसने देखा। यह रवैया पूरे समाज में दिखने लगा है। कल सज़ा मिलेगी न, आज तो आनंद मिल रहा है, आज के आनंद को जी लो, आज की थ्रिल को जी लो। मरने-मारने की योजना बनाने में थ्रिल है, उन्माद है और इस उन्माद में बाद में होने वाले पश्चात्ताप की कोई पदचाप भी उन्हें सुनाई नहीं देती।
पक्ष-विपक्ष कई पहलू रख रहा है। जैसे सालों-साल महिलाएँ प्रताड़ित होती रहीं, जलती रहीं, दफ़्न होती रहीं तब कोई कुछ क्यों नहीं बोला। बोला तो तब भी गया, विरोध तो तब भी हुआ ही था। निर्भया के साथ जो हुआ उसके बदले में किसी लड़के को ‘निर्भया की जगह निर्भय बना’, उसकी बलि तो नहीं ली जा सकती न? हमारा समाज लड़कियों को बराबरी का हक़ दिलवाने में उन्हें लड़का बनाने पर आमादा है। वो उन्हें व्यक्ति नहीं बना रहा, नागरिक नहीं बना रहा। सिगरेट पीना दोनों के लिए हानिकारक है, उसी तरह धोखा देना, फ़रेब करना, हत्या या जालसाजी या साजिश रचना भी दोनों के लिए सही नहीं है। हम यह नहीं बता पा रहे। हम उन्हें लड़कों की तरह बड़ा कर रहे हैं। लड़के जो ग़लत काम करते हैं, वे काम भी मर्दानगी की तरह परोसे जाते रहे हैं…ख़ूब लड़ी मर्दानी….मर्दानी क्यों, ख़ूब लड़ी दुर्गा क्यों नहीं कहा।
किसी परिवार में लड़की जन्मने की तमन्ना होती है और लड़का पैदा हो जाता है तो उसके बचपन में माता-पिता उसे एकाध फॉर्क पहनाकर काजल-सुर्मा लगाकर फ़ोटो खिंचवा लेते हैं। अपनी ख़्वाहिश वे केवल उसी एक फोटो से पूरी करते हैं, पर उसके बाद उसे लड़की की तरह बड़ा नहीं करते। उसे खाना बनाना, नीचे नज़रें कर चलना नहीं सिखाते। इसके विपरीत किसी परिवार में लड़के की आस में लड़की पैदा हो जाए तो उसे लड़के की तरह बड़ा किया जाता है। उसे लड़कों जैसे कपड़े पहनाए जाते हैं, बॉय कट करवाया जाता है या वो ख़ुद ऐसा करने लगती है। उसके माता-पिता उसके और सबके सामने हमेशा कहते हैं- यह हमारी बेटी नहीं, बेटा है। मतलब आदर्श इस तरह उस और अन्य सभी लड़कियों के सामने रखा जाता है कि दुनिया में जो भी कुछ करने या पाने जैसा है उसे लड़का बनकर ही हासिल किया या पाया जा सकता है। एक पूरी पीढ़ी इसी तरह बड़ी होती है।
इसके बाद की अगली पीढ़ी आती है। लड़कियाँ पढ़ी-लिखी हैं, नौकरी करने लगी हैं, अपना खुद कमाने-खाने लगी हैं। अब वे कॉलेज में या नौकरी करते हुए लड़कों की तरह सिगरेट पीती हैं ताकि ‘कूल’ लग सके। शराब-सिगरेट, गाली-गलौच किसी भी बात में स्त्री-पुरुष होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। दोनों के लिए यह अनैतिक है, होना चाहिए। पर हमने ही लड़कियों के मन में यह बात डाली है कि लड़के जो करते हैं, जैसा करते हैं उसका ही अर्थ आज़ादी है। वे अपनी आज़ादी अपने तरीके से जीना चाहती हैं। इसमें मुक्त यौन संबंध भी आ गए, सब चलता है कि प्रवृत्ति भी आ गई।
ओटीटी प्लैटफ़ॉर्म आग में घी का काम कर रहे हैं। पहले बड़े परदे पर परिवार के साथ फ़िल्म देखने जाते समय प्रेम-प्यार के दृश्य दो फूलों को परदे पर दिखा पूरे हो जाते थे। अब तो संबंध कैसे बनते हैं, खुलेआम दिखाया जाने लगा है। कोई भी सीरीज़ उठा लीजिए, वे घोषित ही करते हैं कि इसमें गंदी भाषा (फ़ाउल लैंग्वेज), हिंसा-सेक्स शामिल है। ख़ून-ख़राबा दिखाना इतना आम हो गया है कि युवाओं को लगता है दुनिया न माने तो सच में गोली मार देना चाहिए। भाषा को लेकर चलता है का रवैया भी ऐसा ही है कि लैंगिक शब्द खुलेआम इस्तेमाल होने लगे हैं तो व्यभिचार भी आम नहीं होगा कैसे मान लें।
अब हम किस-किसको सुधारने जाएँगे। घंटी बँधेगी तो सबके गले में होगी। सिया या सोनम की परवरिश को या उनकी मानसिकता को दोष नहीं दे सकते। जो पकड़ा गया, वो चोर है। वरना हमें मान लेना चाहिए कि हम सबमें सीता या राम नहीं ‘सिया’ ही बसने लगी है, कब किसके मन में यह ज़ोर पकड़ लेगी, कह नहीं सकते। उस क्षण को दबाने का संयम और समझ हमारे पास होनी चाहिए, इतना ही… और वास्तविकता यह है कि आज समझ के साथ संयम का भी नितांत अभाव बढ़ता जा रहा है।
