समय और साहित्य की लहरों पर डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक‘

14 जुलाई को आदरणीय डॉ रमेश पोखरियाल निशंक जी का जन्मदिन होता है । हर बार की तरह इस बार भी मित्रों, राजनेताओं , साहित्यकारों, समाज सेवियों की शुभकामनाएँ उन्हें मिली । राजनेता – मंत्री , मुख्यमंत्री , कैबिनेट मंत्री के दायित्वों से गुज़र कर आज भी वे जीवन – समाज और साहित्य की दिशा तय कर रहे है । यह बहुत कठिन कार्य है ।
कोरोना के दौरान राजनीतिक उथल पुथल में काफ़ी परिवर्तन हुए । निशंक जी स्वंय आल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट में भर्ती रहे । वहां भी इन्होंने अपना रचनाकर्म नहीं छोड़ा । उस समय के राजनीति के सशक्त हस्ताक्षरों को परिवर्तन के तूफ़ान को झेलना पड़ा । आज कुछ अपने समय का इंतज़ार कर रहे है । कुछ गुमनामी के गर्त में चले गए । कुछ की प्रतिभा कुंद हो रही है । कुछ के तो नाम आपको याद दिलाने पड़ेंगे । पर निशक जी तो सामाजिक – राजनीतिक- साहित्यिक जीवन के सतत यात्री है । अपने समय के प्रमुख हस्ताक्षर । एक यात्रा में ऐसे मोड , ऐसे पड़ाव तो आते रहते है । खट्टे – मीठे , चुनौतीपूर्ण, कठिन मुक़ाम । पर वे जहाँ भी जाएँगे , अपनी छाप छोड़ जाएँगे ।

उनका एक सपना था । वे इस सपने को अटल जी की व्यथा से जोड़ते हैं । एक कार्यक्रम में अटल जी ने लेखकों की स्थिति पर अपनी चिंता ज़ाहिर की थी । निशंक जी की संवेदना को गहरी चोट लगी । लेखक ग्राम का निर्माण उनके जीवन का संकल्प बन गया । उत्तराखण्ड में सैंकड़ों तीर्थ हैं । निशंक जी ने साहित्य का तीर्थ बनाया । आज वह साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र है । केवल उत्तराखण्ड ही नहीं देश- विदेश के लेखक , साहित्यिक गतिविधियाँ , युवाओं के कार्यक्रम , कार्यशालाएँ , कवि सम्मेलन, श्रेष्ठ वक्ता , चित्रकार , दुर्लभ पौधों , जड़ी बूटियों का संचय , प्रकृति की सुरम्य गोद – यह तो साक्षात सरस्वती का लेखक ग्राम के रूप में उतरना था । उन्होंने एक स्वप्न को जिया । उनकी वर्षों की साधना के बाद आज वह एक सुखद यथार्थ है । समाज और साहित्य ने उससे अपनी अपेक्षाएँ बढ़ा ली हैं ।
उनके जन्मदिन के अवसर पर उनके बहुत से गुणों से प्रेरणा ली जा सकती है । पर उनकी संवेदनशीलता और मानवीयता तो अद्भुत है । मुझे कोरोना के समय की याद है लोग आक्सीजन की कमी से त्रस्त थे । मृत्यु से संघर्ष कर रहे थे । पर उन्होंने सब की चिंता की । विशेष रूप से लेखकों को लेकर तो वे दिन – रात चिंता कर रहे थे । उस समय केंद्रीय हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष के रूप में ज़िम्मेदारी होने के कारण उनके प्रयत्नों में साझीदार था । यह चिंता जाति , धर्म , विचारधारा से आगे की थी । यह बातें केवल मुहावरे में नहीं थी । एक लेखक के स्वास्थ्य को लेकर उन्हें दिन रात चिंता रहती । कई लोग कहते कि वह तो सदा आपके विरोध में रहा है । पर वे इन पर्दों को चीर मनुष्यता को देख सकते हैं । ऐसे ही एक लेखिका के पति मृत्यु से जूझ रहे थे । वे दिन – रात चिंता करते रहते । यथा संभव सहायता देते । इसी प्रकार एक युवा लेखक दूर बिहार के एक छोटे नगर में मृत्यु से जूझ रहा था । स्मृतियाँ तक गड्ड मड्ड हो रही थीं । वे ज़िला मजिस्ट्रेट को फोन लगाते है । हस्पताल में बात करते हैं । जहा्ँ कहीं भी कठिनाई हो वे उपस्थित है । इतना शीर्ष व्यक्तित्व , अपने स्वास्थ्य की चिंता न करना , अपने जीवन पर खेलकर लोगों के लिए दिन रात लगे रहना । उन्होंने अपने जीवन की बाज़ी लगा कर ऐसी मिसाल पैदा की जिसका अनुकरण तक कठिन है । मनुष्यता के ऐसे उच्च आदर्शों को जीवन में निभाने वाले आदरणीय डॉ रमेश पोखरियाल ‘ निशंक ‘ जी को जन्मदिवस के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएँ ।

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