मोह (कहानी) – मधुरिमा कोहली

*********आज के विमर्श में हम पढ़ते हैं वरिष्ठ साहित्यकार, दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व प्रोफेसर डॉ मधुरिमा कोहली जी की कहानी। डॉ मधुरिमा कोहली प्रतिष्ठित साहित्यकार स्वर्गीय डॉ नरेन्द्र कोहली जी की पत्नी हैं।*******

अभी सुबह के दस ही बजे हैं और हम इस लेक वाशिंगटन बीच-पार्क  पर पहुंच गये हैं। बेटे  के साथ आये हैं। भारतीय लोगों की संस्था है मिलन। उस में बहुत सक्रिय है वह। ये लोग ऐसे आयोजन करते ही रहते हैं जहां भारतीय परिवारों को आपस में मिलने-जुलने के अवसर मिलें। आज रविवार को पिकनिक का आयोजन हुआ है। उसने हमें कुछ दिन पहले ही बता दिया था, “आप लोगों को भी चलना है। पिकनिक ग्यारह बजे से है, पर मेरे साथ एक घंटा पहले ही निकलना होगा, मुझे जल्दी पहुंच कर बहुत से काम करने हैं। प्रबंधकों में से हूं न।”

हमें असुविधा होगी, पर वह विवश है, कुछ कर नहीं सकता इसलिये यह सब कह कर शिष्टाचार निभा रहा था।

“नहीं नहीं, हमें कोई असुविधा नहीं है,” ऐसे अवसरों पर हम दोनों, मैं और मेरे पति, अक्सर यही कहते हैं। मैं तो उसका मन रखने के लिये आगे भी जोड़ देती हूँ, “हमारे लिये तो और भी अच्छा है। एक घंटा और मिल जायेगा घर से बाहर घूमने के लिये।”

सच पूछो तो उसका मन रखने की ही बात नहीं है। सच में ही अच्छा है। घर से बाहर निकलने के अधिक अवसर मिलते ही कितने हैं यहाँ? यों सुबह के दस बजे से शाम के पांच-छह बजे तक थक कर चूर हो जायेंगे, इसमें भी कोई संदेह नहीं। वह तो शाम को भी जल्दी नहीं निकल पायेगा न, यह कह कर कि मेरे माता-पिता थक गये हैं। प्रबंधकों में से है तो सब समेट कर ही तो चल पायेंगे। अब जो है सो है, सुविधा-असुविधा की बात क्या करनी। शाम की बात बाद में सोचेंगे। अभी तो मन खुश हो गया है स्थान को देखते ही। चारों ओर फैली हुई हरियाली, दूर से दिखता झील का जल, वातावरण बहुत ही सुहावना लग रहा था। मौसम भी तो कितना खुला हुआ था। धूप की हल्की-हल्की किरणें पेड़ों के पत्तों में चमक पैदा करती हुईं अपनी आभा बिखेर रहीं थीं।

“मैं चलता हूं,जरा काम देखने, आप लोग आस-पास घूम आइये” कह कर निकल गया था वह।

“ज़रा रेस्ट-रूम होकर आता हूं।” ये चल दिये थे निबटने।

ये, मेरे पति, मैं अक्सर इन्हें ‘ये’ ही कहती हूं। इनका नाम राघवेंद्र है पर मैं इन्हें सामने नाम से नहीं बुलाती, पीछे भी कभी-कभार ही, बहुत ज़रूरी होने पर ही लेती हूँ नाम। हमारे ज़माने में कहां लेते थे पति का नाम। ये आजकल की लड़कियाँ, एक वाक्य में दस बार पति का नाम न लें तो इनका काम ही नहीं चलता। चले भी कैसे, आधे से ज़्यादा काम तो पति को आदेश दे-दे कर कराती हैं। पता ही नहीं चलता,छोटे भाई को बुला रही हैं या घर के मुंडू को आवाज़ें दे रहीं हैं।

मैंने सोचा मैं भी हो आऊँ, नहीं तो अपने लिये अलग से कहना-जाना होगा। निबट कर आये तो देखा, पास ही जंगल में से कच्चा सा रास्ता जा रहा है। घूमने के लिये उसी पर चल निकले। दोनों ओर पेड़ों और झाड़ियों की सघन हरियाली और बीच में यह भूरी सी मिट्टी वाला कच्चा रास्ता। अचानक मेरी दृष्टि एक झाड़ी पर पड़ी। लाल-लाल बेरियाँ। मैं पुलक उठी, “पकी हुई हैं” कहकर एक तोड़ी और मुंह में डाल ली।

ये झल्ला उठे, “कुछ भी उठा कर मुंह में डाल लेती हो, ज़हरीली हुई तो…”

“नहीं होती ज़हरीली ये, मुझे मालूम है।” मैं आश्वस्त थी। अभी कुछ ही दिन पहले तो सविता बता रही थी कि वे लोग पिकनिक पर गये थे और उन्होंने खूब बेरियां तोड़-तोड़ कर खाईं थीं।

पर ये मेरा पीछा छोड़ने वाले नहीं थे। “याद नहीं है तुम्हें, तुमने त्रिनिदाद में वह कच्चा अखरोट पेड़ से तोड़ कर मुंह में डाला था, कैसा सूज कर लाल हो गया था तुम्हारा होंठ।”

मेरा यह किस्सा जितनी बार मेरे पति बच्चों और मित्रों को सुना चुके हैं,उससे ज़्यादा ही बार मैं सुना चुकी हूं। असल में अपने ऐसे किस्से इससे पहले कि यह सुनायें मैं खुद ही सुनाना शुरू कर देती हूं। हँसकर, मज़ा लेकर सुनाने में मैं वह सब छुपा लेती हूं जो मेरे पति के सुनाने में रहता है।

“बच्चों जैसी हरकतें करती हो तुम इस उम्र में भी।” ये मुझे मेरी उम्र याद दिलाये बिना नहीं रहते।

“क्या हुआ है मेरी उम्र को,पिकनिक पर आये हैं मौज-मस्ती करने।” मैं मस्ती की उसी लहर में महिला-समिति की पिकनिक का किस्सा सुनाने लगी। उस पंचेंद्रिय-उद्यान में जो नया बना है, ये तो कभी गये ही नहीं वहाँ, हम सब कैसे पेड़ों के तने पकड़-पकड़ कर उनके साथ गोल-गोल घूमीं थीं पुरानी फ़िल्मी नायिकाओं की तरह गाने गाती हुईं, “मैं क्यों न नाचूँ आज खुशी से मेरा जिया लहराया”, यह जिया भी अजीब पागल चीज़ है। किसी भी बात से खुश हो जाता है। बस घर से बाहर निकले, बाग-बगीचे देखे, पेड़ देखे, झील-सरोवर देखे और जिया खुशी से नाचने लगा। ये मेरे ऐसे किस्से कई बार सुन चुके हैं। बोले, “हाँ-हाँ,दिमाग बंद कर देने से सत्तर साल की बुढ़िया सोलह साल की किशोरी नहीं हो जाती।”

एक मैं ही तो नहीं नाची-झूमी थी। उषा, मीना, कल्पना सभी तो गा रही थीं। वे सब भी क्या साठ-सत्तर की नहीं हो रहीं, मैंने तुनक कर प्रतिवाद किया। अपना बचाव करने की असफल कोशिश मैं करती ही रहती हूं।

कच्चे रास्ते वाला चक्कर काटकर लौटे तो लगा थक से गये हैं। थोड़ा सुस्ता लेने के लिये झील की ओर चले और वहीं बेंच पर बैठ गये। संवाद बनाये रखने के लिये मैंने बहू-पुराण शुरू कर दिया, “देखो न, अनिला को, कितने दिन पहले से समीर ने कह रखा था इसे पिकनिक के लिये, पर नहीं आई न साथ।”

“अरे वह डाक्टर है, उसे कई काम रहते हैं।” मेरा विरोध और उसका बचाव इन्हें सदा ही ज़रूरी लगता आया है, “की होगी कोशिश, निकल आया होगा कोई ज़रूरी काम।”

“हां-हां, अब तो निकलेंगे ही ज़रूरी काम। शादी से पहले देखा था, कैसे पीछे पड़ी थी समीर के, तब सारे ज़रूरी काम कहां गये थे?” मैं झल्लाई थी।

“तुम भी बस, अपना समीर भी कम पीछे नहीं पड़ा था उसके। इस उम्र में होता ही है ऐसा, पता नहीं प्यार होता है या देह का आकर्षण; ऐसा मोह हो जाता है कि यह न मिली तो ज़िंदगी ही नहीं।” ये अपने अनुभव और ज्ञान के अस्त्र चला मुझे परास्त करने में लगे थे।

“हाँ, सो तो है,” मैंने हथियार डाल दिये। “ठीक ही है, बुरी नहीं है, अच्छा ही निभा रही है हम लोगों के साथ भी।”

अब मैंने दूसरा राग छेड़ा, “लो अब तक तो ठीक थी यह आँख, अब फिर पानी टपकने लगा… यह आँख भी मुझे चैन से जीने नहीं देगी।”

पति को मेरी आँख के कष्ट से थोड़ी सहानुभूति हुई। इस एक विषय पर तो ये मेरा दुख समझते हैं। दरअसल बात ही कुछ अजीब हुई है मेरे साथ। किसी को भी सहानुभूति हो ही जायेगी, फिर ये तो मेरे पति हैं, हम बुढ़ापा साथ-साथ भुगत रहे हैं। पिछले महीने तक तो सब कुछ ठीक ही था। फिर एक आँख से कुछ कम दिखने लगा, धुँधला सा। दूसरी तो बिल्कुल ठीक थी। काम तो ठीक से चल ही रहा था, पर मैं रोज़-रोज़ हर समय यही कहती रहती, “इस आँख से कुछ कम दिखता है।”  कोई दूसरा सुने भी तो कहे क्या? कम दिखता है या ज़्यादा उसे क्या? पर मेरी तो अपनी आँख थी, अच्छी-भली थी, यह अचानक इसे पता नहीं क्या हो गया। बेटा बहू दोनों डाक्टर हैं, सो एक दिन कुछ इस तरह से मैंने कहा कि सुन ही लें और जवाब भी दें। तो सुन लिया उन्होंने और जवाब भी दे दिया, “अभी काम तो चल रहा है न, तो कुछ दिन और चला लो। डाक्टर को दिखाया तो औपरेशन बता देगा। अभी किसी को फ़ुर्सत नहीं है यह सब झंझट झेलने की। उपयुक्त समय पर दिखायेंगे।” 

यह भी कोई जवाब हुआ ? इन्हें फ़ुर्सत नहीं है। इन्हें तो कभी भी फ़ुर्सत नहीं होगी । मैं पति के पीछे पड़ गई, “तुमने जिस डाक्टर को अपनी आँख दिखाई थी उसी के पास ले चलो न मुझे भी।”

ये कौन सा कम टालू हैं । बोले, “जब बच्चे अभी मना कर रहे हैं तो रुक जा आओ न कुछ दिन आखिर वे लोग डाक्टर ही तो हैं।”

पर मैं कहाँ मानने वाली थी, “अरे कोई डाक्टरी सलाह पर थोड़े ही मना कर रहे हैं। उन्हें फ़ुर्सत नहीं है, तुम्हें तो फ़ुर्सत ही फ़ुर्सत है। रिटायर्ड हो अब तो।”

पति की टालमटोल नहीं चल सकी। जब से रिटायर हुए हैं ‘फ़ुर्सत नहीं है’ की आड़ में बच नहीं पाते। ले गये वे मुझे डाक्टर के पास। वही हुआ। डाक्टर ने तुरंत औपरेशन कराने को कह दिया। अब बड़ी मुश्किल में पड़े हम।

बेटा बहू भी मजबूर हो गये । उसी सप्ताह में औपरेशन कराना पड़ा। अगले दिन जब डाक्टर को आँख दिखाई तो डाक्टर खुश था, “आँख में पूरी चमक वापिस आ गई है,” वह बोला।

पर परीक्षण के बाद मैं तो चकित थी, “डाक्टर! मुझे तो दूसरी आँख से बिल्कुल दिखाई नहीं दे रहा।” परेशान होने की बारी अब डाक्टर की थी। एक सप्ताह तक वह मुझे कई तरह की पट्टी पढ़ाता रहा और मेरी दूसरी आँख की ज्योति क्यों नष्ट हो गई इसके अस्पष्ट से कारण बताता रहा, जो मेरी समझ में तो आए नहीं, किसी और की समझ में आए हों तो हों। फिर इस आँख से भी पानी टपकने लगा। टप-टप टपकता है यह पानी। दुखी कर देता है । अब डाक्टर कहता है, “यह मेरा क्षेत्र नहीं है, इसके लिए दूसरे डाक्टर के पास जाओ।”

आजकल घर में इस विषय पर मुझसे कोई बात नहीं करता । बेटा बहू कहते हैं, “मना तो किया था, अभी मत करवाओ सर्जरी, किसी की सुनती तो हो नहीं।” बहुत सहानुभूति दिखाते हैं तो कह देते हैं , “माँ , तुम्हारा भाग्य।”। पति से तो झगड़ा ही हो जाता है। मैं कहती हूँ, “इसी डाक्टर ने तुम्हारी आँख तो ठीक कर दी थी।” ये चिढ़ जाते हैं, “मेरी भी फोड़ देता तो तुम खुश हो जातीं?”

मैं यह सब कब चाहती हूँ। पर, मेरी अपनी आँखें अच्छी भली थीं, अच्छा भला देखती थीं, दिखाती थीं, पर अब देखो न, एक कुछ देखती नहीं और दूसरी यह टप-टप पानी टपकाती रहती है। रोती नहीं हूँ मैं इस स्थिति पर, हँसती हूँ, रोने की गुंजाइश ही कहाँ है, टपक तो रहा है पानी, आँसू न सही।

       तो कुछ देर मैं आँख-पुराण बाँचती रही। फिर ये झील में दूर जाती नौकाएँ मुझे दिखाने लगे।

       “तुम्हीं देखो दूर की चीज़ें, मुझे तो पास बैठे, रेत में खेलते ये बच्चे ही दिख जाएँ तो वही बहुत है। देखो कितनी मेहनत से रेत जमा कर रही है यह बच्ची अपनी बाल्टी में।”

       मेरी आँख अब दूर तक कुछ देख नहीं पाती, शायद मेरे पति ने मेरे स्वर में मेरे इस दुख को समझ लिया, इसलिए नौका की बात छोड़ , बच्चों पर ही आ गए, “तुम्हें बच्चों से बहुत मोह है। बच्चे होते ही हैं बहुत प्यारे।” ये अपने बुढ़ऊ दार्शनिक अंदाज़ में आ गए…

“अब सत्तर की हो रही हो, मोह कुछ कम करो।”

कम कहाँ होता है मोह। सुनीता की याद हो आई। मैं उन्हें कल आए सुनीता के फ़ोन की बात सुनाने लगी। कल शाम कितनी देर तक बात की थी। फ़ोन पर नंबर देखा तो कोई नया सा अपरिचित नंबर था; फिर आवाज़ सुनीता की सुनाई दी, नंबर की बात पूछी तो बोली, “हाँ, बेटे के घर आई हुई हूँ, यह उसके फ़ोन का नंबर है। बहू को किसी डांस-पार्टी में जाना था। उसकी नैनी शाम सात बजे के बाद रुकती नहीं तो उसने कहा ‘मौम, आप टिमी के पास रह जाएं तो मैं पार्टी में जा सकूँगी।” मैंने सुनीता को चिढ़ाया था, “तो आयागिरी कर रही हो?”

“अरे नहीं , मुझे तो इतना अच्छा लगता है टिमी के साथ रहना, आयागिरी का तो सवाल ही नहीं उठता।” फिर वह लंबा किस्सा सुनाने लगी, “मैं आलू का परांठा बना रही थी न टिमी के लिये, देख घर में तो चार चपाती बनाना भी मुझे बहुत बड़ा झंझट लगता है, कौन आटा गूंधे, सारा काम फैलाए, बनी-बनाई चपाती का पैकेट बज़ार से खरीद लाती हूँ, पर जब टिमी कहती है न, ‘दादी, आलू –परांठा’ तो मैं बड़े चाव से सारा काम करने लगती हूँ। आलू भी उबालूंगी , आटा भी गूंधूंगी, तो परांठा बनाते बनाते मैं गाना गाती जा रही थी, ‘ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय,’ तो टिमी बोली, दादी, पहेली क्या? फिर मैंने उसे पहेली समझाने के लिये गाना गाया, “तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर,” फिर टिमी बोली, ‘दादी तीतर क्या?’ तो मैंने कागज़ और रंग लेकर उसके लिए तीतर बनाए, बहुत मज़ा किया। अब खा-पीकर खेल-कूद कर सो गई है।”

          मैं बहुत रस लेकर सुनीता के सारे संवाद विस्तार से सुना रही थी, ये पता नहीं कितना सुन रहे थे, कितना अनसुना कर रहे थे, बस इतना ही बोले, “तुम औरतें बच्चों के मोह-जाल में ही फँसी रहती हो।”

           ग्यारह बजने को हैं। पिकनिक के लिए आने वाले लोग पार्क के हरी घास वाले मैदान में इकट्ठे हो रहे हैं। हम भी उठ कर उस ओर चल दिए हैं। हमें देख समीर भी हमारी ओर बढ़ आया। कुछ दोस्तों से, कुछ के माता-पिता से परिचय करवा के आगे बढ़ गया। हम भी ठीक सी जगह देख, हरी घास पर बिछी नीली चटाइयों पर बैठ गए। आँख से पानी, रह-रह कर टपकता ही जा रहा था। टपकता रहे पानी, पर कुछ-कुछ देखती तो है यह आँख, दूसरी तो कुछ भी नहीं करती।

           टपकती आँख से ही चारों ओर फैले, सुंदर और आकर्षक युवक–युवतियों को देखने की कोशिश कर रही हूँ। आजकल के ये परिधान तो इनके सौंदर्य में चार-चाँद लगा देते हैं। यह आजकल चली है न कुर्तियों पर ‘वीर-ज़ारा’ की कढ़ाई, कितनी अच्छी लगती है। ये कुर्तियां पहने सभी प्रीति ज़िंटा लगने लगती हैं। हमारे ज़माने में वह सुरैया वाला डिज़ाइन चला था, कितना फबता था मुझ पर। इसी टपकती आँख से इन्हीं युवतियों में अपना यौवन देखने लगती हूँ। यही मेरा समीर मेरे गले में बाहें डाल कहा करता था, “माँ, तुम कितनी सुंदर हो। तुम मुझे सब से प्यारी लगती हो।” तब इस पर जान छिड़कने वाली दादी इसे बुलाती रह जाती थीं और यह दूर भाग जाता था, दादी को चिढ़ाता था, “दादी, तुम बूढ़ी हो।” आज वही समीर है, वही मैं हूँ, उसे मेरा सौंदर्य तो क्या, टपकती आँख भी नहीं दिखती। आज मैं बूढ़ी हो गई हूँ।

समीर को क्या कहूँ, यौवन और सौंदर्य का मोह किसे नहीं होता? सत्तर बरसों में दर्पण में कितनी ही बार अपने रूप और सौंदर्य को क्षीण होते देखा है। जानती हूँ, किसका रहा है कि मेरा रहेगा? गौतम बुद्ध ने देखा था बुढ़ापा, कितने दुखी हुए थे, “हो जाएगी क्या ऐसी ही मेरी यशोधरा?” हाँ, सभी को ऐसे ही हो जाना है। बुद्ध तो इस दुख का निदान और उपचार ढ़ूँढने निकल पड़े थे और बुद्धत्व प्राप्त कर लौटे थे। उन्होंने तो दुनिया को बहुत कुछ बताया है, मैं तो इतना ही जान पाई हूँ कि समझ लो बुढ़ापा आ गया है, अपना लो उसे, दुख और मोह से आधा छुटकारा तो मिल ही जाएगा।

ये बैठे हैं मेरे पास ही। देख रहे होंगे कनखियों से रूपवती युवतियाँ। प्रकट रूप में तो बहुत पहुँचे हुए ज्ञानियों की सी बातें करते हैं… “बालों को काला रंग लेने से यदि उम्र कुछ कम दिखने लगती है तो कौन सा बड़ा लाभ मिल जाता है?” मानो रूप और यौवन का कोई महत्त्व ही नहीं जीवन में। मोह को जीत चुके हैं न। सुबह शाम पूजा– पाठ में समय बिताते हैं। घंटों मन की आँखों से मन का सौंदर्य देखने की साधना किया करते हैं। ये जाल समेट रहे हैं। मछलियों का मोह छोड़ कर मांझी को एक समय चल ही तो देना होता है। बस ऐसी ही एक धुन में एक शाम मुझसे बोले थे, “सोचता हूँ, वकील से मिलकर संपत्ति की ‘विल’ तैयार करवा दूँ। मेरे बाद तुम लोगों को सार-समेट करने में कठिनाई न आए।” कहते हुए एक कागज़ मेरी ओर बढ़ाया था। कागज़ हाथ में लिये मैं सोचने लगी, क्या लम्बी-चौड़ी संपत्ति है हम लोगों की? जीवन भर ईमानदारी से काम करने वाला एक साधारण आदमी सारा जीवन अपनी आय से  कम खर्च कर के, पैसा-पैसा जोड़ कर एक मकान बना ले अपने रहने के लिए, बस वही संपत्ति होती है बच्चों के लिए छोड़ जाने को। आदमी के जीते-जी तो वह घर ही होता है रहने के लिये, उसके मरने के बाद ही संपत्ति हो जाती है।  ऐसे ही हैं राघवेंद्र, मेरे पति। कार्यालय में सदा ठीक से, अपनी सामर्थ्य भर कुशलता से काम किया। कोई उँगली न उठा सके कि उसने धन का या पद का दुरुपयोग किया, अपने इस यश के मोह में वे बड़े से बड़ा संकट झेलने या नुकसान उठाने को सदा तैयार रहे।

यह कागज़ प्रारूप था उस विल का जो इन्होंने सोच-समझ कर तैयार किया था, वकील को दिखाने के लिये, बोले, “तुम देख लो, यदि कुछ छूट गया हो, कुछ और जोड़ना हो तो बताना।”  तब मेरी आँखों का यह हाल नहीं हुआ था। एक ही नज़र में कागज़ की विषय-वस्तु मेरी आँखों के सामने आ गई थी, “बंगलौर वाले मकान के बराबर के तीन हिस्से होंगे जो मेरी मृत्यु के बाद मेरी पत्नी, मेरे बेटे और मेरी बेटी को मिलें।” मैं हतप्रभ सी हो गई थी। कागज़ लौटाते हुए मैंने कहा था , “मुझे तो यह सब ठीक नहीं लगा।”

“क्यों?” ये आश्चर्य में थे।

मैं बहुत विचलित हो गई थी, पर फिर भी मैंने बहुत सँभल कर शब्द कहे थे, “भगवान न करे कि मुझे आपके बाद रहना पड़े, पर यदि विल कर ही रहे हैं तो मकान मेरे नाम कर देते, मेरी मृत्यु के बाद बच्चों को बराबर-बराबर मिलता।”

मेरी आपत्ति इन्हें रास नहीं आई। ये काफ़ी क्षुब्ध हो गये थे। रोष और क्रोध में फट पड़े –  “मुझे नहीं मालूम था कि तुम्हें संपत्ति का इतना मोह है, अपने बच्चों पर भी विश्वास नहीं है तुम्हें।”

ऐसे आरोप के बाद मैं क्या कहती? पर ये बहुत कुछ कहते रहे थे। मैं मोहग्रस्त आँखों से बहते आँसुओं के साथ सब कुछ सुनती रही थी। सारी बातों का निचोड़ यह था कि मैंने जीवन में कौन सा काम समझदारी से किया है कि संपत्ति सभाल लूँगी, कोई सनकी निर्णय नहीं ले लूँगी। मेरी माँ, मेरी बहनें, मेरी सखियाँ सभी ऐसे ही मोहग्रस्त अविवेकी लोग हैं जिनकी संगति और प्रभाव के कारण मैं ऐसी तुच्छ प्रकृति की बातें सोचती हूँ, कहती हूँ।

आज टपकती आँख का पानी बार-बार पोंछती हूँ, तब एक बार में ही सारे आँसू पोंछ लिए थे। सोच-समझ कर धैर्य से कहा था, “मैंने मोह छोड़ दिया, संपत्ति बच्चों के नाम कर दीजिए।”

मुझे इन पर भी भरोसा है, बच्चों पर भी, अपने आप पर भी क्योंकि मुझे ‘उस’ पर, ‘उसकी’ कृपा पर भरोसा है। हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश सब विधि के हाथ में तो हैं।

सब पढ़ रखा है, सब जानती हूँ, पर ऐसे विचारों के चक्रजाल में फँस जाऊँ तो अवसाद में डूब जाती हूँ। बिल्कुल अकेली हो जाती हूँ। आस-पास के परिवेश से कट गई; खेलते-कूदते बच्चे, खाते-पीते परिवार, सब जैसे ओझल हो गए। कितना समय बीत गया कुछ पता ही नहीं चला। तभी समीर थाली में खाना लेकर आ गया, “पापा, माँ के लिए तो मैं खाना यहीं ले आया हूँ, आप अपने लिए वहाँ जाकर डाल लाइए, खाना शुरू हो गया है। सब लोग वहाँ से ही ले रहे हैं।”

मैंने थाली संभाल ली । देख रही हूँ, थाली के किस किस खंड में क्या है। अभी ये अपनी थाली भर कर लाएंगे तो इसी टपकती आँख से झाँक-झाँक कर देखूँगी क्या क्या लाये हैं। समीर ने मेरी थाली में क्या नहीं डाला। खाने पीने की चीज़ों का मोह कहाँ छोड़ पाई हूँ। यहाँ अमरीका में तो यूँ भी दिन में एक ही बार ढंग से खाना मिलता है। बेटा बहू डाक्टर हैं। न तो उन्हें फ़ुर्सत है तीन-तीन समय खाना बनाने-देने-खाने की और न वे ठीक ही समझते हैं इतना खाना। हमारी उम्र में तो हम जो कुछ भी, जितना कुछ भी खाते हैं सब गलत है उनकी दृष्टि में। मेरे खाने-पीने पर बहू अपने मित्रों में टिप्पणी करती है, “खाने पीने की बहुत शौकीन हैं हमारी माँ।” क्या गलत कहती है, शौकीन तो मैं हूँ ही।

ये लौट आए हैं, बहुत ही कम चीज़ें हैं इनकी थाली में, मुझसे भी कम। “बस इतना ही?” पूछती हूँ तो कहते हैं, “भूख ही नहीं है, इतना ही बहुत है।”

“क्यों क्या हो गया, तबीयत तो ठीक है?” मैं चिंता करने लगती हूँ। चिंता तो इनकी लगी ही रहती है । दिन पर दिन इनका खाना कम होता जा रहा है। खुद अपने लिए खाना ढंग से ज़िन्दगी भर नहीं डाला इन्होंने। मैं ही ध्यान रखती आई हूँ; क्या लिया, क्या नहीं लिया। यहाँ अमरीका में आकर, सबको करते देख कर सीखे हैं अपने लिए कुछ कुछ काम करना। नहीं तो सदा से ही , नाश्ते-खाने का समय हुआ और आकर खड़े हो जाएंगे रसोई के पास ‘आज नाश्ते में क्या बनाया है’, ‘खाने में क्या दे रही हो’। अपने हाथ से न कभी कुछ बनाया न डाला।

      “नहीं , तबीयत तो ठीक ही है”, ये कहते हैं और खाने लगते हैं। “नंदा के बारे में क्या सोचा है तुमने?” खाते हुए ये मुझसे पूछते हैं। नंदा हमारी बेटी है। न्यू-जर्सी में रहती है। इनके सवाल का क्या जवाब दूँ। अभी मैं खुद ही कुछ निर्णय नहीं ले पाई हूँ। कल जब से उसका फ़ोन आया है सोच में डूबी हूँ। बहुत बुला रही है । “मेरे लिये नहीं आते तो अनिका के लिए ही आ जाओ।” उसने बहुत कहा था। अनिका जब छोटी थी, उसकी देखभाल के लिए नंदा के आग्रह पर मुझे अक्सर अमरीका आना ही पड़ता था।

“अनिका तो अब बड़ी हो गई,” कह कर मैं अपनी आँख का कष्ट बताने लगी थी। नंदा का स्वर तेज़ हो गया था, “खाक बड़ी हो गई है, शरीर से ही हुई है, अकल धेले की नहीं। एक दिन भी अकेली नहीं छोड़ सकते, लाख समझा कर जाओ, कोई भी घंटी बजाए दरवाज़ा मत खोलना और यह पगली पोस्टमैन भी आएगा तो दरवाज़ा खोल देगी। माँ, यहाँ का पोस्टमैन तुरंत समझ जाता है कि यह दरवाज़ा खोलने आई है तो घर में यह अकेली ही होगी। किसी दिन कुछ ऊँच-नीच हो गई तो रोते रह जाएंगे हम सब।”  फिर वह मेरी आँख पर बरसी, “और माँ, तुम्हारी आँख जैसी वहाँ टपकती है वैसी ही यहाँ भी टपकती रहेगी। वहाँ कौन सा कुछ कर रही हो? न तुम किसी को दिखाती हो और न समीर और अनिला ही कुछ कर रहे हैं। बस तुम यहाँ आने का कार्यक्रम बनाओ। तुम्हारे यहाँ रहने से अनिका को घर में अकेले छोड़ने की समस्या तो सुलझ जाएगी न।” फिर उसने एक नया पाँसा फेंका था, “माँ, हम इस लौंग वीक-एंड में लंदन घूमने जाने का प्रोग्राम बना रहे हैं। तुम यहाँ होगी तो हमारे साथ-साथ तुम भी लंदन देख लोगी।”

      उसके स्वर की तेज़ी के बावजूद मैंने कहा था, “मैं क्या देखूंगी लंदन, न मुझसे चला जाता है, न मुझे कुछ दिखाई देता है।”

      उसके पास समाधान था, “अच्छा, नहीं चला जाता तो तुम गाड़ी में बैठी रहना। साथ तो रहोगी न।”

      क्या सोचूँ और क्या जवाब दूँ बच्चों की इन बातों का? ये तो कह देंगे तुम बच्चों के मोह में फँसी हो। अब अनिका भी मोह हो गई क्या?

      भोजन निपटा कर मैं तो लेट गई। झपकी लग गई। उठी तो देखा शाम हो गई है, चाय के शौकीन शाम की चाय पी रहे हैं। बहुत चीनी वाली, पिकनिक की चाय मुझे भाती नहीं। इसलिए कुछ खास मन नहीं हुआ चाय का। यूँ भी आजकल शाम की चाय से रात की नींद भी गड़बड़ हो जाती है, सो टाल ही रही थी, पर फिर देखा समीर मेरे लिए चाय का गिलास ले आया। अच्छी गरम थी, दो घूँट भर ही लिए। कुछ ताज़गी आ गई।

      समेटा-समेटी करके चले तो रास्ते में समीर ने गाड़ी स्टोर पर रोकी। “कुछ ज़रूरी सामान लेते चलें माँ, अनिला का फ़ोन आया था, फिर पूरे हफ़्ते समय नहीं मिलेगा।”

      समीर  स्टोर में जल्दी-जल्दी सामान उठाने लगा। एक शैंपू मैंने भी उठा लिया। समीर ने देखा तो टोका, “माँ, यह क्या उठा लिया अच्छा वाला लेतीं।”

“नहीं यही ठीक है, इसकी कीमत एक डौलर कम है।” मैंने अपना मत प्रकट किया।

      “तुम भी माँ, एक-एक डौलर का मोह पाले हुए हो।” ठीक ही कह रहा है समीर। मैं तो डौलर पहले और चीज़ बाद में देखकर ही खरीददारी करती हूँ। बूढ़ी होने को आई, एक डौलर का मोह नहीं छोड़ पाती।

घर आकर एक गिलास संतरे का रस पिया, भूख और प्यास दोनों शाँत हो गईं। बहू घर आ चुकी है, शेष लोगों के खाने-पीने की ज़रूरतें उसने संभाल लीं।

      सोने के लिए लेटी तो थकान के बावजूद नींद जैसे आँखों से दूर भाग रही थी। रह-रह कर आँख की ज्योति क्षीण होते जाने के बुरे विचार मन को घेरते जा रहे थे। आँख से दिखाई नहीं देगा, चलने फिरने से लाचार होती जाऊँगी, यह कैसा जीवन होगा? फिर शयद कोई सपना देखा था। एक बहुत सुंदर महल जैसा घर, हर चीज़ सुंदर, आकर्षक, करीने से सजाई हुई। मैं सीढ़ियाँ चढ़ती हुई ऊपर चली गई थी। कई कमरे, प्रत्येक की सजावट भव्य, फिर आखिरी कमरा खोला, एक विरूप अंधी बुढ़िया वहाँ बैठी हुई दिखाई दी। मूर्ति थी या सचमुच की बुढ़िया? मैं डर गई थी। हाँ , सपना ही था।

      आज सोमवार है। कल की पिकनिक की थकान के कारण सुबह आँख कुछ देर से खुली। बिस्तर पर ही थी कि ‘गौं-गौं’ की आवाज़ आने लगी। सोमवार को घास काटने वाला आता है, उसी की मशीन की आवाज़ है यह। घास ही नहीं काटता, बेलों-पेड़ों की कटाई-छँटाई भी करता है। मैं बैठक में  सोफ़े के कोने पर जा बैठी। यहाँ से यह पीछे का बगीचा बहुत ही सुंदर दिखाई देता है। अभी वह बाहर का काम पूरा करके फिर घर के इस बगीचे में काम करने आएगा। तब तक मैं चाय बना कर ले आई। सुबह-सुबह बिना चीनी की यह सुगंधित चाय मन खिला देती है मेरा। चाय का कप लिए मैं बगीचे में आ गई। मुझे अच्छा लगता है बगीचे में काम करवाना । वैसे तो वह स्वयं ही बहुत ठीक से काम कर देता है, अपने काम में बहुत चुस्त और कुशल है वह, पर बीच-बीच में मैं कुछ कहती हूँ तो बड़ी खुशी से वह भी कर देता है; “देखो , यह टहनी दीवार पर कुछ ज़्यादा झुक आई है, इसे भी काट देना।”

“ज़रूर-ज़रूर”, वह खुशी से सिर हिलाता है।

पिछले कई हफ़्तों से इस एक टहनी को देख रही हूँ, मोह सा हो गया है इससे। बुढ़ा कर मानों झुक सी गई है। हरी-भरी शाखाओं से लदे वृक्षों में बस एक यही है जिसमें कुछ बदसूरत से भूरे-भूरे पत्ते लटक रहे हैं। पिछले हफ़्ते, बहुत मन पक्का किया था, बगीचे की सुंदरता के लिए, इस सोमवार तो इसे कटवा ही दूंगी।

      वह अपना काम लगभग समाप्त कर चुका है; काटे हुए पत्ते और टहनियाँ समेट कर ‘बिन’ में डाल रहा है। कितनी तेज़ी से चलते हैं इसके हाथ-पैर। हम सोचते ही रह जाते हैं और वह क्षणों में अपना काम समाप्त कर यह जा और वो जा। वह जा रहा है पर मैं सोचती ही रह जाती हूँ, टहनी काटने के लिए नहीं कहती।

मधुरिमा कोहली

175 वैशाली, पीतमपुरा,

दिल्ली -110088

madhurima@narendrakohli.org

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