विशेष विमर्श में पुष्पा सिन्हा की कहानी “शिलाखंड बोल उठा”
कहानी शिलाखंड बोल उठा, एक सामान्य मूर्तिकार की लगन और भगवान के प्रति उसके मन की उथल पुथल को सटीक ढंग से व्यक्त करने का सामर्थ्य रखती है।
हालाँकि पुष्पा सिन्हा ने कहानी में एक औपन्यासिक स्वरूप को समेटने की कोशिश की है इसलिए घटनाएँ और उनका घटना कहीं असामान्य सा भी लगता है, फिर भी कहानी अपनी रोचकता बनाये रखती है और यही कहानी की सार्थकता है : मनोज अबोध
परिचय : 30 मार्च को जन्मी सुपरिचित लेखिका पुष्पा सिन्हा की विभिन्न विषयों पर पच्चीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। लम्हें, बारहमासा,धरती माता पिता आकाश, औरत: कल, आज और कल, काँटों बीच गुलाब, मानवाधिकार की असीमित सरहदें, बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ, दिक्कतों से पार, जेल समाधि, तिरंगा तले, भारतीयम, ईच्छामृत्यु, साहित्य लोक इत्यादि प्रकाशित पुस्तकें। ‘महिलानामा’ उपन्यास के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, भारत सरकार के प्रथम पुरस्कार से सम्मानित पुष्पा सिन्हा को डाॅ महाराज कृष्ण जैन स्मृति सम्मान, शिल्पी चड्ढा स्मृति सम्मान, प्रणेता साहित्य गौरव सम्मान, कृति सम्मान/ पुरस्कार भी प्राप्त हुए।

शिलाखंड बोल उठा : पुष्पा सिन्हा
“ठहरो! मुझे हाथ मत लगाओ! मुझे यहीं निर्झरनी नदी के किनारे पड़ा रहने दो। यहाँ पर मैं नदी किनारे चौबीस घन्टे शीतल जल में गोते लगाता रहता हूँ और स्वच्छ प्रदूषण रहित वातावरण में खुश रहता हूँ। यहाँ न कोई शोरगुल है, और न ही किसी चीज की भीड़भाड़,” नदी किनारे पड़ा शिलाखंड, मूर्तिकार हरिराम को हाथ लगाते ही बोल उठा।
“शिलाखंड! मैं एक मूर्तिकार हूँ, और तुम्हें मैं एक बेआकार शिलाखंड से श्री राम की मूर्ति में ढाल दूँगा। यहाँ नदी किनारे तुम्हारा क्या मूल्य और क्या अदब है! जब तुम शिलाखंड से भगवान राम बन जाओगे, तो तुम सुबह- शाम पूजे जाओगे। हजारों लोग तुम्हारे दर्शन को आएंगे। तुम्हारा तो रूतबा ही बदल जाएगा।
“मुझे बहलाने की कोशिश न करो मूर्तिकार! यहाँ मैं स्वच्छ जल और स्वच्छ हवा में मस्ती से भीड़भाड़ से दूर कलकल जल को देखता रहता हूँ। सुबह-सवेरे लोग यहाँ स्नान करने आते देखकर मुझे खुशी होती है।जंगली जानवर जो यहाँ पानी पीने आते हैं, उनसे मुलाकात हो जाती है। चिड़ियों की चहचहाहट से वातावरण गुंजायमान रहता है। पर जब मैं भगवान राम की मूर्ति बनकर शहर के मंदिर में स्थापित हो जाऊँगा, तो चारो तरफ शोरगुल का वातावरण में रहूँगा। और तो और! तुम मेरे मूर्तिकार, मेरे मंदिर में मेरे दर्शन को मेरे सामने हाथ जोड़े खड़े रहोगे, तब मुझे कितना दुख होगा। सोचो जरा! तुम्हें कैसा महसूस होगा। तुम मन ही मन सोचोगे कि जिसे तुमने इतनी मेहनत से गढ़ा है, उसी का दर्शन करने तुम्हें लाइन में हाथ जोड़कर खड़ा होना पड़ रहा है। अतः मूर्तिकार हमदोनों की भलाई इसी में है कि तुम मुझे न गढ़ो, और मुझे यहीं नदी किनारे पड़ा रहने दो। शिलाखंड ने मूर्तिकार को तर्क सहित समझाने की कोशिश किया। ” नहीं शिलाखंड! तुम ऐसा न कहो! मैं तुम्हें भगवान राम में गढ़ना चाहता हूँ। मूर्तियाँ गढ़ना तो मेरा पेशा है। मूर्तियाँ बनाकर बेचता हूँ, तो इससे जो रूपए मिलते हैं, उससे मेरी और पत्नी की जीविका चलती है। और…और बताऊं…मूर्तियाँ गढ़ना मुझे रूचिकर लगता है। मूर्तियाँ बनाकर मैं खुश होता हूँ। उन्हें तराशते हुए निहारता हूँ, उनसे बातें करता हूँ, और धन्य हो जाता हूँ। उनसे बातें करते वक्त वे मेरे लिए एक अस्तित्व बन जाते हैं, जिससे मेरा अकेलापन दूर हो जाता है, मैं मूर्तिलोक में विचरण करने लगता हूँ। मूर्तियाँ गढ़ते समय न तो मुझे समय का ध्यान रहता है, और न ही परिश्रम का। बल्कि मुझे तो ऐसा महसूस होता है कि दुनियाभर की मूर्तियाँ गढ़ने के लिए ईश्वर ने मुझे ही धरती पर भेजा है,” हरिराम इस नदी किनारे पड़े शिलाखंड से अपने मन की बातों को बता रहा था।
हरिराम के मुख से इतनी बातें सुनकर शिलाखंड कुछ देर चुप रहा और सोचता रहा। फिर हरिराम से कहा -” अच्छा एक बात बताओ मूर्तिकार! तुम मुझे यहाँ से अपने घर ले जाकर कहाँ रखोगे ? क्या मैं तुम्हारे अहाते में कुछ दिनों तक यूँ ही पड़ा रहूँगा। बताओ जरा! मुझे इस गर्मी में कैसा अनुभव होगा! शिलाखंड नदी किनारे ही रहने के लिए अपनी दलील सुनाया।
शिलाखंड से इतना सुनते ही मूर्तिकार बोल पड़ा-” मैं तुम्हे अपने अहाते में यूँ ही नहीं पड़ा रहने दूँगा, बल्कि आम के पेड़ के नीचे शीतल छाया में रखूँगा। सुबह-शाम अगरबत्ती से तुम्हारी पूजा करूँगा। फिर कागज और पेन्सिल से भगवान का चित्र बनाऊंगा, ताकि मैं उसी अनुरूप तुम्हें गढ़ सकूँ। फिर अपनी छोटी छेनी और हथौड़ी से तुम्हें गढ़ना शुरू कर दूँगा।” हरिराम मन ही मन अपनी आकांक्षा को को तौलने लगा कि एक दिन वह इस शिलाखंड से भगवान राम की सुन्दर मूर्ति बना ही लेगा। इस शिलाखंड को देखते ही न जाने कौन सी चमक हरिराम की आँखों में समाई कि वह जल्द से जल्द इस शिलाखंड को भगवान राम के रूप में देखने को अधीर हो गया।
लेकिन शिलाखंड हरिराम को समझाने का हर संभव प्रयास कर रहा था कि वह उसे यहीं निर्झरनी नदी के किनारे पड़ा रहने दे। लेकिन दूसरी तरफ शिलाखंड यह भी सोच रहा था,” बिन आकार के शिलाखंड का क्या मूल्य! भगवान राम बनकर मैं सुबह- शाम पूजा जाऊंगा, मंदिर में घंटियाँ बजेंगी, लोगों की हाथ जोड़कर खड़ी कतार दिखाई देगी, तो मुझे अपने पर गर्व तो होगा, पर कोलाहल के माहौल में मेरा दम भी तो घुटेगा! लेकिन क्या करूँ, स्वयं पर मेरा कोई वश भी तो नहीं है। मैं मूर्तिकार की नज़र पर चढ़ गया हूँ, तो जरूर वह यहाँ से उठकर ले जाएगा, और मुझे मूर्ति में ढाल देगा।”
आखिर वही हुआ, जो शिलाखंड मन में सोच रहा था। हरिराम शिलाखंड को छूकर प्रणाम किया, और नदी किनारे से उठकर अपने घर के आंगन में तुलसी जी के पौधे के पास श्रध्दापूर्वक इत्मीनान से रख दिया। मूर्तिकार हरिराम की अब आधी हसरत पूरी हुई, अब आगे की सोच में सोचते- सोचते रात में उसे नींद आ गई। रात को वह सपने में देखता है कि उसके आंगन में रखा शिलाखंड आकाश से जुगनू की तरह चमकते हुए धीरे- धीरे जमीन की तरफ बढ़ा चला आ रहा है। शिलाखंड जितना नजदीक आता जा रहा था, उसकी रोशनी उतनी ही बढ़ती जा रही थी, और अंत में जमीन पर उतरते ही वह इतना प्रकाशमय हो गया कि नींद में बंद आँखें भी चुंधियाने लगीं।
हरिराम ने झट नींद से जाग अपनी आँखें खोलीं, तो ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। पर जब उसने अपने दिमाग पर जोर देकर सोचना शुरू किया, तो उसे एक स्पष्ट संकेत मिला कि शिलाखंड को अब श्री राम की मूर्ति में गढ़ना शुरू कर देना चाहिए।
सवेरा होते ही हरिराम ने नदी में स्नान कर, घर आकर शिलाखंड की पूजा की और उसे अपने मस्तक से लगाया। फिर मन ही मन में प्रसन्नचित्त होकर सोचा-” अब यह शिलाखंड मेरा राम बनकर मेरा तारणहार बनेगा। आज से ही मैं हे भगवन्! तुम्हें गढ़ना शुरू कर दूँगा। इसके लिए मुझे साहस और संयम दो।”
हरिराम को मूर्ति गढ़ते हुए लगभग एक महीना ही बीता कि अब मूर्ति की आँखें गढ़ने का समय आ गया। वह अपनी छेनी और हथैड़ी को अब इतना हौले-हौले चलाता जा रहा था, ताकि भगवान की आँखों को चोट न लगे। और कुछ ही दिनों के बाद वह विस्मित होकर चिल्ला उठा-” मेरे भगवान श्री राम की अद्भुत आँखें मैंने गढ़ दी। देखूँ कितनी कृतज्ञता से प्रभू मुझे निहार रहे हैं। मैं तो धन्य हो गया, मेरा जीवन सफल हुआ। इसी तरह हरिराम बड़े जोश और लगन से शिलाखंड को भगवान राम का आकार, अपनी छेनी और हथौड़ी द्वारा हल्के हाथों से छील-छील कर गढ़ता जा रहा था। उसे गढ़ने की हरिराम के मन में कोई जल्दी नहीं थी। हाँ, लेकिन मन में यही लगन थी कि मूर्ति उत्कृष्ट बने, क्योंकि यह मूर्ति कई सालों, यहाँ तक कि शताब्दी तक भी रहेगी। उपर से शिलाखंड भी कोई साधारण पत्थर नहीं था, बल्कि उससे प्रकाश की किरणें निकलती प्रतीत होतीं थी।
हरिराम इतने शौक और इत्मीनान से मूर्ति को गढ़ता, जैसे उसे गढ़कर सबकुछ हासिल हो जाएगा। उस दिन जब आधी मूर्ति बनकर तैयार हुई, तो उसने पाया कि मूर्ति उदास सी दिख रही है। उसने मूर्ति से थोड़ी दूर जाकर देखा, कई कोणों से निहार कर देखा, ताकि उसे पता चले कि मूर्ति की उदासी उसके दिमाग की उपज तो नहीं है। पर नहीं, यह तो मूर्ति से ही उदासी टपक रही थी। यह दृश्य देख कर हरिराम भी उदास हो गया, और मन ही मन विचार किया कि एक शुभ दिन पूजा-पाठ के बाद, वह मूर्ति से प्रार्थना करेगा कि वह उदास क्यों दिखती है।
उस रात एक आश्चर्यजनक घटना घटी। हरिराम का मन मूर्ति की उदासी का कारण ढूँढने में लगा था, कि तभी मूर्ति से झंकार की एक आवाज आई। वह स्थिर हो, कान लगाकर सुनने की कोशिश करता, जैसे रात के अंधेरे में कोई कहीं से आई आवाज को कान लगा कर थाह लेने की कोशिश करता है। पर कुछ भी पता नहीं चल पाया। पर अधगढ़ी मूर्ति की उदास आँखें देख, अब हरिराम भी कभी-कभी उदासीन महसूस करता। वह मन ही मन सोचता-” आखिर इस शिलाखंड को तराशकर भगवान की मूर्ति बना कर मैं तो इसका भाग्य जगा रहा हूँ। यह सदियों तक भगवान के रूप में पूजा जाएगा,तो फिर इसकी आँखों में उदासी कैसी ?
ऐसे में हरिराम भी कुछ उदास रहने लगा। और एक दिन! हाँ एक दिन हरिराम को रात का खाना खिलाते वक्त उसका उदास चेहरा देखकर उसकी पत्नी ने पूछ ही लिया-” राम जी! आजकल आप कुछ उदास से रहने लगे हो। पहले आप हमेशा खुश दिखते थे। हमें कोई संतान नहीं है, फिर भी आपने कोई परवाह नहीं की। पर अब कौन सी ऐसी बात आपके जीवन में घर कर गई है कि आपकी आँखों से उदासी टपकती है।” पत्नी के मुख से इतना सुनकर भी हरिराम चुप रहा, और सोचता रहा कि पत्नी को सही कारण बता दूँ, या फिर चुप ही रहूँ, और सही समय का इंतजार करूँ।
कुछ दिनों बाद पत्नी के दुबारा टोकने पर हरिराम से अब चुप न रहा गया, और धीमी आवाज़ में बोला-” सीता ! आजकल मैं जो भगवान की मूर्ति बना रहा हूँ, उसकी आँखों में उदासीनता सी दिखती है मुझे। समझ नहीं पा रहा हूँ कि आखिर ऐसा क्यूँ दिख रहा मुझे।
इधर दिन बीतते गए और भगवान की मूर्ति अब लगभग तैयार होने पर थी और उधर निर्झरनी नदी के किनारे आबादी बसने लगी थी। लोग नदी किनारे की जमीन पर अपना घर बनाने लगे थे। साथ ही हाट-बाजार भी लगने लगा। ऐसे में वहाँ के लोगों को नदी किनारे एक मंदिर की जरूरत महसूस होने लगी। लोग-बाग सोचते-” काश! यहाँ नदी के पास एक मंदिर होता, तो स्नान के बाद मंदिर में भगवान का दर्शन करते हुए घर पहुंचते।”
यह खबर हरिराम के कानों तक भी पहुंची। तब उसने वहाँ बसे लोगों से मंदिर बनाए जाने की बात की, तो लोगों ने सहर्ष चंदा इक्ट्ठा कर मंदिर बनवाने की योजना बनाई। कहते हैं न कि शुभ काम में देरी कैसी! नदी किनारे चटपट मंदिर की दीवारें खड़ी कर छोटा सा दो कमरों वाला मंदिर बनकर तैयार हो गया,और उसमें रंगाई- पुताई होने लगी। साथ ही नदी किनारे बसी आबादी ने वहाँ का नाम होल्कर गांव रख दिया। वहाँ सभी जानते थे कि पास के ही गाँव का हरिराम मूर्तिकार है, और आजकल वह भगवान श्री राम की मूर्ति तैयार कर रहा है। बातों ही बातों में गांव वालों की हरिराम से बात पक्की हो गई कि वह राम जी की मूर्ति को मंदिर के लिए दान में दे देगा। अब बात आगे बढ़ी, और मंदिर के पुजारी की खोज होने लगी।गांव वाले बड़े जुगाड़ू निकले। उन्होंने फैसला किया कि हरिराम से अच्छा पुजारी और कौन हो सकता है। एक तो वह भगवान राम का मूर्तिकार और ऊपर से जाति का ब्राह्मण।
गांव वालों ने हरिराम को अपना फैसला सुना दिया, तो वह भी फूला न समाया। भला स्वयं के गढ़े भगवान को पूजा-पाठ करने का सौभाग्य मिल जाए, तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। जीवन भर मूर्तियाँ गढ़ने के बाद वह अब थक चुका था, और अब पूजा-पाठ उसे भा गया। हरिराम ने सहर्ष गांव वालों को अपनी स्वीकृति दे दी। शुभ मुहूर्त देखकर मंदिर का उद्घाटन हुआ, और हरिराम अब पंडित हरिराम कहलाने लगे।
अभी पंडित हरिराम को मंदिर में पूजा-पाठ करते हुए मात्र चालीस दिन ही गुजरे थे कि एक रात अंबर में बादल आपस में टकराये और तेज गर्जन हुई, जैसे हरिराम को कोई शोक संदेश देना चाह रहे हों। रात में बादलों की घरघराहट सुनकर हरिराम कांप उठे, और पत्नी को अपनी बाहों में भर लिया। लेकिन यह क्या! पत्नी के शरीर में कोई हरकत नहीं हुई। उसने घबराकर झट घर की बत्ती जलाकर पत्नी का शरीर टटोला। पत्नी का शरीर शांत था,और साँसें थम चुकी थीं। हरिराम रात के अंधेरे में दहाड़े मारकर रोने लगा, विलाप करने लगा।
खैर! होनी को कौन टाल सकता है। हरिराम अब अपने घर में अकेला रह गया था। घर में अकेले रहते हुए दिन उसे बिच्छू के डंक जैसे लगते,और रातें सांप के डसने जैसा महसूस होता। अतः फैसला किया गया कि हरिराम अपना घर बंद कर, अब मंदिर के बगल वाले कमरे में रहेंगे। वहां उनका मन लग गया, क्योंकि मंदिर में हलचल रहती थी,घंटी बजती थी, और दिया-बत्ती जलती रहती थी।
सभी की सहमति से हरिराम मंदिर में बस गए, सुबह-शाम पूजा-पाठ करते, और दिन में शास्त्रों का अध्ययन करते। साथ ही तीज-त्यौहार पर मंदिर के प्रांगण में प्रवचन का आयोजन करते। एक दिन हरिराम ने पाया कि अब भगवान राम की आँखें प्रसन्नचित्त दिखाई दे रही हैं। यह देखकर हरिराम खुश हो गए। आखिर भगवान और भक्त का सुखद मिलन जो हुआ था।
