विशेष विमर्श में श्री एम. पी. दामोदरन द्वारा अनुवादित कविताएँ

श्री एम. पी. दामोदरन की मलियाली भाषा में लिखी प्रस्तुत कविता वस्तुत गुरु वंदना के साथ ही ईश्वर की वंदना भी है जिसमें कवि परमेश्वर की शक्तियों और शासक के स्वभाव और कार्यशैली पर भी लेखनी चलाता है – मनोज अबोध

परिचय : श्री. एम. पी. दामोदरन का जन्म 31.05.1964 को केरल के कण्णूर जिला के मातमंगलम गाँव में हुआ था। इन्होंने पय्यनूर कॉलेज से गोल्ड मेडल के साथ हिंदी माध्यम से बी. ए. की उपाधि प्राप्त की। लेखक ने कोचीन विश्वविद्यालय से एम. ए. हिंदी की उपाधि तथा केरल विश्वविद्यालय से हिंदी में बी. एड़ की उपाधि प्राप्त की।
सन 1989 नवंबर में भारत सरकार के राजभाषा विभाग की हिंदी शिक्षण योजना के कोचीन कार्यालय में हिंदी प्राध्यापक के पद पर अपना कार्यभार ग्रहण किया। इन्होंने हिंदी अधिकारी के पद पर भारतीय मौसम विभाग, नागपूर में प्रतिनियुक्ति के आधार पर, केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण उप संस्थान, बेंगलूर में सहायक निदेशक (भाषा) के पद पर आठ वर्ष तथा केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण संस्थान, राजभाषा विभाग, नई दिल्ली एवं हिंदी शिक्षण योजना, चेन्नै, में उप निदेशक (भाषा) के पद पर दो वर्ष, बेंगलूर में स्थित कॉफी बोर्ड के प्रधान कार्यालय में प्रतिनियुक्ति के आधार पर उप निदेशक (राजभाषा) के पद पर काम किया है।

मंगलाचरण

गुरुनाथ की सतत कृपा से
सदा रहे जीभ पर हरी के नाम
अलग न रहे वह कभी भी हमसे
नर जन्म तो तभी सफल बने !
कृष्ण ! कृष्ण ! मुकुंद ! जनार्दन !
कृष्ण ! गोविंद ! नारायण ! हरे !
अच्युतानंद ! गोविंद ! माधव !
सच्चिदानंद ! नारायण ! हरे!

समय का खेल

कल क्या था यह तो पता नहीं
कल क्या होगा यह भी पता नहीं
अब दिखे तन के विनाश का
काल कब है यह भी पता नहीं
सामने दिखे मर्त्य की लीला भी
तमाम करते तो आप ही हैं हरि
दो या चार दिनों में किसी को भी
ओहदे पर बिठाते तो आप हैं,
महल में विराजमान महाराज को
भिखारी बनाने वाले तो आप हैं ।
कृष्ण ! कृष्ण ! मुकुंद ! जनार्दन !
कृष्ण ! गोविंद ! नारायण ! हरे !
अच्युतानंद ! गोविंद ! माधव !
सच्चिदानंद ! नारायण ! हरे!

शासकों के प्रकार

देखते ही समझ लेते कोई
देखने से भी न समझते कोई ।
जो भी देखा है वह सत्य है नहीं
यह भी जान लेते हैं पहले ही कोई ।
मनु जाति में मानव मन है तो
भिन्न-भिन्न हैं, यह सभी जान लें ।
सभी को यह समझाने के लिए
बनाये हैं शास्त्र भिन्न-भिन्न यार।
कर्म के अधिकारी जनों के लिए
बने कर्म-शास्त्र भी भिन्न-भिन्न हैं ।
ज्ञान के अधिकारी जनों के लिए
बने ज्ञान-शास्त्र भी भिन्न-भिन्न हैं ।
सांख्य और योग-शास्त्र आदि भी
अनगिनत हैं, सभी सदा यहीं रहें ।

मूल रचना

മംഗളാചരണം
കൃഷ്ണ! കൃഷ്ണ! മുകുന്ദ! ജനാർദ്ദന!
കൃഷ്ണ! ഗോവിന്ദ! നാരായണാ! ഹരേ!
അച്യുതാനന്ദ! ഗോവിന്ദ! മാധവാ!
സച്ചിദാനന്ദ! നാരായണാ! ഹരേ!

ഗുരുനാഥൻതുണചെയ്കസന്തതം
തിരുനാമങ്ങൾനാവിന്മേലെപ്പോഴും
പിരിയാതെയിരിക്കണംനമ്മുടെ
നരജന്മംസഫലമാക്കീടുവാൻ!(2)

കാലലീല
ഇന്നലെയോളമെന്തെന്നറിഞ്ഞീലാ
ഇന്നിനാളെയുമെന്തെന്നറിഞ്ഞീലാ
ഇന്നിക്കണ്ടതടിക്കുവിനാശവു-
മിന്നനേരമെന്നേതുമറിഞ്ഞീലാ.
കണ്ടുകണ്ടങ്ങിരിക്കുംജനങ്ങളെ-
ക്കണ്ടില്ലെന്നുവരുത്തുന്നതുംഭവാൻ.
രണ്ടുനാലുദിനംകൊണ്ടൊരുത്തനെ
തണ്ടിലേറ്റിനടത്തുന്നതുംഭവാൻ,
മാളികമുകളേറിയമന്നന്റെ
തോളിൽമാറാപ്പുകേറ്റുന്നതുംഭവാൻ‍1.

അധികാരിഭേദം
കണ്ടാലൊട്ടറിയുന്നുചിലരിതു
കണ്ടാലുംതിരിയാചിലർക്കേതുമേ.
കണ്ടതൊന്നുമേസത്യമല്ലെന്നതു
മുമ്പേകണ്ടിട്ടറിയുന്നിതുചിലർ2.
മനുജാതിയിൽത്തന്നെപലവിധം
മനസ്സിന്നുവിശേഷമുണ്ടോർക്കണം.
പലർക്കുമറിയേണമെന്നിട്ടല്ലോ
പലജാതിപറയുന്നശാസ്ത്രങ്ങൾ.
കർമ്മത്തിലധികാരിജനങ്ങൾക്കു
കർമ്മശാസ്ത്രങ്ങളുണ്ടുപലവിധം.
ജ്ഞാനത്തിന്നധികാരിജനങ്ങൾക്കു
ജ്ഞാനശാസ്ത്രങ്ങളുംപലതുണ്ടല്ലോ.
സാംഖ്യശാസ്ത്രങ്ങൾയോഗങ്ങളെന്നിവ3
സംഖ്യയിലതുനില്‌ക്കട്ടേസർവ്വവും

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