‘भाषा की पाठशाला’ में आज के शब्द – ग्रंथ, पुस्तक और किताब : कमलेश कमल
कमलेश कमल हिंदी के चर्चित वैयाकरण, भाषाविज्ञानी एवं लेखक हैं। वे भारतीय शिक्षा बोर्ड के भाषा सलाहकार रहे हैं तथा भारत सरकार के विभिन्न हिंदी शब्दकोशों के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। ‘गोस्वामी तुलसीदास सम्मान’ (2023) और ‘विष्णु प्रभाकर राष्ट्रीय साहित्य सम्मान’ (2023) सहित अनेक सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। दैनिक जागरण में ‘भाषा की पाठशाला’ के स्थायी स्तंभकार तथा दूरदर्शन के ‘हिंदी पाठशाला’ कार्यक्रम से जुड़े रहे हैं। उनकी प्रमुख पुस्तकों में ‘भाषा संशय-शोधन’, ‘शब्द-संधान’, ‘शब्दार्थ’ और उपन्यास ‘ऑपरेशन बस्तर : प्रेम और जंग’ शामिल हैं। 2000 से अधिक आलेख, कविताएँ, कहानियाँ, संपादकीय एवं समीक्षाएँ प्रकाशित हैं। UPSC अभ्यर्थियों के लिए हिंदी एवं निबंध की निःशुल्क कक्षाएँ तथा विभिन्न विश्वविद्यालयों में भाषा-संवाद कार्यक्रम संचालित करते रहे हैं। वे ITBP में जनसंपर्क अधिकारी एवं प्रकाशन प्रमुख के रूप में भी कार्य कर चुके हैं।

‘भाषा की पाठशाला’ में आज के शब्द : ग्रंथ, पुस्तक और किताब
ग्रंथ : ‘ग्रंथ’ शब्द में गुँथे होने, नत्थी होने का भाव है। लिखित भोजपत्र आदि को ग्रंथित करने अथवा नत्थी करने से ही ‘ग्रंथ’ अस्तित्व में आया होगा। जब तक लिखित अथवा मुद्रित सामग्री अलग-अलग रखी रहे, आपस में गुँथी न जाए, ग्रंथ का अस्तित्व संभव नहीं। विदित है कि ‘ग्रंथि’ का अर्थ गाँठ अथवा गुच्छा है। यही कारण है कि विवाह में वर-वधू के कपड़ों में जो गाँठ लगाकर बाँधने की रस्म होती है, उसे ‘ग्रन्थिबन्धन’ कहा जाता है, जो तद्भव में ‘गठबंधन’ हो गया। वर-वधू की भाँति आज राजनीतिक पार्टियाँ भी ग्रन्थिबन्धन या गठबंधन करती हैं; जो अधिक तनाव या तकरार की स्थिति में टूट भी जाता है।
विदित है कि ग्रंथ का पाठ करने वाला व्यक्ति ‘ग्रंथी’ कहलाता है; जबकि ग्रंथ से ही बने ‘ग्रंथिक’ का अर्थ होता है– ‘ज्योतिषी’ (जो जन्मपत्री के बहुत से पन्नों को गाँठ लगाकर रखता है)। इसी से मिलते-जुलते एक अन्य शब्द ‘ग्रंथिल’ का अर्थ है– गाँठ वाला अर्थात् जटिल; जबकि ‘ग्रंथन’ किसी वस्तु को गाँठ देकर बाँधने या गठियाने के लिए प्रयुक्त होने वाला शब्द है।
पुस्तक : संस्कृत के ‘पुस्त्’ में लेप करने, पोतने, पलस्तर करने, आवरण चढ़ाने का भाव है। स्पष्ट है कि इससे व्युत्पन्न ‘पुस्तक’ शब्द अपने जन्म के समय लिखित सामग्री के आवरण अथवा जिल्द के लिए प्रयुक्त हुआ होगा। विदित है कि अलग-अलग लिखित सामग्री जब एक आवरण में आ जाए, तब पुस्तक का निर्माण होता है। कालांतर में, ‘पुस्त’ अथवा आवरण ही ‘ग्रंथ’ की पूरी सामग्री का पर्याय बन गया। कहा जा सकता है कि ‘पुस्तक’ शब्द का अर्थविस्तार हुआ है। लघु पुस्तक के लिए ‘पुस्तिका’ शब्द का प्रयोग होता है।
किताब : अरबी भाषा का स्त्रीलिंग शब्द है, जिसका मूल अर्थ है– ‘लिखी हुई सामग्री’। पुस्तक, ग्रंथ या पोथी के लिए अरबी भाषा का यह शब्द हिंदी में भी खूब प्रचलन में है। लिखाई का काम ‘किताबत’ कहलाता है। किताब से संबंधित के लिए विशेषण शब्द ‘किताबी’ है, जैसे किताबी बातें, किताबी चेहरा आदि। हम देखते हैं कि हिंदी ने अरबी से आए ‘किताब’ और ‘किताबी’ का तो स्वागत किया, पर पुस्तकालय के लिए ‘किताबख़ाना’ और ‘किताबिस्तान’ को नहीं अपनाया।
