दिन विशेष कविता : प्यारी अम्मा – प्रियंका सिंह
एक धुंधली सी याद है
बचपन से ही साथ है
चूल्हे पर से उठता धुआँ
रसोई में बैठी हमारी अम्मा
हांडी में रखी दाल उबलती
सिल पर धनिये की चटनी महकती
अलट-पलट कर रोटी सेकती
फूँकनी दिखाकर हमें डराती
हमारी अम्मा हमें बुलाती
डाँट-डाँट कर सबको पुकारे
डाँट-डाँट कर सबको पुकारे
रोटी खा लो
मर जाओ सारे
कुछ ऐसी थी हमारी अम्मा
सचमुच बहुत थी प्यारी अम्मा
डाँट में भी प्यार छुपाती
प्यार-प्यार में डाँट लगाती
मैं पतलून पहनती तो मुझे चिढ़ाती
थाने का हवलदार बताती
कुछ ऐसी थी हमारी अम्मा
सब बच्चों की प्यारी अम्मा
गोल-मटोल थी हमारी अम्मा
मैली सी साड़ी पहने अम्मा
फूँकनी से आग जलाती
गरम-गरम रोटी खिलाती
साथ में नोनी घी और चटनी
सब बच्चों की अम्मा अपनी
कुछ-कुछ ऊँचा सुनती थी वो
कुछ-कुछ ऊँचा सुनती थी वो
हम कहते “अम्मा बादल बहुत हैं”
वो सुनती “हाँ बालक बहुत हैं”
कम सुनकर भी ज्यादा सुनती
ज्यादा सुनकर भी सुनती कम
हम कहते “अम्मा कान में मशीन लगा लो
क्योंकि तुमको सुनता है कुछ कम”
वो कहती “तुम अपने मुँह में लगा लो
क्योंकि मुझको नहीं कोई गम”
कुछ ऐसी थी हमारी अम्मा
सब बच्चों की प्यारी अम्मा
हँसते-हँसते छोड़ गई ये दुनिया
आज कहीं तारों संग मुस्कुराती होगी
कहती होगी
कहाँ गए मेरे बच्चे प्यारे
रोटी खा लो
मर जाओ सारे
