दिन विशेष व्यंग्य : पेट्रोल महागाथा – डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र
डेढ़ किलोमीटर लंबी कतार में बिल्कुल आख़िरी छोर पर खड़े मियाँ अज़ायब ख़ान को दूरबीन से देखकर ही पहचाना जा सकता था। पर, उनके हाव-भाव और ज़िस्मानी लहज़े से ही मैं, उनका जो लंगोटिया-रुमालिया यार हूँ, ताड़ गया कि वह मियाँ ख़ान ही हैं जो अपनी कार के सहारे खड़े हैं। उनकी मरियल-सड़ियल हालत देखकर मेरा सिर चकरघिन्नी करने लगा। पास पहुँचकर मैंने देखा कि मटमैला लुंगी-कुर्ता पहने पूर्व-पार्षद और भूतपूर्व मेयर अर्थात मियाँ ख़ान की हालत बेहद पतली है। बेशक़ीमती सऊदी बुरक़े और अबाया ओढ़ी चार-चार बेग़मों के साथ हाई लेविल की ऐय्याश ज़िंदग़ी बसर करने वाले और दिनभर में दर्ज़नभर सिगार फूँककर ग़रीबी-फटीचरी जैसे हालात का मखौल उड़ाने वाले, दो दर्ज़न बच्चों के अब्बा, अर्थात मियाँ ख़ान को रेशमी शलवार-अचकन में ही देखा गया है. जिस तरह चार्ली चैपलिन जैसी शख़्सियत को सोने की हैंडिल वाली स्टिक और फ्रेंच हैट के बिना पहचानना एक टेढ़ी खीर थी, उसी तरह मियाँ ख़ान को एक बेहद ख़ास और रोबदार पहनावे में न देखा जाना उनकी भारी-भरकम शख़्सियत का गुड़-गोबर करने जैसा ही है। पर, उस दिन तो ग़ज़ब ही हो गया. वह बेमूँछदार लेकिन पूँछदार चेहरा लटकाए हुए उस उमरदराज़ दढ़ियल बकरे की माफिक लग रहे थे जिसे बक़रीद के दिन कुर्बानी के लिए ज़िबहख़ाने में ले जाया जा रहा हो।
कोठी में चार-चार नौकरों की ख़िदमत में ऐशो-आराम की ज़िंदग़ी का नायाब मिसाल बन चुके मियाँ ख़ान से मिलते ही जब मैंने सवाल किया कि उन्होंने ऐसा हुलिया क्यों बना रखा है तो वह बिफर पड़े, “डॉक’ सा’ब! मैं आसमान से गिरे और ख़जूर पर अटके उस शख़्स की तरह हूँ जिसकी ख़ानदानी शानो-शौकत पर फुफुंद उग आया है। मेरी हालत हिंदुस्तान में रहते हुए पाकिस्तान जैसी होती जा रही है जिसके हुक्का-पानी की सप्लाई हिंदुस्तान द्वारा बंद कर दी गई है।”
पाकिस्तान का ज़िक्र आते ही मैंने ताज़्ज़ुब से अपना मुँह खोला ही था कि पड़ोस से घुसपैठ करके आई एक मक्खी मेरे अंदर चली गई जिसे सर्ज़िकल स्ट्राइक की माफ़िक ख़खार कर उगलते हुए मैं बोला, “मियाँ, आपके ख़िदमतग़ार कहाँ गए।”
तभी वह पान की पीप से बग़ल से गुज़र रही मोबाइल फोन की दुनिया में खोई एक ख़फ़्तुलहवास मोहतरमा के पिछवाड़े को रंगीन करते हुए बोले, “अज़ी, मेरे सारे नौकर-चाकर किसी ईरानी नेता के शहीद होने पर एक ख़ासमख़ास भीड़ में ग़मी मनाने लखनऊ चले गए हैं। बेग़ानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना—क्या कहा जाए?”
मैं समझ गया कि चौबीस कैरेट सोने की तरह खाँटी मुसलमान मियाँ ख़ान को अपने उसूलों के ख़िलाफ जाकर क्या-क्या नहीं करना पड़ रहा है। अभी वह अपनी मर्सिडीज़ में पेट्रोल भरवाएंगे, फिर हलाल मार्केट जाकर गोश्त लाएंगे, उसके बाद ख़ुद ही मीट-कोरमा बनाकर कोई पाँच घंटे बाद पेट-पूजा करेंगे। चार में से उनकी दो बीवियाँ तो ऐसी हैं जिन्हें किचेन का ककहरा तक नहीं पता है। तीसरी किसी उलेमा-शेख की बेटी है जिसके साथ उन्होंने इसी शर्त पर निक़ाह किया था कि वह उसे मुमताज़ बेग़म की तरह हरम की पटरानी बनाकर रखेंगे जिसके ख़ुदा-न-ख़ास्ता मुमताज़ की तरह चौदहवें बच्चे की अम्मी बनते समय अकाल मौत हो जाने पर ताज़महल की नकल पर एक गगनचुम्बी मक़बरा बनवाएंगे जिसके लिए उन्होंने अपने पड़ोस के एक शिवाले पर कब्ज़ा भी कर रखा है। इस प्रकार यह तीसरी बेग़म तो बीफ कोरमा बनाने से रही। बाकी बची चौथी बीवी जो काफिर है और जिसे मियाँ ख़ान लव ज़ेहाद में फँसाकर ब्याह लाए थे और जिससे किए गए इस वायदे को वह आज तेरह साल बाद भी निभा रहे हैं कि उसे गोश्त खिलाकर मुसलमान नहीं बनाएंगे और उसे अपनी ब्राह्मणी रीति-रिवाज़ों के साथ रहने देंगे। कोई नाज़ायज़ ज़ोर-ज़बर्दस्ती नहीं करेंगे।
भला हो, नेकदिल मियाँ ख़ान का जो अब्दुल की तरह नहीं हैं; बल्कि बेहद फराख़दिल हैं और उसके लिए अलग रसोई है और अलग पूजागृह का प्रबंध कर रखा है। सो, प्याज-लहसुन की गंध से ग़शी खाने वाली यह चौथी बीवी का तो रेड बीफ देखते ही राम-नाम-सत्त हो जाएगा। इसलिए, पेट्रोल पंप से फारिग होने के बाद ख़ान ही कुआँ खोदेंगे, ख़ुद ही उसका पानी पीएंगे।
मेरे मन में निरीह मियाँ ख़ान के प्रति अपार स्नेह-सम्मान की सुनामी उमड़ रही थी। हिंदुस्तान के अच्छे मुसलमान की भूमिका में उनका कोई सानी नहीं है। सर्वथा-सर्वदा शांत-चित्त रहते हैं—चाहे कोई भोला-भाला अब्दुल किसी काफ़िर गुड़िया को नोच-खाकर और उसके छत्तीस हिज़्ज़े अटैची में निपटाए, या कोई कश्मीरी चच्चाज़ान मुँहबोली बहन बनाई हुई किसी काफ़िर औरत के साथ सरेआम वो करें, जो एक सच्चे नमाज़ी मुसलमान के लिए करना बेहद ज़रूरी है।
चुनांचे, कतार में अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे मियाँ ख़ान यहाँ भी अपनी शांत-चित्तता की काबिले-तारीफ मिसाल पेश कर रहे हैं। लाइन तोड़कर और अपनी औक़ात का रोब ग़ालिब करके वह पहले नंबर पर पेट्रोल प्राप्त कर सकते हैं। मेरे द्वारा उकसावे पर भी वह ऐसा नहीं कर रहे हैं. बेशक, वह सार्वजनिक रूप से ऐसा करके किसी की नुक़्ताचीनी का शिकार नहीं होना चाहते हैं। आख़िर, इस चुनाव में विधायक का टिकट भी तो उन्हें हथियाना है।लेकिन, तेल की किल्लत पर वह सरकार को अपनी सख़्त ज़बान से झिड़कियों की दुलत्ती मारने से भी बाज़ नहीं आ रहे हैं। सालाना पेंशन में पाँच-छ: प्रतिशत डीए की बढ़ोत्तरी के बावज़ूद पेट्रोल और डीज़ल की प्रति लीटर कीमतों पर तीन रुपए बढ़ने पर घड़ों आँसू बहा रहे हैं और सरकार के ख़िलाफ लोगों की हमदर्दी बटोर रहे हैं। भूतपूर्व जिला मेयर के रूप में देश के बेहद ख़ास आदमी का ख़िताब मिलने के बावज़ूद महंगाई के बढ़ने पर आवाम को भड़काकर उससे वल्ग़ार कराना चाह रहे हैं। लिहाज़ा, जब कौमी विद्रोह होगा तभी तो वह एक ख़ास समुदाय के साथ खड़े होंगे और अन्याय हो रहा है—के विरुद्ध ज़ुमला भौंकेंगे। अभी यहाँ सरकार को कटघरे में खड़े करने के बाद बाहर निकलेंगे तो साठ रुपए का बनारसी पान खाकर थूकने में उन्हें कोई मलाल नहीं होगा और किसी मोटे-तगड़े फकीर को उसके शाम के चिकेन-मटन और बीफ-बिरयानी के लिए उसकी कटोरी में पाँच सौ रुपए डालने में कोई हिचक नहीं होगी।
बहरहाल, इस घड़ी मियाँ ख़ान पेट्रोल पर दीक्षांत भाषण दे रहे हैं। वहाँ खड़ा मैं ही उनका इकलौता श्रोता नहीं हूँ, बल्कि अमृत-समान पेट्रोल-प्रसाद प्राप्त करने के लिए पेट्रोल पंप पर अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे असंख्य श्रद्धालु जन भी उनका भाषण सुन रहे हैं। उनके अमृत-वचन का लब्बोलुबाब यह है कि पेट्रोल इक्कीसवीं सदी का अमृत बन गया है—बस, फर्क इतना है कि इसे पीने से नहीं, कार-मोटर में भरवाने से जीवन चलता है। इसलिए इस जीवन को सार्थक बनाने के लिए अगर कहीं दस गज भी चलकर जाना हो तो अपनी गाड़ी से ही जाना मज़बूरी है। कार-मोटर के शौकीन लोग सरकार के ख़िलाफ बग़ावत करते हुए यह तंज़ कसते हैं कि वे पेट्रोल पंप पर जाने से पहले बैंक से लोन लेने पर विचार कर रहे हैं। आगे मियाँ ख़ान कहते हैं कि पेट्रोल पंप की मशीन से पेट्रोल कम और आहें ज्यादा निकलती हैं। यों तो सरकार का मानना है कि पेट्रोल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भर करती हैं जबकि जनता का कहना है कि सरकार कि नज़र उसकी जेब काटने पर रहती है। हम यह सोचने लगे हैं कि काश, वह दिन कब आएगा जबकि हमारी गाड़ियां भी पेट्रोल पीए बग़ैर हमारी तरह पैदल ही चलने लगेंगी। सो, हम कार-मोटर निर्माता कम्पनियों से पूछने लगे हैं कि भैया! हमें गाड़ी की माइलेज़ से कुछ भी लेना-देना नहीं है, इसमें पैदल चलने का सिस्टम भी मुहैया करा दो। अब हम कार तभी दौड़ाएंगे जबकि गाड़ियाँ पेट्रोल के बजाए पानी से चलने लगेंगी और हम अपनी कार-मोटरों में सड़क किनारे नलों से पानी भरकर अपनी-अपनी गाड़ियां चलाएंगे और अपनी जीवन-नैया पार लगाएंगे। मियाँ ख़ान वहाँ खड़े अपने श्रोतावृन्द से यह गुज़ारिश करते हैं कि आपलोग अपनी बहन-बेटियों के शादी-ब्याह में अब दहेज में मोटर-कार की डिमांड करने के साथ-साथ कोई दस हजार लीटर पेट्रोल से भरा टैंक की भी मांग करें।
मित्रो, मियाँ ख़ान हमारे समय की सशक्त आवाज़ हैं। इसमें उनकी अपने स्वार्थ और जनता के हित की कितनी मिलावट है! क्या वह बेसिर-पैर की बातें कर रहे हैं. आप अपने विचार अवश्य दीजिएगा। धन्यवाद!

