पुस्तक समीक्षा : “एक आदर्शवादी सपने को यथार्थ में बदलना” – नीलम दुग्गल ‘नरगिस’
‘टुवर्ड्स एन इगैलिटेरियन सोसाइटी’
लेखक: डॉ. सुधा कुमारी
प्रकाशक: आलोकपर्व प्रकाशन
मूल्य: हार्ड कवर रु. 695/-, पेपरबैक रु. 495/-
समीक्षक: नीलम दुग्गल ‘नरगिस’,
पूर्व व्याख्याता (अंग्रेजी) और समाजसेवी
आज के समाज में जब ‘मैं’ ‘मुझे’ और मेरा’ वाली सोच तेज़ी से बढ़ रही है, तब डॉ. सुधा की पुस्तक ‘टुवर्ड्स एन इगैलिटेरियन सोसाइटी’ एक ताजा हवा के झोंके की तरह आई है, जो इसे और भी अहम और सार्थक बनाती है। डॉ. सुधा कुमारी न सिर्फ़ एक पूर्व आईआरएस अधिकारी हैं, बल्कि समाज और सिस्टम में न्याय, समानता और सस्टेनेबिलिटी के लिए समर्पित वॉलंटियर भी हैं। तीन दशकों के अपने करियर में अलग-अलग राज्यों में अहम प्रशासनिक भूमिकाएँ निभाने से उनका एक उदार और व्यावहारिक नज़रिया बना है, जो इस पुस्तक में स्पष्ट झलकता है।
उन्होंने अपनी पुस्तक के 34 अध्यायों में इंसानियत से जुड़े कई विषयों को शामिल किया है। लेखिका की पैनी नज़र से कुछ भी नहीं छूटा है – जैसे स्वच्छ पर्यावरण, न्यायिक प्रक्रिया और लोकतंत्र की कमियाँ, माता-पिता और बच्चों के कर्तव्य, महिलाओं का संपत्ति का अधिकार और कर्तव्य, महिला के विरुद्ध अपराध, विवाह-संस्था, आध्यात्मिकता, नशीली दवाओं की लत, सुरक्षित परिवहन, नदियों की सफाई, पराली की समस्या और भी बहुत कुछ। इस किताब की विशेषता केवल समस्याओं पर चर्चा करना नहीं है, बल्कि लेखिका हर अध्याय के अंत में बहुत व्यावहारिक समाधान भी बताती हैं। जिस तरह आय, उत्पादन और रोजगार पैदा करने जैसे अच्छे कामों के लिए टैक्स और दंड के प्रावधान हैं, उसी तरह प्रदूषण, कचरा फैलाने और कब्ज़ा करने जैसी बुरी गतिविधियों पर टैक्स लगाने और दंड लगाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया है।
वह समाज पर समस्याओं के प्रभाव और मीडिया, उद्योग और प्रसिद्ध व्यक्ति कैसे एक खुशहाल समाज बनाने में योगदान दे सकते हैं, इस बात पर चर्चा करती हैं। अगर हम अपनी सोच बदल सकें, तो हमारे समाज में खुशी का स्तर- जो अभी बहुत कम है- बढ़ सकता है।
यह पूरी पुस्तक एक ऐसे विचार को आगे बढ़ाती है जो बरसों की गहरी समझ और अवलोकन से विकसित हुआ है कि समतामूलक और न्यायपरक समाज कोई कोरी कल्पना नहीं है, बल्कि इसे वास्तविकता बनाया जा सकता है, यदि हम परिवर्तन की शुरुआत व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर से करें जिससे अंततः देश के स्तर पर बदलाव आए। लेखिका पाठकों को उन समस्याओं पर सोचने और उनके प्रति संवेदनशील होने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करती हैं, जिन्हें समाज युगों से सामान्य और रोज़मर्रा की बात मानकर सहन करता आया है।
पितृसत्तात्मक समाज की वजह से महिलाओं के बारे में बनी नकारात्मक सोच पर चर्चा करते हुए, वह एक बहुत दिलचस्प बात कहती हैं कि पुरुषों में ‘मृत्यु-प्रवृत्ति’ ज़्यादा होती है, जबकि महिलाओं में ‘जीवन-प्रवृत्ति’ ज़्यादा होती है। वह लिखती हैं कि वयस्क पुरुषों में अक्सर करियर में विफलता से हताशा, नशे की लत और खुद को नुकसान पहुँचाने की प्रवृत्ति वयस्क महिलाओं की तुलना में अधिक होती है क्योंकि महिलाओं में भावनात्मक तनाव को बाहर निकालने के लिए अश्रु-ग्रंथियाँ होती हैं और इसलिए भी कि महिलाएँ जीवन-ऊर्जा के नए रूपों का स्रोत हैं। शायद यही कारण है कि जीवित विधवाओं की संख्या जीवित विधुरों की तुलना में ज़्यादा देखी जाती है।
वह हमें एक ऐसे समाज के निर्माण के लिए आमंत्रित करती हैं जो न्याय पर आधारित हो, जहाँ कोई भेदभाव और तनाव न हो और जहाँ वातावरण स्वस्थ, स्वच्छ और स्त्री-पुरुष के बीच आपसी सम्मान और सहयोग हो। जागरूक और प्रबुद्ध लोगों के लिए यह पुस्तक अवश्य पठनीय है। जो कोई भी समकालीन समाज में वांछित बदलाव लाना चाहता है और इसे लेकर आशावादी है, उसे डॉ. सुधा कुमारी द्वारा लिखित इस सुशोधित और उत्तम पुस्तक को अवश्य पढ़ना चाहिए।

