ट्रिनिडाड में हिन्दी – स्थिति और संभावनाएं
ट्रिनिडाड में भारतीयों का पदार्पण और हिन्दी का वृक्षारोपण
ट्रिनिडाड एवं टुबैगो दो द्वीप-समूहों का एक देश है जो कैरेबियाई सागर के दक्षिण में 10° 2' और 11° 12' उत्तरी अक्षांश तथा 60° 30' और 61° 56' पश्चिमी देशांतर पर स्थित है। इसे दक्षिण अमरीका का हिस्सा माना जाता है, यह वेनेज़ुएला के पूर्वोत्तर तट पर और ग्रेनेडा के दक्षिण में है। इस द्वीप के पूर्वोत्तर में बार्बाडॉस और दक्षिण-पूर्व में ग्याना हैं। यह देश स्पेन, फ्राँस और डच शासन के अधीन रहते हुए अंतत: अंग्रेज़ों के अधीन रहा, जिससे इसे वर्ष 1962 में स्वतंत्रता मिली और वर्ष 1976 में यह एक गणराज्य बना।
वर्ष 1838 में वहाँ दास प्रथा का अंत हो गया था और अन्य कई देशों से लाए गए मज़दूरों से काम करवाने का प्रयास असफल रहा था। इसलिए अंग्रेज़ों ने, जो उस समय भारत पर भी शासन कर रहे थे, एक खास मक्सद के लिए कुछ भारतीयों को यहाँ भेजने का निर्णय लिया। यह खास मक्सद था – तेज़ी से डूबते हुए चीनी उद्योग का जीर्णोद्धार! भारत से ट्रिनिडाड आने वाले अधिकांश भारतीय उत्तर प्रदेश के पूर्वी ज़िलों से और पश्चिमी बिहार से थे पर कुछेक सुदूर उत्तर से और दक्षिण से भी थे। 30 मई 1845 को भारतीयों के पहले समूह ने 103 दिन की समुद्री यात्रा तय करके इस ज़मीन पर अपने पाँव रखे जिसे वे चीनीदाद कहते थे। कलकत्ता से इन्हें लाने वाला जहाज़ था – फतह-अल-रज़ाक। एक ही जहाज़ पर इतना लम्बा सफर तय करने के बाद इनके बीच जाति भेद-भाव समाप्त हो गया था और अब ये केवल ‘जहाज़ी-भाई’ थे। वर्ष 1917 तक ट्रिनिडाड आने वाले इन गिरमिटिया मज़दूरों की कुल संख्या लगभग 1,44,000 थी, जिनमें से करीब एक-चौथाई पाँच वर्ष की शर्त की अवधि की समाप्ति के बाद स्वदेश लौट गए(ब्रिंस्ले समारू)1।
बाग़ानों के मालिक भारत से आए गिरमिटिया मज़दूरों के काम से बहुत खुश थे क्योंकि कृषि-क्षेत्र की जानकारी तो इन्हें थी ही ये मेहनतकश भी थे। औपचारिक रूप से दास प्रथा समाप्त हो चुकी थी परन्तु इन मज़दूरों का शोषण हर प्रकार से होता था। इन्हें ‘कुली’ कहकर बुलाया जाता था और सिस्टम में अनियमितताएँ भी बहुत थीं । लेकिन भारत में अंग्रेज़ों द्वारा पटसन और नील इत्यादि की खेती के ज़रिए ज़बरन पैदा की गई अकाल और भुखमरी की स्थितियों से जूझकर आए इन भारत के रत्नों ने गन्ने और कोको के खेतों में जी-तोड़ मेहनत की और ट्रिनिडाड के कृषि, व्यापार एवं अर्थव्यवस्था क्षेत्रो में नई जान फूँक दी। ये लोग अपने देश से कुछ अधिक सामान नहीं लाए थे – मात्र दो जोड़ी कपड़े, लोटा और अपने धार्मिक ग्रंथ – रामचरितमानस, गीता और पुराण इत्यादि। इनका पाठ तो ये हमेशा करते रहे। कष्टपूर्ण दिनों में भी काम खत्म होने के बाद जब सब एकसाथ बैठते और विशेष तौर पर रामचरितमानस (जिसे ये रामायण कहते हैं) की चौपाइयाँ गाते थे तो अपने सब दुःख भूल जाते थे। उन्हें अपनी मातृभूमि छोड़ना राम के बनवास जैसा लगता था और भक्त हनुमान में अपना ही संकटमोचन दिखाई देता था। भारत से इनके आगमन के साथ जो संस्कृति इस देश में आई उसने मानवता, सृजनात्मकता और संसाधन-सम्पन्नता जैसे गुणों के साथ-साथ इस देश को और भी बहुत कुछ नया दिया – खान-पान, संगीत, नृत्य, धर्म, साहित्य, जीवन-दर्शन इत्यादि। इनके आगमन के साथ ही आई खाद्य सुरक्षा, आर्थिक विकास और मुद्रा-प्रणाली में बढ़ती बचत। वास्तव में बैंकिंग प्रणाली का जो विकास हुआ उसने ट्रिनिडाड को आर्थिक आपदाओं और सामाजिक अव्यवस्था से सुरक्षित रखा (पारस रामौतार)2। भारत माता के बच्चों के लिए ट्रिनिडाड को अपना घर बनाना उनके जीवन के एक पड़ाव का अंत भी था और एक नई शुरुआत भी!
अफ्रीका, यूरोप, चीन और कुछ अन्य देशों से आकर बसे जन-समूहों में ट्रिनिडाड की जनसंख्या का करीब 40% हिस्सा होते हुए और अपना एक सुदृढ़ स्थान बनाकर भी भारतीय उस क्रियोल समाज में हाशिए पर ही थे। कारण मुख्यतः यह था कि वे अपनी संस्कृति से जुड़े रहे और पाश्चात्य ईसाई संस्कृति का हिस्सा नहीं बने। प्रो.ब्रिंस्ले समारू का मानना है कि मुख्यतः बिहार और उत्तर प्रदेश से होने के कारण ट्रिनिडाड आए भारतीय भोजपुरी संस्कृति से प्रभावित रहे। वे अपने नए देश में अन्य जन-समूहों से घुल-मिल तो रहे थे लेकिन भारत में अपने पूर्वजों से भी नाता बनाए हुए थे। बस दुःख की बात यह थी कि समय बीतते-बीतते संस्कृति के एक महत्वपूर्ण पहलू यथा भाषा उनसे कहीं छूट गया। ये लोग ब्रज, अवधि और अन्य हिंदी बोलियों से प्रभावित भोजपुरी का प्रयोग तो करते थे किंतु स्कूली शिक्षा के अभाव में इन्हें मानक हिंदी का ज्ञान नहीं था। गन्ने के खेतों में जो संपर्क भाषा विकसित हुई उसे प्लांटेशन हिंदुस्तानी और ट्रिनिडाड भोजपुरी का नाम दिया गया (डॉ महाबीर)3। इसे बहुमेल खिचड़ी भाषा भी कहते थे (डॉ. हरीशंकर आदेश)4 । ये लोग क्रियोल फ्रैंच या पतवा (Patois) सीख रहे थे और अफ्रीकी लोग संपर्क सुविधा के लिए स्थानीय भोजपुरी। परिणामतः बहु-भाषा और क्रियोलीकरण की स्थिति उत्पन्न हो रही थी। जब अंग्रेज़ी ट्रिनिडाड की राजभाषा और शिक्षा की भाषा बनी तो हिंदी के ही एक बोली रूप भोजपुरी हिंदी का स्थान क्रियोल अंग्रेज़ी ने ले लिया जो फिर युवा पीढ़ियों की आम बोलचाल की भाषा बन गई। आज भोजपुरी का वह रूप केवल पुरानी पीढ़ी के बुज़ुर्गों की बातचीत में और लोकगीतों में पाया जाता है।
भारतीय भाषा के इस लोप का स्पष्ट कारण उपनिवेशवाद ही था जिसके खौफ़ के चलते भारतीय मूल के लोगों ने अपने बच्चों को स्वभाषा से दूर रखने का निश्चय किया। अपनी संतान को अंग्रेज़ों के अत्याचार से और उन्हें हीन भावना से बचाने के लिए, उनके सुनहरी भविष्य की कामना में उन्होंने स्वभाषा की बलि चढ़ा दी। समय करवटें बदलता रहा और धीरे-धीरे गिरमिटिए आर्थिक और सामाजिक रूप से स्थापित होने में काफी हद तक सफल हुए। तब उन्होंने अपनी अस्मिता की पहचान के बारे में सोचा और अपने धर्म और संस्कृति के प्रचार की ओर ध्यान देना शुरू किया। मंदिरों और मस्जिदों की स्थापना हुई। हिंदी और उर्दू भाषाएँ सिखाने की शुरुआत तो हुई लेकिन सरकार की ओर से इस संबंध में कोई समर्थन न होने के कारण और राजनैतिक कारणों से भी गैर-ईसाई स्कूल चलाना अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य था। यहाँ हिंदी केवल एक पीरियड में पढ़ाई जाती थी जो धर्म की शिक्षा देने के लिए होता था। वर्ष 1952 में आर्य प्रतिनिधि सभा को क्यूरेप में हिंदी स्कूल चलाने की अनुमति दी गई (सिल्विया मोदी कुबलालसिंह)। वर्ष 1952 से 1956 के दौरान सनातन धर्म महा सभा (ट्रिनिडाड के सबसे बड़ा हिंदू संगठन) ने 31 स्कूल बना लिए। इनका उद्देश्य भारतीय/हिंदू समुदाय को हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति के परिवेश में पश्चिमी शिक्षा मुहैया कराना था। यहाँ बच्चों को रामायण से और अन्य हिंदू ग्रंथों से कथाएँ सुनाई जाती थीं और भजन तथा प्रार्थनाएँ सिखाई जाती थीं। दीपावली और होली (जिसे वे फगवा कहते हैं) त्यौहार मनाए जाते थे। परंतु कुल मिला कर भाषा से अधिक धर्म की शिक्षा दी जाती। धीरे-धीरे कई अन्य संस्थाएँ और संगठन हिंदी शिक्षण के कार्य से जुड़ गए जैसे हिंदी निधि, कबीर पंथ, स्वाहा, वेस्ट इंडीज़ विश्वविद्यालय, निहर्स्ट स्कूल ऑफ लेंग्वेजेज़, पंडित परसराम स्कूल ऑफ़ हिंदुइज़्म, भारतीय विद्या संस्थान, भारतीय उच्चायोग इत्यादि। मंदिरों में पूजा-पाठ के साथ हिंदी सिखाने का भी काम किया जाता था। हिंदुस्तानी मूल के अधिकांश लोग किसी न किसी संस्था के साथ जुड़कर या व्यक्तिगत रूप से हिंदी का अध्यापन कार्य कर रहे हैं। भले ही ट्रिनिडाड की राजभाषा अंग्रेज़ी है और हिंदी को स्पैनिश और फ्रैंच की तरह द्वितीय भाषा का भी दर्जा प्राप्त नहीं है फिर भी हिंदी सीखने और सिखाने वालों को यह विश्वास हो चला है कि भाषा ही उनकी संस्कृति की जड़ों को मज़बूत बनाए रख सकती है।
ट्रिनिडाड की हिन्दी सेवी संस्थाएं और उनकी हिन्दी प्रचार गतिविधियाँ
सनातन धर्म महासभा
सनातन धर्म महासभा ट्रिनिडाड का एक प्रमुख हिंदू संगठन है। वर्ष 1981 में ट्रिनिडाड में हिंदुओं को संगठित करने के लिए सनातन धर्म एसोसिएशन की स्थापना की गई थी। वर्ष 1932 में इसे विधिक रूप से निगमित कर दिया गया। वर्ष 1932 में ही एक रूढ़िवादी हिंदू समूह ने सनातन धर्म नियंत्रण बोर्ड नामक एक अन्य संगठन की स्थापना की। वर्ष 1952 हिंदू समाज के लिए एक महत्वपूर्ण समय सिद्ध हुआ जब सिपरिया, दक्षिण ट्रिनिडाड के विद्वान पण्डित गोबर्धन के सशक्त मार्गदर्शन में पं. भदेस सगन माराज ने इन दोनों संगठनों का मेल करवा कर एक नए संगठन ‘सनातन धर्म महासभा’ की स्थापना की। महासभा के परिषद के सदस्य पंडितों पर मंदिरों के कार्यक्रमों की ज़िम्मेदारी थी। आज परिषद के पंडितों की संख्या लगभग 200 से भी अधिक है। महासभा ने स्कूल और मंदिर निर्माण का भी कार्य संगठित रूप से किया। आज इस संगठन के अपने 150 से भी अधिक मंदिर और 50 से अधिक स्कूल हैं। हिंदू समुदाय के बच्चों की शिक्षा की ज़िम्मेदारी इन्हीं पर है। स्कूलों और मंदिरों में पढ़ाई के लिए महासभा ने कुछ साहित्य भी प्रकाशित किया है। हिंदी का आधारभूत ज्ञान दिया तो जाता है परंतु भारतीय संस्कृति के प्रचार, हवन-यज्ञ जैसे अनुष्ठानों, रामायण-पाठ इत्यादि पर अधिक बल रहता है।
संगठन का मुख्यालय सेंट अगस्टिन में स्थित है, महा-अध्यक्ष पंडित उत्तम महाराज हैं और महा सचिव पं. सतनारायण महाराज हैं। संग़ठन की एक सराहनीय उपल्ब्धि है – उसका अपना रेडियो स्टेशन –जागृति। यह रेडियो स्टेशन सूचना और मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा पर भी ध्यान देता है। इस उद्देश्य से हिंदी और संस्कृत की शिक्षा को प्रोत्साहित करता है कि ये हिंदुत्व को समझने में सहायक हैं। यह सभी हिंदू त्यौहारों, रीति-रिवाज़ों, कर्म-कांडों के ज़रिए भारतीय संस्कृति और हिंदुत्व का प्रचार-प्रसार करता है।
महासभा गत 30 वर्षों से ‘बाल विकास विहार’ नाम से बच्चों का एक सांस्कृतिक उत्सव भी आयोजित करता आ रहा है। बाल विहार बच्चों का एक समूह है जिन्हें प्रशिक्षित सेवक और सेविकाएँ, सप्ताह में एक बार, एक-डेढ़ घंटे के लिए कहानियों, प्रश्नोत्तरी, भजनों, गीतों, श्लोकों, नृत्य और लघु-नाटिकाओं के माध्यम से हिंदू धर्म-ग्रंथों और अध्यात्म की जानकारी प्रदान करते हैं। फगवा (होली) के माह में शुरू होने वाली बाल विकास विहार प्रतियोगिताएँ जून माह में समाप्त होती हैं। हिंदी छात्र, उनके माता-पिता, अध्यापक और महासभा के अध्यक्ष इसे ‘हिंदू-धर्म’ के पुनर्जागरण के एक पर्व के रूप में मनाते हैं। निस्संदेह, इस गतिविधि में बच्चे हिंदी के कई शब्दों और अनेक संकल्पनओं की जानकारी तो हासिल कर लेते हैं परंतु सभी हिंदी शब्दों के अर्थ उन्हें मालूम नहीं होते और न ही वे हिंदी को बोलचाल की भाषा के रूप में इस्तेमाल करने में समर्थ हो पाते हैं।
हिंदी निधि
हिंदी निधि की स्थापना 30 अप्रैल 1986 को हुई थी और 20 जुलाई 1989 को संसद के अधिनियम के तहत इसे ‘द हिंदी फाउंडेशन ऑफ ट्रिनिडाड एंड टुबैगो’ नाम से मान्यता दी गई थी। इसका मुख्य कार्यालय सेंट अगस्टिन में स्थित है। हिंदी निधि अपने देश का एकमात्र ऐसा स्वयं-सेवी संगठन है जिसका प्रमुख कार्य हिंदी का प्रचार-प्रसार है। हिंदी भाषा का अध्ययन, अध्यापन और विकास ही इसके उद्देश्य हैं। संगठन के संस्थापक-सदस्य और अध्यक्ष श्री चंका सीताराम जी हैं। इस संगठन के कार्यकारी और अन्य आम सदस्य भिन्न-भिन्न धर्मों, संस्कृतियों और जातियों से हैं। यह संगठन सरकार द्वारा अनुमोदित और सहायता-प्राप्त कार्यक्रम के अंतर्गत देश भर में 25 से भी अधिक प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में यायावर हिंदी शिक्षक मुहैया कराता है।
हिंदी निधि द्वारा स्कूल की छुट्टियों के दौरान कैम्प भी आयोजित किए जाते हैं जिनमें बच्चों के साथ-साथ उनके माता-पिता भी आते हैं और हिंदी बातचीत में भाग लेते हैं। प्रो. जगन्नाथन जी के सहयोग से हिंदी निधि द्वारा हिंदी की पाठ्य-पुस्तकें भी प्रकाशित की गईं जो बेहद कम दामों पर और ज़रुरतमंद बच्चों को तो निःशुल्क भी उपलब्ध कराई जाती हैं।
हिंदी निधि के ही प्रस्ताव पर वेस्ट इंडीज़ विश्वविद्यालय में प्रथम वर्ष के स्तर पर हिंदी भाषा का अध्ययन प्रारम्भ किया गया थ।
हिंदी निधि द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर समय-समय पर सम्मेलन, संगोष्ठियाँ, लेक्चर, रेडियो कार्यक्रम इत्यादि आयोजित किए जाते हैं। संगठन द्वारा वर्ष 1992 में पश्चिमी गोलार्ध में होने वाले प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन का अयोजन किया गया। वर्ष 1996 में पाँचवें विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन भी हिंदी निधि और वेस्ट इंडीज़ विश्वविद्यालय द्वारा भारत सरकार के सहयोग से किया गया। इसके अलावा मॉरिशस, यू.एस, यू.के. और सूरीनाम में हुए अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलनों में भी हिंदी निधि के प्रतिनिधियों ने भागीदारी की।
हिंदी निधि भारत से ट्रिनिडाड जाने वाले हिंदी विद्वानों, राजनयिकों, व्यावसायिओं का बढ़-चढ़ कर आदर-सत्कार करती है और उनके अनेक कार्यक्रम भी प्रायोजित करती है। ट्रिनिडाड में हिंदी को जीवित रखने में हिंदी निधि की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
वेस्ट इंडीज़ विश्वविद्यालय
ट्रिनिडाड के सेंट अगस्टिन में स्थित वेस्ट इंडीज़ विश्वविद्यालय में वर्ष 1987 से हिंदी एक विदेशी भाषा के रूप में आरम्भिक स्तर पर ही पढ़ाई जाती है। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आई सी सी आर), भारत सरकार द्वारा वेस्ट इंडीज़ विश्वविद्यालय के ‘सेंटर फॉर लेंग्वेज लर्निंग’ में हिंदी शिक्षण के लिए एक हिंदी पीठ की व्यवस्था है। यहाँ हिंदी शिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत हिंदी न जानने वाले या हिंदी का बहुत कम ज्ञान रखने वाले छात्रों के लिए प्रारम्भिक हिंदी पाठ्यक्रमों की व्यवस्था है। यहाँ हिंदी की कक्षाएँ नियमित रूप से चलाई जाती हैं। हिंदी सिखाने के लिए दृश्य-श्रव्य उपकरणों का सहारा लिया जाता है और हिंदी गीतों और टी. वी. धारावाहिकों के ज़रिए हिंदी सिखाई जाती है। इनमें हिंदी सीखने वालों को उनके स्नातक पाठ्यक्रम के लिए क्रेडिट दिए जाते हैं। हिंदी में पर्याप्त रुचि और हिंदी से अत्यधिक प्रेम होने के बावजूद यहाँ हिंदी पढ़ने आने वाले छात्रों की संख्या काफी कम रहती है। वर्ष 2011 में वेस्ट इंडीज़ विश्वविद्यालय में भारतीय उच्चायोग की द्वितीय सचिव (हिंदी एवं संस्कृति) द्वारा ‘लीला’ (LILA) (Learning Indian Languages through Artificial Intelligence) के माध्यम से ऑनलाइन हिंदी सीखने संबंधी कार्यशाला का भी आयोजन किया गया था। वेस्ट इंडीज़ विश्वविद्यालय और भारतीय उच्चायोग द्वारा आयोजित कुछ महत्वपूर्ण कार्यक्रम और सम्मेलन इस प्रकार हैं:
विशव हिंदी सम्मेलन 1996
वर्ष 2003 में अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन
वर्ष 2008 में हिंदी पंचायत (ओपन हाउस)
वर्ष 2009 में हिंदी कवि सम्मेलन
भारतीय उच्चायोग
ट्रिनिडाड में हिंदी के प्रति रुचि बढ़ाने में भारतीय उच्चायोग की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका वर्ष 1960 से ही है जिस वर्ष भारत और ट्रिनिडाड के राजनयिक संबंधों की शुरुआत हुई थी। इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए भारत सरकार द्वारा उच्चायोग के लिए सांस्कृतिक अताशे के पद का सृजन किया गया और सर्वप्रथम इस पद पर प्रो. हरिशंकर आदेश जी की नियुक्ति की गई। प्रो. आदेश ने नौ वर्षों तक उच्चायोग को अपनी सेवाएँ दीं। प्रो. आदेश ने इसी अवधि के दौरान ‘भारतीय विद्या संस्थान’ की स्थापना की और संगीतज्ञ होने के नाते संगीत के माध्यम से हिंदी सिखाना शुरु किया (इस संस्थान का विस्तृत वर्णन आगे किया गया है)। भारतीय उच्चायोग द्वारा देशभर के हिंदी-प्रेमियों के हिंदी शिक्षण के लिए लगभग 7 क्षेत्रों में हिंदी की कक्षाएँ आयोजित की जाती हैं। इन कक्षाओं के मुख्य केन्द्र हैं: भारतीय उच्चायोग (पोर्ट ऑफ स्पेन), महात्मा गाँधी सांस्कृतिक केन्द्र, (पहले कैरोनी में था, अब शगुवानाज़ में है), एन सी आई सी (शगुवानाज़), साँग्रे ग्राँडे, सैन फर्नांडो और डेबे।
पिछले 15 सालों से कई सौ छात्र-छात्राओं ने इन कक्षाओं में विभिन्न स्तरों पर हिंदी का ज्ञान अर्जित किया है। ये कक्षाएँ नि:शुल्क चलाई जाती हैं, मात्र 100 ट्रिनिडाड डॉलर केवल पंजीकरण के तौर पर लिए जाते हैं। हिंदी सीखने और सिखाने वालों की सुविधानुसार इन केंद्रों पर सप्ताह में एक या दो बार कक्षाएँ चलाई जाती हैं। सभी को हिंदी पुस्तकें और अभ्यास-पुस्तिकाएँ आदि भी निःशुल्क मुहैया कराई जाती हैं और हिंदी संवाद की विशेष कक्षाएँ भी चलाई जाती हैं। वर्ष के अंत में परीक्षा आयोजित की जाती है और प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले छात्र-छात्राओं को भारतीय उच्चायोग द्वारा आयोजित हिंदी दिवस समारोह में प्रमाण-पत्र और बैंक ऑफ बड़ौदा द्वारा नकद पुरस्कार भी दिए जाते हैं। इन सभी कक्षाओं के लिए, वर्ष 2011 से, एकरूप पाठ्यक्रम तैयार कर दिया गया था और इसी वर्ष से एक सामूहिक वार्षिक परीक्षा की व्यवस्था की गई है ताकि सभी एकसमान अध्ययन करें और एकसमान परीक्षा में बैठकर प्राप्त करने वाले परिणामों से संतोष का अनुभव करें।
भारतीय उच्चायोग के विभिन्न केन्द्रों में हिंदी कक्षाओं में पढ़ाने वाले हिंदी प्रेमी भी या तो आगरा संस्थान से हिंदी सीखते हैं या फिर भारतीय उच्चायोग की कक्षाओं में। ये लोग अपनी नौकरी या कारोबार आदि के बाद के अपने समय में हिंदी सिखाते हैं। इसके अलावा ये शिक्षक केन्द्रीय हिंदी निदेशालय के हिंदी सर्टिफिकेट, हिंदी डिप्लोमा और एड्वांस्ड हिंदी डिप्लोमा के पत्राचार पाठ्यक्रमों में दाखिला लेकर भारतीय उच्चायोग में संचालित की जाने वाली परीक्षाओं में बैठते हैं और अपने हिंदी ज्ञान में उत्तरोत्तर वृद्धि करने में प्रयासरत रहते हैं। स्थानीय शिक्षकों और छात्र-छात्राओं को उच्चारण और वार्तालाप में मदद के लिए कुछ भारतीय महिलाएँ इन कक्षाओं में स्वेच्छा से और बिना किसी प्रतिफल की इच्छा के अपना योगदान देती हैं।
हिंदी को बढ़ावा देने के लिए उच्चायोग द्वारा हर वर्ष जनवरी माह में विश्व हिंदी दिवस समारोह और सितंबर माह में हिंदी दिवस समारोह आयोजित किया जाता है। इस अवसर पर देशभर में हिंदी और भारतीय संस्कृति के संवर्धन में कार्यरत सामाजिक-धार्मिक संगठनों को आमंत्रित किया जाता है और उन्हें यथावश्यक हिंदी-अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ी हिंदी शब्दकोश, हिंदी व्याकरण की पुस्तकें, पौराणिक कथाओं-कहानियों की पुस्तकें, देवनागरि में प्रकाशित रामचरितमानस और गीता आदि गीता आदि भेंट स्वरूप दी जाती हैं। प्रत्येक समारोह में ट्रिनिडाड देश के एक-एक हिंदी-सेवी को ‘हिंदी सेवा सम्मान’ से सम्मानित किया जाता है।
भारतीय उच्चायोग विभिन्न संगठनों को समय-समय पर हिंदी सीखने के लिए सामग्री, सॉफ्टवेयर और भारत सरकार से मिलने वाली सहायता-अनुदान भी मुहैया करवाता है। वर्ष 2009 से 2013 के दौरान उच्चायुक्त श्री मलय मिश्र ने वेस्ट इंडीज़ विश्वविद्यालय में चल रही हिंदी कक्षाओं को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न सुविधाएँ प्रदान कीं। इतना ही नहीं एक हिंदी चेयर की अवधि की समाप्ति पर अगले हिंदी चेयर के भारत से आने तक की बीच की अवधि में होने वाले सत्र में हिंदी-शिक्षण में व्यवधान न हो इस उद्देश्य से उच्चायोग में द्वितीय सचिव (हिंदी एवं संस्कृति) को कक्षाएँ लेने के निदेश दिए। इसके अतिरिक्त श्री मिश्र ने विश्वविद्यालय में भाषा शिक्षण केंद्र (सेंटर फॉर लेंग्वेज लर्निंग) (सी एल एल) में प्रत्येक माह हिंदी फिल्मों के प्रदर्शन के कार्यक्रम को पुनः प्रारम्भ करके इसे नियमित रूप से चलाए जाने पर ज़ोर दिया।
भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा द्वारा ‘विदेशों में हिंदी प्रचार योजना’ के अंतर्गत हिंदी के अध्ययन के लिए छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है। इस योजना के तहत विश्व के विभिन्न देशों के लिए 100 सीटों में से कम से कम दो-तीन सीटें अवश्य ही ट्रिनिडाड और टुबैगो के लिए आबंटित की जाती हैं। यह कार्यक्रम चार स्तरों पर चलाया जाता है:
- हिंदी भाषा प्रवीणता सर्टिफिकेट
- हिंदी भाषा प्रवीणता डिप्लोमा
- हिंदी भाषा प्रवीणता एड्वांस्ड डिप्लोमा
- हिंदी में स्नातकोत्तर डिप्लोमा
संस्थान से हिंदी शिक्षा ग्रहण करके लौटे छात्र-छात्राएँ अपने देश वापस आकर हिंदी-प्रेमियों की किसी न किसी रूप में सहायता करने में जुट जाते हैं। या तो अध्यापन कार्य में लग जाते हैं या रेडियो अनाउंसर बन जाते हैं। ऐसी ही एक होनहार छात्रा कु. अलीशा खान ने 2010-2011 में संस्थान से हिंदी सीखने के एक वर्ष के भीतर हिंदी सीखने वालों के लिए ‘हमारी प्यारी हिंदी’ नाम से एक किताब ही लिख डाली। फिर भारत आकर हिंदी साहित्य में बी.ए. किया और उसके बाद से ट्रिनिडाड की लोक-कथाओं का हिंदी अनुवाद कर रही हैं और भविष्य में हिंदी के प्रचार-प्रसार के प्रति समर्पित रहना चाहती हैं।
भारतीय विद्या संस्थान
भारतीय विद्या संस्थान प्रोफेसर हरिशंकर आदेश जी के भारत प्रेम और निस्स्वार्थ सेवाभाव का मूर्त रूप है। वर्ष 1966 में भारतीय उच्चायोग में सांस्कृतिक अताशे के पद पर ट्रिनिडाड पहुँचे श्री हरिशंकर आदेश ने गिने-चुने हिंदी छात्रों को लेकर एक कमरे में मूलभूत सुविधाओं के अभाव में ही इस संस्थान की नींव रख दी थी। वर्ष 1969 में हिंदी, उर्दू, संस्कृत, भारतीय संगीत, नाटक और दर्शन के अध्ययन के लिए एक संपूर्ण संस्थान के रूप में औपचारिक रूप से इसकी स्थापना की गई। उत्तर ट्रिनिडाड के एल सोकोरो (साँ वाँ) में स्थित यह संस्थान आश्रम (आदेशाश्रम) के नाम से प्रसिद्ध है और यहाँ आने वाले छात्र श्री आदेश जी को आदर्श गुरु मानते हैं। समग्र द्वीप में भारतीय विद्या संस्थान के अनेक सांस्कृतिक शिक्षण केंद्र, जिनमें हज़ारों की संख्या में छात्र पंजीकृत हैं, हिंदी, भारतीय शास्त्रीय एवं समशास्त्रीय संगीत, संस्कृत, नाटक तथा नैतिक शिक्षा क्षेत्र में नि:स्वार्थ सेवारत हैं। संस्थान के इन विद्यालयों में हिंदी आरम्भिक स्तर से लेकर संगीत कलानिधि (बी.ए.) तथा संगीत आरंभिक स्तर से लेकर संगीत कालानिधि (बी.ए.) एवं संगीत सिंधु (एम.ए.) स्तर तक का अध्यापन कार्य सुशिक्षित शिक्षकों द्वारा नि:शुल्क किया जाता है।
संस्थान वर्ष 1974 से ‘जीवन ज्योति’ नामक पत्रिका प्रकाशित करता है जिसमें हिंदी के लेख, गीत और कविताएँ इत्यादि होते हैं।
हर वर्ष जुलाई-अगस्त में संस्थान द्वारा एक माह का शिविर आयोजित किया जाता है और संगीत, निबंध, वाद-विवाद जैसी विभिन्न प्रतियोगिताएँ और भारतीय संगीत के कार्यक्रम इसके आकर्षण-बिंदु होते हैं। पूरे एक माह तक आश्रम में रहने वाले विभिन्न आयु-वर्ग के छात्र-छात्राएँ विनम्रता, निस्स्वार्थ सेवा और अन्य सांस्कृतिक मूल्य आत्मसात करके जब समाज का हिस्सा बनते हैं तो उसका सामना करने में स्वयं को बेहतर स्थिति में पाते हैं और ये सब मूल्य वे अगले वर्ष के शिविर तक भूल नहीं जाते बल्कि इन मूल्यों को वे अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बना लेते हैं।
भारतीय विद्या संस्थान द्वारा हिंदी परीक्षाएँ भी आयोजित की जाती हैं जिनमें सूरीनाम, जमैका आदि जैसे पड़ोसी द्वीपों के छात्र भी बैठते हैं।
आदेशाश्रम से हिंदी सीखने वाले छात्र पर्याप्त रूप से धारा-प्रवाह हिंदी बोल लेते हैं। अधिकांश छात्र हिंदी सीखने के बाद हिंदी सिखाने में लग जाते हैं। संस्थान की सुश्री कमला रामलखन ने ‘हिंदी प्रभात माला भाग I से III’ की रचना की है।
आदेशाश्रम को भारतीय संस्कृति और भाषा का मंदिर कहना अतिश्योक्ति न होगी।
नेशनल काउसिल ऑफ इन्डियन कल्चर (एन सी आई सी)
नेशनल काउंसिल ऑफ इन्डियन कल्चर की स्थापना वर्ष 1964 में भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए और देश के कलाकारों के हितों की रक्षा एवं कल्याण के लिए की गई थी। नेशनल काउंसिल ऑफ इन्डियन कल्चर का यूथ विंग प्रत्येक शुक्रवार की शाम को ‘बातचीत क्लब’ आयोजित करता है। देश के केन्द्रीय भाग में स्थित होने के कारण यह अत्यन्त सुविधाजनक केन्द्र है। अतः विभिन्न हिस्सों से आकर हिंदी प्रेमी यहाँ एकत्र होते हैं और फिर पूर्वनिर्धारित विषय पर जी भरकर बातचीत करते हैं। यहाँ आने वाले हिंदी प्रेमियों को हिंदी बोलने के लिए वातावरण मिलता है। हिन्दी को बोलचाल की भाषा बनाने की दिशा में युवाओं द्वारा उठाया गया यह कदम सार्थक भी है और सरहानीय भी। फेसबुक के चलते शुक्रवार की ‘बातचीत’ से पूर्व भी और उस शाम के बाद भी पर्याप्त चर्चा चलती रहती है। इसके आयोजक डॉ विषम भीमुल हैं जो पेशे से डॉक्टर हैं ।
मंदिरों में हिंदी
ट्रिनिडाड के अधिकांश मंदिर केवल रविवार सुबह कुछेक घंटों के लिए खुलते हैं। इसे वे संडे सर्विस कहते हैं। कई मंदिरों में पूजा-पाठ और अनुष्ठान आदि के अलावा हिंदी सिखाने का काम भी किया जाता है। हिंदी के प्रसार में इन कक्षाओं की भी अपनी ही भूमिका है। यहाँ हिंदी सीखने आने वाले अधिकतर लोग धार्मिक ग्रंथ (मुख्यतः रामचरितमानस) पढ़ने के लिए ही हिंदी सीखना चाहते हैं।
स्वाहा स्कूल
स्वाहा संस्था में हिंदी अध्ययन और अध्यापन की अनेक परियोजनाएँ शुरु की गईं जिनमें से कुछ मुख्य नीचे वर्णित हैं:
- शिक्षकों के लिए प्रारम्भिक कार्यक्रम – इसका उद्देश्य यह है कि स्वाहा के प्रत्येक मंदिर में देवनागरी स्वर, व्यंजन, शब्द-निर्माण और वाक्य रचना के माध्यम से हिंदी सिखाने के लिए कम से कम एक प्रशिक्षित व्यक्ति मौजूद हो।
- स्वाहा ज्ञान दीपक कीर्तन मंडली के छात्र-छात्राओं को लंदन जी. सी. ई. की ओ लेवेल की परीक्षा के लिए तैयारी करवाई जाती है जिनमें से लगभग 50% पास हो जाते हैं।
- तीन-चार वर्ष की आयु से लेकर हर आयु वर्ग के बच्चों के लिए छोटे-छोटे मॉड्यूल बनाकर हिंदी बोलने, पढ़ने और लिखने का अभ्यास करवाया जाता है। कहानियों, कविताओं और गीतों के ज़रिए वार्तालाप और अनुवाद सिखाया जाता है। रामलीला के दृश्यों की नाट्यप्रस्तुति के माध्यम से उच्चारण का अभ्यास करवाया जाता है। चित्रकला कक्षाओं के माध्यम से रंगों, आकारों और संख्या आदि की जानकारी दी जाती है। इन कक्षाओं के दौरान बच्चों के मात-पिता भी उपस्थित रहते हैं और हिंदी का ज्ञान अर्जित करके प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।
- फगवा, रामलीला और इंडियन एराइवल डे के समारोहों में हिंदी संवादों पर ज़ोर दिया जाता है।
- सभी स्वाहा स्कूलों और मंदिरों में गीतों, कहानियों, कविताओं और लेख आदि की वार्षिक स्वदेशी प्रतियोगिता आयोजित की जाती है जिसमें कम से कम 20% हिंदी शब्दों का प्रयोग अनिवार्य होता है। इससे हिंदी शब्द-भंडार में वृद्धि होती है।
आर्य प्रतिनिधि सभा
दस शाखाओं वाली आर्य प्रतिनिधि सभा को इस रूप में ट्रिनिडाड एवं टुबैगो में 1943 में मान्यता मिली। सभा का प्रमुख कार्य आर्यन मंदिरों और स्कूलों का निर्माण था। आर्य प्रतिनिधि सभा सम्भवतः एकमात्र ऐसी संस्था है जिसका अध्यक्ष होने के लिए हिंदी बोलने की क्षमता होना अनिवार्य शर्त है और जिसके अध्यक्ष का नाम हिंदी या संस्कृत का कोई शब्द होना चाहिए। सभा के नियंत्रणाधीन नौ प्राथमिक स्कूल और एक प्रि-स्कूल है। इन स्कूलों में हिंदी प्रार्थनाए, मंत्रोच्चारण आदि सिखाए जाते हैं। वैदिक उपासना को पाठाधार बनाते हुए पहले संस्कृत मंत्रों का हिंदी अनुवाद किया जाता है और फिर अंग्रेज़ी अनुवाद। हिंदी को जीवित रखने के उद्देश्य से पंडितों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे पाठ का हिंदी रूपांतरण ही पढ़ें। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए आर्य प्रतिनिधि सभा के वार्षिक उत्सवों में भी हिंदी भाषण को एक अनिवार्य अंग के रूप में शामिल किया जाता है। रविवार को ये स्कूल मंदिर का रूप ले लेते हैं और यहाँ हवन किए जाते हैं। प्रत्येक गुरुवार को स्कूली बच्चों के लिए हवन किए जाते हैं। यहाँ मूर्ति-पूजा निषिद्ध है। हवन के अलावा गर्बाधान से लेकर अंत्येष्टी तक सभी 16 संस्कार भी किए जाते हैं ।
पंडित परसराम स्कूल ऑफ हिंदुइज़्म
इस स्कूल की स्थापना पं. डॉ. रामप्रसाद परसराम द्वारा 2004 में अपने पिता पं परसराम महाराज का सपना पूरा करने के लिए की गई थी। आपके पिताजी अपने घर पर ही गाँव के सभी बच्चों को हिंदी पढ़ाया करते थे और इस स्कूल के ज़रिए अपने पिताजी द्वारा चलाई गई परम्परा को आगे बढ़ाना ही आपका उद्देश्य था। आज इस स्कूल में 60 से भी अधिक पंडित विद्यार्थी और 20 से भी अधिक ग़ैर-पंडित विद्यार्थी हिंदी सीखते हैं। यहाँ विभिन्न आयु-वर्ग के व्यक्तियों को हिंदी, भारतीय संस्कृति और हिंदुत्व की शिक्षा दी जाती है। यह स्कूल सनातन धर्म महासभा की पंडित परिषद् की हिंदी शिक्षण शाखा है और समय-समय पर इसे भारतीय उच्चायोग से समर्थन एवं सहायता प्राप्त होती रहती है। 2012 में भारतीय उच्चायोग से द्वितीय सचिव (हिंदी एवं संस्कृति) द्वारा इस स्कूल में प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए एक कार्यशाला भी आयोजित की गई थी जिसमें भाग लेने के लिए देश के सभी हिंदी शिक्षकों को आमंत्रित किया गया था। पं. डॉ. परसराम स्वयँ यहाँ पढ़ाते हैं और नियमित रूप से रामायण का पाठ भी करते हैं। पूरे देश में सम्भवत: आप एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जो न केवल शुद्ध और प्रवाहपूर्ण हिंदी बोलते हैं बल्कि आपका संस्कृत का उच्चारण भी अत्यंत स्पष्ट है और आपको गीता के लगभग सभी श्लोक अर्थ-सहित कंठस्थ हैं। आपके घर में हिंदी का बहुत ही सकारात्मक वातावरण था और सम्भवत: यही वातावरण सारे देश में देखना ही आपका सपना है।
ट्रिनिडाड के हिन्दी सेवी – ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में
ट्रिनिडाड के हिंदी सेवियों का ज़िक्र शुरू करें तो एक के बाद एक अनेक नाम ज़हन में आते चले जाते हैं। ये सब हिंदी-प्रेमी हैं परंतु इनमें से धारा-प्रवाह हिंदी बोल पाने या यूँ कहें कि हिंदी बोल भी पाने वालों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है।
पंडित डॉ. रामप्रसाद परसराम, अध्यक्ष, पंडित परसराम स्कूल ऑफ़ हिंदुविज़्म
पंडित परसराम स्कूल ऑफ हिंदुइज़्म के संस्थापक (2004) पंडित डॉ. रामप्रसाद परसराम सँभवत: पूरे देश में अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जो न केवल शुद्ध और प्रवाहपूर्ण हिंदी बोलते हैं बल्कि आपका संस्कृत का उच्चारण भी अत्यंत स्पष्ट है और आपको गीता के लगभग सभी श्लोक अर्थ-सहित कंठस्थ हैं। आपका जन्म ट्रिनिडाड एवं टुबैगो के मेक बीन, कूवा में 27 मई 1944 को हुआ। आपके पिताजी पं परसराम और माताजी श्रीमती सुर्सती जी थीं। आपके पिताजी जीवनयापन के लिए अन्य कार्यों के अलावा पंडिताई भी करते थे अपने पिताजी, यानी कि आपके दादा जी, पं. जादूनाथ जी की तरह। आपके दादाजी बिहार के सूरंगपुर से ट्रिनिडाड आए थे और आपके नाना जी पं ओम कार जी चाँदनी चौक से थे। आपके नाना जी भी पंडिताई के अलावा व्यवसाय भी करते थे और एक जाने-माने गायक और संगीतकार थे। पंडित रामप्रसाद परसराम की प्रारम्भिक शिक्षा कैनेडियन मिशन स्कूल में अंग्रेज़ी माध्यम से हुई और आपको प्रेस्बिटेरियन चर्च भी जाना पड़ता था। लेकिन आपके परिवार में हिंदू परम्पराओं का पालन किया जाता था। ‘संध्या’ आपके परिवार की नियमित दिनचर्या का हिस्सा थी। समय-समय पर पूजा-पाठ किए जाते और हिंदू त्यौहार बड़े उत्साह के साथ मनाए जाते थे। रामायण (रामचरितमानस) और भागवत् के पाठ तो अक्सर घर पर होते रहते थे।
आपके पिता जी अपने घर पर गाँव के सभी बच्चों को इक्ट्ठा करके उन्हें हिंदी पढ़ाया करते थे। आपने भी देवनागरी पढ़ना, लिखना और कहानियाँ और कविताएँ यहीं सीखीं। इस समय तक, यानी 1952 से पूर्व महा सभा के कोई स्कूल नहीं खुले थे। आपके आजा-आजी (दादा-दादी), नाना-नानी, माता-पिता और अन्य सभी सगे-संबंधी हिंदी में ही बातचीत किया करते थे। बचपन में आपकी नानी जी श्रीमती दुखिनी जी भी आप लोगों के ही साथ रहती थीं और आपको “हीरा-लाल और तोता-मैना” आदि के किस्से-कहानियाँ सुनाया करती थीं। आपकी आजी, श्रीमती गोमती जी को “दान-लीला और नाग-लीला” बहुत पसंद थीं और आप इन्हें हिंदी में गाकर सुनाया करती थीं।
बाद में आपने भारत सेवाश्रम संघ के स्वामी पूर्णानंद जी से भी हिंदी शिक्षा ग्रहण की, जो 1953-54 के दौरान अक्सर आपके घर और आपके स्कूल फ्रीपोर्ट हिंदू स्कूल में आया करते थे। वर्ष 1954 में आपने मोंट्रोज़ वैदिक स्कूल से हिंदी बोर्ड परीक्षा भी उत्तीर्ण की। इस प्रकार, हिंदी, हिंदुत्व और हिंदू परम्पराओं के बीच ही आप पले-बड़े और रामायण और चालीसा-पाठ, भजन-गायन इत्यादि आप बचपन से ही सामन्य दिनचर्या के रूप में किया करते थे। यही कारण है कि आज भी ये आपके व्यक्तित्व में सहज ही प्रतिबिम्बित होते हैं।
आपने भारत एवं यू.के. से चिकित्सा और मनोविज्ञान में शिक्षा प्राप्त की और ट्रिनिडाड लौटकर मनश्चिकित्सक के पेशे को अपनाया। अनेक स्वास्थ्य संस्थाओं के अध्यक्ष रहते हुए मई 2004 में आप मेडिकल चीफ ऑफ स्टाफ़ के पद से सेवानिवृत्त हुए। ट्रिनिडाड एवं टुबैगो सरकार द्वारा वर्ष 2010 में आपको पब्लिक सर्विस मेडल ऑफ मेरिट (गोल्ड) के राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया गया। आप पॉलिटिकल क्लब 88 के अध्यक्ष रहे हैं। वर्ष 1986 में दीवाली नगर, मिड सेंटर मॉल, शगुवानाज़ के प्रथम अध्यक्ष बने। धार्मिक प्रवृत्ति वाले पं परसराम जी सनातन धर्म महासभा की पंडित परिषद से जुड़े हैं और कई वर्षों से पंडिताई कर रहे हैं। मार्च 2004 में पिता की मृत्यु के पश्चात् मेक बीन, कूवा में हिंदुत्व की शिक्षा देने के उद्देश्य से आपने पं परसराम स्कूल ऑफ़ हिंदुविज़्म की स्थापना की थी और तब से आप यहाँ हिंदी, भारतीय संस्कृति और हिंदुत्व की शिक्षा दे रहे हैं। आपके स्कूल में स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राओं के अलावा भी लगभग हर उम्र के लोग शिक्षा ग्रहण करने आते हैं। अन्य संस्थाओं में हिंदी शिक्षक भी अपने ज्ञान-वर्धन के लिए आपके स्कूल में आते हैं। आप नियमित रूप से यहाँ रामायण के पाठ स्वयँ करते हैं । युवाओं को भारतीय संस्कृति, रामचरितमानस और हिंदी भाषा का ज्ञान देना आपका मूल उद्देश्य है। प्रेम व आदर से सभी आपको ‘रामपा’ कहकर पुकारते हैं । हिंदी भाषा के अपने अनुभवों और अपने प्रेम को आपने स्वयं इन शब्दों में व्यक्त किया है “बचपन से घर-परिवार से बातचीत की हिंदी से मेरा परिचय और इसका भरसक प्रयोग, हिंदुस्तानी गीतों के प्रति मेरा अथाह प्रेम, जिन्हें मैं ईश्वर की दया से बहुत अच्छी तरह गा लेता था, और हिंदी सिनेमा का शौक और फिर बाद में सत्संग की ओर रुझान – इन सबके कारण मेरे हिंदी पढ़ने, लिखने और बोलने में बहुत ज़्यादा रवानगी आ गई। इन सबके अलावा, दिल्ली और पंजाब में रहने से मेरा शब्द-भंडार काफी विस्तृत हो गया और मेरी भाषा प्रवाहपूर्ण हो गई। मैं छ: साल केरल में भी रहा और तब मुझे मलयालम का भी कार्यसाधक ज्ञान हो गया था, हालाँकि आज मुझे मलयालम कुछ कुछ ही याद है। शायद मेरी हिंदी का भी यही हाल होता अगर हिंदी से मेरा वास्ता मेरे जीवन के शुरुआती सालों से न रहा होता और अगर हिंदी मेरे काम-काज की भाषा न रही होती। हिंदी को मैं काम-काज की भाषा इसलिए मानता हूँ क्योंकि यह रामचरितमानस और चालीसा की भाषा है, यह भजनों और कीर्तनों की भाषा है और यकीनन यह हिंदुस्तानी गीतों और सिनेमा की भाषा है जो आज भी मेरे दिल के बहुत करीब हैं”। इसमें कोई संदेह नहीं कि ‘रामपा’ हिंदी बोलने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते। औपचारिक बैठक के बीच-बीच में और बैठक खत्म हो जाने के बाद अनौपचारिक बातचीत में सायास हिंदी बोलते हैं ताकि अंग्रेज़ी बोलने-समझने वाली युवा पीढ़ी जाने-अंजाने हिंदी शब्दों से परिचित होती रहे। आपको भारतीय उच्चायोग, पोर्ट ऑफ स्पेन, द्वारा वर्ष 2010 में ‘विशिष्ट हिंदी सम्मान’ से सम्मानित किया गया था।
श्री रामगनी बॉब गोपी, अध्यक्ष शैक्षणिक कार्य, हिंदी निधि
मूलतः पेशे से व्यावसायी और एक एकाउंटिंग फर्म के स्वामी श्री बॉब गोपी हिंदी निधि के शैक्षणिक कार्य के अध्यक्ष हैं। हिंदी से आपका संपर्क 8 वर्ष की उम्र से रहा है जब आपने स्वरों और व्यंजनों का ज्ञान प्राप्त कर लिया था और कुछ पसंदीदा शब्द और वाक्य भी सीख लिए थे। बीच में कुछ सालों के लिए हिंदी अध्ययन छूट गया लेकिन आपके घर का मंदिर के निकट स्थित होना हिंदी में दोबारा रुचि पैदा होने का कारण बना और सोने पर सुहागा यह हुआ कि मंदिर के कुछ प्रशासनिक कार्य आपके परिवार को सौंपे गए। इसी कारण से आपकी हिंदी सामान्य बोलचाल की ओर उन्मुख कम थी और धर्म आधारित अधिक। स्कूल में अंग्रेज़ी के विषयों में अच्छे अंक लाने का दबाव रहता था जिसका हिंदी सीखने की गति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता था और हिंदी की पढ़ाई सभी बच्चों के लिए अनियमित रहती थी। पर यह भी सच था कि हिंदी छूटती नहीं थी। श्री बॉब गोपी भले ही बहुत अधिक सहजता से हिंदी में बातचीत नहीं कर सकते बावजूद इसके अपने हिंदी प्रेम के चलते उन्होंने हिंदी में तीन पुस्तकें लिखी हैं। आपकी पहली पुस्तक ‘गीत अर्पणम’ आपकी कई वर्षों तक की गई मेहनत का परिणाम है। आपको यह सोच-सोच कर बहुत तकलीफ़ होती थी कि आपके देश के युवा ही नहीं अपितु कुछ बड़ी उम्र के लोग भी बहुत ही प्रेम-प्यार से हिंदी भजन सुनते और गाते हैं किंतु उनके अर्थ न समझ पाने के कारण उनका पूरा-पूरा आनंद नहीं उठा पाते। श्री बॉब गोपी ने स्वयं यह बात कुछ इन शब्दों में कही, “काश ये लोग जो भी सुनते और गाते हैं उसे समझ भी पाएँ तो उसका भरपूर आनंद ले पाएंगे। अपनी इसी सोच के चलते मैं लगभग 5 वर्षों तक अपनी पसंद के हिंदी भजनों और फिल्मी गीतों को देवनागरी में लिखता रहा ताकि मैं रोमन लिप्यांतरण से बचूँ और जो भी थोड़ी-बहुत हिंदी मुझे आती है उसका अभ्यास बनाए रखूँ और कुछ हद तक अपना हिंदी उच्चारण भी सुधार सकूँ। इसी विनीत प्रेम के साथ मेरे साथियों को यह मेरी प्यार भरी तुच्छ भेंट है”। वर्ष 2008 में प्रकाशित 70 लोकप्रिय गीतों, भजनों, कीर्तनों, मंत्रों इत्यादि के इस संग्रह में श्री बॉब गोपी ने प्रत्येक गीत, भजन इत्यादि को देवनागरी लिपि में दर्शाया है और उसके सामने उसका रोमन में लिप्यांतरण है ताकि देवनागरी लिपि का ज्ञान न रखने वाले पाठक भी उन्हें पढ़ सकें और सही-सही उच्चारण कर सकें। उसके साथ-साथ अंग्रेज़ी में उनके अर्थ भी दिए गए हैं। इसका संपादन प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण द्वारा किया गया था। निस्संदेह यह गीत-संग्रह न केवल ट्रिनिडाड बल्कि विश्वभर के पाठकों के हिंदी ज्ञानवर्धन के लिए महत्वपूर्ण है अपितु इससे उनके भारतीय संस्कृति के ज्ञान में भी वृद्धि होनी निश्चित है।
आपकी दूसरी पुस्तक ‘अब हिंदी बोलो’ वर्ष 2009 में प्रकाशित हुई। मात्र 10 टी.टी. डॉलर की 33 पृष्ठों वाली इस पुस्तिका में अभिनंदन, घर-परिवार, भोजन, खरीदारी, बीमारी, समय इत्यादि से सम्बंधित शब्दावली दी गई है। छोटे-छोटे वाक्य और प्रश्नोत्तर भी हैं। ये रोमन में लिप्यांतरित हैं और अंग्रेज़ी में इनके अर्थ दिए गए हैं ताकि पाठक कम समय में ही कुछ मूल बातें हिंदी में बोलना सीख लें और उनके अर्थ भी जान लें।
वर्ष 2010 में आपका एक और प्रकाशन निकला “हिंदू नेम्स एंड देयर मीनिंग्स”। इसमें लड़कों और लड़कियों के 2000 से अधिक हिंदू नाम (देवनागरी और रोमन लिपि में) और उनके अर्थ दिए गए हैं। आपका उद्देश्य यह था कि बच्चों और उनके माता-पिता को उनके नामों के अर्थ मालूम हों और वे इस बात का गर्व महसूस कर सकें। इस पुस्तक का एक खंड राशि नामों को समर्पित है। आपको वर्ष 2009 में भारतीय उच्चायोग द्वारा ‘हिंदी सेवा सम्मान’ से सम्मानित किया गया था।
प्रो. हरिशंकर आदेश, अध्यक्ष, भारतीय विद्या संस्थान
प्रो. हरिशंकर आदेश वर्ष 1966 में भारतीय उच्चायोग, पोर्ट ऑफ़ स्पेन में भारत सरकार (आई सी सी आर) की ओर से सांस्कृतिक अताशे के पद पर ट्रिनिडाड आए थे और 10 वर्ष तक इस पद पर सेवारत रहे । उन्होंने ट्रिनिडाड आते ही भाँप लिया था कि इस देश में हिंदी की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। और उन्हें इस क्षेत्र में बहुत काम करने की ज़रूरत थी। वे जानते थे कि हिंदी भाषा भारतीय संस्कृति की रीढ़ की हड्डी थी और हिंदी की दशा को सुधारना उनकी प्राथमिकता बन गई। वर्ष 2010 में उनसे साक्षात्कार के दौरान उन्होंने बताया कि जब वे यहाँ आए तो जो लोग उस समय यहाँ थे वो 200 साल पहले आए गिरमिटिया मज़दूरों का विकृत रूप थे। दुःख की बात यह थी कि उस समय हिंदू लोग स्वयं को हिंदू कहने में लज्जा अनुभव करते थे क्योंकि उन्हें नीची नज़र से देखा जाता था। कई हज़ारों हिंदू अपना धर्म छोड़ रहे थे, इसाई उनका धर्म-परिवर्तन कर रहे थे। इस बात से श्री आदेश जी को बहुत धक्का लगा। अपना उत्तरदायित्व समझते हुए उन्होंने एक नीति बनाई और हिंदू संस्कृति के प्रचार के लिए गाँव-गाँव गए। ट्रिनिडाड का कोई गाँव ऐसा नहीं था जहाँ वे न गए हों। उन्होंने हिंदी का और हिंदू संस्कृति का प्रचार किया और उसके माध्यम से लोगों को यह बताया कि यह उनका सौभाग्य था कि वे हिंदू थे और उन्हें इस बात पर गर्व चाहिए। उन्होंने रामायण और गीता से उदाहरण लेकर प्रचार शुरू कर दिया। लोगों को बताया कि गीता में लिखा है कि अपने धर्म में मरना श्रेयस्कर होता है। अन्य धर्म कैसे भी हों अपना धर्म ही सर्वोत्तम होता है । तब बात लोगों की समझ में आने लगी। 3 लोग उनके विद्यार्थी बन गए। इन 3 विद्यार्थियों को उन्होंने अपने घर में पढ़ाना आरम्भ किया। उस समय उनके पास कोई बुनियादी सुविधा-सरंचना तक नहीं थी सिवाय एक चादर के, जिस पर ये विद्यार्थी बैठा करते थे और अगले दिन सुबह उसी चादर को धोकर-सुखाकर फिर बिछाया जाता था। फिर भी उन्हें इन परिस्थितियों से कोई शिकायत न थी। हाँ, उच्चायोग की ओर से उन्हें पूरा समर्थन एवं स्वतंत्रता थी । इन छात्रों को लेकर एक कमरे में मूलभूत सुविधाओं के अभाव में शुरू हुई हिंदी कक्षाएँ ही उत्तर ट्रिनिडाड के एल सोकोरो (साँ वाँ) में स्थित भारतीय विद्या संस्थान की नींव बनी जो ‘आदेशाश्रम’ के नाम से प्रसिद्ध है। वर्ष 1969 में हिंदी, उर्दू, संस्कृत, भारतीय संगीत, नाटक और दर्शन के अध्ययन के लिए एक संपूर्ण संस्थान के रूप में औपचारिक रूप से इसकी स्थापना की गई। देश में संस्थान के अनेक केंद्र हैं जिनमें हज़ारों की संख्या में छात्र पंजीकृत हैं। प्रो. आदेश जी ने बताया कि जो बात उन्हें सबसे अधिक खलती थी वह यह कि पुस्तकें वे हिंदी प्रचार सभा से मँगवाते थे, जिसके लिए उन्हें लम्बे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती थी, और इस मामले में उनका धैर्य जवाब दे जाता था। अतः उन्होंने स्वयं ही पुस्तकें लिखनी प्रारम्भ कर दीं। सब स्थानीय आधार पर, जो उन्हें तुरंत उपलब्ध हो जाती थीं । सुविधाएं सरकार की ओर से भी कुछ नहीं,……. पर लग्न पक्की थी अत: सफलता पग-पग उनके कदम चूमती रही है। ट्रिनिडाड का साहित्यकार होने के नाते आपको भारतीय सरकारी संस्थाओं की और से प्रवासी हिंदी भूषण, पद्मश्री मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार तथा विश्व हिंदी सम्मान आदि अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं।
आज संस्थान द्वारा हिंदी परीक्षाएँ भी आयोजित की जाती हैं जिनमें सूरीनाम, जमैका आदि जैसे पड़ोसी द्वीपों के छात्र भी बैठते हैं। हर वर्ष जुलाई-अगस्त में संस्थान द्वारा एक माह का शिविर आयोजित किया जाता है और संगीत, निबंध, वाद-विवाद जैसी विभिन्न प्रतियोगिताएँ और भारतीय संगीत के कार्यक्रम इसके आकर्षण-बिंदु होते हैं। संस्थान वर्ष 1974 से ‘जीवन ज्योति’ नामक पत्रिका प्रकाशित करता है जिसमें हिंदी के लेख, गीत और कविताएँ इत्यादि होते हैं। आदेशाश्रम से हिंदी सीखने वाले छात्र पर्याप्त रूप से धारा-प्रवाह हिंदी बोल लेते हैं। अधिकांश छात्र हिंदी सीखने के बाद हिंदी सिखाना शुरू कर देते हैं। आदेशाश्रम को संस्कृति और भाषा का मंदिर कहना अतिश्योक्ति न होगी। 27 दिसंबर 2019 को प्रो. आदेश जी की आत्मा परमात्मा में विलीन हो गई।
सुश्री कमला रामलखन, हिंदी शिक्षक, भारतीय विद्या संस्थान
आदेशाश्रम की ही एक छात्रा हैं सुश्री कमला रामलखन – हिंदी का प्रचार-प्रसार करना ही इनके जीवन का ध्येय है। 8 वर्ष की उम्र से ही आपके पिता जी ने आपको गाँव के एक हिंदी स्कूल में भेजना शुरू कर दिया था जहाँ आप हिंदी के कुछ शब्द और भजन गाना सीखती थीं। परंतु 1978 में औपचारिक तौर पर हिंदी और संगीत की शिक्षा के लिए भारतीय विद्या संस्थान की छात्रा बनीं। हिंदी और भारतीय संगीत से अथाह प्रेम के कारण आप हमेशा अव्वल आती थीं। 1981 में आपने ‘लंदन जी.सी.ई. ‘ए’ लेवल’ की परीक्षा दी। आपने यह परीक्षा ‘ए’ ग्रेड में उत्तीर्ण की। इसके बाद आपने हिंदी सीखने के साथ-साथ भारतीय विद्या संस्थान में हिंदी पढ़ानी भी शुरु कर दी। आपने ‘उच्च स्तरीय हिंदी’ पढ़ानी शुरू कर दी और लगभग 21 विद्यार्थियों ने यह परीक्षा पास की। आप हिंदी अच्छे से पढ़ा लेती थीं पर हिंदी बोलने में अपनी कमज़ोरी को भली-भान्ति पहचानती थीं और इसी को दूर करने के लिए आपने भारत आकर उच्च स्तर की शिक्षा ग्रहण करने का निर्णय लिया। इसके लिए आप अवैतनिक छुट्टी लेकर भारत आईं। ट्रिनिडाड में आपने कई स्कूलों और संस्थाओं में हिंदी अध्यापन का कार्य किया और हिंदी शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए भी कार्यशालाएँ आयोजित कीं। हिंदी की सेवा के लिए आपको अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से भी सम्मानित किया जा चुका है। आपने प्रो.हरिशंकर द्वारा रचित लघु-नाटिकाओं और कहाँनियों के अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद भी किए हैं। आपके द्वारा प्रकाशित पुस्तकों की सूची में निम्नलिखित शामिल हैं: स्मरण (हिंदी भजनों का एक संकलन जिसमें इनका रोमन में लिप्यांतरण और अंग्रेज़ी में अर्थ भी दिए गए हैं), हिंदी प्रभात भाग I, II और III . आपका कहना है “हिंदी मेरे विचारों में है, मेरे सपनों में और मेरी साँसों में है”। आपके विचार से हिंदी सीखना और सिखाना पूजा के समान है। भोपाल में आयोजित 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन में आपको ‘विश्व हिंदी सम्मान’ से सम्मानित किया गया है।
कुछ ऐसे अन्य व्यक्ति हैं जो अध्ययन, शोध आदि के लिए भारत आते रहते हैं या भारत में हिंदी अध्ययन के बाद ट्रिनिडाड लौटकर हिंदी पढ़ाते हैं और अच्छी हिंदी बोल लेते हैं जिनमें प्रमुख नाम हैं पंडिता इंद्राणी रामप्रसाद, श्रीमती कलावती रामदास, श्रीमती जिंसी सम्पथ, श्रीमती सुमति करीम, श्रीमती जानकी बलदेव सिंह, श्रीमती लछ्मी जैरीबंदन, कु अलीशा खान इत्यादि। हालाँकि अधिकांश हिंदी शिक्षक अच्छी हिंदी पढ़ा लेते हैं, परंतु प्रवाहपूर्ण हिंदी नहीं बोल सकते। हाँ इतना ज़रूर है कि वे सप्रयास हिंदी बोल लेते हैं और जब चाहते हैं अपनी बात को हिंदी में व्यक्त कर लेते हैं। इस श्रेणी में आने वाले शिक्षक हैं – श्री रफी हुसैन, श्रीमती पामेला कन्हाई, सुश्री यशोधरा, सुश्री जसोधरा रामप्रसाद, सुश्री नीलम राजकुमार आदि।
नेशनल काउंसिल ऑफ इन्डियन कल्चर (एन.सी.आई.सी.) की स्थापना वर्ष 1964 में भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए की गई थी। यह भारतीय उच्चायोग की हिंदी कक्षाओं का एक केंद्र भी है। एन.सी.आई.सी. के युवा विंग के अध्यक्ष डॉ विशम भीमुल जो भोजपुरी का सहारा लेते हुए हिंदी में अपनी बात कह लेते हैं, हर शुक्रवार एक बातचीत क्लब आयोजित करते हैं जिसमें हिंदी प्रेमी आते हैं और हिंदी में बातचीत करते हैं, गीतों, फिल्मों आदि पर हिंदी में चर्चा करते हैं। आपको जब कभी हिंदी में बात करने का मौका मिले आप उसे हाथ से जाने नहीं देते।
पंडिता इंद्राणी रामप्रसाद ने ट्रिनिडाड, सूरीनाम, गयाना, मॉरिशस और उत्तर भारत में पारम्परिक मैदानी रामलीला अभिनय में सात वर्षों से भी अधिक समय तक शोध कार्य किया है। अपने भारत प्रवास के दौरन उन्होंने काफी अच्छी हिंदी बोलनी सीख ली। आपने रामलीला के संवादों के ज़रिए हिंदी पढ़ाने का प्रस्ताव रखा था और इस दिशा में कुछ प्रयास भी किए थे। हिंदुत्व के विश्वकोश (Encylopedia of Hinduism) खंड 8 में पूरे ट्रिनिडाड में अकेले आपके द्वारा एक प्रविष्टि है – “रामलीला इन ट्रिनिडाड, सूरीनाम एंड गयाना”।
कु. अलीशा खान हिंदी और भारत से बेहद प्यार करने वाली एक होनहार छात्रा हैं। आपने 2010-2011 में संस्थान से हिंदी सीखने के एक वर्ष के भीतर विदेश में हिंदी सीखने वालों के लिए हिंदी व्याकरण पर ‘हमारी प्यारी हिंदी’ नाम से एक किताब लिखी। इसके लिए आपको सभी ने सराहा और फिर उच्चायुक्त महोदय श्री मलय मिश्र द्वारा आपको पोर्ट ऑफ स्पेन में आयोजित हिंदी दिवस समारोह में सम्मानित भी किया गया। इसके बाद आपने लखनऊ विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में बी.ए. किया और वर्तमान समय में लखनऊ विश्वविद्यालय से ही पर्यटन में एम.ए. कर रही हैं। ट्रिनिडाड की लोक-कथाओं का हिंदी अनुवाद कर रही हैं और भविष्य में हिंदी के प्रचार-प्रसार के प्रति समर्पित रहना चाहती हैं। आप भी हिंदी में अच्छी बातचीत कर लेती हैं।
अनेक ऐसे विद्वान भी हैं जो भारत से अनन्त प्रेम करने के नाते भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार के प्रति पूर्णतः समर्पित हैं परंतु हिंदी बोलने में असमर्थ हैं। इनमें से कुछ व्यक्ति हिंदी में हो रही बातचीत को कुछ-कुछ समझ लेते हैं और कुछ व्यक्ति बिल्कुल नहीं समझ पाते हैं। तथापि, हिंदी का शब्द-भंडार इनका भी अपर्याप्त नहीं है। बावजूद इसके वे अपने-अपने कार्य के प्रति इतने दृढ़संकल्प हैं कि उन्हें भी हिंदी-सेवियों की सूची में शामिल करना कतई अनुचित न होगा।
इस श्रेणी में शामिल किए जा सकने वाले नाम और काम इस प्रकार वर्णित किए जा सकते हैं:- श्री चंका सीताराम – आप ‘हिंदी निधि’ के अध्यक्ष हैं। हिंदी निधि अपने देश का एकमात्र ऐसा स्वयं-सेवी संगठन है जिसका प्रमुख कार्य हिंदी का प्रचार-प्रसार है। हिंदी भाषा का अध्ययन, अध्यापन और विकास ही इसके उद्देश्य हैं। यह संगठन सरकार द्वारा अनुमोदित और सहायता-प्राप्त कार्यक्रम के अंतर्गत देश भर में 25 से भी अधिक प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में यायावर हिंदी शिक्षक मुहैया कराता है। हिंदी निधि द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर समय-समय पर सम्मेलन, संगोष्ठियाँ, लेक्चर, रेडियो कार्यक्रम इत्यादि आयोजित किए जाते हैं। अन्य देशों में आयोजित किए जाने वाले अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलनों में भी हिंदी निधि का प्रतिनिधित्व रहता है। भारत से ट्रिनिडाड जाने वाले हिंदी विद्वानों, राजनयिकों, व्यावसायियों के अनेक कार्यक्रम भी हिंदी निधि द्वारा बढ़-चढ़ कर प्रायोजित किए जाते हैं। यह हिंदी के प्रति अगाध प्रेम ही है कि हिंदी न जानते हुए भी श्री चंका सीताराम हिंदी निधि के माध्यम से ट्रिनिडाड में हिंदी को जीवित रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका रहे हैं।
डॉ कुमार महाबीर ट्रिनिडाड एवं टुबैगो विश्वविद्यालय (यू.टी.टी) के संकाय सदस्य हैं। कैरिबियाई क्षेत्र में भारतीय और दक्षिण एशियाई मूल के लोग आपके शोध का विषय रहते हैं। आपका हिंदी ज्ञान कुछ शब्दों तक सीमित है तथापि आपने अपने अनुभव के आधार पर रोज़मर्रा ज़िंदगी में अंग्रेज़ी क्रियोल का हिस्सा बन चुके हिंदी शब्दों को सुनते-सुनते और अनायास अपने प्रयोग में आए शब्दों का एक संग्रह तैयार करके उसे ‘ए डिक्श्नरी ऑफ कॉमन ट्रिनिडाड हिंदी’ पुस्तक का रूप दिया है। इसकी भूमिका में आपने ट्रिनिडाड में हिंदी के वृक्षारोपण, अन्य भाषा-भाषियों की हिंदी सीखने में रुचि, समाज पर हिंदी के प्रभाव और हिंदी की स्थिति पर सविस्तार चर्चा की है। तत्पश्चात् आपने सुश्री पेग्गी रामेसर मोहन की “ट्रिनिडाड भोजपुरी : ए मॉर्फ़ोलॉजिकल स्टडी” से उद्धृत करते हुए उच्चारण संबंधी दिशानिर्देश दिए हैं। इसके उपरांत लगभग 1212 से अधिक ट्रिनिडाड हिंदी (भोजपुरी) शब्द रोमन लिपि में दिए गए हैं और उनके सामने अंग्रेज़ी में उनके अर्थ दिए गए हैं। कहीं-कहीं यथोचित चित्र भी दिए गए हैं। डॉ. महाबीर के खुद के शब्दों में, “मुझे आशा है कि यह शब्दकोश न केवल हमारी भाषिक विरासत को संरक्षित करेगा अपितु ट्रिनिडाड एवं टुबैगो के विभिन्न लोगों के बीच हिंदी शब्दों की समझ को भी बढ़ाएगा”।
ऐसा ही एक और नाम जो चुपचाप अपना काम करने में मग्न है – श्री आश्रमजी महाराज। आपके भक्ति भजन माला खंड 1,2 और 3 प्रकाशित किए गए हैं। ये ऐसे विरले रत्नों का खज़ाना हैं जिन्हें आपने भारतीय संगीत रिकॉर्डों की लाइब्रेरी से लिया। ये सब लता मंगेशकर, आशा भोंसले, मन्ना डे, मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, अनूप जलोटा, जगजीत सिंह, महेंद्र कपूर, हरि ओम शरण, प्रदीप, पंकज मलिक, प्रीति सागर और इन्हीं के समकालीन अन्य कई गीतकारों द्वारा गाए गए मूल भजन हैं। भक्ति भजन माला में ये भजन अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों में दिए गए हैं। खंड 1 में 133 भजनों का और खंड 2 में 136 भजनों का संग्रह है । मार्च 2013 में प्रकाशित खंड 3 में 137 भजन हैं और इसमें हनुमान चालीसा और आरतियाँ भी हैं।
श्री हंस हनुमान सिंह का जीवन पत्रकारिता (प्रिंट और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया), जन-कार्यों और अपनी राष्ट्रीय संस्कृति के प्रचार के प्रति समर्पित रहा है। आप 1970 से 1997 तक (27 वर्षों तक) एन सी आई सी के अध्यक्ष रहे और इस दौरान आपने भारतीय संस्कृति के प्रसार के लिए अनेक कार्यक्रम आयोजित किए। दीवाली नगर की संकल्पना करने और उसे मूर्त रूप देने का श्रेय आप ही को जाता है। इस दौरान आप अनेक समूहों का नेतृत्व करते हुए उन्हें भारत भी लाए। इस समय आप ट्रिनिडाड के एक जाने-माने रेडियो स्टेशन ‘हेरिटेज रडियो’ के अध्यक्ष/ सी ई ओ हैं। आप भारत से आने वाले सभी विद्वानों और विशिष्ट अतिथियों के साक्षात्कार/कार्यक्रम अपने रेडियो स्टेशन पर अवश्य प्रसारित करते हैं। भारतीय उच्चायोग में आयोजित किए जाने वाले गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस समारोहों का सीधा प्रसारण आपके रेडियो स्टेशन द्वारा किया जाता है। आपके रेडियो स्टेशन के कुछ एनाउंसर भी भारतीय उच्चायोग के हिंदी शिक्षण कार्यक्रम के तहत हिंदी सीखते हैं।
श्री पारस रामौतार भी एक जाने-माने पत्रकार हैं और भारत से जुड़े और भारतीय उच्चायोग द्वारा आयोजित किए जाने वाले सभी कार्यक्रमों में व्यक्तिगत रूप से हिस्सा लेते हैं और उनके बारे में अपने समाचार-पत्र में लेख भी लिखते हैं। आप आई ए एन एस के लिए भी लिखते हैं।
स्वर्गीय रामजस रामलखन ‘गाँधी सेवा संघ’ के अध्य्क्ष थे और अपने संगठन में अपनी क्षमतानुसार हिंदी कक्षाएँ भी चलाया करते थे।
श्री रवि जी ‘हिंदू प्रचार केंद्र’ के संस्थापक हैं और सुश्री गीता वाहिनि जी इस समय केंद्र की अध्यक्षा हैं। आप हिंदुत्व और हिंदू दर्शन का प्रसार करते हैं। हर आयु वर्ग के बच्चों को रामलीला का प्रशिक्षण देते हैं। सबसे उल्लेखनीय है ‘पिचकारी’। यह एक भारतीय-त्रिनिडाडीय संगीत कला है जिसका जन्म ट्रिनिडाड में ही हुआ। केंद्र द्वारा फगवा समारोहों के दौरान पिचकारी गीत गाए जाते हैं जिनमें सामान्यत: वर्तमान समाज का चित्रण मिलता है। इनमें हिंदी, भोजपुरी और अंग्रेज़ी के शब्दों का मिला-जुला प्रयोग किया जाता है। इस विधा की खोज रवि जी द्वारा की गई थी। पिचकारी प्रतियोगिताएँ हर वर्ष फ़गवा के अवसर पर हिंदू प्रचार केंद्र द्वारा आयोजित की जाती हैं और इस अनोखे तरीके से बच्चों के हिंदी शब्द-भंडार को समृद्ध बनाया जाता है।
भारत से बाहर ‘कबीर पंथी’ समूहों में ट्रिनिडाड का ‘कबीर पंथी’ समूह सम्भवत: सबसे बड़ा है और ‘कबीर पंथ एसोसिएशन ऑफ ट्रिनिडाड एंड टुबैगो’ के नाम से जाना जाता है। यह करपिचायमा में स्थित है। इस संगठन द्वारा आयोजित किए जाने वाले सत्संगों में संत कबीर जी की वाणी गाई जाती है और उस पर चर्चा की जाती है। इसके सदस्य हिंदी सीखने में पर्याप्त रुचि रखते हैं।
इसी प्रकार ‘गुरुद्वारा साहिब ट्रिनिडाड एंड टुबैगो’ कैरिबियाई (वेस्ट इंडीज़) में स्थित एकमात्र गुरुद्वारा है। यहाँ पर हर माह के पहले और तीसरे रविवार को कीर्तन होता है और बैसाखी का त्यौहार भी हर्षोल्लास से मनाया जाता है जिसमें देश के अनेक लोग शामिल होते हैं और भारतीय उच्चायोग और महात्मा गाँधी सांस्कृतिक केंद्र की भी सहभागिता अनिवार्य रूप से रहती है। सिख धर्म संबंधी जानकारी तो मिलती ही है, पंजाबी और हिंदी के शब्द इन कीर्तनों के माध्यम से अनायास ही हवा में गूँजते रहते हैं।
सुश्री शारदा महाराज जो पंडित परिवार से हैं हिंदी में बात तो नहीं करतीं मगर सामने वाला अगर हिंदी बोल रहा हो तो समझती बखूबी हैं और उसका पूरा-पूरा आनंद भी उठाती हैं।
कुछ भारतीय मूल की महिलाएँ हैं जो स्वेच्छा से विभिन्न संस्थाओं से जुड़कर हिंदी शिक्षण का कार्य करती हैं। इनमें आमतौर पर भारतीय उच्चायोग द्वारा चलाई जा रही कक्षाओं में पढ़ाती हैं या फिर स्थानीय शिक्षकों और विद्यार्थियों को उच्चारण आदि में सहायता के लिए कक्षाओं में उपस्थित रहकर अपना अमूल्य योगदान देती हैं, जैसे श्रीमती स्नेह लता प्रभा, श्रीमती लता रवि शंकर आदि ।
श्रीमती आशा मोर भारत में झाँसी, उत्तर प्रदेश से हैं और 1982 से ट्रिनिडाड में हैं। हिंदी में कविताएँ और लघुकथाएँ लिखने में आपकी रुचि है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के अलावा भारतीय उच्चायोग की गृहपत्रिका ‘यात्रा’ में भी आपकी कविताएँ और लघुकथाएँ प्रकाशित होती हैं। आप गर्भनाल पत्रिका के परामर्श मण्डल में सहभागी रही हैं। वर्ष 2002 में ट्रिनिडाड अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन तथा 2003 में सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन में आपकी भागीदारी रही। ट्रिनिडाड में समय-समय पर आयोजित कवि सम्मेलनों में आपने कविता पाठ किया है। आपने वर्ष 2001 से 2003 तक ‘पश्चिम काशी मंदिर’ पोर्ट ऑफ स्पेन में सभी उम्र के बच्चों को हिंदी की शिक्षा दी। वर्ष 2003 में आपको हिंदी की सेवा के लिए ट्रिनिडाड के तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त श्री वीरेंद्र गुप्ता द्वारा सम्मानित भी किया गया था। वर्ष 2010 से आप लगातार ट्रिनिडाड स्थित ‘जय लक्ष्मी होम’ अनाथाश्रम में प्रत्येक रविवार को बच्चों को हिंदी पढ़ा रही हैं। यहाँ आप दो कक्षाएँ लेती हैं। प्रत्येक कक्षा में 10-10 बच्चे हैं। ट्रिनिडाड में हिंदी के बारे में आपने अपने विचार कुछ इस तरह व्यक्त किए हैं: “ ट्रिनिडाड में कई स्थलों पर हिंदी पढ़ाई जाती है। कई लोग लिखना और पढ़ना सीखते हैं पर यहाँ बोलचाल की भाषा अंग्रेज़ी है। मेरा योगदान यहाँ हिंदी के लिए घड़े में एक बूँद के बराबर है। फिर भी मुझे इस बात की तसल्ली है कि मुझसे जितना बन पड़ता है मैं अपनी और से कोशिश करती हूँ । अनाथाश्रम के 20 बच्चे भी, यदि प्रत्येक वर्ष कुछ हिंदी लिखन-पढ़ना सीख जाते हैं, तो मुझे खुशी है। प्रत्येक वर्ष कुछ बच्चे जूनियर कक्षा से सीनियर कक्षा में चले जाते हैं, कुछ सीनियर बच्चे अनाथाश्रम छोड़ कर चले जाते हैं। कुछ नए बच्चे जूनियर कक्षा में आ जाते हैं और यह क्रम इसी तरह चलता रहता है”।
सच पूछिए तो ट्रिनिडाड में न तो हिंदी प्रेमियों की कमी है न हिंदी सेवियों की ! शायद इसीलिए अनायास ही मन में आता है “काश ! जितनी यह उनके हृदय की भाषा है उतनी ही उनकी ज़ुबान की भाषा भी बन जाती।”
हिंदी भाषा का स्वरूप
लगभग 170 वर्ष पूर्व अंग्रेज़ों द्वारा गिरमिटिया मज़दूरों के रूप में भारत से ट्रिनिडाड भेजे गए गिरमिटिया मज़दूर अपने साथ अनेक भाषाएँ लाए जैसे अवधी, मगधी और मैथिली के साथ-साथ बंगाली, नेपाली और तेलुगु भी। मद्रास से आए कुछ गिरमिटियों के साथ तमिल भाषा भी आई। पर चूँकि अधिकांशत: गिरमिटिया मज़दूर उत्तर प्रदेश के पूर्वी ज़िलों और पश्चिमी बिहार से भेजे गए थे अत: सर्वाधिक वर्चस्व भोजपुरी का ही रहा। आज वहाँ इन भारतवंशियों की चौथी-पाँचवीं पीढ़ियाँ हैं और वहाँ के साधन-संपन्न वर्ग का हिस्सा हैं। देश की राजभाषा अंग्रेज़ी है और विभिन्न राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक कारणों से और अन्य जन-समूहों के प्रभाव के चलते अधिकतर बोलने-सुनने को अंग्रेज़ी क्रियोल ही मिलती है जिसमें हिंदी भाषा के शब्दों की भरमार है और लोटा, दुल्हिन, रोटी, आजी-आजा, नानी आदि शब्द लगभग हर समूह के लोगों द्वारा प्रयोग किए जाते हैं फिर भी हिंदी वहाँ बोलचाल की भाषा नहीं है। स्पैनिश और फ्रैंच द्वितीय भाषाओं के रूप में स्कूलों में पढ़ाई जाती हैं लेकिन हिंदी को वहाँ की सरकार की ओर से यह दर्जा नहीं दिया गया है। देश के सामाजिक-धार्मिक संगठनों के प्रयासों के परिणामस्वरूप कुछ स्कूलों में हिंदी सिखाई तो जाती है लेकिन यह केवल धार्मिक शिक्षा के लिए निर्धारित पीरियड तक ही सीमित रहती है।
ट्रिनिडाड स्पैनिश और ट्रिनिडाड फ्रैंच क्रियोल की तरह ही ट्रिनिडाड भोजपुरी/हिंदी अब अधिकांश लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा न रहकर केवल सुदूर इलाकों में रहने वाले ग्रामीण परिवारों के बुज़ुर्गों द्वारा इस्तेमाल की जाती है। (भाटिया 1988; चंदू 1989)। स्पैनिश हो, फ्रैंच या फिर हिंदी – ये सभी भाषाएँ कुछ इस कदर हाशिए पर आ गई हैं कि आज ट्रिनिडाड एक-भाषीय राष्ट्र ही माना जाता है क्योंकि राजभाषा के रूप में और अन्यथा भी अंग्रेज़ी का ही वर्चस्व है। बात समाज की हो या शिक्षा के विकास की, दबदबा तो अंग्रेज़ी का ही है।
प्रवासी भारतीय समाज की बात करें तो इन्होंने भारत से लगभग पंद्रह हज़ार किलोमीटर दूर कैरेबियाई सागर के दक्षिण में स्थित दो द्वीप-समूहों वाले इस देश में भारतीय खान-पान, संगीत, नृत्य, धर्म, पूजा-पाठ, रीति-रिवाज़ इत्यादि के ज़रिए भारत की संस्कृति को कुछ इस प्रकार जीवित रखा हुआ है कि उसे भारत से दूर एक छोटा भारत कहना कतई अनुचित न होगा। बस यह भाषा का लोप हृदय को कचोटता है। ट्रिनिडाड-निवासी जिस शिद्दत के साथ हिंदी सीखते और सिखाते हैं, पढ़ते और पढ़ाते हैं वह जज़्बा बोलचाल में कहीं दिखाई नहीं देता।
पर एक सच यह भी है कि ट्रिनिडाड पहुँचकर भले ही आपको लोगों की ज़ुबान से धाराप्रवाह हिंदी सुनने को न मिले, फिर भी आपके कान कभी हिंदी सुनने के लिए तरसेंगे नहीं और न ही कभी आपको यह महसूस होगा कि आप भारत से कोसों दूर हैं। कण-कण में व्याप्त भारतीय संस्कृति आपको यह अहसास कभी होने ही नहीं देगी। देश के 5 रेडियो स्टेशनों पर 24X7 हिंदी गाने, भजन और कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। तीन सिनेमा-घरों में हिंदी फिल्में भी दिखाई जाती हैं। विवाह-समारोहों तथा अन्य सामाजिक पर्वों पर हिंदी/भोजपुरी लोक-गीत अवश्य गाए या बजाए जाते हैं। टेलीविज़न पर हिंदी चैनल बकायदा चलते हैं और हिंदी फिल्मों, गीतों के कार्यक्रमों और धारावाहिकों के तो अधिकतर लोग दीवाने हैं।
हिंदी यूँ तो दुकानों के नामों में भी मिलेगी – रफी रोटी शॉप। सड़कों और जगहों के नाम जैसे फैज़ाबाद, कलकत्ता स्ट्रीट, पटना स्ट्रीट् भी हैं। पर मिलेगा सब रोमन में लिखा हुआ, फिर भी हिंदी तो है ही। इतना ही नहीं अधिकतर लोगों के नामों में भी भारतीय नाम मिलेंगे –सरस्वती, रामचरण, रेणुका, राधिका, जानकी, लछ्मी इत्यादि। इनके अलावा रोज़मर्रा के इस्तेमाल के शब्द जैसे खाना, पानी, भाई, लोटा, यज्ञ, दुल्हिन, गाना; रसोईघर में इस्तेमाल किए जाने वाले कुछ शब्द जैसे चूल्हा, चटनी, कुचला (अचार), दाल, भात आदि; और पोशाकों एवं आभूषणों के हिंदी नाम युवाओं की ज़बान पर सहज ही रहते है।
कुछ धार्मिक क्रियाकलापों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में, ख़ासतौर पर संगीत के कार्यक्रमों में तो पूरी की पूरी कार्रवाई हिंदी में की जाती है और दर्शकगण, बहुत कुछ न समझने के बावजूद, मंत्रमुग्ध होकर उसका आनन्द लेते रहते हैं – यह उनका हिंदी प्रेम ही तो है!
पंडितों द्वारा संस्कृत और हिंदी का व्यापक प्रयोग किए जाने के कारण समाज में उनका बहुत आदर-सत्कार किया जाता है। और जो भी कोई हिंदी में बात करता है सबके सम्मान का पात्र बन जाता है। भारत से आए लोगों के लिए तो उनका हृदय प्रेम और श्रद्धा से भरा रहता है, उन्हें लगता है कि जो भारत से आया है वह उनके पूर्वजों की पावन भूमि की मिट्टी और गंध भी साथ लाया है। उनके लिए हिंदी केवल एक भाषा नहीं है, अपितु यह भारत से उनके पवित्र बंधन का ऐसा प्रतीक है जो उनके और भारत के बीच की भौगोलिक दूरी को पाट देता है, उनके सांस्कृतिक अस्तित्व को एक नई पहचान देता है व उसकी जड़ों को सींचते हुए उसे और भी मज़बूत बनाता है।
ट्रिनिडाड में हिंदी शिक्षण
ट्रिनिडाड में 100 से अधिक मंदिर हैं और लगभग सभी मंदिरों में हिंदी सिखाई जाती है, अधिकांशत: सप्ताह में एक दिन। मंदिरों में पढ़ाई जाने वाली हिंदी अमूमन प्रारम्भिक स्तर की ही होती है जिसमें स्वर और व्यञन के ज्ञान के अलावा, हिंदी में गिनती, आकार और रंगों के नाम और छोटे-छोटे वाक्य बोलने भी सिखाए जाते हैं। मंदिरों में रामायण और महाभारत के अंशों के नाट्यरूपांतरण प्रस्तुत किए जाते हैं जिनमें बच्चे हिंदी में संवाद बोलकर अपना ज्ञान-वर्धन करते हैं। यूँ तीन-स्तरीय हिंदी शिक्षण कार्यक्रम ‘वेस्ट इंडीज़ विश्वविद्यलय’ में भी चलाया जाता है परंतु यह भी प्रारम्भिक स्तर का ही है। इसी प्रकार महासभा के 50 से अधिक स्कूलों में सिखाई जाने वाली हिंदी भी कमोबेश प्रारम्भिक स्तर की ही होती है। इन सब संस्थाओं से हिंदी सीखने के बाद भी हिंदी में बातचीत का कोई वातावरण नहीं बनता।
देश में हिंदी के प्रचार-प्रसार में कार्यरत देश की एकमात्र स्वयंसेवी संस्था ‘हिंदी निधि’ ने वर्ष 2000 से लगभग 20 प्रारम्भिक और माध्यमिक स्कूलों में हिंदी शिक्षण प्रारम्भ किया था। श्री चंका सीताराम की अध्यक्षता में हिंदी के अध्ययन, अध्यापन और विकास के रास्ते पर अग्र होती ‘हिंदी निधी’ के आज लगभरग 25 स्कूलों में 700 से भी अधिक बच्चे हिंदी का ज्ञानार्जन करते हैं।
भारतीय उच्चायोग, पोर्ट ऑफ स्पेन में सांस्कृतिक अताशे के पद पर भारत से गए प्रो. हरिशंकर आदेश अपने हिंदी और भारतीय संस्कृति के प्रेमवश अंतत: वहीं के हो कर रह गए। उनके द्वारा संस्थापित ‘भारतीय विद्या संस्थान’ के अनेक सांस्कृतिक शिक्षण केंद्र हिंदी, भारतीय शास्त्रीय अवं समशास्त्रीय संगीत, संस्कृत, नाटक तथा नैतिक शिक्षा क्षेत्र में पिछले लगभग पचास वर्षों से कुछ इस प्रकार सेवारत हैं कि अनेक विद्यार्थी अच्छी हिंदी सीख लेते हैं और हिंदी के सेवा में लग जाते हैं। इसी की एक मिसाल हैं सुश्री कमला रामलखन जिन्हें इस वर्ष भोपाल में आयोजित 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन में ‘विश्व हिंदी सम्मान’ से सम्मानित किया गया है।
भारत की ओर से इस क्षेत्र में विभिन्न तरीकों से सहायता, समर्थन और प्रोत्साहन की दिशा में भारतीय उच्चायोग द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जाती है। भारतीय उच्चायोग द्वारा देश के विभिन्न भागों में तीन स्तरों पर नि:शुल्क हिंदी कक्षाएँ चलाई जाती हैं। वर्ष के अंत में परीक्षा आयोजित की जाती है और प्रत्येक स्तर पर प्रथम, द्वीतीय और तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले छात्र-छात्राओं को हिंदी दिवस के अवसर पर प्रमाण-पत्र और नकद पुरस्कार दिए जाते हैं। सभी उत्तीर्ण छात्र-छात्राओं को भी प्रमाण-पत्र दिए जाते हैं। इन्हीं में से प्रवाहपूर्ण हिंदी बोल पाने वाले छात्र-छात्राओं का चयन करके उन्हें केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा में तीन माह के हिंदी प्रशिक्षण के लिए छात्रवृत्ति पर भेजा जाता है जिसके लिए भारत आने-जाने का खर्च भारत सरकार द्वारा वहन किया जाता है। हिंदी दिवस और विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी-सेवी संगठनों को हिंदी की पुस्तकें, शब्द-कोश इत्यादि भेंट किए जाते हैं। हिंदी प्रेमियों को हिंदी गीत, कविताएँ आदि सुनाने का अवसर प्राप्त होता है।
स्वाहा और आर्य प्रतिनिधि के स्कूलों में भी हिंदी प्रारम्भिक और माध्यमिक स्तर तक सिखाई जाती है।
श्रीमती कलावती रामदास, हिंदी शिक्षिका, के शब्दों में “सनातन धर्म महासभा के लगभग 43 स्कूल हैं जिनमें हिंदी सिखायी जाती है। कुछ सरकारी, वेदिक और प्रेस्बिटेरियन प्राइमरी और सैकेंडरी स्कूलों में भी हिंदी सिखाई जाती है। कूवा में कॉन्वेंट स्कूल में हिंदी जी.सी.ई. ओ लेवेल तक सिखाई जाती है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि हिंदी फिल्मों, गीतों, भजनों और धर्म-ग्रंथों के कारण ट्रिनिडाड में हिंदी हमेशा जीवित रहेगी। एक बार हमारे युवा छात्र-छात्राओं में यह आत्म-जागृति आ जाए कि हिंदी सीखना उनके जीवन की अनिवार्यता है, अच्छे हिंदी शिक्षकों की ज़रूरत हमेशा रहेगी। आप जानते ही हैं कि अधिकांश प्रौढ़ वर्ग के लोग केवल हिंदी गीत समझने के लिए और रामायण का पाठ करने के लिए हिंदी सीखते हैं।
ट्रिनिडाड में भारतीय रेडियो और टेलीविज़न
ट्रिनिडाड में भारतीय रेडियो के प्रवर्तक श्री कमालुद्दीन मुहम्मद थे और टेलीविज़न के प्रवर्तक उनके छोटे भाई श्री शाम मुहम्मद थे। शाम मुहम्मद ने 1970 में भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए ‘मस्ताना बहार’ नाम से गीत, संगीत और नृत्य प्रतियोगिताएँ शुरू कीं ताकि उत्कृष्ट प्रतिभाएँ सामने आ सकें । इनका सीधा प्रसारण टेलीविज़न पर किया जाता है और यह किसी भी स्थानीय कार्यक्रम की अब तक की सबसे लम्बी टी.वी. सीरीज़ है। ‘मस्ताना बहार’ के वर्तमान प्रोड्यूसर श्री शाम मुहम्मद के बेटे श्री ख़याल मुहम्मद हैं। प्रसारित होने वाले टी.वी. कार्यक्रम हैं सितारे, इंडियन वैरायटी, इंडियन कल्चरल मैग़ज़ीन आदि।
ट्रिनिडाड में हिंदी/हिंदुस्तानी संगीत बजाने वाले रेडियो स्टेशन
वर्ष 1993 तक आठ ‘राष्ट्रीय’ रेडियो स्टेशन थे पर इनपर हिंदी नाम मात्र के लिए प्रतिदिन बस एक या दो घंटों के प्रोग्राम में सुनने को मिलती थी और यह देश की 50 प्रतिशत जनता की प्रगाढ़ धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं को व्यक्त करने के लिए अपर्याप्त थी (अहमद 1998:2) । 5 जुलाई, 1993 को हिंदुस्तानी कार्यक्रम वाले रेडियो 103 एफ एम का शुरू होना एक बड़ा ऐतिहासिक परिवर्तन था। 1994 में समाचार पत्र ‘न्यूज़डे’ में एक ख़बर के अनुसार “जब से 103 एफ एम शुरु हुआ, श्रोताओं ने स्टेशन बदलना ही छोड़ दिया था और हर समय बस इसी स्टेशन को सुनते थे। अनेक हिंदुस्तानियों की ज़िंदगी के खालीपन को भरने का काम किया इस स्टेशन ने! आज भी हर वर्ष 5 जुलाई को इसकी वर्षगाँठ एक नि:शुल्क संगीत समारोह के साथ मनाई जाती है जिसमें कई हज़ार प्रशंसक आते हैं। इसके बाद एक के बाद एक चार और पूर्णत: हिंदुस्तानी रेडियो स्टेशन चालू किए गए परंतु आज भी 103 एफ एम की लोकप्रियता सबसे अधिक है। 103 एफ एम में विज्ञापनों के ज़रिए होने वाले अत्यधिक लाभ और हिंदुस्तानी संगीत की बढ़ती भूख का परिणाम हुआ 1995 में दूसरा पूर्णकालिक हिंदी रेडियो स्टेशन एन.बी.सी 610 (जिसे बाद में एन.बी.एन 91.1 के नाम से जाना जाने लगा) और फिर उसी वर्ष में तीसरा स्टेशन 106 एफ एम। इन स्टेशनों पर कोई ‘टॉक शो’ नहीं प्रसारित किए जाते, बजता है तो बस हिंदुस्तानी संगीत और ‘हॉट चटनी’ संगीत इसका लोकप्रिय हिस्सा हैं।
वर्ष 1995 में चौथा हिंदुस्तानी संगीत स्टेशन शुरू किया गया जिसमें शुरुआत तो अंग्रेज़ीऔर शास्त्रीय भारतीय संगीत से की गई लेकिन 1997 में इसे पूर्णत: हिंदुस्तानी संगीत का स्टेशन बना दिया गया। इस रेडियो स्टेशन द्वारा कई मासिक और वार्षिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। एक वार्षिक कार्यक्रम ‘फैमिली डे फ्री कंसर्ट’ भी है। बच्चों के लिए रंग भरने की पुस्तकें भी बनाई जाती हैं जिनके ज़रिए और चीज़ों के साथ-साथ बच्चे हिंदी की शब्दावली भी सीखते हैं।
जनवरी 2001 में लाँच किया जाने वाला मसाला 101.1 एफ एम देश का सतरहवाँ और हिंदुस्तानी संगीत को समर्पित पाँचवाँ रडियो स्टेशन था। इस रेडियो स्टेशन पर विभिन्न प्रकार का जोश-भरा संगीत सुना जा सकता है जिसमें लैटिन, पॉप, रेगे, डब और रॉक के अलावा भंगड़ा, चटनी और सोका भी सुनने को मिलता है। कार्निवल बैंड और बीच पार्टियाँ इसका विशेष आयोजन होती हैं। हाँ, हिंदुस्तानी संगीत इसके नियमित कार्यक्रमों का हिस्सा है। रेडियो 103,106 और 90.5 की तरह ही यह भी खुले पार्कों में नि:शुल्क संगीत समारोह आयोजित करता है और पूरे विश्व में ऑनलाइन प्रसारण भी करता है। मसाला 101.1 भोजन और रक्त-दान के लिए सामाजिक और सामुदायिक अभियान भी चलाता है।
सनातन धर्म महासभा द्वारा 19 जनवरी 2007 से प्रारम्भ किया गया रेडियो जागृति 102.7 एफ एम ट्रिनिडाड एवं टुबैगो में 24-घंटे चलने वाला रेडियो स्टेशन है। मीडिया पर हिंदू समुदाय की ज़रूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से इस स्टेशन पर धार्मिक और प्रेरक कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं, जैसे देश में रातभर चलने वाले रामायण पाठ, विभिन्न हिंदू अनुष्ठान, प्रातः भक्ति कार्यक्रम, भविष्यफल, हिंदी शिक्षण, युवा फोरम, शाकाहारी पाक-कला, योग, आयुर्वेदिक चिकित्सा, महिलाओं और सामयिक विषयों पर चर्चा-परिचर्चा, फिल्म और रूमानी व धार्मिक संगीत।
अन्य सभी रेडियो स्टेशनों पर भी हिंदी/भारतीय संगीत और गीतों के अलावा पण्डितों और इमामों द्वारा धार्मिक व्याख्याएँ भी प्रसारित की जाती हैं। सेहत और खान-पान संबंधी कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं, दैनिक और साप्ताहिक भविष्यफल भी बताए जाते हैं, श्रोताओं द्वारा अपने रिश्तेदारों और दोस्तों आदि को जन्मदिन और वर्षगाँठ की शुभकामनाएँ भी दी जाती हैं और अन्य सामुदायिक घोषणाएँ भी प्रसारित की जाती हैं। इन रेडियो स्टेशनों से पहले हिंदी गाने केवल कैसेट प्लेयर, लाउडस्पीकरों और ज्यूक बॉक्सों पर ही सुने जाते थे और इन स्टेशनों के आने से रेडियो संचार का नया माध्यम बन गया (अहमद:1998)। मुहम्मद (2002:6) का मानना है कि इन सभी स्टेशनों पाई जाने वाली समानता है हिंदी गानों और स्थानीय गीतों के माध्यम से “ट्रिनिडाड में भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार के प्रति समर्पण”।
इन सभी रेडियो स्टेशनों में हिंदी जानने वाले कुछ ऐसे व्यक्ति अवश्य होते हैं जिन्होंने भारत में रहकर हिंदी सीखी हो और जो धारा-प्रवाह हिंदी बोलते हों। इनमें रोज़गार पाने की एक शर्त यह भी है कि कतिपय हिंदी शब्दों का उच्चारण आता हो और हिंदी की कुछ मूलभूत जानकारी अवश्य हो (अली 2002; बेदी 2002; किरन महाराज 2002) । ये सभी रेडियो स्टेशन इस बात पर बल देते हैं कि इनका स्टाफ हिंदी सीखे और कई लोग इसी के चलते भारतीय उच्चायोग में हिंदी सीखने आते भी हैं। समय-समय पर रेडियो और टेलीविज़न पर हिंदी सीखाने के कार्यक्रम भी शुरू किए जाते हैं जो दुर्भाग्यवश बहुत लम्बे समय तक जारी नहीं रह पाते।
ट्रिनिडाड के हिंदी लोकगीत और चटनी संगीत
ट्रिनिडाड और टुबैगो में संगीत की बात करें तो कैलिप्सो, सोका और स्टील पैन का नाम अनायास ही ज़ुबाँ पर आ जाता है और साथ ही ज़हन में आ जाते हैं स्थानीय कलाकारों लॉर्ड किचनर और माइटी स्पैरो के नाम। अफ्रीका और भारत के अलावा अन्य कई देशों से आकर बसे लोगों का यह देश अपने गर्भ में अनेक संस्कृतियाँ लिए हुए था। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में इसका बहु-आयामी प्रभाव देखने को मिलता है। इसी कारण देश के लोक-गीत तो अफ्रीका और भारत के शास्त्रीय संगीत पर आधारित हैं ही, संगीत के अनेक अन्य स्थानीय रूप भी सुनने को मिलते हैं जैसे सोका, चटनी, परांग, रैपसो, बैले, कैसो और टैम्बू-बैम्बू इत्यादि।
बीसवीं शताब्दी में एक ही साज़ का आविष्कार हुआ – स्टील पैन – और संगीत की दुनिया को इस देन का श्रेय जाता है ट्रिनिडाड और टुबैगो को।
भोजपुरी और चटनी संगीत
चटनी संगीत की सराहना के लिए इसके बारे में जानने से भी ज़्यादा ज़रूरी है इसे सुनना, इसे महसूस करना। भारत में परम्परा रही है कि बच्चे के जन्म, शादी-ब्याह, आदि जैसे मौकों पर महिलाएँ लोक-गीत गाया करती हैं। ये भोजपुरी गीत दोहरे अर्थ लिए होते हैं और इनका उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ रीति-रिवाज़ों और परम्पराओं को अगली पीढ़ी को सौंपना भी रहता है। ट्रिनिडाड के चटनी संगीत का जन्म इन्हीं भोजपुरी लोक-गीतों से हुआ है। देश में इसका आगमन गिरमिटियों का आगमन के साथ ही 1845 में हुआ। इन गिरमिटिया मज़दूरों का जीवन तो गन्ने के खेतों में ही बीतता था, दिन-भर वहीं मेहनत करते और शाम होते ही रम के साथ इन भोजपुरी लोकगीतों का दौर शुरू हो जाता और स्वदेश की यादों में डूबते-उभरते रात घिर आती।
ट्रिनिडाड में चटनी गीत महिलाओं द्वारा केवल बच्चे के जन्म के समय और शादी के समय शुक्रवार की रात को “माटीकोर” के समय और विवाह से पूर्व की रात यानी शनिवार की रात “कुकिंग” जिसे वे ‘फेयरवेल” भी कहते हैं, गाए जाते हैं। ढोलक, धनताल और हार्मोनियम लेकर महिलाएँ ये गीत गाती थीं और गीतों में कामुकतापूर्ण शब्दों के कारण पुरुषों की उपस्थिति वर्जित रहती थी। समय के साथ-साथ चटनी संगीत और गीतों में बदलाव आता रहा और 1960 के दशक के अंत तक इस शैली में आमूल-चूल परिवर्तन आ गया। इसमें अंग्रेज़ी और हिंदी के शब्दों का मेल होने लगा । इस शैली में शामिल हुए – विवाह गीत, जन्म के समय गाए जाने वाले लोक-गीत (सोहर), भजन, बिरहा, चौताल, होरी, छठी, कव्वाली और कसीदा। पुरुष बढ़-चढ़ कर इसमें हिस्सा लेने लगे और चटनी संगीत घर से बाहर निकल कर रेडियो और टेलीविज़न तक ही नहीं पहुँचा बल्कि खुले मंचों पर भारी इनाम-राशि वाली वार्षिक प्रतियोगिताओं के तौर भी बेहद लोकप्रिय हो गया। इसका श्रेय जाता है तीनों भाइयों – शाम, मोयेन और कमालुद्दीन मुहम्मद जी को।
स्थानीय कलाकारों ने इसे सोका और कैलिप्सो के साथ फ्यूज़न के ज़रिए नया रूप दिया और चटनी-सोका चटनी का ही पर्याय बन गया है। और पारम्परिक साज़ों के अलावा तास्सा ड्रमों (भारत में बजाए जाने वाले ढोल जैसे) और म्यूज़िक बैंड इसके साथ बजने लगे। आज लोग भले ही इसमें इस्तेमाल होने वाले शब्दों को न समझें, वे तेज़ सोका और कैलिप्सो बीट्स के विलयन वाली इस शैली पर झूम-झूम कर नाचते हैं और इसका आनंद उठाते हैं। विभिन्न शैलियों के फ्यूज़न के चलते आज इसके कई रूप हो गए हैं – चटनी भंगड़ा, चटनी हिप-हॉप आदि।
चटनी संगीत के प्रवर्तक थे सुंदर पोपो जिन्होंने सबसे पहले ‘नाना और नानी’ गीत लिखकर इसकी लोकप्रियता बढ़ाई। और टेलीविज़न शो ‘मस्ताना बहार’ पर इसकी प्रस्तुति करके छा गए। चटनी गायक के रूप में उन्हें ख्याति मिली ‘स्कॉर्पियन गैल (गर्ल), कुंजगलिया, हम न जइबे, सुरजिया, यूनिटी और अमर कृति मदर्स लव से।
ट्रिनिडाड पहुँचीं भारतीय गीतकार कंचन और उनके पति बाबला ने सुंदर पोपो के साथ मिलकर ‘फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी गाया’ जो बेहद पसंद किया गया। इसके बाद कंचन का ‘हॉट-हॉट-हॉट’ आया।
रिक्की जय (होल्ड द लता मंगेश्कर), सोनी मान (लोटे ला), ब्रदर मार्विनका ‘जहाज़ी भाई’ और अनेक नाम इस शैली के गायकों की सूची में जुड़ते चले गए। वर्ष 1982 में चटनी संगीत ट्रिनिडाड की सीमाएं पार करता हुआ और अन्य कैरिबियाई देशों से होते हुए अमरीका तक पहुँच गया। हाल ही में भारत की कुछ फिल्मों में भी इसे आज़माया गया।
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत
भारत से आए गिरमिटिया मज़दूर अपने साथ शुद्ध भारतीय शास्त्रीय संगीत लाए थे। बाद में इंडो-ट्रिनिडाड शास्त्रीय संगीत भी एक अलग रूप में विकसित हुआ। प्रो. हरिशंकर आदेश द्वारा स्थापित भारतीय विद्या संस्थान शुद्ध भारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा देने वाली पहली संस्था थी। बाद में कई अन्य संगीत विद्यालय खुले जैसे संगीत महाविद्यालय और शिव संगीत स्कूल ऑफ म्यूज़िक । पंडित मंगल पटेसर, शिवानंद महाराज और डेक्स्टर रघुनानन जैसे व्यक्ति जिन्हें भारत में आकर संगीत सीखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, उन्होंने देश लौटकर संगीत सिखाने का बीड़ा उठा लिया।
ट्रिनिडाड एवं टुबैगो विश्वविद्यालय (यू. टी. टी.) में डॉ. रूबी मलिक, श्री राना मोहिप और श्री प्रशांत पटेसर द्वारा संगीत की शिक्षा दी जाती है।
भारतीय उच्चायोग के तत्वाधान में महात्मा गाँधी सास्कृतिक केंद्र द्वारा भी नियमित रूप से संगीत और नृत्य की कक्षाएँ आयोजित की जाती हैं।
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| हिंदी पत्रकारिता |
प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन के अवसर पर प्रो. हरिशंकर आदेश का ‘ट्रिनिडाड में प्रथम हिंदी साहित्य साधक’ नाम से स्थानीय लेखकों की रचनाओं का एक संकलन प्रकाशित हुआ था। ट्रिनिडाड के नवोदित कवियों की कविताओं का संग्रह ‘उभरते क्षितिज’ प्रकाशानार्थ तैयार है।
संस्थान वर्ष 1974 से ‘जीवन ज्योति’ नामक पत्रिका प्रकाशित करता है जिसमें हिंदी के लेख, गीत और कविताएँ इत्यादि होते हैं।
देश में हिंदी और भारतीय संस्कृति के बारे में पर्याप्त सामग्री प्रकाशित तो होती रहती है परंतु यह अधिकांशतः अंग्रेज़ी में ही होती है।
वर्ष 2009 से वर्ष 2013 के बीच भारतीय उच्चायुक्त श्री मलय मिश्र के प्रयास से प्रत्येक दो माह में एक बार प्रकाशित गृह-पत्रिका ‘यात्रा’ में हिंदी के लेख और कविताएँ लिखने के लिए स्थानीय लोगों को काफी प्रेरणा मिलती थी। पंडित रामप्रसाद परसराम नियमित रूप से पत्रिका के लिए “चले जा रहे हैं……” शीर्षक से लेख लिखा करते थे। हिंदी शिक्षिका श्रीमती सुमति करीम और श्रीमती जिन्सी सम्पत भी पत्रिका के लिए हिंदी कविताएँ लिखा करती थीं। श्रीमती स्नेह सक्सेना, श्रीमती आशा मोर, श्रीमती सुनीता पाण्डेय और उच्चायोग की अन्य भारतीय महिलाओं का भी हिंदी खंड के लिए निरंतर योगदान रहता था।
हिंदी के प्रति इस अथाह प्रेम और हिंदी शिक्षण और हिंदी के प्रचार के लिए किए जा रहे अथक प्रयासों के बावजूद इस बात से कष्ट होता है कि ‘हिंदी’ मात्र एक शब्द के रूप में जानी जाती है वहाँ, भाषा के रूप में नहीं। हिंदी भाषा के शब्द तो उनकी भाषा (अंग्रेज़ी क्रियोल) में काफी हद तक शामिल हैं पर हिंदी उनकी बोलचाल की भाषा नहीं है। इसका इस्तेमाल तो वे लस्सी में नमक या चीनी की मात्रा के समान ‘स्वादानुसार’ करते हैं। कभी यह तय करना कठिन हो जाता है कि इस बात से मन दुखी हो कि वहाँ हिंदी ठोस रूप में कहीं नहीं है या फिर इस बात पर हर्षित हुआ जाए कि हवा की मानींद यह देश में सर्वत्र व्याप्त है।
शायद ज़रूरत इस बात की है कि देश की विभिन्न संस्थाओं द्वारा अलग-अलग किए जा रहे प्रयासों को एकीकृत किया जाए और साथ ही हिंदी सीखने वालों के लिए उसके सांस्कृतिक महत्व के साथ-साथ उसके व्यवसायिक पहलू पर भी ध्यान दिया जाए और हिंदी सीखने के आर्थिक लाभों की सम्भावना को बढ़ाया जाए। वहाँ की सरकार द्वारा भी इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाए जाने की आवश्यकता है कि कम से कम स्पैनिश और फ्रैंच की तरह हिंदी को भी द्वितीय भाषा का दर्जा दिया जाए। और युवा वर्ग को यह अहसास दिलाया जाए कि विश्व में भारत की उत्तरोत्तर सुदृढ़ होती स्थिति को देखते हुए यह अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि उनका हिंदी सीखने का उद्देश्य रामायण और अन्य धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने की सीमाओं से आगे बढ़े और वे यात्रा, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, व्यापार, हिंदी में उच्चतर शिक्षा आदि को भी अपना लक्ष्य बनाएँ। लुप्त होती भाषा के जीर्णोद्धार के लिए गम्भीरता से सोच-विचार करने और ठोस एवं सकारात्मक कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।
-सुनीता पाहूजा
पूर्व द्वितीय सचिव (हिंदी एवं संस्कृति)
भारतीय उच्चायोग, ट्रिनिडाड एवं टुबैगो (2010 से 2013)
(संतति: केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो, गृह मंत्रालय, भारत सरकार में
सहायक निदेशक (रा.भा.) के पद से सेवानिवृत्त)
