एक अंतिम आलिंगन
अदिति अरोरा
कितना सत्य है, समय न कभी किसी के लिए रुकता है और न ही बीता हुआ समय कभी पलट कर आता है। पलट कर आती हैं तो मात्र स्मृतियाँ, कभी गुदगुदा देने वाली और कभी नेत्रों को अश्रुपूरित कर हृदय को झकझोर देने वाली। ऐसी ही एक हृदय विदारक घटना मेरे स्मृति पटल पर प्रायः उभर कर आती रहती है और बार-बार एक टीस उठा जाती है।
बात कुछ वर्ष पुरानी है, मैं अपनी माँ से मिलने लगभग पाँच वर्ष के लंबे अंतराल के बाद सिंगापुर से कैलिफोर्निया जा रही थी। माँ का स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था। आए दिन कुछ न कुछ शारीरिक कष्ट और उनकी फोन पर थकी-थकी सी आवाज़ मेरे हृदय को अंदर तक हिला जाती थी कि माँ के कष्ट को कैसे दूर करूँ?
माँ से न मिल पाने का यह पाँच वर्ष का अंतराल मेरी पारिवारिक स्थिति जनित था, दुर्भाग्य से मेरे घर के जो द्वार सदैव हर किसी के स्वागत के लिए खुले रहा करते थे वे अपनो के लिए भी बंद हो गए थे। न ही कोई बाहर जा सकता था और न ही कोई अंदर आ सकता था।
जिस माँ को अपने पास रखकर, उनकी सेवा कर जो परम सुखानुभूति हुआ करती थी मैं उस से वंचित हो गई थी। न माँ को अपने पास बुला सकती थी और न ही उन से मिलने जा सकती थी। माँ फोन पर अकसर पूछा करतीं, क्या तुम से फिर कभी मिल पाऊँगी और मैं चुप रह जाती क्योंकि मेरे पास उसका कोई उत्तर न होता था। शायद हम दोनों का एक दूसरे से न मिल पाने का कष्ट और मिलने की तीव्र अभिलाषा का मेरे परिजनों को आभास हो गया और मेरे लिए किसी तरह एक सप्ताह माँ से मिलकर आने का सुयोग बना दिया।
२१-२२ घंटे की यात्रा के पश्चात् मैं अपनी माँ के समक्ष खड़ी थी, दोनों एक दम मौन, बस एक दूसरे को अपलक निहारते… एक दूसरे की आँखों में आँखें… शायद शब्दों की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। पाँच वर्ष का अंतराल जैसे एक ही क्षण में समाप्त हो गया था। जिस माँ को सदैव स्फूर्ति से भरे इधर-उधर भागते दौड़ते देखा था वह आज एक दुर्बल सी काया लिए सोफे के एक कोने में सिकुड़ी हुई बैठी थी। जितना सुख उन से मिलकर हुआ उस से कई गुणा अधिक दुख उनकी यह दशा देखकर मुझे अन्दर तक झकझोर गया। माँ ने प्रश्न किया- क्या कल्पना की थी कि तुम मुझे इस दशा में पाओगी? मेरे पास आज भी उत्तर नहीं था। मेरी आँखों से अविरल अश्रु धारा बह निकली, मैंने सिर्फ धीरे से न में गर्दन हिलाई और माँ को आलिंगन करने के लिए नीचे झुकी। उनके शरीर में तो जैसे जान ही नहीं थी। जो हर किसी को अपनी बलिष्ठ भुजाओं से कसकर हृदय से चिपका लिया करती थी आज उसके बेजान से हाथ उठने में भी काँप रहे थे।
थोड़ी देर बाद शुभ रात्रि कहकर वह अपने कमरे में सोने चली गईं। मैं और मेरे बड़े भाई भी अपने-अपने कमरों में।
अगली सुबह माँ को अस्पताल लेकर जाना था। इस आशा से कि सब ठीक ही होगा घर से निकले, लेकिन नियति को कौन टाल सकता है, सभी परीक्षणों के उपरांत चिकित्सकों और विशेषज्ञों ने आकर माँ के कैंसर की अंतिम अवस्था की सूचना दी। माँ ने आगे किसी भी प्रकार की चिकित्सा के लिए मना कर दिया, शायद वह जानती थीं कि अब सब व्यर्थ है।
मैं और मेरे भाई हम दोनों ख़ाली से हाथ लिए माँ को घर वापस ले कर आ गए।
तीनों के हृदयों और घर में एक गहन, भयावह सी निस्तब्धता छा गई थी। न कोई किसी को नेत्र उठाकर देख पा रहा था और न ही जैसे किसी के मुख में कोई शब्द बचे थे। कुछ देर पश्चात् माँ ने ही इस सन्नाटे को तोड़ा और प्यार से हमें बुलाकर अपने हृदय से चिपका लिया। तीनों अपने जिन आँसुओं को रोकने का भरसक प्रयत्न कर रहे थे वे एक सैलाब की तरह उमड़ पड़े ।
मेरे पास अब मात्र ६ दिन थे जो मैं अपनी प्यारी माँ को समर्पित कर सकती थी। इन ६ दिनों में जैसे अपना और उनका पूरा जीवन जी लेना चाहती थी, उनकी पसंद का खाना बनाना, उनके नाख़ून काटना, उनके कहने पर उनके बाल काटना, मैं जो कुछ भी अधिक से अधिक कर सकती थी, उनको जो भी सुख दे सकती थी प्रयास करती रही। एक-एक दिन जैसे मेरी मुट्ठी से रेत की भाँति फिसल रहा था, लगता था काश समय को किसी तरह यहीं रोक पाती।
लेकिन नहीं.. मेरे वापस आने का दिन भी आख़िरकार आ ही गया। एक सप्ताह पता ही नहीं चला कहाँ, कैसे और कब चला गया। संध्या का समय था मुझे हवाई अड्डे के लिए निकलना था, न तैयार होने की इच्छा, न भूख न प्यास। भाई, माँ को अकेले छोड़ कर नहीं जा सकते थे इसलिए उन्होंने मेरे लिए टैक्सी बुला दी।
मैं अंतिम बार माँ के कमरे में गई और उनसे चिपक कर फूट-फूट कर रोने लगी, माँ एकदम शांत और बोली नहीं ऐसे नहीं अच्छे से जाओ और अपनी जो ज़िम्मेदारी छोड़ कर आए हो जाकर उसे पूरी करो।
मैं अनमनी सी धीरे से अपना सामान उठाकर बाहर आ गई । जो माँ बाहर तक आशीर्वाद देने आया करती थी आज उसमें उठने की भी शक्ति नहीं थी। भाई ने मेरा सामान टैक्सी में रख दिया, सब कुछ जैसे यंत्रवत हो रहा था। मैं टैक्सी का दरवाज़ा खोलकर बैठने ही वाली थी कि अचानक भाई की पीछे से आवाज सुनाई दी, “अरे मम्मी” ! मैंने तुरंत पलटकर देखा तो पाया कि माँ हिम्मत करके बाहर के दरवाज़े तक मुझे विदा करने को खड़ी थीं, पर शायद मेरे अंदर अब उनको इस स्थिति में देखने की और हिम्मत नहीं थी और न ही मैं अपने आँसुओं को अपने भाई और माँ को दिखा उन्हें कमज़ोर करना चाहती थी। मैंने दूर से ही हाथ हिला दिया और टैक्सी में बैठ गई।
और.. यह मैंने अपने जीवन की सबसे बड़ी गलती की। जानती थी कि अब माँ से कभी नहीं मिल पाऊँगी, फिर भी वापस जाकर उनको वह एक अंतिम आलिंगन करने से चूक गई।
एक सप्ताह बाद माँ हमें छोड़कर चली गईं पर आज भी मुझे वे उस दरवाज़े पर खड़ी नज़र आती हैं। न अब माँ है और न ही मैं भागकर उसको आलिंगन कर सकती हूँ।
हम प्रायः जिनसे प्रेम करते हैं उनको बताने में, दर्शाने में चूक जाते हैं, कुछ गलती हो गई हो तो माफ़ी माँगने में चूक जाते हैं। कभी क्रोध वश, कभी अहंकार, कभी व्यस्तता और कभी जल्दी में हम बहुत से मूल्यवान क्षणों को जीने से चूक जाते हैं।
समय पलटकर नहीं आता… बस यादें रह जाती हैं…अतः जब भी किसी से मिलो प्यार से मिलो, जब अलग होने लगो तो और भी ज्यादा प्यार से अलग हों।
मेरी तरह चूक नहीं जाना, क्या पता वह अंतिम मिलन हो और एक अंतिम आलिंगन भी….
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