ग़ज़ल -1
बेखुदी ऐसी घिरी है कुछ समझ आता नहीं
ख़ुद को तो भूला हुआ हूँ आप को पाता नहीं
एक चौरस्ता है जिसपे मैं खड़ा हैरान हूँ
इक कदम तेरे बिना मुझसे चला जाता नहीं
जानता हूँ सच है ये पर दिल को समझायेगा कौन
जो चला जाता जहाँ से लौटकर आता नहीं
हो सके तो रास्ता मुझको दिखा आसान सा
ज़िंदगी को और ज़ियादा अब मैं उलझाता नहीं
हर तरफ़ तूफ़ान और सैलाब का मंज़र ‘अनिल’
बारिशों में घिर चुका हूँ हाथ में छाता नहीं
***
ग़ज़ल -2
बांये मस्जिद थी दायें बुतख़ाना
था पसोपेश में ये दीवाना
बात आसान कर दी साक़ी ने
हमको दिखला के राहे मैख़ाना
उसकी आँखों से जाम पीकर के
नाच उठता है दिल ये मस्ताना
पास कुछ भी नहीं बचा मेरा
पेश कर पाऊँ कहके नज़राना
ज़िक्र जब तक न आयेगा उसका
पूरा होगा न मेरा अफ़साना
अब न हो पायेगा ‘अनिल’ हमसे
उसकी महफ़िल को छोड़कर जाना
***
ग़ज़ल – 3
जाने क्या हो गया ज़माने को
वज़्न पड़ता है मुस्कराने को
बात सच है कि वो पड़ोसी है
नाम राज़ी नहीं बताने को
दिल से होते नहीं सलाम दुआ
हाय हैलो बहुत .. जताने को
लोग खाते नहीं निगलते हैं
दांत रखते हैं बस दिखाने को
खिड़कियों से हवा नहीं आती
कांच उन पर लगा सजाने को
एक अंधी सी दौड़ जारी है
जाने पहुंचेंगे कब ठिकाने को
*****
