
ध्वनियों का संसार
क्या तुमने कभी विचार किया
शब्दों को कोई नाम दिया?
आवाहन है तो हुंकार
ढोल-नगाडे की टंकार ।
पीड़ा में निकले सिसकारी,
आनंदित मन किलकारी।
पंछी बोलें चहचह चुक-चुक
भँवरे करता गुनगुन गुनगुन।
कूहु कूहु करती हैं कोयल,
कैंहों कैंहों करता मोर।
नदिया बोले कलकल-कलकल
पानी की हलचल है धबधब।
टिपटिप, रिमझिम बरसे पानी,
झिमझिम-झिमझिम खूब झमाझम।
झींगुर की है किर्र -किर्र
तो बोलें मेंढक टिर्र-टिर्र।
भिन-भिन, भिन-भिन मक्खी करती
मच्छर करते भुनभुनभुन।
वृक्षों की सर-सर है धीमी,
पत्तों की हलचल में सुरसुर।
जितने शब्द उतनी ध्वनियाँ या
कितने शब्द कितनी ध्वनियाँ
फिर भी नहीं समाती इनमें
भावों की चंचल अठखेलियाँ।
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– वंदना मुकेश