डियर मोमोज (व्यंग्य)
मोमोज के उस सफेद, चिपचिपे और रहस्यमयी व्यक्तित्व की शारीरिक संरचना किसी दार्शनिक गुत्थी से कम नहीं है, जिसे देखकर लगता है कि मैदा अपनी मुक्ति के लिए किसी नेपाली बाबा की शरण में आया है। वह मैदा, जिसे डॉक्टर और डाइटीशियन ‘आंतों का परमानेंट फेविकोल’ घोषित कर चुके हैं, मोमोज वाले के जादुई हाथों में आकर एक ऐसी पारदर्शी और महीन चादर बन जाता है, जिसके आर-पार पत्तागोभी का अनिश्चित भविष्य और दुकानदार की मुनाफे वाली नियत बिल्कुल साफ नजर आती है। इसकी बनावट ऐसी है मानो किसी ने बहुत ही सलीके से एक ‘लजीज अपराध’ को सफेद कफन में लपेटकर स्टीमर के हवाले कर दिया हो। ऊपर से वे नन्हीं-नन्हीं बारीक चुन्नटें किसी महाकंजूस की उस पोटली जैसी लगती हैं, जिसमें उसने अपनी पूरी वसीयत और सात जन्मों की मोह-माया को बड़ी बेरहमी से मरोड़कर कैद कर दिया हो। यह वह पोटली है जिसे खोलते ही स्वाद का जिन्न बाहर आता है।
जब मोमोज स्टीमर के उस अंधेरे, उमस भरे और बहुमंजिला एल्युमीनियम के कमरों से बाहर निकलता है, तो उसकी देह पर तैरती वह गर्म भाप उसे किसी महंगे डिजिटल फिल्टर जैसा ‘ग्लो’ प्रदान करती है। वह इतना नाजुक और लचीला होता है कि यदि कोई सख्त मिजाज व्यक्ति उसे थोड़ा जोर से घूर भर ले, तो उसकी ‘मैदे वाली खाल’ लोक-लाज के भय से वहीं फट जाए और अंदर का पत्तागोभी रूपी सत्य बाहर बिखर जाए। उसकी गोलाई में एक ऐसा वल्गर आकर्षण और मासूमियत भरी कामुकता छिपी है, जिसे देखकर बड़े-बड़े डाइट-चार्ट बनाने वाले न्यूट्रिशनिस्ट भी अपनी कैलोरी वाली थ्योरी को डस्टबिन के हवाले कर देते हैं। लोग सड़क किनारे खड़े होकर पत्तल में रखे उस गोले को ऐसे निहारते हैं जैसे वह कोई साधारण खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने वाला कोई गुप्त ‘शॉर्टकट’ हो, जिसे निगलते ही मोक्ष मिल जाएगा।
मोमोज की असली रूह उसकी उस ‘लाल चटनी’ के खौफनाक ‘अग्निपथ’ में बसती है, जो दिखने में किसी खतरे के सिग्नल जैसी सुर्ख लाल होती है, पर जिसका हमला सीधे मनुष्य के नर्वस सिस्टम और उसकी खानदानी मर्यादा पर होता है। यह वह चटनी है जिसे बनाने वाला शायद पूरी मानवता से अपनी किसी पिछली सदी की रंजिश का बदला लेने की कसम खाकर सिल-बट्टे पर बैठता है। जुबान पर इसकी एक नन्हीं सी बूंद पड़ते ही ऐसा आध्यात्मिक अहसास होता है मानो किसी ने अचानक 440 वोल्ट का नंगा तार आपके अस्तित्व के सबसे कोमल हिस्से से छुआ दिया हो। इसे खाने के बाद आंखों से जो गंगा-जमुना प्रवाहित होती है, वह किसी वियोग या मानसिक दुख का परिणाम नहीं होती, बल्कि उस ‘मिर्ची-क्रांति’ की गवाह होती है जो आपके शरीर के भीतर के पूरे भूगोल और ऐतिहासिक मर्यादाओं को हिलाकर रख देने की अद्भुत क्षमता रखती है।
इस ‘लाल आतंक’ के हमले के बाद लोग जिस तरह से सिसकारियां भरते हैं और उनका चेहरा किसी हाइब्रिड टमाटर की तरह लाल होकर जलने लगता है, वह दृश्य किसी ऐतिहासिक त्रासदी से कम नहीं होता। बावजूद इसके, कोई भी उस ‘अश्लील तीखेपन’ से अपना हाथ पीछे नहीं खींच पाता; यह वह नशा है जहाँ इंसान खुद अंदर से जल रहा होता है और साथ में ‘एक्स्ट्रा मेयोनीज’ की रिश्वत देकर अपनी अंतरात्मा की जलन को शांत करने का एक निहायत ही असफल ढोंग करता है। मेयोनीज का वह सफेद, ठंडा और कृत्रिम लेप दरअसल उस पाप की लीपापोती है जो हमने लाल चटनी के रूप में अपनी आंतों के साथ किया होता है। लोग उस चटनी को चाटते समय ऐसे आत्मघाती योद्धा बन जाते हैं जो दर्द को ही अपना असली पुरस्कार मानने लगते हैं और नाक पोंछते हुए अगले मोमोज की तैयारी करते हैं।
सोसाइटी के उन ‘फिटनेस फ्रीक्स’ का दोहरा चरित्र तो और भी विचित्र और हास्यास्पद है, जो सुबह-सुबह पार्कों में ओस वाली घास पर नंगे पैर चलकर ‘शुद्ध और सात्विक जीवन’ का लंबा-चौड़ा प्रवचन सोशल मीडिया पर पेलते हैं। वही लोग शाम ढलते ही अपनी महंगी स्पोर्ट्स कार या गियर वाली साइकिल किसी अंधेरे कोने में खड़ी करके मोमोज की रेहड़ी पर ‘एक प्लेट और भैया, चटनी ज्यादा देना’ का गुप्त कीर्तन और विलाप करते पाए जाते हैं। उनके लिए मोमोज वह ‘चीट मील’ है जो उनके अनुशासन की धज्जियां उड़ाकर उन्हें धरातल पर ले आता है। यह मोमोज का ही वह अद्भुत उन्माद है जिसने पिज्जा और बर्गर जैसे विदेशी सामंतों की चूलें हिला दी हैं और उन्हें भारतीय गलियों के नुक्कड़ पर घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है। मोमोज अब केवल एक स्नैक नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक महामारी बन चुका है।
असल में मोमोज खाना केवल पेट भरने की एक तुच्छ शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह उस पूरे सिस्टम के खिलाफ एक सफल भूमिगत विद्रोह है जो हमें चौबीस घंटे उबली हुई सब्जियां और अनुशासित जीवन जीने की सलाह देता है। हम सब्जियां तो खाते हैं, पर उन्हें मैदे के अभेद्य तहखाने में कैद करके और लाल चटनी के तेजाब में डुबोकर! उस सफेद गोले के भीतर छिपी हुई वह अधकचरी पत्तागोभी दरअसल हमारे आधुनिक समाज का ही सटीक प्रतीक है—बाहर से सब कुछ चिकना, चमकदार, सफेद और पारदर्शी नजर आता है, मगर अंदर झाँक कर देखें तो वही घिसी-पिटी, उबली हुई और बदरंग वास्तविकता दिखाई देती है। जनता इस सादगी और धोखे की इतनी भूखी है कि वे उस मैदे की नग्नता को भी ‘हॉट एंड सेक्सी’ डाइट मानकर गटक जाते हैं और डकार लेकर अपनी नैतिकता के डेटा को रीसेट कर लेते हैं।
मोमोज के स्टॉल पर लगने वाली भीड़ किसी धार्मिक सत्संग की भीड़ से अधिक अनुशासित, धैर्यवान और समर्पित होती है। वहाँ ऊंच-नीच, जात-पात और अमीरी-गरीबी का भेद पूरी तरह खत्म हो जाता है क्योंकि हर व्यक्ति लाल चटनी के सामने एक समान रूप से असहाय, लाचार और आंसू बहाता हुआ नजर आता है। दुकानदार जब उस बड़े से पतीले का ढक्कन एक नाटकीय अंदाज में हटाता है, तो निकलने वाला वह सफेद धुआं किसी दिव्य अवतरण जैसा प्रतीत होता है। उस धुएं के पीछे खड़े ग्राहक अपनी बारी का इंतजार ऐसे करते हैं जैसे वे किसी सरकारी राशन की दुकान पर नहीं, बल्कि सीधे स्वर्ग के प्रवेश द्वार पर अपनी अर्जियां लेकर खड़े हों। हर कोई चाहता है कि उसे वह मोमोज मिले जिसकी खाल सबसे पतली हो, ताकि वह अंदर के पत्तागोभी रूपी सत्य को ज्यादा करीब से महसूस कर सके।
इस छोटे से खाद्य पदार्थ ने मनुष्य की सहनशक्ति और धैर्य की नई परिभाषाएं गढ़ी हैं। जो इंसान घर में दाल में थोड़ी सी ज्यादा काली मिर्च पड़ जाने पर पूरी गृहस्थी में हंगामा खड़ा कर देता है, वही व्यक्ति मोमोज की रेहड़ी पर खड़ा होकर बड़े गर्व से कहता है— “भैया, थोड़ी और तीखी चटनी डालना, मजा नहीं आ रहा।” यह उस उच्च मानसिक अवस्था का परिचायक है जहाँ व्यक्ति अपने स्वयं के विनाश और आत्मदाह का आनंद लेने लगता है। वह लाल चटनी शरीर के भीतर जाकर जिस तरह की विनाशकारी रासायनिक प्रक्रियाएं करती है, उससे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी खौफ खाता है, लेकिन एक सच्चे मोमोज-प्रेमी के लिए वह केवल स्वाद की पराकाष्ठा है। यह वह नशा है जिसे छोड़ने की बात तो हर सुबह की जाती है, पर शाम होते ही सारे संकल्प कपूर की तरह उड़ जाते हैं।
मोमोज का आकार भी समय के साथ गिरगिट की तरह बदलता जा रहा है, कभी वह गोल पोटली जैसा होता है, तो कभी किसी लंबी मछली या किसी अज्ञात समुद्री जीव जैसा। लेकिन स्वाद का केंद्र वही मैदा और पत्तागोभी का रहस्यमयी और अवैध गठबंधन ही रहता है। कुछ अति-उत्साही लोगों ने तो अब इसमें पनीर, सोयाबीन और यहाँ तक कि नूडल्स भरकर इसके मूल चरित्र के साथ खुला बलात्कार करना शुरू कर दिया है। ‘तंदूरी मोमोज’ के नाम पर तो इसे जलते हुए कोयलों पर फेंककर इसकी आत्मा को ही राख कर दिया जाता है। फिर भी, इसकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आती क्योंकि यह दुनिया का इकलौता ऐसा व्यंजन है जो आपको यह सुखद भ्रम देता है कि आप ‘स्टीम्ड’ यानी स्वास्थ्यवर्धक खाना खा रहे हैं, जबकि हकीकत में आप केवल उबला हुआ मैदा चबा रहे होते हैं।
मध्यमवर्गीय परिवारों में तो मोमोज अब एक अघोषित राष्ट्रीय त्यौहार का दर्जा ले चुका है। जिस दिन घर की महिलाओं को सब्जी बनाने से मुक्ति चाहिए हो या पुरुष को आलस सता रहा हो, उस दिन ‘मोमोज ले आना’ एक क्रांतिकारी और सर्वसम्मत लोकतांत्रिक फैसला माना जाता है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर कोई उस सफेद लोई को लाल चटनी के तेजाब में डुबोकर अपने जीवन के तनावों को भस्म करने के लिए तैयार रहता है। इसे खाते समय जो डकार आती है, वह केवल पेट की फालतू वायु नहीं होती, बल्कि वह समाज के थोपे हुए खान-पान के कायदे-कानूनों के खिलाफ एक विजयी गर्जना होती है। मोमोज ने हमें बखूबी सिखाया है कि कैसे एक साधारण सी चीज को थोड़ी सी भाप और जहरीली चटनी के सहारे एक वैश्विक ब्रांड में बदला जा सकता है।
बाजार की तंग गलियों में मोमोज बेचने वाले भी किसी मझे हुए मनोवैज्ञानिक या तांत्रिक से कम नहीं होते। वे जानते हैं कि किस ग्राहक को कितनी मेयोनीज की रिश्वत देकर उसे शांत करना है और किसे कितनी लाल चटनी का डोज देकर उसे दोबारा अपनी दुकान की गुलामी करने के लिए मजबूर करना है। उनकी उस काली कड़ाही और भाप उगलते बर्तनों के पीछे छिपी हुई रहस्यमयी मुस्कान यह साफ बताती है कि वे जानते हैं कि उन्होंने पूरे शहर को मैदे के इस खतरनाक मायाजाल में सफलतापूर्वक फंसा लिया है। वे मोमोज के साथ जो ‘फ्री सूप’ देते हैं, वह दरअसल एक ऐसा संदिग्ध तरल पदार्थ है जिसका स्वाद दुनिया के किसी भी रसायन शास्त्र की किताब में नहीं मिलता, फिर भी लोग उसे अमृत समझकर ऐसे गटकते हैं जैसे उनकी प्यास सदियों पुरानी हो।
आज के इस दौर में मोमोज केवल एक डिश नहीं रह गया है, बल्कि यह एक अंतरराष्ट्रीय भाषा और प्रेम का पैगाम बन गया है। युवाओं के लिए यह डेटिंग का पहला और सस्ता स्टेप है, तो दफ्तर के थके-हारे कर्मचारियों के लिए शाम की थकान मिटाने का एक रामबाण इलाज। इसे खाते समय मुँह से जो ‘आह’ और ‘उह’ की ध्वनियां निकलती हैं, वे किसी शास्त्रीय संगीत समारोह से कम आनंददायक नहीं होतीं। यह वह भोजन है जो आपको आपकी असली औकात और वास्तविकता से रूबरू कराता है—कि आप अंदर से कितने कमजोर हैं और आपकी जुबान कितने तीखेपन को सह सकती है। मोमोज की वह सफेद परत दरअसल एक पर्दा है, जो हमारे स्वाद की हवस और सेहत के बीच एक अत्यंत पतली सी दीवार बनकर खड़ा रहता है, जिसे हम हर शाम तोड़ देते हैं।
जब हम मोमोज की उस पारदर्शी और चमकदार खाल को देखते हैं, तो हमें अपनी जिंदगी की खोखली पारदर्शिता की याद आती है। जिस तरह मोमोज के भीतर का मसाला पूरी तरह पका नहीं होता, उसी तरह हमारी जीवन की योजनाएं, करियर और सपने भी आधे-अधूरे, अधकचरे और भाप में पके हुए होते हैं। हम बस उस पर लाल चटनी रूपी क्षणिक उत्तेजना छिड़ककर उसे निगलने की कोशिश करते हैं और सोचते हैं कि पेट भर गया। मोमोज का वह सफेद गोला हमें यह सिखाता है कि जीवन में अगर सब कुछ फीका और नीरस लगे, तो समझ लीजिए कि आपके पास अभी ‘लाल चटनी’ का तीखा विकल्प मौजूद है। बस आपको उस जलन को सहने की हिम्मत जुटानी होगी और अपनी आंतों के स्वास्थ्य के साथ थोड़ा बहुत समझौता करना होगा।
अंततः, मोमोज हमारी आधुनिक डिजिटल सभ्यता का वह ‘फास्ट-ट्रैक’ सत्य है जो हमें यह बताता है कि सादगी अब केवल मैदे के भीतर ही सुरक्षित बची है। चाहे दुनिया के डॉक्टर इसे ‘जंक फूड’ का खिताब दें या ‘बीमारी का घर’ कहें, लेकिन जब तक इस धरती पर शाम ढलेगी और जब तक सड़क किनारे सफेद भाप के बादल उठेंगे, तब तक मोमोज का अखंड साम्राज्य बना रहेगा। हम इस सफेद गोले के जन्मजात गुलाम हैं और हमेशा रहेंगे, क्योंकि यह हमें उस आदिम स्वाद की याद दिलाता है जहाँ आग और भाप ने पहली बार मनुष्य की बेकाबू भूख के साथ संवाद किया था। इसलिए, अगली बार जब आप मोमोज उठाएं, तो उसे सिर्फ भोजन न समझें, बल्कि उसे एक ‘लजीज जुर्म’ मानकर पूरे सम्मान के साथ अपनी जुबान के हवाले कर दें।
इस पूरी प्रक्रिया में मोमोज वाला उस मुख्य पुजारी की तरह है जो हमें हमारे स्वाद के पापों से मुक्ति दिलाता है। वह सफेद गोला जब हमारे गले से नीचे उतरता है, तो वह केवल एक मैदा नहीं होता, बल्कि वह हमारी दिनभर की कुंठाओं, ऑफिस की शिकायतों और बॉस की गालियों का एक पुतला होता है जिसे हम चबाकर नष्ट कर देते हैं। लाल चटनी की वह भयानक जलन दरअसल उस आध्यात्मिक पश्चाताप की तरह है जो हमें यह याद दिलाती है कि सुख के साथ दुख का आना अनिवार्य है। मोमोज का यह दर्शन इतना गहरा और महीन है कि इसे समझने के लिए आपको कम से कम दो प्लेट एक्स्ट्रा तीखे मोमोज खाने पड़ेंगे, जिसके बाद आपका दिमाग पूरी तरह काम करना बंद कर देगा और केवल पेट ही आपके अस्तित्व का अंतिम फैसला करेगा।
– डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
