पक्के रंग और कच्चे मन के किस्से (व्यंग्य)
हमारे यहाँ होली कैलेंडर की तारीखों से नहीं, बल्कि मोहल्ले की उस पुरानी दीवार पर पड़ने वाले नीले-लाल धब्बों से शुरू होती थी। वह दीवार जिसे साल भर कोई नहीं देखता था, होली आते ही वह किसी आधुनिक पेंटिंग जैसी दिखने लगती। यादें धूल की तरह होती हैं, बस एक फूँक मारो और सब साफ़ हो जाता है। मेरी यादों के बक्से में वह पहली होली आज भी वैसी ही ताज़ा है, जैसी गालों पर लगी वह पहली गुलाल की लकीर। वह समय ऐसा था जब स्मार्टफोन की रील नहीं बनती थी, बल्कि यादें सीधे दिल के हार्ड ड्राइव में सेव होती थीं। होली के दस दिन पहले से ही घर की छत पर पापड़ और कचरी की नुमाइश लग जाती थी, जिन्हें चिड़ियों से बचाना दुनिया का सबसे बड़ा मिशन हुआ करता था।
बचपन में गुब्बारे भरना एक ‘इंजीनियरिंग’ से कम नहीं था। हम नल के नीचे बैठकर घंटों गुब्बारे फुलाते, इस डर के साथ कि कहीं वह बीच में ही न फट जाए। वह भी क्या दौर था, जब रंग खरीदने के लिए गुल्लक से निकले दस-बीस रुपये भी भारी भरकम बजट लगते थे। हम गुब्बारों को बाल्टी में ऐसे सजाकर रखते थे जैसे कोई सेना अपने गोला-बारूद तैयार कर रही हो। पड़ोसी के उस ‘खड़ूस’ अंकल की खिड़की हमारा प्राइमरी टारगेट होती थी। आज जब हम बड़े हो गए हैं, तो समझ आता है कि असल मज़ा गुब्बारा मारने में नहीं, बल्कि उस गुब्बारे को फटने से बचाने की जद्दोजहद में था। वह कच्ची उम्र का कच्चा रंग आज के पक्के रंगों से कहीं ज़्यादा गहरा था।
होली की सुबह का वह सन्नाटा बड़ा ही रोमांचकारी होता था। घर के अंदर माँ और दादी की रसोई से आती गुझिया की खुशबू और बाहर सड़क पर छाई शांति, यह तूफान के पहले की शांति थी। फिर अचानक कहीं दूर से ‘बुरा न मानो होली है’ की आवाज़ आती और मोहल्ले का सारा अनुशासन धुआं-धुआं हो जाता। वह पल बड़ा जादुई होता है जब आप साफ़-सुथरे सफ़ेद कुर्ते में बाहर निकलते हैं और पाँच मिनट के भीतर आपकी पहचान सिर्फ आपके दांतों से होती है। उस समय कोई बॉस नहीं होता, कोई जूनियर नहीं होता; सब के सब बस एक जैसे ‘कैनवस’ होते हैं जिन पर ज़िंदगी अपना सबसे चटक रंग बिखेर देती है।
होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं है, यह तो असल में ‘डाइट’ को छुट्टी देने का बहाना है। वह गर्म-गर्म छनती हुई गुझिया, जिसकी परत टूटते ही अंदर का खोया और चाशनी मन की सारी कड़वाहट को सोख लेती थी। जब मोहल्ले के लोग टोली बनाकर घर आते, तो चाय के साथ उन किस्सों का दौर शुरू होता जो पिछले दस सालों से हर होली पर सुनाए जा रहे होते थे। वही पुराने जोक्स, वही पुरानी बातें, लेकिन हर बार उनका स्वाद नया लगता था। शायद इसलिए क्योंकि उन किस्सों में नमक नहीं, अपनापन घुला होता था।
हर टोली में एक दोस्त ऐसा ज़रूर होता है जो कसम खाकर आता है कि वह रंग नहीं लगवाएगा, और अंत में सबसे ज़्यादा काला-नीला वही दिखता है। हमारी टोली का ‘बंटी’ भी ऐसा ही था। उसे रंगों से चिढ़ थी, लेकिन उसे रंगने का जो सामूहिक आनंद था, वह किसी मेडल जीतने से कम नहीं था। वह ‘पक्का रंग’ जिसे छुड़ाने के लिए हम घंटों साबुन रगड़ते थे और अंत में हार मानकर यह सोच लेते थे कि अब स्कूल इसी चेहरे के साथ जाना होगा। वह रंग चेहरे से तो उतर जाता था, लेकिन उन दोस्तों के साथ बिताए लम्हों की छाप कभी नहीं उतरी। आज वे दोस्त अलग-अलग शहरों में ‘सेट’ हैं, पर होली वाले दिन व्हाट्सएप ग्रुप पर वही पुरानी फोटो आज भी सबको बच्चा बना देती है।
दोपहर ढलते ही जब हुड़दंग शांत होता, तब होली का सबसे खूबसूरत हिस्सा शुरू होता था—’अबीर’ वाली शाम। नहा-धोकर, साफ़ कपड़े पहनकर जब हम अपनों के पैर छूते और वे माथे पर गुलाल का टीका लगाते, तो वह पल बड़ा ही सुकून भरा होता था। उस समय शोर नहीं होता, बस एक खामोश स्वीकृति होती थी कि “चलो, सब ठीक है।” वह शाम अक्सर किसी की कमी भी खलवाती थी। कोई पुराना प्यार, कोई बिछड़ा दोस्त या वह दादाजी जो अब नहीं रहे। होली के चटख रंगों के बीच वह हल्का सा फीकापन ही तो हमें इंसान बनाता है। पूरी तरह खुश होना भी एक तरह की अधूरी बात है।
अब हम बड़े शहरों के फ्लैट्स में रहते हैं, जहाँ होली ‘ईवेंट’ बन गई है। सफ़ेद कपड़े पहनकर ‘सनबर्न’ वाली पार्टी में जाना और आर्गेनिक रंगों से सलीके वाली फोटो खींचना अब दस्तूर है। लेकिन इन सबके बीच वह पुरानी वाली मिट्टी की गंध गायब है। वह बाल्टी भर पानी, वह छत की भागदौड़ और वह बिना किसी एजेंडे वाली मस्ती अब यादों के एल्बम में कैद है। जब भी होली आती है, वह पुराना शहर, वह मोहल्ला और वह अपनी बालकनी तेज़ी से याद आती है। लगता है कि काश एक बार फिर उस पुराने घर की घंटी बजे और कोई जोर से चिल्लाए—”अबे बाहर निकल, होली है!”
होली सिर्फ कैलेंडर का एक लाल गोला नहीं है, यह एक मौका है खुद को फिर से खोजने का। यह त्योहार हमें सिखाता है कि अगर दाग लग भी जाएं, तो वह बुरे नहीं होते, बशर्ते वह खुशियों के हों। वह यादगार होली मेरे साथ हमेशा रहेगी, सिर्फ इसलिए नहीं कि उस दिन बहुत रंग उड़ा था, बल्कि इसलिए क्योंकि उस दिन हम ‘प्रोफेशनल’ होने के बजाय सिर्फ ‘इंसान’ थे। ज़िंदगी के पन्ने भी तो होली की तरह ही होने चाहिए—थोड़े बिखरे हुए, थोड़े रंगीन और थोड़े बेतरतीब। क्योंकि साफ़-सुथरी ज़िंदगी अक्सर बोरियत से भरी होती है।
– डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
