ट्यूलिपों के देश नीदरलैंड की जादुई लोक कथाएँ: संस्कृति और कल्पना और यथार्थ का सुन्दर संगम : समीक्षक – रेखा राजवंशी

मुझे 1988 में ट्यूलिपों के देश नीदरलैंड जाने का अवसर मिला। मेरे मन पर वहाँ गुज़ारे डेढ़ महीने आज भी अपनी समस्त सुंदरता के साथ अंकित हैं। वसंत का महीना था – प्रकृति ने रंग बिरंगे फूलों से समस्त धरा को दुल्हन की तरह सजा दिया था। हम क़ौक़नहोफ भी गए जहाँ का ट्यूलिप गार्डन बहुत लोकप्रिय था और जहाँ सिलसिला फिल्म की शूटिंग भी हुई थी।  

डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पाँडे द्वारा अनूदित एवं संकलित पुस्तक “ट्यूलिपों के देश नीदरलैंड की जादुई लोक कथाएँ”  पढ़कर सारी यादें साकार हो गईं। ऋतु कई विधाओं में लिखती हैं और उनकी रचनाएं मुझे पसंद हैं। उनके द्वारा अनूदित लोककथाओं का संग्रह सिर्फ एक संग्रह नहीं, बल्कि भारत और नीदरलैंड के बीच सांस्कृतिक संवाद का एक सशक्त सेतु है। यह किताब पाठकों को नीदरलैंड की लोकसंस्कृति, जनजीवन, लोकविश्वासों और मानवीय मूल्यों से परिचित कराते हुए कल्पना और यथार्थ के सुंदर संगम तक ले जाती है।

किसी भी देश की लोककथाएँ वहाँ सदियों से चली आ रही जीवन-दृष्टि, नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक अनुभवों को सहज रूप में प्रस्तुत करती हैं। इस दृष्टि से यह पुस्तक अत्यंत महत्वपूर्ण है,  इसमें संकलित बारह कथाएँ नीदरलैंड की लोकपरंपरा को हिंदी पाठकों तक सरल, रोचक और आत्मीय भाषा में पहुँचाती हैं।

पुस्तक की विशेषता यह है कि प्रत्येक कथा मनोरंजन के साथ-साथ जीवनोपयोगी सीख भी देती है। “घमंडी राजकुमारी” विनम्रता और आत्मबोध का पाठ पढ़ाती है, “गरीब किसान” अनुभव और ज्ञान के महत्व को रेखांकित करती है, जबकि “समझदार बकरी” सूझबूझ, साहस और मातृत्व की शक्ति का प्रभावी चित्रण करती है। “साहसी केकड़ा”, “तीन गुलाम” और “हरा मटर” जैसी कहानियाँ बुद्धिमत्ता, संघर्ष और आशा के विविध रंग प्रस्तुत करती हैं।

पुस्तक की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि इसका सफल अनुवाद है। अनुवादक ने केवल शब्दों का रूपांतरण नहीं किया, बल्कि नीदरलैंड की सांस्कृतिक संवेदना को हिंदी की आत्मीयता में ढाल दिया है। भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और बाल-पाठकों के अनुकूल है, जबकि कथाओं का मूल स्वाद भी अक्षुण्ण बना रहता है। यही कारण है कि पाठक इन कथाओं को पढ़ते समय अनुवाद नहीं, बल्कि मौलिक हिंदी रचनाओं का आनंद अनुभव करता है।

“जादुई शीशा” जैसी कथाएँ प्रेम, करुणा और मानवीय संवेदनाओं की विजय को रेखांकित करती हैं। वहीं “इवान की दुल्हन” और “बेईमानी की सजा” जैसी कहानियाँ लोककथाओं के पारंपरिक जादुई संसार को रोमांच और नैतिकता के साथ प्रस्तुत करती हैं। इन कथाओं में जादू, परियाँ, शाप, बोलते पशु-पक्षी और चमत्कारिक घटनाएँ हैं, परंतु इनके केंद्र में सदैव मनुष्य और उसके मूल्य ही बने रहते हैं।

यह पुस्तक साहित्य प्रेमियों, बाल-पाठकों तथा तुलनात्मक लोकसाहित्य के अध्येताओं के लिए समान रूप से उपयोगी है। विशेष रूप से हिंदी में विश्व लोकसाहित्य की उपलब्धता के संदर्भ में यह कृति महत्वपूर्ण योगदान देती है। नीदरलैंड की लोकसंस्कृति को हिंदी जगत तक पहुँचाने का यह प्रयास सराहनीय है।

अंततः कहा जा सकता है कि “ट्यूलिपों के देश नीदरलैंड की जादुई लोक कथाएँ” एक ऐसी पुस्तक है जो मनोरंजन, शिक्षा, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती है। यह पाठकों को न केवल एक नए देश की लोकपरंपराओं से परिचित कराती है, बल्कि यह भी बताती है कि दुनिया की अलग-अलग संस्कृतियों के बीच मानवीय मूल्यों की एक साझा धारा सदैव प्रवाहित होती रहती है।

यह कृति निस्संदेह हिंदी लोकसाहित्य और अनुवाद साहित्य की एक उल्लेखनीय उपलब्धि है।

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