डॉ. शैलजा सक्सेना की कविता ‘माँ! मैं तुम सी न हो पाई’ का आशा बर्मन द्वारा बांग्ला अनुवाद

माँ! मैं तुम सी न हो पाई’ – डॉ. शैलजा सक्सेना

माँ! मैं तुम सी न हो पाई!

मैं,

उलटती-पलटती रही इस अनुभूति को

बहुत देर,

दिल और दिमाग के बीच की रेखा पर

तौलती रही इसे,

शब्दों को पकाती रही सम्वेदना के भगौने में,

तब सोचा

कि स्वीकार किये बिना अब कोई चारा नहीं है,

कि माँ,

मैं तुम सी न हो पाई।

मैं तुम सी न हो पाई!!

तुम,

अपनी नींद,

टुकड़ा-टुकड़ा हमारी किताबों में रख,

भोर की किरणों को

परीक्षा पत्र सा बांचती आई

मैं, न कर पाई!

तुम,

हमारे स्वाद,

थालियों में सजा,

अपनी पसंद सिकोड़ती आई

मैं, न कर पाई!

तुम्हारी,

प्रार्थनाओं की फैली चूनर में

केवल हमारे सुखों की आस थी

तुम कहीं नहीं थीं उसमें!

मैं,न कर पाई!

तुमने बोलना सिखाया हमें

और खुद चुप होती चली गई!

तुमने कभी कहा नहीं परेशानियों में भी

कि “अब तुम से होता नहीं”

और तुम्हारी हिम्मत

मुक्त करती रही हमें अपराध बोध से!

तुमने कभी यह भी कहा नहीं कि

“यह मैं ही करूँगी”

और चुपचाप हमारे भीतर

कर्म की अनेक सँभावनायें बो दीं!

तुम्हारा मौन, तुम्हारी शांति है और तुम्हारी ढाल भी!

तुम्हारा श्रम, तुम्हारी काँति है और तुम्हारा हथियार भी।

तुम्हारा प्रेम, हमारे लिये हवा है, पानी है,

हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।

तुम अपनी इच्छाओं को,

खाद बना हमें फलने-फूलने देती रही

हमें सोचने की न ज़रूरत हुई, न फुर्सत!

आज,

जब तुम्हारी भूमिका में हूँ मैं

और उलट-पलट कर देखती हूँ तुम्हारा जीवन,

तो जानती हूँ

तुम्हारी तरह मौन, अपने को देते चले जाने की साधना

नहीं है मुझ में..!!

मेरा मन देकर भी बचा लेना चाहता है,

अपना निजी एक कोना!

अपने को पूरा दे देना

संस्कृति नहीं है अब हमारी,

अब हमारी निजी अस्मितायें हैं

जो तौलती हैं हर संबंध से मिलने और देने को,

और अक्सर पैदा करती हैं कटुताओं का उलझाव

जो तुममें नहीं था।

तुम साफ नीला आकाश थी

हमें ढ़के हुये,

एक कोमल घास वाली धरती,

जिस पर खॆलते थे हम निश्चिन्त

तुम्हारे आशीर्वादी सूरज की गुनगुनी धूप से ढँके!!…

माँ, सच,

मैं होकर भी माँ,

पूरी तरह

आकाश, घास, सूरज न हो पायी!

मैं,

तुम सी न हो पायी,

तुम सी ना हो पायी

মা,আমি তোমার মতো হতে পারিনি – आशा बर्मन 

মা,আমি তোমার মতো হতে পারিনি।

আমি,

এই অনুভূতিটাকে উল্টেপাল্টে দেখেছি

অনেকক্ষণ ধরে,

হৃদয় আর মস্তিষ্কের মাঝের সরু সীমারেখায়

তুলে দেখেছি একে,

অনুভূতির হাঁড়িতে শব্দগুলোকে সিদ্ধ করেছি,

তারপর ভাবলাম

এখন স্বীকার না করে আর উপায় নেই,

যে মা,

আমি তোমার মতো হতে পারিনি!!

তুমি নিজের ঘুমটুকু টুকরো টুকরো করে

আমাদের বইয়ের পাতায় রেখে দিতে,

ভোরের আলোকে

পরীক্ষার খাতার মতো পড়তে।

আমি, পারিনি!

তুমি,

আমাদের পছন্দের স্বাদ

থালায় সাজিয়ে দিতে,

নিজের পছন্দগুলো গুটিয়ে রাখতে।

আমি, পারিনি!

তোমার প্রার্থনার ছড়ানো আঁচলে

শুধু আমাদের সুখের আশাই ছিল,

তুমি নিজে কোথাও ছিলে না তাতে!

আমি, কিন্তু সেটা  পারিনি!

তুমি আমাদের কথা বলা শিখিয়েছ

আর নিজে চুপ হয়ে যেতে থেকেছ!

তুমি বিপদেও কখনো বলোনি

যে “এখন আর আমার দ্বারা হবে না”

আর তোমার সাহস

আমাদের অপরাধবোধ থেকে মুক্ত করে রেখেছে!

তুমি এটাও কখনো বলোনি যে

“এটা আমি-ই করব”

আর নিঃশব্দে আমাদের ভিতরে

কর্মের অজস্র সম্ভাবনা বুনে দিয়েছ!

তোমার নীরবতা, তোমার শান্তি আর তোমার ঢাল,

তোমার শ্রম, তোমার দীপ্তি আর তোমার অস্ত্রও!

তোমার ভালোবাসা, আমাদের জন্য বাতাস, জল,

আর ছিল আমাদের জন্মগত অধিকার।

তুমি নিজের ইচ্ছেগুলোকে

সার বানিয়ে আমাদের ফলতে-ফুলতে দিয়েছ,

আমাদের ভাবার প্রয়োজন হয়নি, সময়ও হয়নি!

আজ,

যখন আমি তোমার ভূমিকায় আছি

আর তোমার জীবনকে উল্টে-পাল্টে দেখি,

তখন বুঝি —

তোমার মতো নিঃশব্দে নিজেকে দিয়ে যাওয়ার সাধনা

আমার মধ্যে নেই..!!

আমার মন দিয়ে দিয়েও

নিজের জন্য একটা ছোট্ট জায়গা বাঁচিয়ে রাখতে চায়।

নিজেকে পুরোটা দিয়ে দেওয়া

এখন আর আমাদের সংস্কৃতি নয়।

এখন আমাদের আছে শুধু নিজস্ব অস্তিত্বগুলো

যারা প্রতিটা সম্পর্ককে মাপে — কী পেলাম, কী দিলাম,

আর প্রায়ই জন্ম দেয় তিক্ততার জটিল প্যাঁচ,

যা তোমার মধ্যে ছিল না।

তুমি ছিলে পরিষ্কার নীল আকাশ,

যা আমাদের ঢেকে রাখত,

একটা কোমল ঘাসে ভরা মাটি,

যার ওপর আমরা নিশ্চিন্তে খেলা করতাম,

তোমার আশীর্বাদের সূর্যের রোদে ঢাকা!!….

…মা, সত্যি,মা হয়েও আমি সম্পূর্ণভাবে

আকাশ, ঘাস, রোদ হয়ে উঠতে পারিনি!

আমি,তোমার মতো হতে পারিনি,

তোমার মতো হতে পারিনি।

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