प्रगति टिपणीस की कविताएं

कविता विमर्श में आज पढिए, मूलतः लखनऊ से प्रगति टिपणीस पिछले तीस से अधिक वर्षों से मॉस्को में निवास कर रही हैं। वे पेशे से इंजीनियर हैं, लेकिन पिछले कई वर्षों से साहित्यिक और व्यावसायिक अनुवाद के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने ‘आईसेक्ट पब्लिकेशन, भोपाल’ से प्रकाशित पुस्तक ‘रूस की चयनित रचनाएँ’ का संकलन और संपादन किया है। साथ ही वे ऑनलाइन पत्रिका ‘अनन्य-रूस’ की संपादक भी रही हैं। वे रूस की सबसे पुरानी भारतीय संस्था ‘हिंदुस्तानी समाज, रूस’ की महासचिव हैं। आपकी कविताओं में प्रकृति की आमद सुहानी लगती है।

बहाव – ख़यालों का

कई दिनों से समां ठहरा हुआ-सा था

बादल थे कि ठहर जाने को आए थे

शीत पूरे हक़ से किवाड़ खटखटा रही थी

वन अकेले शांत जमे थे

रस्ते मानो राह तक रहे थे

मिलने सिर्फ़ इक गिलहरी आती थी

कोमल स्पर्श से सहला जाती थी

पेड़ों से पीली उदासी लटकी थी

किसी यार का उनको इंतज़ार था

सभी खड़े थे सांस थामे

पसरी थी उनके बीच ख़ामोशी

एक झोंका आया सर्र करता

झर्र झरने लगे पत्ते

यह एक फटकार भी थी उड़ने की

बादल बग़लें ताकने लगे थे

नीले वितान के नीचे

पीले झरने तले

पत्तों मानिंद मचला मन

छोटी चिड़िया ख़यालों की

फुर्र से उड़ी

संग उसके उड़ने लगी

मेरे भारी क़दमों की पतंग

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सावन (कविता)

सूखे और सैलाब के बीच

आसमान में उड़ती हरी-भरी चिड़िया

सावन कहलाती है।

सूखा

भूरी-भूरी धूल से सब कुछ सन गया होता है

पेड़ ओढ़ लेते हैं पीली-पीली उदासी

ज़मीं का सीना फट जाता है

जगह-जगह उमस है रिसती

हवाएँ गोया थम जाती हैं

थक के चूर पेड़ परिंदे!

आसमान में तलाशते हैं

अब्र का टुकड़ा

नज़र नहीं आता है जो

चकमा दे जाता है कभी

नदी नाले सब

ताल-तलैया पोखर सब

खो देते हैं अपना वजूद

बंजर-हुई धरती से

मिलाते हैं हाथ

सावन झूम के फिर आता है

घर, आँगन, धरती, आकाश, पोखर

तन-मन, सारा ही वजूद

झूम उठते हैं हरी-भरी लहरों के साथ

चहक उठती हैं पत्तियाँ

गाती हैं नदियाँ

नाले सब कुछ

मचल रहा है हर इक ज़र्रा

तोड़ते हैं सब बाड़

आगे और भी आगे बढ़ जाते हैं

रोकना है मुश्किल

सब कुछ फिर सैलाब में गुम

सूखे और सैलाब के बीच

रह जाता है सावन

बिखेरता गीतों, झूलों, मल्हार

और कजरियों के रंग

मोर-नाच और इंद्रधनुष साथ

नए ही राग अलापती है ये ज़मीं!!

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