गोर्की की माँ – समीक्षक : शैलजा सक्सेना
आज दुनिया की इतनी सारी माता के बारे में सुनकर मन भावुक रहा है लिखने में तो मन बहुत ही छोटा शब्द है लेकिन जब मन के बारे में लिखा जाए तो संसार का कोई भी ग्रंथ छोटा पड़ जाए आज मैं रशियन लेखक मैक्सिम गोर्की की रचना मदर पर बोलना चाहूंगी संसार के सभी माय चाहे वह मनुष्य हो या पशु पक्षी उन सभी में एक सामान्य होती है और वह है अपने बच्चों के लिए कुछ भी कर गुजरने की हिम्मत और ताकत मां की ममता अनंत है तो मां की क्षमता भी अनंत है। गोर्की की माँ पेलागेया नीलोबना में भी यह गुण देखने को मिलता है। शुरू में तो वह बहुत ही डरी सहमी और साधारण सी घरेलू महिला होती है। जब उसका बेटा मजदूर और गरीबों के प्रति हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता है तब वह माँ घबड़ा जाती है कि उसका बेटा व्यवस्था के विरुद्ध है। लेकिन धीरे-धीरे मां बेटे के क्रांतिकारी विचारों को समझती है और उसका साथ देती है। यहां वह दर्शाती है कि ममता केवल घर तक ही सीमित नहीं होती एक माँ समाज के परिवर्तन की शक्ति भी बन सकती है।
गोर्की की माँ
एक माँ
जो पहले डरती थी,चुप रहती थी
जिसकी दुनियाँ केवल घर के दीवारों तक ही सीमित थी ।
आंखों में था वर्षों का डर होठों पर चुप्पी की लकीर, सहते सहते जीवन बीता मन में दबा हुआ था पीर, लेकिन जब बेटे ने आकर अन्यायों के घाव दिखाएं, सोए हुए उसे माँ के भीतर, साहस के दीप स्वयं जगाए।
हाथ कांपते थे पहले जिनके,अब मुट्ठी बन जाती थी, सच और न्याय की राहों में, हर पीड़ा सह जाती थी, चूल्हे की राख में दबी, एक धीमी सी चिंगारी थी।
ना आंधी से वह डर पाई,ना बंदिश उसको रोक सकी, ममता जब जागी भीतर हर जंजीर वही टूट गई, गलियों गलियों चौपाल में धीरे-धीरे बात गई, एक साधारण सी माँ भी अन्यायों से टकरा गई।
उसकी आंखों में अब केवल अपने बेटे का स्वप्न ना, था हर मजदूर हर पीड़ित जान ही उसकी ममता का अपना था।
गोर्की की वह माँ बताती ममता केवल आंसू नहीं जब अत्याचार बढ़ धरती पर माँ बनती है क्रांति भी।
वो माँ आज भी जीवित है हर साहस की पुकारो में जब भी कोई सत्य के खातिर उठती है उठती है अंधियारों में, उठती है अंधियारों में।
