खामोश हो गयी पण्डवानी की हुंकार : विनय उपाध्याय

कला की रंगभूमि पर रणभूमि की हुंकार भरने वाली मशहूर पण्डवानी गायिका तीजन बाई ने जीवन के रंगमंच को अलविदा कह दिया।

यादों का एक अनंत सिलसिला है और तीजन की कहानी अपनी रंग रूपहली छवियां लिए पन्ने दर पन्ने रौशन है।
…..ये उनकी आखिरी भोपाल यात्रा थीं। आयोजकों का विशेष आग्रह था। रवीन्द्र भवन के मुक्ताकाश में “लोकरंग” की वो मटियारी शाम ऐतिहासिक थी। नया थिएटर के रंगकर्मी और तीजन के पुराने निज सचिव धन्नूलाल सिन्हा उनका हाथ थामे हौले-हौले मंच पर लाए। करतल ध्वनि का झोंका हवाओं में लहराया। माईक के पास आते ही तंबूरे पर झंकार हुई और तीजन के कंठ से झरने लगी पांडवों की गाथा। बेशक तीजन की आवाज़ में थकान थी लेकिन यह दृश्य अपने आपमें अनोखा, ऐतिहासिक था।

एक उदघोषक के नाते मुझे अनेक समारोहों में तीजन बाई को पुकारने का सौभाग्य मिला। उनके साथ कई यात्राएं कीं, गुफ्तगू के अनेक मौके भी मिले। वो महफ़िलें अब गुज़रे ज़माने की याद बनकर रह गई । पिछले कुछ सालों में तीजन को बीमारी ने घेर लिया था।
देह थकी पर पण्डवानी का मंच और लोकरंग में महकते मंज़र सोते-जागते उनका पीछा करते रहे। सब कुछ अब नीम खामोशी के हवाले हो गया। महफिलें सूनी हो गयीं जहाँ तीजन का जादुई सम्मोहन सिर चढ़कर बोलता। एक कलाकार के जीवन का यही दारूण सच है।

……बोल वृन्दावन बिहारी लाल की जय! इस उद्‌घोष के साथ छिड़ने लगता छत्तीसगढ़ी लय-ताल का अल्हड़ संगीत। हाथ में इकतारा लिए पण्डवानी गायिका महाभारत की कथा का प्रसंग सुनाने मंच पर मुस्तैदी से प्रकट होती और अपार जन समुदाय अधीर होकर इस विलक्षण कथाकार को निहारने लगता। संगीत, एक सिरे पर जाकर थमता और शुरू होती- पाण्डवों की कथा। भाव-भंगिमाओं और संवादों की ऐसी सहज अदायगी कि देखते-देखते धृतराष्ट्र, भीम, अर्जुन, गांधारी, द्रौपदी और महाभारत के नायक कृष्ण के चरित्र सजीव हो उठते। छत्तीसगढ़ की चौक-चौपाल से लेकर देश-दुनिया के सैकड़ों मंचों पर पण्डवानी का परचम लहरा चुकी पद्मभूषण तीजनबाई का फ़न किसी से अछूता नहीं रहा।
तीजनबाई को पण्डवानी करते देखना सदा एक ऐतिहासिक अनुभव होता। उनकी हुँकार भरती वाणी और देह में जब महाभारत के पन्ने खुलते हैं तो यह किसी आश्चर्य लोक से कम नहीं होता। ज़ाहिर है यह कुव्वत तीजनबाई ने लम्बे संघर्ष के बाद अर्जित की। उन्हें संतोष रहा कि गाँव की चौहद्दी तक सिमटी पण्डवानी समंदर पार के देशों तक अपनी महक बिखेर चुकी है। पॉपुलरिटी के दौर में उनकी परम्परा का रंग भी फीका नहीं पड़ा बल्कि सिर चढ़कर हल्ला बोलता रहा । लेकिन उन्हें चिन्ता रही अपनी विरासत की। उन्हें रितु वर्मा, मीना साहू और शान्तिबाई चेलक से काफ़ी उम्मीदें रहीं। वे चाहती थीं, जल्दी ही इस देश को एक और तीजनबाई मिल जाए। उनकी प्रस्तुति से आकर्षित होकर कई शहरी लड़कियाँ पण्डवानी सीखने को लालायित होती रहीं लेकिन लोक कलाओं को समझना आसान है पर आचरण और संस्कारों में ढालना सरल नहीं है। तीजनबाई कहती – इसके लिए मिट्टी में रचना-बसना पड़ता है।
हालाँकि तीजनबाई इस बात से ख़ुश थी कि आज छत्तीसगढ़ में पण्डवानी गाने वालों की तादाद बढ़ रही है। छोटी-बड़ी कई मण्डलियाँ हैं पर सबको जल्दी ही मंच, पैसा और शोहरत चाहिए। दो सौ से भी ज़्यादा कलाकारों को उन्होंने पण्डवानी का प्रशिक्षण दिया, लेकिन तीजनबाई के अनुसार यह बताना कठिन है कि आगे चलकर ये क्या गुल खिलाते हैं!
तेरह बरस की किशोर उम्र में तीजनबाई ने पहली बार पण्डवानी के सुर साधे और दुर्ग ज़िले के चनखुरी गाँव में पहला कार्यक्रम दिया। बहुत याद आता है वह समय। कहती – ‘पूरा देश घूम लिया। कई बार विदेशों की सैर कर ली। पण्डवानी रौशन हो गई। मेरे लिए इससे बड़ी ख़ुशी हो नहीं सकती।’ संघर्ष के दिनों को वे भूलती नहीं – ‘‘जब तक जली रोटी का अहसास नहीं होगा, भोजन में मिठास नहीं आयेगी।’ अब तो पण्डवानी सबकी ज़ुबान पर है। ईश्वर से विनती है कि यह स्थिति बनी रहे”।

पद्मश्री,पद्मभूषण, पद्मविभूषण और डी.लिट. की उपाधियों से विभूषित तीजनबाई ने एक बार मज़ेदार वाक़या सुनाया। उन्हें कुछ साल पहले बिलासपुर के विश्वविद्यालय से फ़ोन आया कि डॉक्टरेट की उपाधि दी जा रही है तो वे चिन्ता में पड़ गयीं। कहा-मुझे डॉक्टर नहीं बनना है। मैं लोगों का कैसे इलाज करूँगी और फ़ोन काट दिया। फिर लोगों ने समझाया कि यह इलाज करने वाली डॉक्टरेट नहीं है सिर्फ़ नाम के आगे लगाने वाली डॉक्टरेट है।

पण्डवानी, तीजन और छत्तीसगढ़ कुछ इस तरह एकमेक रहे कि दुनिया में ऐसी दूसरी मिसाल मिलना मुश्किल है। महाभारत के आख्यान को लोक शैली में शिद्दत से कहने का कला-कौशल छत्तीसगढ़ की रंगभूमि के पास ही है। ठेठ छत्तीसगढ़ी वेश-भूषा में तम्बूरा हाथ में लिए जब मंच पर तीजनबाई अपनी संगीत मण्डली के साथ उतरती तो दर्शकों पर सम्मोहन छा जाता । महाभारत में मौजूद तमाम भाव-रस तीजन के रोम-रोम में जीवन्त हो उठते। कथानक की सहज, कुटिल और वक्रोक्ति से भरे संवादों का प्रवाह मंच से सीधे दर्शक के मानस से टकराता है। यह शब्द का अतिक्रमण कर महाभारत की कथा एक चरित्र अभिनय से एकाकार होकर वैश्विक अनुभव में बदल जाती है। लोक में गहरी पैठ रखने वाले प्रतिज्ञा, वीरता, त्याग, सेवा जैसे मूल्य अगर इंसानी दुनिया का भरोसा हैं तो महाभारत की कलह-कथा के सार में यही तो सन्देश है। पण्डवानी इस अर्थ में मनोरंजन और विचार का बख़ूबी ताना-बाना तैयार करती है।

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