मिलिए प्रदेश की पहली महिला पत्रकार अलकनंदा साने से विशेष बातचीत : स्वरांगी साने


सफेद बाल, साधारण सूती साड़ी और हिंदी भाषा में बात, यदि आप किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं और सोचते हैं कि अरे यह तो बहुत ही साधारण महिला है तो जरा रुकिएगा। हम आपकी मुलाकात ऐसी महिला से कराने जा रहे हैं जिन्होंने सन् 1974 से पत्रकारिता शुरू की। जी हाँ सन् 1974 से जब आम तौर पर महिलाएँ घर के बाहर कदम भी नहीं रखती थीं इस महिला ने पहली बार न केवल कदम रखा बल्कि हिंदी पत्रकारिता की और मध्य प्रदेश की पहली हिंदी महिला पत्रकार के रूप में अपना नाम रोशन किया आज हम जानेंगे हमारी जर्नी में उनकी यात्रा के बारे में। आइए मिलते हैं अलकनंदा साने जी से जो बड़ी पत्रकार हैं, कवयित्री हैं, अनुवादक हैं, कला समीक्षक हैं। ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी अलकनंदा जी हमारे बीच में हैं। हम आपका पूरे दिल से स्वागत करते हैं।
स्वरांगी साने- नमस्कार जी मैं आपसे पहली बात तो यही जानना चाहूँगी कि पत्रकारिता के क्षेत्र में आप कैसे आईं
और वह क्या था कि जो आप पहली महिला पत्रकार बन गईं।
अलकनंदा जी – पत्रकारिता मुझे विरासत में मिली। मेरे पिताजी थे रघुनाथ शिरढोणकर उन्होंने मध्यप्रदेश में मराठी पत्रकारिता की शुरुआत की उसके बाद मेरे भाई, वे भी पत्रकार थे और इस तरह से मैंने तो कोई प्रयास नहीं किए उसके लिए, लेकिन एक तरह से वह मेरे अंदर से निकल कर आया है ऐसा मैं मानती हूँ और मुझे अवसर भी अच्छा मिला कि माणिकचंद जी वाजपेई जैसे संपादक के साथ में मुझे सबसे पहले काम करने का अवसर मिला जिन्हें पत्रकारिता के जगत में उनको मामा जी के नाम से ज्यादा जाना जाता था।
स्वरांगी साने- पर मैं यह जानना चाहती हूँ कि यह पहली बार कुछ करना क्या यह उस वक्त आपको एहसास था कि आप पहली बार कर रही हैं या वो अपने आप इतिहास बन गया।
अलकनंदा जी- हमारे परिवार की भी बहुत बड़ी परंपरा है। जैसे मेरे पिताजी ने मराठी भाषा में पत्रकारिता की।
इससे बहुत सारे लोगों को गलतफहमी हो जाती है। वे अपनी भाषा में पत्रकारिता करने वाले, उत्तर भारत में मराठी पत्रकारिता करने वाले पहले पत्रकार थे। इसी तरह से मेरे भाई हैं जो दृष्टिहीन थे और वह मध्य प्रदेश के पहले आर्थो सर्जन थे। यह परंपरा भी आगे बढ़ती जा रही है कि एक मेरी भांजी संगीता अग्निहोत्री है, तबलावादक है वह मध्य प्रदेश की पहली महिला है, जिसने तबला बजाना शुरू किया। इसी तरह मेरी बेटी भी। उसकी कविताएँ वेबदुनिया पर पहली बार आईं, यह वह दौर था जब यूट्यूब पर कविताएँ नहीं आती थीं। उसकी कविताएँ यूट्यूब के इतिहास में किसी अखबारी चैनल पर सबसे पहले आईं। इस तरह से मुझे लगता है कि ये कहानी बनना तो हमें ईश्वर की देन है या एक विरासत है। जैसा कि मैंने पहले कहा और इस वजह से तो मुझे इसलिए कुछ अलग महसूस नहीं हुआ क्योंकि मेरे आस-पास पहली बार कुछ करने वाले बहुत सारे लोग थे। बेटा भी कम उम्र में संपादक के स्तर तक पहुँच गया तो उसके लिए भी यह डीएनए में मिली विरासत की तरह रहा।
स्वरांगी साने- तो क्या हम ऐसा कह सकते हैं कि आप तो बहुत ही सौभाग्यशाली रहीं कि आपको एक ऐसा परिवार
मिला या आपका बचपन ऐसे परिवार में बीता कि जहाँ पर आपको कुछ भी अजूबे जैसा नहीं था।
अलकनंदा जी- वरदान ही कहना चाहिए क्योंकि जब मैंने पत्रकारिता शुरू की तब एक तो हमारे समय में इतना
कुछ सोचा नहीं जाता था कि पढ़ने -लिखने के बाद में क्या करना है। करियर नाम का शब्द तो बहुत बाद में आया
है। मुझे वरदान की तरह लगता है उससे जो है बहुत ज्यादा सीखने को मिला ये मैं जरूर करूंगी।
स्वरांगी – पर मैं यह जानना चाह रही हूं कि जहाँ तक हम जानते हैं या आप ज्यादा सही बता पाएँगी कि आपके
पिताजी की मृत्यु बहुत जल्दी हो गई और शायद बाकी भाई बहनों का बड़े राजसी अंदाज में जीवन बीता था
लेकिन आपको वो सुख नहीं मिला। दुःखों के जो पहाड़ आते गए उनको आप सुख में कैसे बदलती चली गईं।
अलकनंदा जी- मुझे लगता है कि हर व्यक्ति को यह देन मिलती है कि जो भी अभाव में रहता है उसे संघर्ष करने
का एकमात्र मार्ग मिलता है और बहुत सारे लोगों को जो इस तरह से अभावों से निकलते हैं तो मुझे ऐसा नहीं
लगता कि मैंने कोई बहुत अद्भुत कार्य किया है। दरअसल मेरी परिस्थितियाँ भी वैसी थीं पढ़ने-लिखने का
वातावरण था पत्रकारिता का वातावरण था। घर में भले ही पिताजी की मृत्यु के बाद आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी
नहीं रही थी लेकिन मेरी माँ ने यह कहा कि पढ़ना लिखना है, भले ही तुम दो रोटी कम खाना लेकिन पढ़ना
लिखना। तो इस तरह से वातावरण मिला जिससे प्रगति हुई ऐसा मैं मानती हूँ। मैंने अपनी ओर से कुछ सायास
किया है ऐसा मुझे नहीं लगता जो कुछ आता गया वो अपने आप होता गया यही मानती हूँ।
स्वरांगी साने- पत्रकारिता की चुनौतियों के बारे में बताइए। आज आप इतने सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं
तो आपको उसे समय की चुनौतियां और आज की चुनौतियां में क्या अंतर लगता है। आज तो बहुत महिलाएँ,
बहुत लड़कियाँ इस क्षेत्र में आ गई हैं।
अलकनंदा जी- मुझे लगता है कि चुनौतियाँ हमेशा बनी रहती हैं। मुझे ये लगता है कि मेरे समय ये चुनौतियाँ थीं,
कि जैसे हमारे समय मोबाइल पर कोई जानकारी नहीं मिलती थी या कंप्यूटर नहीं थे। उस तरह से कोई माहौल
नहीं था लेकिन मैं जब मुझे याद है कि मैं रिपोर्टिंग करके रात को 11:00 बजे लौटती थी और उस जमाने में, जब
किसी पुरुष का या किसी युवक का भी 11 बजे सड़क पर निकलना अच्छा नहीं समझा जाता था उस समय मैं
रात11:00 बजे लौटती थी। जो अच्छा नहीं समझा जाता था तो मतलब वो पान की दुकानों पर या शराब के अड्डों
में उस समय बहुत कम लोग खड़े रहते थे। और जो वहाँ खड़े रहते थे उनको अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था
लेकिन उन पुरुषों की ओर से मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई। कितनी बार ऐसा लगा मेरे क्षेत्र में आने के बाद में कि उनका मुझे सहारा है। कुछ भी हो जाएगा तो ये मुझे जानते हैं कि मैं क्या करती हूँ, मैं कहां से लौट कर आ रही हूँ मुझे कभी भी किसी भी तरह के बुरे व्यवहार का सामना नहीं करना पड़ा और अब मुझे यह लगता है कि आज जो
लड़कियाँ घर से बाहर निकलती हैं, तमाम पुरुष भी बाहर निकलते हैं और रात भर हमारे यहां पर जो है आवाजाही चलती रहती है सड़क पर, मुश्किल से एक दो घंटे के लिए कहीं कोई रुकता होगा तब भी इस माहौल में लड़कियाँ
असुरक्षित हैं, जबकि मैं उसे माहौल में भी अपने आपको सुरक्षित समझती थी ये मुझे लगता है कि यह बहुत चुनौती है आज की। हमारे समय यह चुनौती नहीं थी दूसरी चुनौतियाँ थीं। काम को लेकर लेकिन इस तरह हमें
कहीं पर भी नहीं लगता था। आज सुरक्षा कम होती जा रही है।
स्वरांगी साने- ऐसा लग रहा है कि आज के दौर में संवेदनशीलता खत्म होती जा रही है और आपने बहुत संवेदनशील होते हुए दृष्टिहीनों के क्षेत्र में भी काम किया है कुछ ऐसे अलग पहलू हैं आपके जीवन के जो बहुत कम लोगों को पता है तो आपको क्या लगता है कि संवेदनशील होने से आप कविता लिखती हैं या संवेदनशील होने से आप समाज के उस तबके से जुड़ीं जो अभी भी उपेक्षित समझा जा सकता है।
अलकनंदा जी- नहीं निश्चित रूप से लिखने के लिए तो संवेदनशील हर लेखक होता है। साहित्यकार है तो वो
संवेदनशील पहले है, क्योंकि उसको जो आसपास का माहौल है या कोई घटना होती है उसे लेकर उसके मन में
विचार आते हैं, वो उसकी संवेदनशीलता की वजह से ही आते हैं। संवेदनशीलता एक पहली चीज है, उसका आधार
है उसके बाद ही कोई भी व्यक्ति लिखना शुरू करता है चाहे वो पत्रकार बनता है या लेखक बनता है। जब तक
उसके अंदर संवेदनशीलता नहीं होगी वो उन सारी चीजों को एक अलग नज़रिये से देख नहीं सकता। दृष्टिकोण की
बात करूँ तो जैसे कि मैंने कहा कि मेरे चचेरे भाई जो दृष्टिहीन थे डॉक्टर म.वि. शिरढोणकर, और मध्य प्रदेश के
पहले फिजियोथैरेपिस्ट थे तो घर में ही एक तरह से माहौल था कि हमने उनका संघर्ष देखा था तो उनके साथ मैं
काम करने लगी और फिर वो मुझे अच्छा भी लगने लगा और उन दृष्टिहीनों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला
जैसा कि आपने कहा कि मेरा बचपन अभावों में बीता लेकिन मुझे लगा कि जो अभाव उनको हैं या जो दुःख वे झेल
रहे हैं हमारा तो उनके सामने कुछ नहीं।
स्वरांगी साने- और आपको उसमें सम्मान भी मिला। आप कुछ उन सम्मानों के बारे में बताइए।
अलकनंदा जी- जो विकलांग सेवा के लिए मुझे राज्य स्तर पर सम्मानित किया गया था उसके पीछे की एक
छोटी सी घटना ये थी कि सन् 1990 में विश्व विकलांग वर्ष घोषित हुआ था और उसमें यूनेस्को ने उनकी अपनी
नीति बनाई थी जो भी दृष्टिहीन बच्चे हैं वे सामान्य बच्चों के साथ में पढ़ाई लिखाई करेंगे ताकि उनको किसी भी
तरह की असमानता का सामना नहीं करना पड़ेगा तो मैं दृष्टिहीन विद्यालय में काम करती थी। वहाँ पर जनसंपर्क अधिकारी थी तो उन 10वीं पास पाँच बच्चियों को सरकारी विद्यालय में या किसी भी विद्यालय में उन्हें प्रवेश दिलवाना था लेकिन जहाँ भी मैं जाती थी मना करते कि नहीं हम इनको नहीं पढ़ा सकते हैं तो फिर मैं सीधे भोपाल चली गई थी और भोपाल में मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह थे। उस समय मैं उनके केबिन के बाहर सुबह 10 से शाम 5:00 बजे तक बैठी रही उनके जो सचिव थे उन्होंने मुझे मिलने नहीं दिया मुख्यमंत्री से क्योंकि उन्हें लगा कि मैं तो बेकार की बात लेकर आ गई हूँ। शायद उनको ऐसा लगा होगा। वे मुझे टालते रहे कि अभी मीटिंग में हैं, अभी ऐसा हो रहा है, वैसा हो रहा है, जब 5 बज गए, मैं पूरे 7 घंटे में वहाँ बैठी रही तो मैं सीधे अर्जुन सिंह के कमरे में चली गई दरवाजा खोल कर। वे भी दंग रह गए। उस समय तो मैं एक तरह से मान लीजिए की मैं लड़की थी मतलब बिल्कुल नई-नवेली कह सकते हैं और जब मैंने उनको अपनी बात बताई तो उन्होंने कहा पहले आप बैठिए उन्होंने मुझे बिठवाया और एक पत्र टाइप करवा कर मुझे दिया कि अब आप किसी भी स्कूल में ले जाइए और यदि कोई मना करता है तो आप मुझे इस नंबर पर सूचित कीजिए। तो उसके बाद से उन लड़कियों के प्रवेश का सिलसिला शुरू हो गया और वो कुछ आसान भी हो गया उनके लिए उसे आधार पर मुझे राज्य स्तरीय सम्मान दिया गया।
स्वरांगी साने- अरे वह यह बहुत आपने अच्छी बात बताई थी आपको अपने समाज में बदलाव लाने के लिए कोशिश की। तो आप खुद को कहाँ देखती हैं, आप खुद को एक कवयित्री के रूप में अपने को पहचानती हैं यह अपने आप पत्रकार के रूप में ज्यादा करीब आप खुद को पाती है या आप किस रूप में अपने आपको सबसे ज्यादा करीब पाती हैं।
अलकनंदा जी- अब वैसे देखा जाए तो व्यावहारिक रूप से तो मेरी पत्रकारिता मतलब समाप्त हो गई है।
पत्रकारिता तो मैं अब कर नहीं रही हूँ लेकिन वो जो अंश हैं दिमाग में वही मुझे शायद कविता की और ले जाते हैं
वही जो एक संवेदनशीलता है वो मैं लेखक के रूप में या कवि के रूप में मैं उसको प्रस्तुत करती हूँ और कवयित्री के रूप में ही अब मैं अपने आप अपने आपको अधिक उसके नजदीक पाती हूँ क्योंकि वो मेरे लिए सबसे आसान है चाहे रात को 2:00 बजे भी कोई विचार मन में आता है तो मैं कागज पेन लेकर या मोबाइल पर वो लिख सकती हूँ बाकी किसी क्षेत्र में इस तरह से कम करना अब मेरे लिए संभव नहीं लगता है।
स्वरांगी साने- आपने आंदोलन किया जैसे आपने पत्रकारिया में आंदोलन किया। आप भाषा को लेकर भी बहुत
ज्यादा सजग रहती हैं तो आपको क्या लगता है कि वो पत्रकारिता की भूमिका ही आप हर बार निभाती रहती हैं जब
आप कविताओं में भी आप कहती हैं भाषा की बात करती हैं या मराठी भाषा को लेकर आपके क्या विचार हैं
अलकनंदा जी- तो अब मैं पत्रकारिता के रूप में तो हूँ ही नहीं क्योंकि आजकल जो अपने आपको बहुत बड़ा
पत्रकार कहते हैं उन्होंने सबसे ज्यादा भाषा का नुकसान किया है। उनके लिखे में अंग्रेजी बहुत ज्यादा है और वे
क्या इंग्लिश बोलने लगे तो कोई सवाल ही नहीं उठाता। पत्रकारिता के रूप में लेकिन भाषा के रूप में मेरा आग्रह
इसलिए है और पहले मराठी की बात करूँ तो मराठी क्योंकि मेरी मातृभाषा है तो निश्चित रूप से मुझे उसके प्रति
अधिक लगाव है और वो हमारे घरों में बोली जाने वाली भाषा है और मराठी साहित्य भी काफी समृद्ध है। तो भाषा
के प्रति आग्रह होने का कारण तो यह है कि हमें भाषा आती है हमें उसे नहीं भूलना चाहिए दूसरी बात यह है कि एक
भाषा के साथ में सिर्फ लिखावट या सिर्फ लिपि नहीं चलती है उसके साथ में उसे समाज में चलने वाले रीति रिवाज
परंपराएँ, संस्कृति ये सारी बातें जुड़ी हैं। अब मैं छोटा-सा उदाहरण देना चाहूँगी। एक किशोर लड़की है। उसकी मां
का एक मित्र है और उस मित्र को वह अंकल कहती है वह काका या मामा नहीं कहती, जबकि हमारे बचपन में हम हमारे भाई को भैया कहते थे तो हमारे बच्चे जो है उनको मामा-काका कहते थे लेकिन अब वह नहीं रहा। मुझे नहीं
लगता कि अंकल शब्द में वो सब आता है जो काका या मामा में आता है। फिर मैं जब उन लोगों की बातचीत सुनती
हूँ तो मुझे अनुभव होता है कि उनमें बिल्कुल ऐसा लगता है कि कोई दूरी है। ऐसा लगता है कि बहुत बराबरी के
हैं वो दोनों, जबकि कम से कम मुझे लगता है की 20-25 साल का अंतर होगा, लेकिन वो सीमाएँ टूट गई हैं और ये
सारी चीज जो भाषा से है क्योंकि वह दबाव नहीं है क्योंकि वो अंकल हैं, अंकल कुछ नहीं कहेंगे, अंकल डाटेंगे नहीं,
अंकल से हम कुछ भी कह सकते हैं तो ये जो सीमा है वो टूटती जा रही है।
स्वरांगी साने- मतलब सीमाओं का होना आप महत्वपूर्ण मानती हैं और आप बहुत अच्छा प्रबंधन करती हैं आप
कुछ समूह भी चलाती हैं जिनका प्रबंधन आप अच्छे से करती हैं। मैं बार-बार आपको पत्रकार से इसलिए जोड रही
हूँ क्योंकि मूल जो है आपका पत्रकार होना ही तो है आजकल तो पत्रकारिता में प्रबंधन पत्रकारिता ज्यादा आ गई है
तो प्रबंधन और प्रबंध पत्रिका इन दोनों के बीच के अंतर को किस तरह से करेंगे।
अलकनंदा जी- प्रबंधन पत्रकारिता में तो होना चाहिए लेकिन आप उसकी पत्रकारिता नहीं करें यह मुझे लगता है।
मतलब उसमें प्रबंधन नहीं होना चाहिए संपादक के पास प्रबंधन होना चाहिए लेकिन जो बाकी चीजें देखना है जैसे विज्ञापन कौन देख रहा है और उसका वितरण कौन देख रहा है वो जो एक प्रबंध है वो आजकल हावी हो गया
है। वह दबाव या उनका जो है हस्तक्षेप भी पैदा नहीं होना चाहिए। इससे अखबार में जो सामग्री छपना है उसका
स्तर निश्चित रूप से गिरता है। अब वह चाहे कोई पत्रिका हो या हम प्रबंधक को हमारे सामाजिक माध्यमों की ओर
ले आए कि फेसबुक पर समूह चलते हैं या व्हाट्सऐप पर समूह चलते हैं वहाँ पर भी प्रबंधन होता है तो वो प्रबंधन
यदि कोई काबिल व्यक्ति कर रहा है या उसे क्षेत्र से संबंधित व्यक्ति कर रहा है तब तो उसका प्रभाव पड़ता है और
उसका फर्क भी पड़ता है लेकिन यदि जिनके पास में पैसा है और जो दूसरों को वेतन दे रहे हैं तो उनकी अपेक्षाएँ
कुछ अलग हो जाती हैं।
स्वरांगी साने – आप अभी कह रही हैं कि पैसे का दौर है पर यदि आपकी बात से समझें तो पैसे का जोर अभी बढ़
गया है लेकिन हम पुराने समय में देखें तो हम स्वर्ण युग किसे कहते हैं गुप्तकाल को हम स्वर्ण युग कहते हैं।
तब कलाएं बहुत विस्तार पाती थीं उसकी एक वजह यह भी थी कि उस समय का समाज जो था आर्थिक रूप से
संपन्न था तो संपन्नता तो अभी भी आईं है फिर कलाएँ कैसे पीछे गई हैं और कल समीक्षा के रूप में जो आपकी
ख्याति है रही है तो आज वैसे कला समीक्षक कहाँ हैं।
अलकनंदा जी -अब ये दो जो सवाल आपने पूछे हैं। दोनों बिल्कुल अलग-अलग हैं। उस समय कलाकारों को
राज्याश्रय मिलता था। राज्याश्रय आज भी मिल रहा है लेकिन राज्याश्रय उसे मिल रहा है जो चापलूसी कर रहा है
जो आगे बढ़ने के लिए अपनी ओर से कुछ प्रयत्न कर रहा है मतलब उसमें काबिलियत है या नहीं ये कोई नहीं देख
रहा है। जो शीर्ष पर बैठा है उस व्यक्ति की नजरों में उसका क्या अस्तित्व है इसे देखकर आश्रय मिलता है। तो उस
समय की सिर्फ आर्थिक समृद्धि से तुलना करने में कोई अर्थ नहीं, बल्कि आज तो आर्थिक समृद्धि मतलब पहुँच है।हर व्यक्ति का समूह है। इस समूह के लोग हैं, वो अलग हैं, उस समूह के लोग अलग हैं। समूह के लोग अपने
व्यक्ति को आगे बढ़ाने के कोशिश करते हैं और उसमें जो सफल हो गया वो बड़ा कहलाता है। कला की आराधना
कितने लोग कर रहे हैं। कला का रियाज कितने लोग कर रहे हैं और कला के लिए वातावरण कितना मिल रहा है।
लोगों को कितनी प्रतिक्रिया मिल रही है, उस पर सबका ध्यान है। लाइक मिल रहा है, बहुत लाइक
मिल रहा है, तो अच्छा है। आप मेरे परिचित हैं तो यदि किसी और को आपने लाइक किया तो मैं लाइक कर
दूँगी मैं पढ़ूँगी भी नहीं पूरा। ये भी एक तरह का वातावरण बन रहा है जो बहुत खराब जो नया लिख रहे हैं उनके लिए
तो बहुत ज्यादा घातक हैं क्योंकि उनको कोई बताने वाला ही नहीं है कि वो खराब लिख रहे हैं। पहले वो बताने वाले
थे वो खुद भी अध्ययन किया करते थे। पहले जो कला समीक्षक होते थे वो पहले उसके निष्णात होते थे अब कला
समीक्षक भी रिपोर्टर्स हैं जो बाकी की खबरें करते है। जो मैंने अभी कहा कि माध्यम का जो जोर है वैसा तब नहीं
था। हमारे समय जब मैं शासकीय संगीत के कार्यक्रमों के समीक्षा करने जाती थी तो मैं स्वयं बैठती थी उनसे
पूछती थी कि आप क्या गाएँगे कैसे गाएँगे और हम बैठकर पूरा सुनते थे उन्होंने कौन सी तान ली, किस स्वर पर
उनका ठहराव था उन्होंने किस तरह से राग का विस्तार किया वो सब लिखते थे क्योंकि मैं संगीत जानती थी
इसीलिए मुझे वैसे कार्यक्रमों में भेजा जाता था। लेकिन अब क्या है कि आप दफ्तर में बैठे, अपने कार्यालय में बैठे हैं
मोबाइल में पूछ लिया क्या गाया, अब राग यमन है या नहीं, यमन बिना सुने लिख दिया। कुछ भी लिख दिया,
छाप दिया। कोई आपत्ति नहीं ले रहा कि आपने गलत छापा है। बिलास खानी तोड़ी और बिलास खानी में
कोई अंतर नहीं है। राग विभास और बिलासखानी में अंतर है यह पता जिसे पता नहीं, वह लिख रहा है
तो मुझे नहीं लगता कि वह समीक्षा कर रहा है। ये सिर्फ समाचार हैं। और वह समाचार भी उनके आते हैं
जिनके विज्ञापन छपे हैं। यह इसमें भी जो मैं प्रबंधन की बात कर रही थी तो यह जो है अर्थ का प्रबंधन ज्यादा चला
है इसमें साहित्य या कला या पत्रकारिता एक तरह से जो मिशन हुआ करती थी वो तो निश्चित रूप से खत्म हो
गया।
स्वरांगी साने- आपने इसी किस तरह से मिशन के रूप में तब्दील किया है आप आपके जीवन को यदि हम कहें एक
संक्षेप में हम लें मैं आपके सामने अंग्रेजी बोलने में इसलिए डर रही हूं क्योंकि आपका भाषा को लेकर आग्रह और
कई बार आपका भाषा को लेकर दुराग्रह भी रहता है तो समराइज करते हुए आज की युवा पीढ़ी ज्यादा सही समझ
पाएगी की समराइज मतलब आप अपने आपको किस तरह से पाती हैं।
अलकनंदा जी- जो लोग मुझे जानते हैं कि मैं बहुत कड़क अनुशासन वाली महिला हूँ। मुझे लगता है कि
अनुशासन से हमें बहुत कुछ हासिल होता है। अब आपने जब मेरे जीवन की आरंभिक चुनौतियों का उल्लेख किया
तो बाद में भी आईं। और सभी के जीवन में आती हैं मतलब कभी हम ऊँचाई पर होते हैं कभी हम नीचे गिर जाते हैं
लेकिन उन सबमें जब हम अनुशासन में रहते हैं तो हम उसमें से बाहर भी आते हैं ये मुझे सबसे ज्यादा अपने लिए
महत्वपूर्ण मानती हूँ चाहे वह समय का अनुशासन हो, व्यक्ति के साथ में बात करने का अनुशासन हो।
अनुशासन पूरे जीवन में फैला हुआ है और हम इस अनुशासन के रास्ते पर यदि चलते हैं तो हमारी उन्नति से हमें
कोई नहीं रोक सकता।
