दिन विशेष विमर्श में शैलजा सक्सेना की कविताएं
संवेदनशीलता कनाडा की शैलजा सक्सेना जी कविताओं की विशेषता हैं। उनकी कविताएँ उन विषयों पर हैं, जो खुद अपने बारे में नहीं कहते कि मुझे इस तरह से देखो। बड़ी तरल, बड़ी सरल सी ये कविताएँ अंदर तक भिगोती हैं। वे भारत सरकार की ओर से फीजी में वर्ष 2022 में विश्व हिंदी सम्मान से सम्मानित हैं। भारत के कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में उनकी रचनाएँ हैं। अनेक पत्रिकाओं तथा वेब पत्रिकाओं में उनकी समीक्षाएँ, साहित्यिक निबंध, कविताएँ, हाइकु और कहानियाँ प्रकाशित हैं। नाट्य निर्देशन एवं अभिनय से भी वे जुड़ी हैं। वे हिंदी राइटर्स गिल्ड कनाडा की सह– संस्थापिका एवं निदेशिक हैं। वैश्विक हिंदी परिवार की वेबसाइट की वे संपादक भी हैं। – स्वरांगी साने

कविता क्या दे सकती है!
किताब के सीने पर हाथ रखकर
वह बैठी रही चुप
मानों धड़कन सुन रही हो उन शब्दों की
जो हर पन्ने में,
बोल रहे थे, गा रहे थे, खिलखिला रहे थे
उसे चिढ़ा रहे थे
वह भीग रही थी
शब्दों के भीतर झरते झरनों में,
आनंद की रुलाई से,
वह भीग रही थी
मन के उठते ज्वार में,
अपने ही आँखों के समुद्र की लहरों से,
वह भीग रही थी
और देख रही थी
अपना भीगना
कविता उसे क्या दे सकती हैं,
आज उसने फिर जाना,
अपने आप को फिर पहचाना,
कविता के शब्दों में!!
इंद्रधनुष
रिंगा रिंगा रोज़ेज़……
पॉकेट फुल ऑफ़ पोज़ीज़….
बच्चियाँ खेल रहीं थीं,
एक-दूसरे का हाथ पकड़े
भूरे, पीले, गोरे, काले रंगों की बच्चियाँ खेल रहीं थीं!
धरती पर इंद्रधनुष रचतीं,
अपनी सफ़ेद हथेलियों में
एक दूसरे के रंगों को थामें, वे मगन थीं!
उन्हें मतलब नहीं था
ज़मीन के नीचे दबे इतिहास से!
दिमाग़ों में ठुकी नफ़रत की कीलों से
जो दिखती नहीं,
पर हाथ लगाने पर चुभती हैं…!
वे पिछली सदियों की हवाओं से
बाहर थीं!
वे मुक्त थीं अभी,
पुरखों के ख़ून में बहे पक्षपात से!
वे हवा से होड़ लेती घूम रही थीं!
आसमान की तरफ़ ताकती हँस रही थीं!
घास पर चमकीली आँखें लिये,
एक साथ गिरती थीं,
जैसे गिर रहे हों फूल
विविधवर्णी..
वे अभी तितली, पेड़, फूल थीं!
वे अभी हवा, पानी, आसमान, मिट्टी थीं!
वे इस पल भविष्य रचती ब्रह्मा थीं!

एक पुस्तक प्रेमी होने के नाते मैं समझ सकता हूँ कि किताबें केवल पढ़ने की वस्तु नहीं होतीं, वे हमारे भीतर छिपी संवेदनाओं को जगाने वाली जीवंत साथी होती हैं। कवयित्री ने “किताब के सीने पर हाथ रखकर” और “शब्दों की धड़कन सुनने” जैसे बिंबों के माध्यम से पाठक और साहित्य के गहरे संवाद को अत्यंत सुंदरता से व्यक्त किया है।
शैलजा सक्सेना जी की कविताओं में शब्दों का चयन अद्भुत है, पाठक यह सोचता रह जाता है कि यह यथार्थ है या हो सकता है क्या ? फिर स्वयं ही विश्वास होने लगता है कि कवयित्री ने इन भावनाओं को संभव कर दिखाया है ।
ग़ज़ब की कविताएँ शैलजा..!
कितनी सच्ची..!
कितनी गहरी..!!
शब्द शब्द
अथाह अर्थ ,अथाह संभावनाएं समेटे..!!!