स्वतंत्र भारत: स्मृति, संघर्ष और संकल्प (15 अगस्त विशेषांक)

रचना सूची

15 अगस्त का अर्थ : संपादकीय – (डॉ. शैलजा सक्सेना)

रवींद्रनाथ ठाकुर-अनुवाद- (आशा बर्मन): मेरे सोने का बंगाल

रवींद्रनाथ ठाकुर: अनुवाद (आशा बर्मन) बांग्लार माटी, बांग्लार जल

सुब्रमण्यम भारती, तमिल कविता का अनुवाद: वंदेमातरम कहें हम

अनिल जोशी, दिल्ली: मैं भी चुप हूँ, तुम भी चुप हो, फिर यह कहानी कौन कहेगा

अलका सिन्हा, दिल्ली: अटूट प्रेम

अलका सिन्हा, दिल्ली: राजपथ से

रामा तक्षक, नीदरलैंड्स: पत्थर इसी इमारत का

आशा बर्मन, कैनेडा: प्रवासी की पीड़ा

कपिल कुमार, बेल्जियम: गज़ल

शिखा रस्तोगी, थाईलैंड: अमर वीरों को नमन

सांद्रा लुटावन, सूरीनाम: एकता की मशाल, आज़ादी का उजाला

अंजना वर्मा, बैंगलूरू: वतन जो आज़ाद है

राकेश मिश्रा, कैनेडा: जन्मभूमि

आशा मोर, ट्रिनिडाड: हम प्रवासी

नर्मदा कुमारी, भारत: भारत की विकास यात्रा

मनोज मोक्षेंद्र, भारत : ग़ज़ल

स्वरांगी साने, महाराष्ट्र : जनतंत्र

वीर सावरकर- मराठी कविता का अनुवाद (सुनील देवधर): जयोस्तुते

डॉ. सुनील देवधर, पुणे: जय भारत, जय-जय महान

डॉ. सुनील देवधर, पुणे: जय भारत नूतन नवीन

मैथिलीशरण गुप्त: स्वराज्य की अभिलाषा (भारत-भारती)

रामधारी सिंह ’दिनकर’: ध्वज वंदना

हरिवंश राय बच्चन: आज से आज़ाद अपना देश फिर से

शिवमंगल सिंह ’सुमन’: आज देश की मिट्टी बोल उठी है

मनोज कुमार श्रीवास्तव: पाँच छोटी कविताएँ (तिरंगा, शृद्धानत, कारगिल विजय, अजातशत्रु, मानव)

डॉ. शिप्रा मिश्रा, भारत: हे मातृभूमि तेरा अभिनंदन

पूनम चंद्रा ’मनु’, कैनेडा: सावन से कह दो

पूनम चंद्रा ’मनु’, कैनेडा: ये वीरों की धरती है

दिव्या माथुर, यू के: रंग दे बसंती चोला

दिव्या माथुर, यू के: शब्दकोष

डॉ. आरती ‘लोकेश’ की कविताएँ

निमेश आज़ाद, भारत: आज़ादी की आग

प्रीति अग्रवाल, कैनेडा: प्रवासी मन

डॉ. नरेन्द्र ग्रोवर, कैनेडा: लोग चाहते हैं

कुसुम धीमान ’कलिका’ भारत: मेरा देश महान

जन्मभूमि : राकेश मिश्र

संगीता चौबे ’पंखुड़ी’, कुवैत: देश तुझॆ अभिनंदन

सुबोध श्रीवास्तव, कानपुर: देशभक्ति के दोहे

अलका अगरवाल, पुणे: स्वतंत्रता दिवस

सरस दरबारी, कैनेडा: शहीदों के जब ताबूत में अवशेष आते हैं

आराधना झा श्रीवास्तव, सिंगापुर

लतिका ’नीर’, पुणे: आज़ादी

अविनाश कुमार, पुणे: स्वतंत्रता दिवस

प्रीति साहू, पुणे: आज़ाद हैं हम

जूही गुप्ते, पुणे: उनहत्तर पल

जूही गुप्ते, पुणे: इस तिरंगे में कुछ बात तो है

सौरभ शर्मा, मध्यप्रदेश: प्रसन्नता के दीपक

फिर आया स्वतंत्रता दिवस : मीरा ठाकुर

डॉ. नरेन्द्र ग्रोवर: क्या तुम सहमत हो?

अवतार सिंह संधू ’पाश’, पंजाबी कविता का अनुवाद : भारत

डॉ. शैलजा सक्सेना, कैनेडा: मैं कहीं भी रहूँ, तेरे पास हूँ

संपादकीय- १५ अगस्त का अर्थ

भारत की स्वतंत्रता का दिन है १५ अगस्त! हम सब इस तक पहुँचने के भीषण संघर्ष और बलिदान के इतिहास को जानते हैं अत: इसे दोहराने की आवश्यकता नहीं। प्रश्न यह है कि हमारी पीढ़ी और हमारे बाद की आने वाली पीढ़ियाँ इस स्वतंत्रता को किस तरह समझती हैं, उनके लिए स्वतंत्रता का क्या अर्थ है? क्या स्वतंत्रता का अर्थ केवल बोलने की, देश की आलोचना की स्वतंत्रता है या इस स्वतंत्रता में देश के प्रति कोई उत्तरदायित्व भी जुड़े हैं? ये सोचने की बात है। अधिकार सभी को प्रिय होते हैं और कर्तव्य करने में सभी को श्रम लगता है, आज जब जीवन सुविधाओं से घिरा हुआ है तब इसे और अधिक सुविधाजनक बनाने के लिए हम लगातार अधिकारों की बात करते चले जा रहे हैं और कर्तव्य की बात असुविधाजनक हो चुकी है।
हमारे पूर्वजों ने आज के हमारे अधिकारों को जुटाने के लिए, अपने अधिकारों के बारे में सोचे बिना जो कठोर कर्तव्य किए, जो जवान देश की सीमा की सुरक्षा के लिए कठिन परिस्थितियों में कर्तव्य कर रहे हैं, उनके बारे में सोचने के लिए यह 15 अगस्त हमें विवश करता है।
जिस प्रकार का उपनिवेशवाद उनके समय में था आज उस प्रकार का उपनिवेशवाद नहीं है किंतु सुविधाओं के आदी हम आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर होकर एक नए प्रकार के आर्थिक उपनिवेशवाद का निर्माण कर चुके हैं। ’आत्मनिर्भर’ भारत इस उपनिवेशवाद का उत्तर हो सकता है लेकिन तब जब हम अपने संसाधनों और अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक बनें। मुक्तिबोध की ये पंक्तियाँ मुझॆ याद आती हैं:
“लिया बहुत-बहुत अधिक, दिया बहुत-बहुत कम,
मर गया देश अरे, जीवित रह गए तुम?”
देश के मरने का अर्थ, देशवासियों का अपने कर्तव्यों से मुँह मोड़ना ही है। देश हमें अच्छी सुविधाएँ दे पर हम उनका अपव्यय करेंगे, देश हमें स्वच्छ सड़कें दे पर हम अपना कूड़ा सड़कों पर फेकेंगे, देश हमें अच्छी गाड़ियाँ दे लेकिन हम उनकी सीट के फ़ोम तक नौंच डालेंगे, बसों को पत्थरों से तोड़ेंगे, चौड़ी सड़कों पर अनधिकृत कब्ज़ा करके उन्हें छोटा करेंगे, जहाँ चाहें पोस्टर चिपकायेंगे, निर्माण के बाद रेत और मलबे की ढ़ेरियाँ सड़कों पर छोड़ेंगे आदि-आदि.. ऐसी एक लंबी सूची है जिसपर ध्यान से देखने और सोचने की आवश्यकता है कि हम किस प्रकार का देश अपने और अपने बच्चों के लिए गढ़ रहे हैं। टैक्सचोरी, घूसखोरी, बेईमानी आदि जब तक हमारे लिए सामान्य रहेंगे, हम देश की उन्नति की बात कैसे कर सकते हैं? देश प्रेम के कसीदे काढ़ना, झंड़ा फ़हरा कर लड्डू बाँट लेना मात्र देशप्रेम नहीं है।
अपने आचरण को हमें उदाहरण बना कर, देश को अपना घर मान कर, उस पर गर्व करते हुए हर दिन, हर समय सही, नीतियुक्त, नियमयुक्त, आचरण करते हुए देश की उन्नति के लिए काम करना होगा तभी हम सही रूप से देश की स्वतंत्रता का पर्व मनाने के अधिकारी होंगे।
अनेक लोग ऐसे उदाहरण बनें हैं जिन्होंने अनेक क्षेत्रों में नए तरीकों, (जैसे कूड़े से प्लास्टिक टाइल बनाना, गोबर से शवदाह के लिए ईंटे बनाना, कृषि के लिए नए तरीके खोजना, आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा का प्रसार करना आदि) से देश की उन्नति के लिए अपना जीवन लगा दिया। हमें इन तरीकों का प्रयोग करना चाहिए और सोचना चाहिए कि और क्या किया जा सकता है। अपने बच्चों के सामने उदाहरण बनिये, अपने समुदाय के सामने उदाहरण बनिये। देश आपका है, आपको पाल और सींच रहा है, आपको भी अपने देशवासी होने का धर्म पालन करना है। हर काम सरकार नहीं कर सकती और सरकार भी तो लोगों से बनती है अत: हर व्यक्ति अपने देश की सुरक्षा, स्वच्छता, सुन्दरता और समृद्धि के प्रति जब सावधान होगा तो शुद्ध हवा में लहराता हमारा तिरंगा भी मुस्कुरा देगा।
प्रवासी भारतीयों के लिए १५ अगस्त एक अलग तरह का उत्तरदायित्व देता है कि वे जिस भी देश में रहते हैं, वहाँ भारत की छवि को सुदृढ़ बनाने के लिए काम करें। आज भारत की उन्नति पर विश्व की आँखें टिकी हैं और इसे रोकने के लिए कई हाथ भी उठे हुए हैं। हमें ध्यान देना होगा कि हमारा व्यवहार वैश्विक सोच को भारत के प्रति मैत्रीपूर्ण बनाए और जहाँ देश विरोधी बातें हों, वहाँ हमें तन कर खड़ा भी होना होगा। हम भारत के बाहर, भारत की आँखॆं और कान हैं, हमारी सजगता और सतर्कता ही हमारे देश-प्रेम का प्रमाण हो सकती है।
इस काव्य ’विशेषांक’ में हमने देश-विदेश के लेखकों की कविताएँ लगाई हैं, हिंदी के अतिरिक्त कुछ अन्य भारतीय भाषाओं से भी रचनाएँ ली हैं और कुछ हमारे वरिष्ठ और प्रतिष्ठित रचनाकार भी यहाँ हमें पुकारते हुए दिखेंगे। इस अंक के प्रारंभ के बारह कवि हिंदी के साथ बांग्ला, उड़िया, तमिल और पंजाबी के वे प्रतिष्ठित कवि हैं जिन्होंने अपनी लेखनी से भारत के सोये देशप्रेम को जगाया था। उनकी लेखनी के सुनहरे, आग-तपे शब्दों ने गुलाम भारत को राह दिखाई थी और आज भी वे उसी प्रकार हमारे हृदय को झकझोरते हैं। १५ अगस्त पर उन्हें दोबारा पढ़ना आवश्यक है।
उसके बाद आप भारत और विदेश के लेखकों को पढ़ेंगे। इस अंक का उद्देश्य है कि हम अनेक वर्षों से लिख रहे, लोकप्रिय कवियों के साथ नए लेखकों के देशप्रेम को भी स्थान दें इसलिए आपको जाने-पहचाने नामों के साथ अनेक नए नाम भी देखने को मिलेंगे। आशा है आप सभी को अपना समय और स्नेह देंगे।
हम सभी लेखकों का हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं और इस विशेषांक को संभव बनाने वाली संपादन टीम के विद्वानों; स्वारंगी साने, डॉ.मनोज ’मोक्षेंद्र’, डॉ.मनोज ’अबोध’, मनोज श्रीवास्तव ’अनाम’, प्रखर शर्मा जी का धन्यवाद करते हैं। नेट पर इस विशेषांक को लाने के लिए डॉ. मनीष कुमार और अजय शर्मा जी का आभार है।
आशा है हम इस अंक में व्यक्त भावनाओं को क्रियान्वन के स्तर पर लायेंगे। आदरणीय जयशंकर प्रसाद जी लिखते हैं:
“ज्ञान दूर, कुछ क्रिया भिन्न है, इच्छा क्यों पूरी हो मन की,
एक दूसरे से न मिल सके, यही विडंबना है जीवन की”
लेखक ने ज्ञान तो दिया पर जब तक इस इच्छा और ज्ञान को क्रिया का आधार नहीं मिलेगा तब तक विडंबना बनी रहेगी। आइये, प्रण लें कि हम इच्छा, ज्ञान और क्रिया को संयुक्त करके अपने देश को समृद्ध और सुरक्षित बनायेंगे।
सादर
शैलजा
डॉ. शैलजा सक्सेना, कैनेडा
shailjasaksena@gmail.com
संपादक
editorvaishvikhindi@gmail.com

আমার সোনার বাংলা
শ্রী রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর
আমার সোনার বাংলা, আমি তোমায় ভালোবাসি।


চিরদিন তোমার আকাশ, তোমার বাতাস,
আমার প্রাণে বাজায় বাঁশি॥
ও মা, ফাগুনে তোর আমের বনে ঘ্রাণে পাগল করে,
মরি হায়, হায় রে—
ও মা, অঘ্রানে তোর ভরা ক্ষেতে
আমি কী দেখেছি মধুর হাসি॥

श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता
(अनुवादक-आशा बर्मन)

मेरे सोने का बंगाल


मेरे सोने का बंगाल
मैं तुमसे प्यार करता हूँ।

तुम्हारा आकाश, तुम्हारी हवा,
मेरे प्राणों में हमेशा बांसुरी बजाती है॥

ओ माँ,
फागुन में तेरे आम के बाग की खुशबू
पागल कर देती है, हाय री हाय —
ओ माँ,
अगहन में तेरे भरे खेतों में
मैंने कितनी मधुर हंसी देखी है॥

বাংলার মাটি, বাংলার *জল— রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর

বাংলার মাটি, বাংলার জল,
বাংলার বায়ু, বাংলার ফল—
পুণ্য হউক, পুণ্য হউক,
পুণ্য হউক হে ভগবান॥
বাংলার ঘর, বাংলার হাট,
বাংলার বন, বাংলার মাঠ—
পূর্ণ হউক, পূর্ণ হউক,
পূর্ণ হউক হে ভগবান॥
বাঙালির পণ, বাঙালির আশা,
বাঙালির কাজ, বাঙালির ভাষা—
সত্য হউক, সত্য হউক,
সত্য হউক হে ভগবান॥
বাঙালির প্রাণ, বাঙালির মন,
বাঙালির ঘরে যত ভাই বোন—
এক হউক, এক হউক,
এক হউক হে ভগবান॥

रवीन्द्रनाथ ठाकुर की राष्ट्रप्रेम से लेबरेज़ एक मार्मिक कविता

(अनुवादक : आशा बर्मन)

बंगाल की माटी, बंगाल का जल

बंगाल की मिट्टी, बंगाल का जल,
बंगाल की हवा, बंगाल के फल —
पवित्र हों, पवित्र हों,
पवित्र हों, हे भगवन॥
बंगाल के घर, बंगाल के बाज़ार,
बंगाल के वन, बंगाल के खेत —
पूर्ण हों, पूर्ण हों, पूर्ण हों
हे भगवन॥
बंगाली का संकल्प, बंगाली की आशा,
बंगाली का काम, बंगाली की भाषा —
सत्य हों, सत्य हों, सत्य हों
हे भगवन॥
बंगाली का प्राण, बंगाली का मन,
बंगाली के घर के सभी भाई-बहन
एक हों, एक हों, एक हों
हे भगवन॥

वंदे मातरम् कहें हम : सुब्रमण्यम भारती

सुब्रमण्यम भारती की तमिल कविता “वंदे मातरम् एन्बोम्” का हिंदी रूपांतरण

(कृत्रिम मेधा की मदद से)

वंदे मातरम् कहेंगे हम,
अपनी मातृभूमि को प्रणाम करेंगे हम।
वंदे मातरम्॥
जाति और धर्म का भेद नहीं देखेंगे।
यदि किसी ने इस महान देश में जन्म लिया है,
तो वह वेदज्ञ ब्राह्मण हो
या किसी दूसरे कुल का हो,
दोनों एक ही हैं।
वंदे मातरम्॥
जिन्हें समाज में सबसे हीन समझा गया,
क्या वे भी हमारे साथ
इसी देश में रहने वाले नहीं हैं?
क्या वे चीनी हो जाएँगे?
क्या वे दूसरे देशों के लोगों की तरह
हमारा अनेक प्रकार से अहित करेंगे?
वंदे मातरम्॥
यदि यहाँ हजार जातियाँ हैं,
तो इसमें क्या न्याय है कि
विदेशी आकर हमारे बीच प्रवेश करें?
एक ही माँ के गर्भ से जन्मे लोग
आपस में लड़ते भी रहें,
तो क्या वे भाई नहीं होते?
वंदे मातरम्॥
यदि हम एकजुट रहेंगे,
तभी हमारा जीवन सुरक्षित रहेगा।
यदि हमारे बीच से एकता चली गई,
तो हम सभी का पतन होगा।
हमें इस सत्य को भलीभाँति समझना चाहिए।
यह ज्ञान प्राप्त हो जाने के बाद
हमें और क्या चाहिए?
वंदे मातरम्॥
हमारी जो भी दशा होगी,
वह हम सभी के लिए समान होगी।
हम तीस करोड़ लोग साथ-साथ जिएँगे;
और यदि हमारा पतन हुआ,
तो पूरे तीस करोड़ लोगों का
एक साथ पतन होगा।
वंदे मातरम्॥
बीते दिनों में हमने
इस तुच्छ दासता को स्वीकार किया था।
अब उन बीते हुए दिनों को स्मरण कर
हमारा मन लज्जित हो।
अपने सारे कष्ट और अपमान समाप्त करने के लिए
इस दासता की अवस्था को
घृणा के साथ दूर फेंक दें।
वंदे मातरम्॥
वंदे मातरम् कहेंगे हम,
अपनी मातृभूमि को प्रणाम करेंगे हम।

मैं भी चुप हूँ, तुम भी चुप हो, फिर यह कहानी कौन कहेगा। : अनिल जोशी

लहू सी भीगी अगर नहीं तो , यह है जवानी कौन कहेगा
मैं भी चुप हूँ तुम भी चुप हो , फिर यह कहानी कौन कहेगा।
ऐ आजादी तेरा स्वागत है, गूँज रही है अब शहनाई
रंगा बसंती चोला हमने ,तब जाकर आजादी पाई
किया शक्ति का आराधन , वे सुभाष अलबेले थे
अमर हो गए वे सेनानी , जो मृत्यु से खेले थे
आजादी की अमर कथा में, बलिदानों का कोण रहेगा
मैं भी चुप हूँ , तुम भी चुप हो , फिर यह कहानी कौन कहेगा ।
जलियाँवाला बाग की मिट्टी ,क्यों पावन कहलाती है
क्यों शहीद कहलाए भगतसिंह , और पूजा की जाती है
बिस्मिल कहते शीश , हथेली पर रखने का यह प्रण है ,
देशभक्त वह कहलाएगा , बलिदानी जो क्षण क्षण है
फिर जीतेगा अजुर्न या फिर , दुर्योधन और द्रोण रहेगा
मैं भी चुप हूँ , तुम भी चुप हो , फिर यह कहानी कौन कहेगा ।
जाति धर्म से बड़ा राष्ट्र है , कंकर -कंकर शंकर है
आज़ादी का मूल्य खून है ,यह सुभाष का ही स्वर है
कहो इसे न इंडिया हाउस , आज़ादी का यह घर है
ग़दर हमारे स्वाभिमान की ,अद्भुत एक धरोहर है
राज फ़िरंगी दुनिया भर में , और यह भारत गौण रहेगा ।
मैं भी चुप हूँ , तुम भी चुप हो , फिर यह कहानी कौन कहेगा ।

वह जेलों में , लाठी खाकर , आज़ादी चिल्लाता था
किस कंधे पर अंडमान में कोल्हू जोता जाता था
हँस -हँस कर भी किन फूलों ने ,फांसी को ही चूमा था
बलिदानों की बलिवेदी पर ,कौन दीवाना झूमा था
पीडा , फाँसी और शहादत, और यह भारत मौन रहेगा।

लहु से भीगी अगर नहीं तो , फिर ये जवानी कौन कहेगा
मै भी चुप हूँ तुम भी चुप हो ,फिर यह कहानी कौन कहेगा।

अलका सिन्हा की कविताएं:

(1) अटूट प्रेम

सच है!
मैंने किया है तुमसे अटूट प्रेम
बेइंतहा मुहब्बत,
मोल ली है दुनिया भर से लड़ाई,
पर, जुनून ही न हुआ तो मुहब्बत कैसी,
सच है, मैंने दीवानावार चाहा है तुम्हें,

हालांकि, मैं नहीं हुई शामिल कभी
तुम्हारे नाम पर निकाले जलसे-जुलूसों में,
नहीं लगाए–
तुम्हारे नाम के नारे
पर, टस से मस नहीं हुई अपने उसूलों से

सो, मुश्किल कर ली है मैंने अपनी जिंदगी
मगर अकेले दीए-सी,
जलती रही मेरे प्यार की लौ
यकीन करो, ईमानदारी भी ज़रूरी है
सच्ची मुहब्बत के लिए

(2) विश्व बाजार में

एक ग्राहक से अधिक है मेरी हैसियत
इसलिए कभी देखा नहीं
चाइना बाज़ार की तरफ,
यकीनन कठिन होगा
होगा महंगा
पर, मुझे भाया स्वदेशी सामान
स्वदेशी भाव

(3) अवसर की तलाश में

पलायन करने के बदले
बे-आवाज़, चलती विदेशी मशीनों की
तेज रफ़्तार से कहीं ज़्यादा
लुभाता रहा मुझे
लयबद्ध चलता लकड़ी का चरखा
और खड्डी की आवाज
स्वाभिमान से भरता रहा
हाथ से काता खद्दर,
डायमंड कट वाले कांच के बरतनों से
ज़्यादा भाते रहे
भट्ठी में पकाए मिट्टी के कुल्हड़…
पैट्रोल की धौंस को दरकिनार कर
साइकिल से तय कर लेना
लंबी दूरियां भी होता है
इज़हारे मुहब्बत,
लिखती हूं मैं भी
देसी जूते की ठाठ पर
स्वावलंबन के गीत
और हां,
अपनी भाषा को प्यार करना
बोलना अपनी मादरे ज़ुबान भी
भरती है मुझे
मुहब्बत के अहसास से

राजपथ से

राजपथ से सलामी मंच की ओर
जब सधे कदमों से गुजरती हैं
सशस्त्र सेनाओं की टुकड़ियाँ,
हवा में लहराती तलवार, हिलाते हुए हाथ
गर्जना करते हुए अपने दल का आदर्श वाक्य
तब दहल उठता है सड़क का कलेजा…
मारक मिसाइलों से लैस
तोप और टैंक
तलहट से वार करते सिंधु-शस्त्रास्त्र
या, फिर जांबाज़ परिंदे की तरह
दसों दिशाओं को ललकारता
गुजरता है जब
विनाश फॉर्मेशन को रचता युद्धक विमान
तब थर्रा उठता है आसमान।
अलग-अलग पंखुड़ियों-सी खुलने लगती हैं
जब अलग-अलग बोलियों और भाषाओं में मुखरित
आंचलिक झाँकियां
तब धीरे-धीरे उभरने लगता है संपूर्ण भारत,
अलग होते हुए भी
सबके साथ हाथ हिलाता
कदम से कदम मिलाता
राष्ट्र-भक्ति की धुन पर थिरकता, गाता
एकनिष्ठ भारत
गौरवान्वित होती हूं मैं
भव्य परेड की साक्षी बनती
राजपथ पर कदमताल करती
मार्चिंग दस्ते के बीच

पत्थर इसी इमारत का। : रचनाकार : रामा तक्षक

नाम से परे मैं कौन हूँ ?
इस प्रश्न के गर्भ से इस रचना का जन्म हुआ।
प्रत्येक भारतवंशी को समर्पित रचना।

मैं राजदूत हूँ भारत का,
मैं पत्थर इसी इमारत का।
मैं पूरे प्रण से प्रतिष्ठित हूँ,
मैं इसी भाव से पोषित हूँ।
मैं राजदूत हूँ भारत का,
मैं हिस्सा इसी इमारत का। 1

मैं देश नहीं मिटने दूँगा,
मैं मर मिटने को सदा सजग,
मेरा है एक ये प्रण अडिग,
रहे अस्तित्व नित्य पार्थ का।
मैं राजदूत हूँ भारत का,
मैं पत्थर इसी इमारत का। 2

हे देश तुम्हारे आँगन में,
मैं भी एक छोटा सा पत्ता हूंँ,
मैं एक पवन का झोंका हूँ,
मैं हूँ हिस्सा भी आंँधी का।
मैं राजदूत हूँ भारत का,
मैं पत्थर इसी इमारत का।3

पौ माह की सर्द सुबह, हूँ
तपते ताप की जेठ दुपहरी,
मैं रात चाँदनी पूर्णिमा की,
मैं सघन अँधेरा मावस का।
मैं राजदूत हूँ भारत का,
मैं पत्थर इसी इमारत का। 4.

योग ज्ञान मेरा गौरव है,
यही सौन्दर्य मानवता का।
इसी से यह जग सौरभ है,
मैं शांति-दूत ध्यान-धरा का।
मैं राजदूत हूँ भारत का,
मैं पत्थर इसी इमारत का।5

महासागर का गाम्भीर्य सलिल,
मैं पिघलन हूँ उष्ण ताप का,
मैं ठोस बड़ा हिमखण्डों सा,
हिम-श्रृंखला के आंचल का।
मैं राजदूत हूँ भारत का,
मैं पत्थर इसी इमारत का।6

वेद, उपनिषद, जीवन रूपांतरण,
रामायण पाठ है अद्भुत गाथा,
महाभारत की रणभूमि में,
गीता की कोख का जन्मा,
मैं जग जीवन, आहट सन्नाटा।
मैं राजदूत हूँ भारत का,
मैं पत्थर इसी इमारत का।7

भाव उमंगों का थिर तल हूँ,
मैं चैतन्य पथिक जग जीवन का,
हूँ उठता ज्वार, मैं हुँकारों का,
सहज झिलमिल राग तरंगों का,
मैं राजदूत हूँ भारत का,
मैं पत्थर इसी इमारत का।8

प्रवासी की पीड़ा : आशा बर्मन

एक प्रश्न बादल-सा बोझिल, मन में मेरे घिर-घिर आया
प्रवास के इस जीवन में, क्या खोया, क्या मैंने पाया ?

त्योहारों पर माता का, प्यार-भरा निमंत्रण पाना
और विभिन्न बहानों से, साजन का अपने पास बुलाना।

ऐसे मधुर प्रसंगों से, स्वयं को मैंने वंचित पाया
प्रवास के इस जीवन में, क्या खोया, क्या मैंने पाया ?

हास-परिहास देवरों के, नन्दों की मीठी फटकार
भाई-बहनों के उपालम्भ, जिनसे बरबस था झरता प्यार।

ऐसी मीठी बातों का, अवसर जीवन में कम आया
प्रवास के इस जीवन में, क्या खोया, क्या मैंने पाया?

अपने बच्चों ने, सच पूछो, नानी-दादी का प्यार न जाना
बरसों पर मिले यदि तो सबने उनको पाहुन ही माना।

सब संग मिलकर रह पाने से, उनमें जो पड़ते संस्कार
वे भला पनपते कैसे, उन्हें न मिला ठोस आधार।

ऐसी-ऐसी कितनी बातें, कहाँ तक गिनाऊँ मैं
क्या खोया, इस विषय का ओर-छोर न पाऊँ मैं।

सहसा पत्रों से जब जाना, दूर बसे प्रियजन बीमार
उनसे मिलने को व्याकुल मन, दूरी बनी विकट दीवार।

और कभी प्रियजन को खोया चिरनिद्रा में, हो लाचार
ऐसे अवसर पर प्रवास को मिला, सौ-सौ बार धिक्कार।

मन के घाव समय से भरते, पर ये न कभी भर पायेंगे
इस खोने की गहराई को, क्या शब्द व्यक्त कर पायेंगे?

यदि जन्म-जन्मान्तर सच है तो हे प्रभु! यह वर देना
देना जन्म उसी धरती पर, शाप प्रवास का हर लेना।

ग़ज़ल : कपिल कुमार

क़लम जब भी उठे हर बार लिखो
वतन की शान में कुछ यार लिखो

लुटाकर जान जो निकले वतन पर
शहीदों के सभी उपकार लिखो

भगत,आज़ाद,बिस्मिलऔर शिवाजी
शहादत के अलमबरदार लिखो

लिखो जब वीर सावरकर ओ’ तात्या
तो मंगलपाण्डे सा दिलदार लिखो

कपिल गाफ़िल नहीं हिन्दोस्ताँ अब
वतन बेदार है , बेदार लिखो

अमर वीरों को नमन : शिखा रस्तोगी

अमर बलिदानियों को समर्पित, जिनके त्याग, साहस और समर्पण ने भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया।

अमर वीरों को शत-शत नमन…..

जिनके बलिदान से स्वतंत्रता का सूर्योदय हुआ,
उन वीरों की स्मृति में राष्ट्र का शीश सदा झुका रहेगा।

माटी के कण-कण में जिनकी
वीरगाथा आज भी जीवित है,
जिनके त्याग की पुण्य-ज्योति से
भारत-भूमि आलोकित है।

किसी ने हँसकर प्राण गँवाए,
किसी ने सीने पर गोली खाई,
किसी ने कारा की पीड़ा सहकर
स्वाधीनता की अलख जगाई।

फाँसी के फंदे को चूम लिया,
पर मातृभूमि का मान न जाने दिया,
जीवन की अंतिम साँस तक
भारत माँ को प्रणाम किया।

उनके रक्त से सींची धरती,
उनके सपनों का हिंदुस्तान,
उनके त्याग और तप से ही
ऊँचा है भारत का सम्मान।

जब-जब नभ में ध्वज लहराता,
जब-जब गूँजता राष्ट्रगान,
तब-तब उनकी पुण्य स्मृति से
गर्वित होता हिंदुस्तान।

वे चले गए, पर छोड़ गए
स्वाभिमान की अमर कहानी,
उनके साहस की गाथा है
भारत की हर विजय निशानी।

आज स्वतंत्र गगन के नीचे
हम जो जीवन जीते हैं,
उनके त्याग की छाया में
अपने सपनों को सच करते हैं।

आओ, उनके स्वप्न सँवारें,
अपने कर्मों से मान बढ़ाएँ,
सत्य, प्रेम, करुणा, एकता से
भारत को सुंदरतम बनाएँ।

नहीं व्यर्थ उनका बलिदान हो,
नहीं व्यर्थ उनका अरमान,
जब तक भारत की धड़कन में
जीवित है उनका बलिदान।

जिन वीरों ने जीवन देकर
आजादी का दीप जलाया,
उन अमर बलिदानी वीरों को
कोटि-कोटि नमन हमारा।

नमन उन वीरों के साहस को,
नमन उनके बलिदान को,
नमन मातृभूमि की खातिर
मिट जाने वाले प्राणों को।

अमर रहें वे वीर हमारे,
अमर रहे उनका बलिदान,
उनकी पावन स्मृति से जगमग
रहे सदा यह हिंदुस्तान।

एकता की मशाल : सांद्रा लुटावन

गुलामी की रात थी गहरी
हर दिल में एक दर्द था,
अपनी ही धरती पर फिर भी
जीना कितना मुश्किल था।

डर के साये छाए थे
आँखों में आँसू थे
लेकिन दिल के कोने में
आज़ादी के सपने थे।

फिर, जागी एक नई चेतना
दिल में हिम्मत आई,
एकता की ज्योति जल उठी
नई सुबह मुस्काई।

न जाति देखी, न धर्म देखा
न देखा कोई भेदभाव,
सबने मिलकर हाथ बढ़ाया
तोड़ दिए सब भेद।

किसी ने सत्य का मार्ग चुना
किसी ने बलिदान दिया,
किसी ने अपना सुख त्यागा
देश को अपना मान दिया।

गाँव-गाँव से आवाज़ उठी
शहर-शहर गूँजा नारा–
हम सब एक हैं, हम सब भारतवासी
भारत देश है सबसे प्यारा।

एकता बनी हमारी शक्ति
साहस बना हथियार,
मिल-जुलकर जब कदम बढ़े,
तो टूट गया अत्याचार।

लंबी लड़ाई, अनेक बलिदान
फिर आया वह दिन महान,
गुलामी की ज़ंजीरें टूटीं
स्वतंत्र हुआ हिंदुस्तान।

आज़ादी के यह पावन दिन
हम सब मिलकर याद करें,
वीरों के बलिदानों को
श्रद्धा से हम नमन करें!

आज भी एकता को अपनाकर
देश को आगे बढ़ाएँ,
प्रेम, शांति और भाईचारे से
भारत को सुंदर बनाएँ।

एकता में ही शक्ति है
एकता में सम्मान,
मिलकर हम सब आगे बढ़ें,
यही है भारत की पहचान।

वतन जो आज़ाद है : अंजना वर्मा

तुम सुरक्षित रह सको
इसके लिए वे लड़ रहे हैं
चैन से तुम जी सको
इसके लिए वे मर रहे हैं…

भूल से भी तुम कभी
उन सैनिकों की बात कर लो,
देश को मुस्कान जो
देते हैं उनको याद कर लो, b
रात-दिन जो मौत को
देते चुनौती लड़ रहे हैं
चैन से तुम जी सको
इसके लिए वे मर रहे हैं…

सिसकती थी संगिनी पर
चल दिए घर छोड़ कर जो,
दूर अपने जिगर के
टुकड़ों से भी मुँह मोड़कर जो,
प्यार रिश्तों का वतन की
सरहदों में भर रहे हैं,
चैन से तुम जी सको
इसके लिए वे मर रहे हैं…

नहीं है उनके लिए यह
देश बस माटी का टुकड़ा,
यह करोड़ों जनों की माँ
का दमकता सरल मुखड़ा,
छातियों पर झेल गोली
बंदगी वे कर रहे हैं,
चैन से तुम जी सको
इसके लिए वे मर रहे हैं

मौत सीने से लगाकर
जो किया करते सवेरा,
खून सीमा पर जलाकर
दूर करते हैं अँधेरा,
देश की रक्षा सिपाही
जान देकर कर रहे हैं,
चैन से तुम जी सको
इसके लिए वे मर रहे हैं

वतन जो आज़ाद है तो
है उन्हीं बलिदानियों से,
सर उठाकर जी रहे हो
उन्हीं की कुर्बानियों से,
सरहदों पर होम अपनी
ज़िंदगी का कर रहे हैं,
चैन से तुम जी सको
इसके लिए वे मर रहे हैं

जन्मभूमि : राकेश मिश्र

आँगन छूटा तो वह पूरा नहीं छूटा
उसका थोड़ा-सा हिस्सा मेरे साथ चला आया
गाँव भी आया, नगर भी
और विद्यालय के वे मित्र भी
जिनसे बरसों बात नहीं हुई

दूर देश में घर बनाते समय पता चला—
स्मृतियाँ सामान से हल्की होती हैं
फिर भी सबसे अधिक जगह घेरती हैं

जब देश छोड़कर आया था—
यह नहीं ठीक से समझा
कि जन्मभूमि केवल जन्म लेने की जगह नहीं होती
वह असंख्य लोगों के श्रम
स्मृतियों और सपनों से समय के साथ निर्मित होती है
उसमें मेरे पुरखे भी हैं
जिनके नाम अब धीरे-धीरे स्मृति में धुँधले पड़ गए हैं
लेकिन जिनका श्रम
आज भी उस मिट्टी में जीवित है

उन्होंने अपने हिस्से का समय जिया
कठिन दिन देखे
जो कुछ बचा सके
उसे सँभालकर अगली पीढ़ी को सौंप दिया
शायद इसी तरह एक पीढ़ी
दूसरी पीढ़ी के लिए जगह बनाती है
जैसे कोई वृक्ष अपने बाद
आने वाली छाया के लिए बीज छोड़ जाता है

दूर बैठकर अपने देश को याद करता हूँ
उसके साथ बहुत से अनदेखे लोग भी
स्मरण हो आते हैं
वे, जो सीमाओं पर डटे रहे
वे भी, जिनके नाम कहीं दर्ज नहीं हैं
लेकिन जिनके कारण
बहुत कुछ सुरक्षित बचा रहा–
भारत केवल नक्शे पर खींची गई रेखाओं से नहीं
बल्कि अनगिनत लोगों की छोटी-बड़ी निष्ठाओं
त्याग और समर्पण से बना है।

कृतज्ञ मन से
मैं अपने पूर्वजों
उन सभी ज्ञात-अज्ञात लोगों को
जिन्होंने इस धरती को सँभाला
उस मातृभूमि को नमन करता हूँ
जिसने मुझे जन्म दिया
मेरी कामना है कि—
यह भूमि आने वाले समय में भी
नदियों की तरह अविरल बहती रहे
खेतों की तरह हरी-भरी रहे
और लोगों के मन में घर की तरह बसी रहे!

दूर देश में बैठा मैं उसे प्रणाम करता हूँ।

हम प्रवासी : आशा मोर

ऐसा पन्द्रह अगस्त सालों बाद आया है,
जो साथ अपने राम मंदिर की सौग़ात लाया है।
लाल क़िले पर झंडा जब फहराया जाता है,
प्रवासी भारतीयों का भी सिर फ़ख़्र से ऊँचा उठ जाता है।
प्रथम स्वतंत्रता सैनानी वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई,
मंगल, सुभाष चंद्र बोस, आज़ाद ,भगत सिंह जैसे भाई–
वीरगति को प्राप्त हुए जो देश को स्वतंत्र कराने में,
श्रद्धासुमन में अर्पित करती हूँ, उन सब के सम्मान में।
देश के विकास में सभी का है–महान योगदान,
सभी कृतज्ञ भारतवासी करते–उनका यशोगान,
मोदी जी आज के दौर के सेनानी कर रहे हैं काम महान।
अब हमारे देश की नयी आन-बान-शान और पहचान।
मंगल ग्रह पर पहुँच गए हम, काम बहुत है बाक़ी,
बदल गया कश्मीर का नज़ारा, वह है शान हमारी।
समय था जब अंग्रेज़ी शासन का सूरज न डूबा करता था,
सारे संसार में अब भारतीय संस्कृति का बोलबाला है।
विश्वभर में अब योग दिवस मनाया जाता है,
टाइम स्क्वायर पर भी श्रीराम मंदिर की छवि लगायी जाती है।
स्वाभिमानी, हिंदुस्तानी—
देशभक्ति, सच्ची निष्ठा से भरपूर,
हम प्रवासी, दूर भारत वर्ष से,
हम प्रवासी, दूर भारत वर्ष से
पर, भारतवर्ष हमारे अंदर है,
भारत वर्ष हमारे अंदर है।

भारत की विकास-यात्रा : नर्मदा कुमारी

अंधेरे से प्रकाश की ओर तक
सूखे से सिंचाई के छोर तक
जमीन से आसमां की ओर तक
भारत की एक नई खोज तक
ऐसी रही भारत की विकास-यात्रा……………

अंग्रेजों का भारत से जाना
फिर से उठकर चल दिखाना
सभी राज्यों को एक लेकर चलना
नया संविधान और नई सरकार बनाना
एकजुट से कर्तव्य-पथ तक
मिट्टी से सेनानियों के रक्त तक
ऐसी रही भारत की विकास-यात्रा……………

अशिक्षा के अंधकार से शिक्षा देना
महिलाओं को चार दीवारी से बाहर लाना
भारत में लोकतंत्र का बिगुल बजाना
अर्थव्यवस्था को शून्य से ऊपर उठाना
अशिक्षा से डिजिटल इंडिया तक
ऐसी रही भारत की विकास-यात्रा………………

निर्भर भारत को आत्मनिर्भर बनाना
हर नागरिक को लोकतंत्र में भागीदार बनाना
अंतरिक्ष में अपनी पहचान खोजना
अनेकता से एकता के सूत्र में बाँधना
अर्थव्यवस्था में छठा स्थान पाने तक
दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनाने तक
अंतरिक्ष की उड़ान में मंगलयान तक
स्वतंत्रता सेनानियों से एक बड़ी सैन्य-शक्ति तक
ऐसी रही भारत की विकास-यात्रा………………

अंधकार के तम से ज्योति तक
सोच की जड़ता से चेतनता तक
भूगोल से खगोल की ऊँचाइयों तक
मंद गति से बढ़ती त्वरित गति तक
पतझड़ से नए बसंत की ओर तक
ऐसी रही भारत की विकास-यात्रा…………………

परावलंबी भारत के स्वावलंबी होने तक
प्राचीनता से आधुनिकता के नए आयाम तक
अस्थिरता से स्थिरता के पड़ाव तक
प्रतिगमन से प्रगति की उड़ान तक
सामान्य से विशेषता की पहचान तक
ऐसी रही भारत की विकास-यात्रा…………

ये मेरा नहीं हमारा भारत है
इस विकास-यात्रा के सभी साझीदार है
इसी विजय-यात्रा को आगे बढ़ाना है
एकजुटता और मेहनत के सूत्र से प्रगति का परचम लहराना है
तभी बढ़ेगी भारत की विकास-यात्रा…………………

ग़ज़ल : मनोज मोक्षेंद्र

कहीं है कर्ब का घेरा कहीं है धुंध का पहरा
निग़ाहें जिस तरफ़ जाएं, दिखे हर दिल में है सहरा

कहीं शकुनी का चौपड़ है, कहीं रावण की है लंका
लगी है दाँव पर कृष्णा, कि सीता भी बनी मुहरा

लो फिर से आँधियों पर चढ़ के आया, बर्बरा बाबर
पनाहों के लिए बेसब्र छिपता हर यहाँ चेहरा

वो भोले थे जो दौड़े ले पताका सत्य का हर सूं
पताका बख़्तियारों का शिखर पर था मग़र फहरा

दु:शासन हर गली में घूमता बेख़ौफ़-सा यारों
कलपती द्रौपदी दर-दर कन्हइया हो गया बहरा

घटाओं में पड़ा सूखा, नदी रहने लगी प्यासी
भगीरथ भोग में डूबा, तआज़्ज़ुब है बडा गहरा

ये तैमूरों की तलवारें लटकती सबकी गरदन पर
जटायू! उठ खड़ा हो जा, तूँ अपने पंख को लहरा

ये हमको था यकीं, उद्धार होगा अहिल्याओं का
मिथक वो ज़ादुई स्पर्श का भी बेअसर ठहरा

हिरण्यकश्यप की साज़िश से नहीं उबरेगा ये प्रहलाद
इसी विश्वास से भाई! हमारा दिल गया मेहरा

पेड़ ये है हिंद का, हम पत्तियाँ औ’ डाल हैं
क्यूं नहीं लगता हमें, हम अम्न की सुर-ताल हैं

इश्तेहारों में मुकम्मल नाम जो अपना लिखा
लिखने वालों ने पहन ली भेड़ियों की खाल हैं

हमसे जो करवा रहा है तिकड़मी उन्माद है
ख़ूँ बहाना कुफ़्र कर, ये दोगली-सी चाल हैं

जिनके कदमों के निशां पर चल रहे दिन-रात हैं
वो अंधेरों में बिछाए सब फ़रेबी जाल हैं

उन किताबों को जला दो कर्मवीरों हिंद के
जिनमें लिक्खा हम सभी ज़ेहाद के बेताल हैं

जनतंत्र : स्वरांगी साने

लड़कियाँ देख रही हैं सपने साथ-साथ
बता रही हैं एक दूसरे को
मनोवांछित जो देखा

माँएँ कितनी भी दे आवाज़ें
भैया बुलाएँ दस बार

अभी तो वे चुन रही हैं वे
अपने लिए सुयोग्य घर-वर

वे जो बैठी हैं पास-पास
उन्हें भी मालूम है अच्छी तरह
घर और वर का चुनाव
उनका नहीं होता
जनतंत्र दूर है
लड़कियों से अब भी।

जयोऽस्तुते : वीर सावरकर – हिन्दी अनुवाद : डॉ. सुनील देवधर

जयोऽस्तुते जयोऽस्तुते श्रीमहन्मंगले शिवास्पदे शुमदे स्वतंत्रते भगवती त्वामहं यशोयुतां वंदे

राष्ट्राचे चैतन्य मूर्त तू, नीति संपदांची स्वतंत्रते भगवती श्रीमती राज्ञी तू त्यांची परवशतेच्या नभांत तूची आकाशी होशी स्वतंत्रते भगवती चांदणी चमचम लखलखशी वंदे त्वामहं यशोयुतां वंदे

गालावरच्या कुसुमी किंवा कुसुमांच्या गाली स्वतंत्रते भगवती तूंच जी विलसतसे लाली तूं सूर्याचे तेज उदधिचे गांभीर्यही तूची स्वतंत्रते भगवती अन्यथा ग्रहण नष्ट तेची वंदे त्वामहं यशोयुतां वंदे

मोक्ष-मुक्ति ही तुझीच रूपे तुलाच वेदांती स्वतंत्रते भगवती योगिजन परब्रह्म वदती जे जे उत्तम उदात्त उन्नत महन्मधुर ते ते स्वतंत्रते भगवती सर्व तव सहचारी होती वंदे त्वामहं यशोयुतां वंदे

हे अधम-रक्त-रंजिते सुजन पूजिते श्रीस्वतंत्रते

तुज साठी मरण ते जनन तुज वीण जनन ते मरण तुज सकल चराचर शरण चराचर शरण श्रीस्वतंत्रते वीर सावरकर


अनुवाद डॉ. सुनील देवधर

राष्ट्र का चैतन्य मूर्त,
तुम नीति संपदा की स्वतंत्रते भगवती श्रीमती राज्ञी तुम उनकी
परवशता के नभ में तुम ही नभ में हो जैसी
स्वतंत्रते भगवती चांदनी चमचम जगमगती

गालों के कुसुमों पर या कि कुसमों के गालो पर स्वतंत्रते भगवती तुम्ही विलसती लाली बनकर तुम्ही सूर्य का तेज, उदधि का धैर्य गहन तुम्हीं स्वतंत्रते भगवती अन्यथा ग्रहण नष्टता की

मोक्ष मुक्ति हैं रूप तुम्हारे, तुम्हें ही वेदांती, स्वतंत्रते भगवती योगिजन परब्रह्म कहते जो है उत्तम उदात्त उन्नत महन् मधुर जो भी स्वतंत्रते भगवती सभी तुम्हारे सहकर्मी बनते

हे अधम रक्तरंजिते, सुजन पूजिते श्री स्वतंत्रते तेरे लिए मरण है जनम बिन तेरे जनम है मरण तुम्हें सकल चराचर शरण चराचर शरण भरतभूमिको दृढ़ आलिंगन दोगी कब वरदे स्वतंत्रते भगवती त्वामहम् यशोयुतां वंदे

“जय भारत जय जय महान” : डॉ. सुनील देवधर

जय भारत जय जय महान, जन-जन को तुझ पर अभिमान ।

वन-वन नूतन वेद सुनाते
ऊंचे पर्वत शीश झुकाते
और ऋचाएँ करती है नित
गौरव, गरिमा, गुण, यश-गान ।
जय भारत जय-जय महान..

नदियों की धाराएं पावन
रस रिमझिम संगीत सुहावन
मंदिर मस्जिद और गुरुद्वारे गिरजाघर सब पावन धाम ।
जय भारत जय जय महान…

कोई न जाने अंत कहां है
साधु यहां और संत यहां हैं
राम यहां पर मर्यादा हैं
और कृष्ण नट नागर श्याम
जय भारत जय जय महान जन-जन को तुझ पर अभिमान ।

“जय भारत नूतन नवीन” : डॉ. सुनील देवधर

जय भारत नूतन नवीन तुम श्रद्धा की मधुर बीन ।

शुभ्र मुकुट है तुंग हिमालय विश्व चकित करते देवालय जो भी आया शीश झुकाकर
तुझ में ही हो गया विलीन । जय भारत

कितने अनुपम रंग यहां पर जैसे उतरा स्वर्ग धरा पर गंगा यमुना की धाराएं करती हैं सब को शालीन। जय भारत-

गीता में उपदेश कर्म का गुरुग्रंथ संदेश धर्म का आत्मसात जो करता इनको हो जाता है कुशल प्रवीण । जय भारत-

मस्जिद से उठती अजान है गिरजा में सेवा का ज्ञान है नहीं किसी में बल है इतना ले तुझको तुझ से ही छीन । जय भारत-

विश्वासों के स्मारक भारत हे आस्था के धारक भारत कोई तुझको छले अगर तो तड़पे जैसे जल बिन मीन । जय भारत जय

मैथिलीशरण गुप्त ‘स्वराज्य की अभिलाषा’ — भारत-भारती

शत शत सम्राटों के स्वामी!
हे अनंत! हे अंतर्यामी!
सुख का स्वप्न है कि आशा है यह स्वराज्य की अभिलाषा
किसने इसको उदित किया है?
मुरझे मन को मुदित किया है;
तुमने केवल तुमने प्रभुवर! कहती है अंतर्भाषा॥
बैठ तुम्हारे साहस-रथ में
हम न रुकेंगे अपने पथ में;
नाथ! तुम्हारी इच्छाओं को बाधाएँ ही बल देंगी।
सत्य और विश्वास मिलेंगे;
काँटों मे ही फूल खिलेंगे;
उद्योगों की कल्पलताएँ मनमाने शुभ फल देंगी॥
काला रंग बाधक होगा,
गोरों का गुण साधक होगा;
एक हृदय का मिलन हमारा तीर्थराज संगम होगा।
उन्नति में न रुकावट होगी,
होंगे योग्य उच्चपद-भोगी;
आत्मा की सच्ची समता से मनुज मनुज के सम होगा॥
कभी न नैतिक घातें होंगी,
मुक्त मानसिक बातें होंगी;
विधि-विधान मे फिर निजत्व का हमको अटल गर्व होगा।

2

पक्षपात, मतभेद न होगा
ग्लानि न होगी, खेद न होगा;
न्याय-सभाओं में विचार का प्रकटित पुण्य पर्व होगा॥
सुलभ सभी को होगी शिक्षा,
नहीं माँगनी होगी भिक्षा;
फिर सारे व्यापार हमारे अपने ही करगत होंगे।
उपनिवेश यमपुर न रहेंगे,
वहाँ न हम अपमान सहेंगे।
उनके वे उद्धत अधिवासी अपने आप प्रणत होंगे॥
निम्मश्रेणी के अधिकारी
रह न सकेंगे स्वेच्छाचारी;
जान-माल की रक्षा के मिस प्रजा न पिसने पावेगी।
शासक और शासितों में फिर—
चिर विश्वास रहेगा, सुस्थिर;
समस्नेह से नियम-चक्र की धुरी न घिसने पावेगी॥
हिंस्र जंतु कुछ कर न सकेंगे,
हम उनसे यों डर न सकेंगे;
हरी-भरी खेती को सकूर फिर यों नहीं उजाड़ेंगे।
होंगे स्वयं शस्त्रधारी हम,
वीर भाव के अधिकारी हम;
निज साम्राज्य-सत्व-रक्षा का झंडा हम सब गाड़ेंगे॥
परमात्मन् ऐसा कब होगा?

3

जब होगा बस तब सब होगा;
ब्रिटिश जाति का गौरव होगा, उच्च हमारा सिर होगा।
वह इंग्लैंड और यह भारत,
होंगे एक भाव में परिणत;
दोनों के यश का दिगंत मे पुण्य पाठ फिर फिर होगा॥

ध्वज-वंदना : रामधारी सिंह ‘दिनकर’

नमो, नमो, नमो…
नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!
नमो नगाधिराज-शृंग की विहारिणी!
नमो अनंत सौख्य-शक्ति-शील-धारिणी!
प्रणय-प्रसारिणी, नमो अरिष्ट-वारिणी!
नमो मनुष्य की शुभेषणा-प्रचारिणी!
नवीन सूर्य की नई प्रभा, नमो, नमो!
नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!
हम न किसी का चाहते तनिक, अहित, अपकार
प्रेमी सकल जहान का भारतवर्ष उदार
सत्य न्याय के हेतु, फहर फहर ओ केतु
हम विरचेंगे देश-देश के बीच मिलन का सेतु
पवित्र सौम्य, शांति की शिखा, नमो, नमो!
नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!
तार-तार में हैं गुंथा ध्वजे, तुम्हारा त्याग
दहक रही है आज भी, तुम में बलि की आग
सेवक सैन्य कठोर, हम चालीस करोड़
कौन देख सकता कुभाव से ध्वजे, तुम्हारी ओर
करते तव जय गान, वीर हुए बलिदान
अंगारों पर चला तुम्हें ले सारा हिन्दुस्तान!
प्रताप की विभा, कृषानुजा, नमो, नमो!
नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!

आज से आज़ाद अपना देश फिर से : हरिवंश राय बच्चन

आज से आजाद अपना देश फिर से!
ध्यान बापू का प्रथम मैंने किया है,
क्योंकि मुर्दों में उन्होंने भर दिया है
नव्य जीवन का नया उन्मेष फिर से!
आज से आजाद अपना देश फिर से!
दासता की रात में जो खो गये थे,
भूल अपना पंथ, अपने को गये थे,
वे लगे पहचानने निज वेश फिर से!
आज से आजाद अपना देश फिर से!
स्वप्न जो लेकर चले उतरा अधूरा,
एक दिन होगा, मुझे विश्वास, पूरा,
शेष से मिल जाएगा अवशेष फिर से!
आज से आजाद अपना देश फिर से!
देश तो क्या, एक दुनिया चाहते हम,
आज बँट-बँट कर मनुज की जाति निर्मम,
विश्व हमसे ले नया संदेश फिर से!
आज से आजाद अपना देश फिर से!

आज देश की मिट्टी बोल उठी है : शिव मंगल सिंह सुमन

लौह-पदाघातों से मर्दित
हय-गज-तोप-टैंक से खौंदी
रक्तधार से सिंचित पंकिल
युगों-युगों से कुचली रौंदी।
व्याकुल वसुंधरा की काया
नव-निर्माण नयन में छाया।

कण-कण सिहर उठे
अणु-अणु ने सहस्राक्ष अंबर को ताका
शेषनाग फूत्कार उठे
साँसों से निःसृत अग्नि-शलाका।
धुआँधार नभी का वक्षस्थल
उठे बवंडर, आँधी आई,
पदमर्दिता रेणु अकुलाकर
छाती पर, मस्तक पर छाई।
हिले चरण, मतिहरण
आततायी का अंतर थर-थर काँपा
भूसुत जगे तीन डग में ।
बावन ने तीन लोक फिर नापा।
धरा गर्विता हुई सिंधु की छाती डोल उठी है।
आज देश की मिट्टी बोल उठी है।
आज विदेशी बहेलिए को
उपवन ने ललकारा
कातर-कंठ क्रौंचिनी चीख़ी
कहाँ गया हत्यारा?
कण-कण में विद्रोह जग पड़ा
शांति क्रांति बन बैठी,
अंकुर-अंकुर शीश उठाए
डाल-डाल तन बैठी।
कोकिल कुहुक उठी
चातक की चाह आग सुलगाए
शांति-स्नेह-सुख-हंता
दंभी पामर भाग न जाए।
संध्या-स्नेह-सँयोग-सुनहला
चिर वियोग सा छूटा
युग-तमसा-तट खड़े
मूक कवि का पहला स्वर फूटा।

ठहर आततायी, हिंसक पशु
रक्त पिपासु प्रवंचक
हरे भरे वन के दावानल
क्रूर कुटिल विध्वंसक।
देख न सका सृष्टि शोभा वर
सुख-समतामय जीवन
ठट्ठा मार हँस रहा बर्बर
सुन जगती का क्रंदन।
घृणित लुटेरे, शोषक
समझा पर धन-हरण बपौती
तिनका-तिनका खड़ा दे रहा
तुझको खुली चुनौती।
जर्जर-कंकालों पर वैभव
का प्रासाद बसाया
भूखे मुख से कौर छीनते
तू न तनिक शरमाया।
तेरे कारण मिटी मनुजता
माँग-माँग कर रोटी
नोची श्वान-शृगालों ने
जीवित मानव की बोटी।
तेरे कारण मरघट-सा
जल उठा हमारा नंदन,
लाखों लाल अनाथ
लुटा अबलाओं का सुहाग-धन।
झूठों का साम्राज्य बस गया
रहे न न्यायी सच्चे,
तेरे कारण बूँद-बूँद को
तरस मर गए बच्चे।
लुटा पितृ-वात्सल्य
मिट गया माता का मातापन

मृत्यु सुखद बन गई
विष बना जीवन का भी जीवन।
तुझे देखना तक हराम है
छाया तलक अखरती
तेरे कारण रही न
रहने लायक सुंदर धरती
रक्तपात करता तू
धिक्-धिक् अमृत पीनेवालो,
फिर भी तू जीता है
धिक्-धिक् जग के जीनेवालो!
देखें कल दुनिया में
तेरी होगी कहाँ निशानी?
जा तुझको न डूब मरने
को भी चुल्लू भर पानी।
शाप न देंगे हम
बदला लेने को आन हमारी
बहुत सुनाई तूने अपनी
आज हमारी बारी।
आज ख़न के लिए ख़ून
गोली का उत्तर गोली
हस्ती चाहे मिटे,
न बदलेगी बेबस की बोली।
तोप-टैंक-एटमबम
सबकुछ हमने सुना-गुना था
यह न भूल मानव की
हड्डी से ही वज्र बना था।
कौन कह रहा हमको हिंसक
आपत् धर्म हमारा,
भूखों नंगों को न सिखाओ
शांति-शांति का नारा।

कायर की सी मौत जगत में
सबसे गर्हित हिंसा
जीने का अधिकार जगत में
सबसे बड़ी अहिंसा।
प्राण-प्राण में आज रक्त की सरिता खौल उठी है।
आज देश की मिट्टी बोल उठी है।
इस मिट्टी के गीत सुनाना
कवि का धन सर्वोत्तम
अब जनता जनार्दन ही है
मर्यादा-पुरुषोत्तम।
यह वह मिट्टी जिससे उपजे
ब्रह्मा, विष्णु, भवानी
यह वह मिट्टी जिसे
रमाए फिरते शिव वरदानी।
खाते रहे कन्हैया
घर-घर गीत सुनाते नारद,
इस मिट्टी को चूम चुके हैं
ईसा और मुहम्मद।
व्यास, अरस्तू, शंकर
अफ़लातून के बँधी न बाँधी
बार-बार ललचाए
इसके लिए बुद्ध औ’ गाँधी।
यह वह मिट्टी जिसके रस से
जीवन पलता आया,
जिसके बल पर आदिम युग से
मानव चलता आया।
यह तेरी सभ्यता संस्कृति
इस पर ही अवलंबित
युगों-युगों के चरणचिह्न
इसकी छाती पर अंकित।

रूपगर्विता यौवन-निधियाँ
इन्हीं कणों से निखरी
पिता पितामह की पदरज भी
इन्हीं कणों में बिखरी।
लोहा-ताँबा चाँदी-सोना
प्लैटिनम् पूरित अंतर
छिपे गर्भ में जाने कितने
माणिक, लाल, जवाहर।
मुक्ति इसी की मधुर कल्पना
दर्शन नव मूल्यांकन
इसके कण-कण में उलझे हैं
जन्म-मरण के बंधन।
रोई तो पल्लव-पल्लव पर
बिखरे हिम के दाने,
विहँस उठी तो फूल खिले
अलि गाने लगे तराने।
लहर उमंग हृदय की, आशा—
अंकुर, मधुस्मित कलियाँ
नयन-ज्योति की प्रतिछवि
बनकर बिखरी तारावलियाँ।
रोमपुलक वनराजि, भावव्यंजन
कल-कल ध्वनि निर्झर
घन उच्छ्वास, श्वास झंझा
नव-अंग-उभार गिरि-शिखर।
सिंधु चरण धोकर कृतार्थ
अंचल थामे छिति-अंबर,
चंद्र-सूर्य उपकृत निशिदिन
कर किरणों से छू-छूकर।
अंतस्ताप तरल लावा
करवट भूचाल भयंकर

अंगड़ाई कलपांत
प्रणय-प्रतिद्वंद्व प्रथम मन्वंतर।
किस उपवन में उगे न अंकुर
कली नहीं मुसकाई
अंतिम शांति इसी की
गोदी में मिलती है भाई।
सृष्टिधारिणी माँ वसुंधरे
योग-समाधि अखंडित,
काया हुई पवित्र न किसकी
चरण-धूलि से मंडित।
चिर-सहिष्णु, कितने कुलिशों को
व्यर्थ नहीं कर डाला
जेठ-दुपहरी की लू झेली
माघ-पूस का पाला।
भूखी-भूखी स्वयं
शस्य-श्यामला बनी प्रतिमाला,
तन का स्नेह निचोड़
अँधेरे घर में किया उजाला।
सब पर स्नेह समान
दुलार भरे अंचल की छाया
इसीलिए, जिससे बच्चों की
व्यर्थ न कलपे काया।
किंतु कपूतों ने सब सपने
नष्ट-भ्रष्ट कर डाले,
स्वर्ग नर्क बन गया
पड़ गए जीने के भी लाले।

भिगो-भिगो नख-दंत रक्त में
लोहित रेखा रचा दी,
चाँदी की टुकड़ों की ख़ातिर
लूट-खसोट मचा दी।
कुत्सित स्वार्थ, जघन्य वितृष्णा
फैली घर-घर बरबस,
उत्तम कुल पुलस्त्य का था
पर स्वयं बन गए राक्षस।
प्रभुता के मद में मदमाते
पशुता के अभिमानी
बलात्कार धरती की बेटी से
करने की ठानी।
धरती का अभिमान जग पड़ा
जगा मानवी गौरव,
जिस ज्वाला में भस्म हो गया
घृणित दानवी रौरव।
आज छिड़ा फिर मानव-दानव में
संघर्ष पुरातन
उधर खड़े शोषण के दंभी
इधर सर्वहारागण।
पथ मंज़िल की ओर बढ़ रहा
मिट-मिट नूतन बनता
त्रेता बानर भालु,
जगी अब देश-देश की जनता।
पार हो चुकी थीं सीमाएँ

शेष न था कुछ सहना,
साथ जगी मिट्टी की महिमा
मिट्टी का क्या कहना?
धूल उड़ेगी, उभरेगी ही
जितना दाबो-पाटो,
यह धरती की फ़सल
उगेगी जितना काटो-छाँटो।
नव-जीवन के लिए व्यग्र
तन-मन-यौवन जलता है
हृदय-हृदय में, श्वास-श्वास में
बल है, व्याकुलता है।
वैदिक अग्नि प्रज्वलित पल में
रक्त मांस की बलि अंजुलि में
पूर्णाहुति-हित उत्सुक होता
अब कैसा किससे समझौता?
बलिवेदी पर विह्वल-जनता जीवन तौल उठी है
आज देश की मिट्टी बोल उठी है।

कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव

  1. तिरंगा

तिरंगा शान है
हमारी जान है
गगन का गान है
वतन की आन है।
कोटि कोटि भारतीयों का
अस्तित्व है, स्वाभिमान है
विश्व में अमिट पहचान है
अमृत्वमय राष्ट्र का प्राण है।

  1. श्रद्धानत

शेर जना था, भारत में
एक जननी ने
नाम सुभाष धरा था
मां प्रभावती ने
गोरों का मुँह काला कर
जो अड़ा रहा।
हिटलर भी जिसके
बाजू में खड़ा रहा।
राष्ट्र हित में
कलम उठाने को वचनबद्ध हूँ।
उनकी श्रद्धा में
मैं श्रद्धानत हूँ।

  1. कारगिल विजय

मातृभूमि तू अमर रहेगी, तेरे हित ही प्राण है।
तन-मन-धन से बढ़ कर अर्पित मेरा प्राण है।
तेरे चरणों में सिर देना ही सिर का सम्मान है।
सीमा पर संगीनें ताने, खेतों में डटा किसान है।
कारगिल विजय नहीं, वह भारत की आन है।
युद्ध-बुद्ध दोनों हैं, चुन लो जिसकी पहचान है।

  1. अजातशत्रु

अटल इरादे और मज़बूत वादे,
राजनीति में एक अजातशत्रु थे।
हृदय से कवि औ पुरोधा बुद्धि के
गठबंधन। के वे गणमान्य तंत्र थे।
जिनके तर्क को काट न सके कोई
ग़ैर कांग्रेसी राजनीति के वे नट थे।
बड़े-बड़े शूरमा भी किए धराशायी,
संसद में ऐसे वे अकेले वाग्भट्ट थे।
जनसंघ जल ने उगाया जो कमल,
भाजपा की बेल के प्रथम फल थे।
अटल इरादे और मज़बूत वादे,
राजनीति में एक अजातशत्रु थे।

  1. मानव

ओ मानव!
तू आगे बढ़ता जा
उन्नति के शिखरों पर चढ़ता जा
पर मानवता को साथ लिए चल
दुःख, दैन्य और दुर्भाग्य सकल
उनके आँसू पोंछे
जिनके सपने टूट गए
इस भागदौड़ में
अपने जो पीछे छूट गए।

‘हे मातृभूमि! तेरा अभिनन्दन!’ : डॉ. शिप्रा मिश्रा

जिस माटी में आंँखें खोलीं
जिस माटी में पांँखें डोलीं
प्रथम गुरु को पाया हमने
ममता के आंँचल में हो-ली

उस भूमि को मेरा वंदन
हे मातृभूमि तेरा अभिनंदन!

मेरे साथ ही पले हुए
एक ही संस्कार में ढले हुए
बाल- सुलभ लीलाएँ सारी
अनेक वृक्षों के तले हुए

यह क्रीड़ा भूमि मेरा चंदन
हे मातृभूमि तेरा अभिनंदन!

मेरी सखियाँ मेरी चुनिया
साथ हैं खेले पुतरी कनिया
यह थाती है मेरा धन है
मेरी छोटी सी यह दुनिया

फिर मैं क्यों करूँ क्रंदन
हे मातृभूमि तेरा अभिनंदन!

फूल- फूल पर नाम लिखा
सुबह से लेकर शाम लिखा
हूँ इसी हवा में रची- बसी
झंझावातों को थाम लिखा

मेरी पूज्या मैं हुई धन्य
हे मातृभूमि तेरा अभिनंदन!

पूनम चन्द्रा ‘मनु’ की कविताएँ

“सावन से कह दो”

सावन से कह दो
इस बार बादलों पर वो
जो इन्द्रधनुष बनाये
उसमे तीन ही रंग भरें
वो तीन रंग
जो हमारी पहचान है
वो तीन रंग
जो हमारी असलियत है
वो तीन रंग तिरंगे के
धरती के
इस छोर से
उस छोर तक बसने वाले
हर भारतीय के आसमाँ पर
ये इन्द्रधनुष बना दिखाई दे
जब ये इन्द्रधनुष बन जाए
फिर
कुछ इस तरह
बूंदे बरसाए ये बादल के
कभी लगे होली के रंग है
कभी लगे दीवाली की फूलझड़ी हैं …
हर दिल रंग जाए
बस बसंती रंग से
देशप्रेम का ये इन्द्रधनुषी धागा
हर दिल को जोड़ रहा हो

हर भारतीय ने इसे मजबूती से पकड़ा हो

इसी धागे को बुनकर हम
आज
और आने वाला कल पहन लें
दिखा दें इस दुनिया को के हम
साथ चलने में विश्वास रखतें हैं
हम भारतीय हैं
जहाँ खड़े हो जाएँ
हम भारत वहीं बसा लेते हैं
दिखा दें के हम रंगना भी जानतें हैं
और रमना भी जानते हैं
कह दो उन हवाओं को जो नफरतों से देखतीं है हमें
हमारे हौसलें
जलते भी हवाओं से हैं
और
भड़कते भी हवाओं से हैं
आओ दोस्ती का हाथ थामकर आगे बढ़ें
तुम भी जिंदा रहो
हम भी ये ज़िन्दगी जी लें
आने वाली पुश्तों को कुछ तो दे कर जाएँ
हो सकता है कल हम फिर खुद
अपनी ही पुश्त बनकर आएँ
इस धरती को खून की होली नहीं
खुशियों का सावन दें

सावन से कह दो के इस बार बादलों पर जो वो
इन्द्रधनुष बनाये
उसमे तीन ही रंग भरें
वो तीन रंग जो हमारी पहचान है
वो तीन रंग हमारी असलियत है”

ये वीरों की धरती है

ये वीरों की धरती है
यहाँ रक्त से माँ का तिलक होता है
पुत्र को पीठ पर बांध
लक्ष्मीबाई दुश्मन का संहार करती है
स्वम पर मोहित स्वामी को
युद्ध प्रस्थान के लिए
हाडारानी अपना शीश दान करती है
ये शिवाजी का देश है
महाराणा प्रताप की भूमि है
गुरुगोविंद सिंह की धरा है
यहाँ कायरों की भाषा मत बोलो

अगर देश के लिए मर नहीं सकते
तो दुश्मन की जान लेने जा रहे
वीर की चरण धूलि ले लो
स्पर्श तो करो
तुममे मारने की
हिम्मत न आजाए तो कहना
वो जो अपना घर छोड़ कर
मारने या मरने जा रहा है
वो देश के पिता की भूमिका लेने जा रहा है
सीमाओं पर बारूद से लिपट कर
दुश्मन की छाती का रक्त पीने की क्षमता
उस वीर के हाथों में ही है
नत-मस्तक हो, सम्मान करो
हमारी अगली आने वाली साँस
उसके कर्म का परिणाम है
शपथ है तुम्हें
यहाँ कायरों की भाषा मत बोलो
अगर देश के लिए मर नहीं सकते
तो दुश्मन की जान लेने जा रहे
वीर की चरण धूलि ले लो

शब्दकोष : दिव्या माथुर

शब्दकोष वह अदभुत था, ‘युद्ध’ शब्द उसमें न था
‘शत्रु’ का था न अता-पता, ‘बारूद’ बेचारा क्या करता
’घृणा’ न थी न ‘द्वेष’ वहाँ, ‘आहें’ थीं न ‘बीमारी’न ‘आँसू’ थे न ‘शोक’ वहाँ, न ‘मृत्यु’ न
‘गोलाबारी’
बंजर’ शब्द का अर्थ वहाँ था, ‘सरसों के जैसा पीला’’पतझड़’ था ‘बसंत’ वहाँ और
‘मरुस्थल’ था ‘नीला’
‘झूठ’ वहाँ था ‘जिज्ञासा’, ‘आलस्य’ वहाँ था ‘फ़ुर्तीला’था ‘रोना’ मुस्कान वहाँ और ‘बेसुर’ था
‘एक गीत सुरीला
‘विनम्र, परिष्कृत, सदय’ तो थे, किंतु न थे ‘नैराश्य, हताशा’
थे ‘रामराज्य शुभ मंगलमय, सम्मान स्नेह, गौरव, मर्यादा’
शब्दकोष सीने पर रख, मीठे सपनों में व्यर्थ बहीसुबह आज जब मैं जगती काश कि रहते
अर्थ वही!

रंग दे बसंती चोला : दिव्या माथुर

(भगत सिंह और उसकी माँ के बीच वार्तालाप)


‘मेरा रंग दे बसंती चोला,’ माँ से भगत सिंह बोला
तड़प के उसकी माँ बोली, ‘लाल मेरे तू हुने न जा,’
‘टोलकी वजदी वेड़े विच ते नचदे आंड-ग्वांडे ने
कुड़ी हल्दी लाके रा तके, व्या ते अपणा हो जाने दे
‘जलियाँ वाला बाग का बदला, खून से गोरों के लूँगा
तू तेल चोएगी शांति का, मैं क्रांति के फेरे लूँगा।’
‘वच्चयां दे दुद विच गोरयां ने, की सोंच ज़हर है कोलया
गोलियां बंदूकां छड्ड काक्के, फुलियाँ  नाल पर लै चोला,’
‘लाजपत सा था जिसका बेटा, माँ, तड़प रही है उसकी माँ
यदि मुझे किसी ने मार दिया, तू उसे माफ़ कर देगी क्या?’
‘गांदीजी दी गल्ल सुन पुत्रा, इन जंगा विच कोई नहीं वचा
वदले दि अग्ग नु दे तू बुझा, ए करेगी सारा देश तब्बाह,’
‘विदेशी वस्त्रों की होली जला, चल फूंक मशालें हमारे लिए
फिर देख बसंती चोलों पर, चमकेगा खून अँगारे लिए,’
‘गोरों दा दीन-ईमान नहीं, तोपा ते तैन्नु देंगे उड़ा
मार काट साड्डा तरम नईं, रब तों ते डर मेरे पुत्रा,’
‘मुझे किसी का खौफ़ नहीं, न गोरों का और न रब का
मृत्यु के बाद मेरे विचार, माँ, जिंदा रहेंगे सदा सदा,
फ़ख्र कर, माँ, फ़िक्र न कर, हम कफ़न बाँधकर निकले हैं
राजगुरु सुखदेव से लाखों, इस संग्राम में सैनिक हैं,’
अक्षत की जगह आँसु छिड़के, और खून से माँ ने टीका किया
‘पैरी पौना’ कह कर माँ से, वीर भगत सिंह निकल पड़ा।
इंकलाब और जिंदाबाद, कहकर उसने बम फेंक दिये
व्यवधान यह केवल नाटक था, न मरे कोई न ही ज़ख़्मी हुए
बेइंसाफी के खिलाफ़, सरदार भगतसिंह नहीं झुका

उसके तो दिलो-दिमाग़ में बस, गोरों पर क्रोध था धधक रहा
सौंडर्स की हत्या का भी जुर्म, उसने ही स्वयं कुबूल किया
और देश के ज़र्रे ज़र्रे में, मुक्ति का मंत्र ज्यूँ फूँक दिया
‘इंकलाब और जिंदाबाद, मैं रहूँगा देश आज़ाद करा,’
वह नारे लगाते थका नहीं, फाँसी पर हँसते हँसते चढ़ा।

डॉ. आरती ‘लोकेश’ की कविताएँ

मेरा भारतवर्ष

विचरा करते जहाँ स्वर्ण मृग, और कहाता सोन चिरैया,
वेद उपनिषद मंत्र गूँजते, रसखान रचे निर्बाध सवैया।
भक्ति रंग दिया तुलसी ने, नीति ज्ञान कबीर की वाणी,
भागीरथ प्रयत्न से सुरसरि, उतरी धरा पर बन निर्वाणी।
हिन्द महासिंधु चरण पखारे, माँ पग अमृत के आकर्ष,
ताम्रपत्र पर अमिट कहानी, जो है रची वह भारतवर्ष।
यज्ञ हवन व तप की वेदी, सर्वोच्च परित्याग की मूरत,
अंतस्थ अस्थि भी दान करे, हर साधु दधीचि-सी सूरत।
पूजी जाती स्त्री जाति ज्यों, घर-घर बसीं हुई रुद्राणी,
पाहन में जो फूँके प्राण, कृषक कथा है जग कल्याणी।
प्रहरी जिसका हिमगिरि, बना है अटल सहज सहर्ष,
ताम्रपत्र पर अमिट कहानी, जो है रची वह भारतवर्ष।

शून्य भी दिया दशमलव भी, ऐसे परम गणितज्ञ जहाँ,
रमन बासु भाभा कलाम, विज्ञान जनक जन्मे हैं यहाँ ।
प्रण-वचन करते निर्वाह, राजा दशरथ पितामह भीष्म,
कर्त्तव्य से न डिगते प्राणी, शीत भयंकर वर्षा या ग्रीष्म।
प्रस्तर युग से आधुनिकता, पथ बना उन्नति व उत्कर्ष,
ताम्रपत्र पर अमिट कहानी, जो है रची वह भारतवर्ष।
चक्रवर्ती राजाओं की गाथा, बालक-बाला को कंठस्थ,
सम्राट अशोक, चंद्रगुप्त मौर्य, बसे हर वासी के अंतस्थ।
पन्ना, चेनम्मा, जीजाबाई, पद्मावती, झाँसी की रानी,
पृथ्वीराज-राणा प्रताप, राजा पुरुरवा की अमर कहानी।
वीरों की धरती वीर ही जन्मे, यह संस्तुति का निष्कर्ष,
ताम्रपत्र पर अमिट कहानी, जो है रची वह भारतवर्ष।

यूँ ही नहीं

यूँ ही नहीं कहलाता इसका, तेजस्वी ललाट विशाल है,
हिमालय मुकुट बन सजा हुआ, मेरी मातृभूमि के भाल है।
पगाश्रय पाता हिंद महासागर, नतमस्तक तरंग उत्ताल 1 है,
उत्तरी गोलार्ध में स्थित, जम्बु महाद्वीप में गिरिशाल 2 है।
देवतुल्य धरती पर शतदल, जो प्रफुल्लित उषाकाल है,
उपमहाद्वीप दक्षिण भाग, ज्यों तड़ाग मध्य मृणाल 3 है।
कर्क रेखा को राह दिलाता, ठहरा है ऊपर विषुवत से,
उपनिषद्काल में आर्यवर्त, था वेद वाणी शाश्वत से।
पराक्रमी महा शूरवीर वे, शार्दूल क्रीड़ा अणुव्रत से,
भारत नाम से जग ने जाना, सम्राट भरत अनुद्वत 4 से।
सिंधु घाटी से सिंध हुआ, सिंध से हिंद कहावत से,
1 बहुत अधिक ऊँचा
2 एक प्रकार का बाज पक्षी
3 कमल का डंठल
4 विनीत

इंडस वैली से बना इंडिया, जब दूर हुए सारस्वत से।
तीस प्रतिशत भू-टुकड़े पर, बसते हैं कई सारे देश,
क्षेत्रफल में सातवाँ नाम, तुलना में अधिक छ: विदेश।
ग्यारह लक्ष मीलवर्ग ज़मीं, भाँति-भाँति के रूप-वेश,
सातहज़ार की तटीय रेखा, नहीं किसी से तनिक क्लेश।
बांग्लाभू-लंक-भूटान-बर्मा, पाक-चीन-नेपाल को संदेश,
प्रेम को प्रेम, अरि को अरि, निर्देश मानो, चाहे उपदेश।
सर्वधर्म समभाव अनुगामी, वसुधैव कुटुम्ब आधार है,
संस्कृति, सभ्यता, मान्यता, भारत की अपरिहार है।
संविधान में बाईस भाषाएँ, सहस्रों बोलियाँ अवतार हैं।
संस्कृत इन सबकी माता, सब माने इसका उपकार हैं।
आदि महापुरुषों के उद्गार, दोहराता अब संसार है,
यूँ ही नहीं समस्त विश्व में, भारत की जयजयकार है।

प्रवासी भारतीय! सुन जाना तुम!

इस माटी से विकसा तन, मन जुड़ा इसी प्रकृति से,
इस भू से है नाल जुड़ी, विचार पोषित हैं संस्कृति से,
माता-पिता के संस्कारों को हरदम शीश नवाना तुम!
देश का नाम बढ़ाना तुम, देश का मान बढ़ाना तुम।
सात-समुंदर पार की धड़कन, यहाँ स्पंदित होती है,
देवी-आशीष को फलता देख, धरिणी आनंदित होती है,
शीश-शीर्ष बिठाया पुत्र, हृदय से न झर जाना तुम!
देश का नाम बढ़ाना तुम, देश का मान बढ़ाना तुम।
सुविधा-संपन्न विदेशी मकान, बड़ी खुशी की बात है,
देशी घर में छूटे जिनकी, वय ढलती जर्जर गात है,
राह टकटकी बाँधे आँखें, फिर-फिर के घर आना तुम!
देश का नाम बढ़ाना तुम, देश का मान बढ़ाना तुम।

शिक्षा ने आधार दिया, धन-संचय का व्यापार दिया,
खाने-ओढ़ने का सामान, बहु प्रकार अपरंपार दिया,
स्वदेस के पिछड़े हुओं को, आकर गले लगाना तुम!
देश का नाम बढ़ाना तुम, देश का मान बढ़ाना तुम।
परदेश में बहुत तरक्की है, देश में धक्का-मुक्की है,
रक्त-स्वेद की आय से, चलती घर भर की चक्की है,
लहू में बहते लाल वर्ण को श्वेत न कर जाना तुम!
देश का नाम बढ़ाना तुम, देश का मान बढ़ाना तुम।
धोती छोड़ पहन ली पैंट, फूल छोड़ छिड़के हैं सैंट,
वृद्धों के चरण-स्पर्श करो, तो न आन में मानो डेंट,
ऋतु बदले, बदलें विचार, लेकिन बदल न जाना तुम!
देश का नाम बढ़ाना तुम, देश का मान बढ़ाना तुम।
बच्चे भी घर से दूर हुए, भले दृग के कोहिनूर हुए,
दादी-नानी बुआ-मौसी सब, मिलने से मजबूर हुए,
अंग्रेज़ी गिट-पिट करें मगर, हिंदी भी सिखलाना तुम!
देश का नाम बढ़ाना तुम, देश का मान बढ़ाना तुम
प्रवास वहीं आवास वहीं, पर जीवन का विश्वास यहीं,
समृद्धि है प्रसिद्धि भी, आनंद-उपजी न श्वास कहीं,
काम हेतु परदेश बसे, पर देश के काम भी आना तुम!
देश का नाम बढ़ाना तुम, देश का मान बढ़ाना तुम।
विदेश-स्तुति कितनी-करो, स्वदेश-निंदा जितनी करो,
मात्र उन्नति के हित तोल, वाणी प्रयोग उतनी करो,
सहार कर अर्थ का ढाँचा, रीढ़ सुदृढ़ करवाना तुम!
देश का नाम बढ़ाना तुम, देश का मान बढ़ाना तुम।
लक्ष्य-संधान अभी करना, जी-भर काम सभी करना,
मातृभूमि की गोद में, थक के विश्राम कभी करना,
इस धरती की उर्वरा में, अंत में रम जाना तुम!
देश का नाम बढ़ाना तुम, देश का मान बढ़ाना तुम।

तुमको नमन माँ भारती!

तुमको नमन माँ भारती,
उर-मंदिर तुम ही सँवारती,
पूजन, अर्चन दीप अर्पण,
हम तेरी उतारें आरती।
तुमको नमन माँ भारती, तुमको नमन माँ भारती!
रक्त का मस्तक तिलक लगा
शीशों के पुष्प तुम्हें चढ़ा
वीरों ने प्राण दिए गँवा
जब सुना तुम्हें सिसकारती
तुमको नमन माँ भारती, तुमको नमन माँ भारती!
लें प्रण कि तुम आज़ाद रहो,
हर धड़कन में आबाद रहो।
स्वर में घुलता आह्लाद रहो,
हर श्वास यही है पुकारती।
तुमको नमन माँ भारती, तुमको नमन माँ भारती
हम तेरी उतारें आरती।

हिंद का गौरव हिंदी

सब प्राणी में उच्च है मानव, भाव सोच विचार की गिनती,
अक्षर जन्मा, शिक्षा ने फिर दी, ज्ञान, विवेक, धैर्य और विनती।
भाषाओं का कुंभ है भारत, कुंभ का कर्म व्रत है हिंदी,
भाषा नदियाँ जिस सागर गिरतीं, मंथन कलश में अमृत हिंदी।

संस्कृत पालि प्राकृत अपभ्रंश, फिर बनी नवागत हिंदी,
तत्सम भी हैं तद्भव भी हैं, आगत का करे स्वागत हिंदी।
आचार्यों और महापंडितों, की जकड़ से छूटी नई हिंदी,
बंधनों से मुक्त हुई तो, जन जन की हो गई हिंदी।
राजा रंक, शुचि या पंक, भेद न करती भाषा हिंदी।
ताकतवर निर्बल वाचाल, मूक भाव की आशा हिंदी।
जैसी लिखी वैसी बोली, ब्याती कितनी ही बोली हिंदी।
देवनागरी भरे कलम में, सहज सरल है भोली हिंदी।
प्रदेश देश से, देश विदेश से, जोड़ने वाली कड़ी है हिंदी,
विश्व भर सुने झूमे गाए, नूतन शब्दों की लड़ी है हिंदी।
जहाँ जहाँ भारतीय जा बसे, यत्र तत्र सर्वत्र है हिंदी,
संस्कृति के राजदूत हैं हम, हमारा पहचान पत्र है हिंदी।
यूएई में ध्वनित है होती, रेडियो मोबाइल, एफ़.एम. पर हिंदी,
अरबी लोग सुविधा से बोलें, अपनापन दिखला कर हिंदी।
व्याकरण है अटल हिमालय, संवाद गंगा लहर है हिंदी,
स्वर व्यंजन में भरी कलाएँ, साहित्य में अम्बर है हिंदी।
पद्य में छंद नौ रस दस गुण, सजती अलंकार से हिंदी,
कथा, लेख, निबंध, संस्मरण, गद्य वृहद प्रकार से हिंदी।
जब से जन्मी युद्ध मध्य भी, शांति का स्वर है हिंदी,
उत्कृष्ट और समृद्ध दिनोंदिन, हुई और भी प्रखर है हिंदी।
सात सुरों का नाम है हिंदी, पावन सारे धाम है हिंदी,
राष्ट्रभाषा पद पर चलने को राष्ट्र हित संग्राम है हिंदी।
माँस-पेशियों लहू में बहती, स्वत: स्फूर्त व्यायाम है हिंदी।
सदियों से पोषित सभ्यता का, अब वांछित परिणाम है हिंदी।
साधारण में खास बहुत है, और विशेष में आम है हिंदी,
दुबई शहर में बसे प्रवासी, से प्रेम अविराम है हिंदी।

प्रगति का भिन्न आयाम है हिंदी, प्रबुद्ध को प्रणाम है हिंदी,
मैं भारतवासी बस इतना जानूँ, हिंद की आवाम है हिंदी।
हिंदी मेरी मात-पिता है, श्रीराम-सी अभिराम है हिंदी,
मैं भारतवासी बस इतना जानूँ, हिंद की आवाम है हिंदी।
हिंद की आवाम है हिंदी।

जय हिंदी जय भारत!

“आज़ादी की आग” : निमेश आज़ाद

जब मिट्टी ने जंजीरों का बोझ बहुत सहा था,
हर दिल के अंदर सिर्फ दर्द ही बहा था,
आसमान भी जैसे उस घड़ी रो पड़ा था,
तब भारत का हर बेटा क्रांति में खड़ा था।

जंजीरों की जकड़ में जब हिंदुस्तान कराह उठा,
हर दिल के अंदर एक तूफान सा जाग उठा,
कर-लाठी और अन्याय से जीवन टूट गया था,
पर भीतर ही भीतर क्रांति का सूरज उठ गया था।

गाँव-गाँव में रोष था, शहर भी रो पड़ा था,
हर नौजवान का सपना आज़ादी से जुड़ा था,
माँ भारती का आँचल दर्द से भीग गया था,
पर हर सीने में इंकलाब जाग गया था,
हर गली में बस एक ही नारा गूंज रहा था,
कि अब जंजीर तोड़कर नया इतिहास बन रहा था।

भगत सिंह ने असेंबली में हुंकार भरी थी,
“इंकलाब ज़िंदाबाद” से धरती हिली थी,
सुखदेव और राजगुरु ने फाँसी को अपनाया,
पर अपने बलिदान से इतिहास जगमगाया।

चंद्रशेखर आज़ाद जंगलों में तूफान बने,
“आजाद रहूँगा, आजाद मरूँगा” शान बने,
गोलियों की बारिश में भी मुस्कान छोड़ गए,
और क्रांति की मशाल को कभी ना छोड़ गए,
हर कदम पर उन्होंने डर को मिटाया था,
और भारत माँ का मान बढ़ाया था।

सुभाष चंद्र बोस ने नई राह दिखाई थी,
“तुम मुझे खून दो” की गूंज सुनाई थी,
आज़ाद हिंद फौज ने रणभूमि हिला दी थी,
दुश्मन की पूरी ताकत पीछे भगा दी थी।

गाँधी जी ने सत्य और अहिंसा का मार्ग दिखाया,
दांडी यात्रा से अंग्रेजी कानून झुकाया,
बिना हथियार भी एक बड़ी क्रांति खड़ी की,
और भारत को आत्मबल की शक्ति दी,
उनकी सादगी ने दुनिया को झुका दिया,
और आज़ादी का रास्ता आसान बना दिया।

लाखों शहीदों ने अपना लहू बहाया था,
तब जाकर भारत ने आज़ादी का दिन पाया था,
हर क्रांतिकारी नाम दिल में समाया था,
हर बलिदान ने इतिहास नया बनाया था,
तिरंगा आसमान में गर्व से लहराया था,
और भारत माँ ने स्वतंत्रता का गौरव पाया था

प्रवासी मन : प्रीति अग्रवाल

मेरा देश मुझे अलग तो नहीं,
है यादों, इरादों में, वादों में वो।

मेरी तख्ती में, मेरी स्याही में वो,
कलम से जो निकली, जुबानी में वो।

हर गीत, हर कविता, कहानी में वो,
है मीठे सुरों की रवानी में वो।

मेरे शिल्प में, मेरी शैली में वो,
विचारों में और संस्कारों में वो।

पंख फैला जब भी उड़ती हूँ मैं,
बुलंद हौसलों की, उड़ानों में वो।

वो मुझ में निहित, हूँ मैं उसमें ढली,
सद्भावना की धरोहर मिली।

जीवन की अनमिट कहानी में वो,
हर पात्र की छवि, सुहानी में वो।

मैं प्रवासी सही, मेरे प्रियजन वहीं,
प्रार्थनाओं में, शुभकामनाओं में वो।

मेरा देश मुझे अलग तो नहीं, उसकी मिट्टी में मैं, मेरी मिट्टी में वो!!

लोग चाहते हैं : नरेंद्र ग्रोवर ‘आनन्द मुसाफिर’

कुछ लोग चाहते हैं
मैं भी बोलना बंद कर दूं–
देश के दुश्मनों के विरूद्ध
दिन-रात झूठ और पाखंड के विरूद्ध
भीतर छिपे देशद्रोहियों के विरूद्ध
बोरों में जले नोटों के विरूद्ध
बाज़ारू-लोलुप चाटुकारों के विरूद्ध

देश बेचने और बांटने वालों के विरूद्ध,
बिखरे हुए पैट्रोल को देखकर
मूंद लूं आंखें
छद्म भाईचारे के चूरन के विरूद्ध,
ओढ़ लूँ एक सफेद चादर
रोक दूँ युद्ध
कर लूं आँखें बंद
रोक दूं कलम
तोड़ दूँ दवात

कदाचित नहीं!
मैं प्रभु राम की गिलहरी मानिंद
सहयोगात्मक प्रतीक हूँ,
धमनियों में राष्ट्र भक्ति के
खून का संगीत हूँ
मौत ही लगा सकती है
आवाज पर पाबंदी

भारत मेरा देश महान : कुसुम धीमान ‘कलिका’

भारत माता की जय बोलें, करते हम सम्मान है।
आजादी का पर्व मनाकर, गर्वित हर इंसान है॥
मेरा देश महान। भारत देश महान॥
भगत सिंह सुखदेव राजगुरु, योद्धा खूब महान थे।
वीर प्रसूता धरती अपनी, करते उस पर मान थे॥
खेल जान पर गए वीर थे, करता याद जहान है।
आजादी का पर्व मनाकर, गर्वित हर इंसान है॥
मेरा देश महान। भारत देश महान॥
खूब लड़ी वो मर्दानी थी, मानी कभी न हार थी।
पीठ बाँधकर सुत को अपने, करती अरि पर वार थी॥
जय हो रानी लक्ष्मीबाई, हम सब की प्रतिमान है।
आजादी का पर्व मनाकर, गर्वित हर इंसान है॥
मेरा देश महान। भारत देश महान॥
नमन शहीदों को है शत-शत, उन पर ही अभिमान है।
संघर्षों से ली आजादी, जन-जन को यह भान है॥
हमें जान से ज्यादा प्यारा, अपना हिंदुस्तान है।
आजादी का पर्व मनाकर, गर्वित हर इंसान है॥
मेरा देश महान। भारत देश महान॥
केवल ध्वज ये नहीं तिरंगा, भारत की पहचान है।
इसकी आन बचाने खातिर, वीर सदा बलिदान है॥
सारे जग में रहे गूँजता, देश प्रेम जय गान है।
आजादी का पर्व मनाकर, गर्वित हर इंसान है॥
मेरा देश महान। भारत देश महान॥

जन्मभूमि : राकेश मिश्र

आँगन छूटा, तो वह पूरा नहीं छूटा। उसका थोड़ा-सा हिस्सा मेरे साथ चला आया। गाँव भी आया, नगर भी, और विद्यालय के वे मित्र भी, जिनसे बरसों बात नहीं हुई।

दूर देश में घर बनाते समय पता चला कि स्मृतियाँ सामान से हल्की होती हैं, फिर भी सबसे अधिक जगह घेरती हैं।

जब देश छोड़कर आया था, तब यह नहीं ठीक से समझा की जन्मभूमि केवल जन्म लेने की जगह नहीं होती। वह असंख्य लोगों के श्रम, स्मृतियों और सपनों से समय के साथ निर्मित होती है। उसमें मेरे पुरखे भी हैं, जिनके नाम अब धीरे-धीरे स्मृति में धुँधले पड़ गए हैं, लेकिन जिनका श्रम आज भी उस मिट्टी में जीवित है।

उन्होंने अपने हिस्से का समय जिया, कठिन दिन देखे, और जो कुछ बचा सके, उसे सँभालकर अगली पीढ़ी को सौंप दिया। शायद इसी तरह एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी के लिए जगह बनाती है, जैसे कोई वृक्ष अपने बाद आने वाली छाया के लिए बीज छोड़ जाता है।

दूर बैठकर अपने देश को याद करता हूँ, तो उसके साथ बहुत से अनदेखे लोग भी स्मरण हो आते हैं। वे, जो सीमाओं पर डटे रहे; और वे भी, जिनके नाम कहीं दर्ज नहीं हैं, लेकिन जिनके कारण बहुत कुछ सुरक्षित बचा रहा। भारत केवल नक्शे पर खींची गई रेखाओं से नहीं, बल्कि अनगिनत लोगों की छोटी-बड़ी निष्ठाओं, त्याग और समर्पण से बना है।

कृतज्ञ मन से मैं अपने पूर्वजों, उन सभी ज्ञात-अज्ञात लोगों को जिन्होंने इस धरती को सँभाला, और उस मातृभूमि को नमन करता हूँ जिसने मुझे जन्म दिया। मेरी कामना है कि यह भूमि आने वाले समय में भी नदियों की तरह अविरल बहती रहे, खेतों की तरह हरी-भरी रहे, और लोगों के मन में घर की तरह बसी रहे।

दूर देश में बैठा मैं उसे प्रणाम करता हूँ।

देश तुझे अभिनंदन : संगीता चौबे ‘पंखुड़ी’

हिमगिरि का है मुकुट शीश अरु, गंगा करती वंदन ।
चरण पूजता सागर तेरे, देश तुझे अभिनंदन ।।

सोना उगले तेरी माटी, धूल नहीं वह चंदन ।
चरण पूजता सागर तेरे, देश तुझे अभिनंदन ।।

भिन्न-भिन्न भाषाएँ तेरी, अलग-अलग है बोली ।
संग – संग में यूँ घुल जाएँ, जैसे दामन चोली ।
छ: ऋतुओं में रचे बसे हैं, जलवायु और मौसम ।
शिशिर शरद शीत ग्रीष्म वर्षा, अरु हेमंती सरगम ।
भिन्न-भिन्न परिधानों का है, दिखता न्यारा बंधन ।
चरण पूजता सागर तेरे, देश तुझे अभिनंदन ।।

हिंद देश जो रहना चाहे, हर घड़ी अग्रगामी ।
सबसे पहले आकर देता, सूरज तुझे सलामी ।
प्रीत रीत दी जग को तूने, संस्कारों की धानी।
दिखा नहीं सारी दुनिया में, तेरा कोई सानी ।
एक संग होता रामायण, अरु कुरान का वाचन ।
चरण पूजता सागर तेरे, देश तुझे अभिनंदन ।।

शून्य दिया जग को तूने अरु, दी दशमलव प्रणाली ।
दूरबीन से तारों की सब, भाषा खूब खँगाली ।
योग कला पाणिनी ने सकल, दुनिया को बतलाई ।
कला सभ्यता पूरे जग ने, भारत से ही पाई ।
रहे विश्व में सदैव आगे, करें लोग अनुपालन ।
चरण पूजता सागर तेरे, देश तुझे अभिनंदन ।।

जन्म दिया अनगिन वीरों को, उर्वर भारत माटी ।
एकलिंग के नारों से थी, गूँजी केसर घाटी ।
एक सूत्र में बँधा देश यह, काश्मीर से कुमारी ।
नेह कली से सुरभित होती, सब के मन की क्यारी।
देश प्रेम से सिंचित हर उर, गाता है जन गण मन ।
चरण पूजता सागर तेरे, देश तुझे अभिनंदन ।।

देशभक्ति के दोहे : सुबोध श्रीवास्तव

विविध सुरीली बोलियाँ, विविध अनूठे धर्म।
दिव्य, पूज्य भारत धरा, छुए विश्व का मर्म॥

अमर शहीदों ने दिया, मिटकर यह संदेश।
प्राणों से भी है अधिक,प्यारा हमको देश॥

आजादी तो मिल गयी,मिला नहीं अधिकार।
पहले हम लाचार थे, अब भी हैं लाचार॥

महलों वाले चल पड़े, हैं सूरज की ओर।
बस्ती में छाया हुआ,अंधियारा घनघोर॥

आजादी के वास्ते, मिटे अनगिनत वीर।
भ्रष्ट तंत्र अब लिख रहा,भारत की तकदीर॥

लोकतंत्र में दोस्तों, जनता है लाचार।
चाहे ये सरकार हो,चाहे वो सरकार॥

आजादी के पर्व पर, गूँज रही जयकार।
सुनता कौन गरीब की,रोटी की दरकार॥

आजादी तो मिल गयी, खुशियाँ भी आबाद।
दिल ही लेकिन जानता,हम कितने आजाद॥

गीत – स्वतंत्रता दिवस : अलका अगरवाल

नमन तुझे है भारत माता,
तुझ पर है ये जान कुर्बान |

अन्ग्रेजो से लडकर हमने,
ये स्वतन्त्रता पायी थी |
लाखो कुर्बानी देकर के,
ये स्वतन्त्रता पायी थी |

नमन तुझे है भारत माता,
तुझ पर है ये जान कुर्बान |

भूल न पायेंगे कुर्बानी,
भगत, राजगुरु, सुखदेव की |
भारत माता के शोषण की,
चंद्रशेखर आजाद की |

नमन तुझे है भारत माता,
तुझ पर है ये जान कुर्बान |

सबने कितने कष्ट उठाये,
लोहे की रोटी तोडी |
कितनो ने था रक्त बहाया,
खेली थी जान की बाजी |

नमन तुझे है भारत माता,
तुझ पर है ये जान कुर्बान |

गर्व है हमको उन वीरो पर,
जिन्होने तन -मन -धन वारा |
भारत माता की स्वतन्त्रता,
को अपना सब कुछ वारा |

नमन तुझे है भारत माता,
तुझ पर है ये जान कुर्बान |

हमने आज कसम है खाई,
आजादी न मिटने देंगे |
भारत माता की रक्षा में,
सिर पर बांध कफन लड़ेगे |

नमन तुझे है भारत माता,
तुझ पर है ये जान कुर्बान|

शहीदों के जब ताबूत में अवशेष आते हैं : सरस दरबारी

देश की खातिर वीरों ने दी
जीवन की कुर्बानी
हर शहीद के साथ जुड़ी
शहादत की कहानी।

इन वीरों के परिवार की
अपनी एक कहानी
सिर्फ नहीं देता शहीद
देता कुनबा कुर्बानी

पीछे रह जाते हैं
एक बेवा बूढ़ी माता
जर्जर शरीर लिए पिता
एक बहन और एक भ्राता

इनके सपने, इनके अरमान काठ हो जाते हैं
शहीदों के जब ताबूत में अवशेष आते हैं ।

बूढ़ी माँ थी खड़ी वहाँ
लिए आँखें पथराईं
भेजा था जिसको तिलक लगा
करे उसकी अगुआई
दोनों हाथों से शीश झुका
जो माथा चूमा था
उसकी काठी के टुकड़ों की
बस गठरी है आई

अर्थी चूम बिलखना उसका देख न पाते हैं
शहीदों के जब ताबूतों में अवशेष आते हैं

एक शहीद की ब्याहता थी
चूड़ा था हाथों में
पथराई सी थी खड़ी हुई
उजड़े हालातों में
उसका अंश भीतर पल रहा
यह खबर सुनानी थी
उसके अरमान शहीद हुए
किस्मत की घातों में

उजड़ी किस्मत देख आँसू रुक न पाते हैं
शहीदों के जब ताबूतों में अवशेष आते हैं

उसी भीड़ में कोने में
बैठा था बूढ़ा बाप
कर्ज़ बीमारी बन गए थे
अब जीवन का श्राप
उसके बुढ़ापे की तो अब
लाठी भी टूटी थी
अब तक थी जो पल रही
वह आस भी छूटी थी

जर्जर सहमी काया देख के मन भर आते हैं
शहीदों के जब ताबूतों में अवशेष आते हैं

देश से शिकायत : आराधना झा श्रीवास्तव

हाँ शिकायत है मुझे अपने देश से
शिकायत अपनों से ही हुआ करती है
अधूरी अपेक्षाओं से उपजा करती है,
परायों से न अपेक्षा न शिकायत!
मेरी शिकायत में छिपा है मेरा प्रेम
प्रेम अपने देश से, अपनी मातृभूमि से
यह प्रेम गर्भनाल सदृश मुझे जोड़ता है
अपनी जननी से और जन्मभूमि से।
इस गर्भनाल की सीमा विस्तृत है
इससे बंधी हुई मैं विचर सकती हूँ
वैश्विक वृत्त की परिधि के भीतर
और क्षितिज के पार अंतरिक्ष में भी।
मैं इसके संग धरती की गोद से छिटक
चाँद की धरती पर रख सकती हूँ कदम
वहाँ से देख सकती हूँ नीली पृथ्वी
और गर्व से कह सकती हूँ..
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा!
और कर सकती हूँ शिकायत भी
जैसे बच्चा करता है अपनी माँ से।
मेरी शिकायत सुनकर भर आएगा
मेरी माँ का ममता से भरा दिल
छम-छम कर बरस पड़ेंगे उमड़ते भाव
सिक्त कर देंगे हिमालय के भाल को
थपथपा देंगे सतपुड़ा के ऊँघते वन को

अशान्त कर देंगे प्रशांत के गहरे मन को
जिसके तल में शिकायत की सीप में
क़ैद है प्रेम के कई नायाब मोती ।
जहाँ प्रेम हो शिकायत भी वही होती है।
मुझे शिकायत है अपने देश से क्योंकि
वह मेरा अपना देश है जहाँ निर्भय होकर
मैं कह सकती हूँ अपनी दो टूक बात
मैं जानती हूँ मेरी साफ़गोई से नहीं छिनेगी
मेरी नौकरी, नागरिकता या कोई और सुविधा।
मेरे शिकायती स्वभाव को समझती है माँ
उसे पता है मैं सारे जहाँ से लौटकर
बस उसकी गोद में ही पाती हूँ प्रेम
वहीं जाकर गर्भनाल का कसाव
शिथिल और शान्त हो जाता है
जब एक बच्चे को अपनी माँ की गोद में
सुकून से सोता हुआ पाता है।

आज़ादी : लतिका ‘नीर’

पंद्रह अगस्त
गुलामी का अंधेरा
चिरती तेजोमय सुबह

तन मन को रोमांचित
करती मधुर मंगल सुबह

उन वीरों को नमन
जिन्होंने खेली
खून की होली

आज़ादी की
हर खुशी
हमें जिनके
बलिदानों से मिली

भारत के रक्षक
सरहदों के प्रहरी
वीर जवान

प्रणाम उन्हें जो
देश की रक्षा
के लिए देते रहे
जीवन की आहुति

हम भारतवासी
आज़ादी का मंगल
जय गान गाएंगे

एकजुटता से
हमारा तिरंगा
आकाश में
हमेशा हमेशा
फहराते रहेंगे

स्वतंत्रता दिवस : अवनीश कुमार

आज फिर
आसमान में तिरंगा लहरा रहा है,
और हवा उसके रंगों को
नगरों, शहरों और गाँवों की
खिड़कियों तक पहुँचा रही है।

मैं कुछ देर तिरंगे के पास खड़ा रहा..

केसरिया कुछ कह रहा था,
सफेद गहरी चुप्पी में था,
और हरा, क्षितिज के पार
बहुत दूर तक देख रहा था।

मैंने धीमे से पूछा,
“क्या हम सचमुच स्वतंत्र हैं?”

केसरिया बोला,
“जिस दिन तुम्हारे भीतर
तुम्हारे स्वार्थ से बड़ा
देश खड़ा हो जाएगा,
उस दिन समझना
आज़ादी ने तुम्हें छुआ है।”

सफेद ने अपनी चुप्पी तोड़ी,
“सच को सच कहने का साहस रखना…
क्योंकि झूठ के शोर में
सबसे पहले
देश अपना आईना खोता है।”

हरा मुस्कुराया,
“जिस दिन किसान की हथेली पर
फसल के साथ उम्मीद भी उगेगी,
जिस दिन हर बच्चे की आँख में
निराशा की जगह
एक उज्ज्वल भविष्य पलेगा
उस दिन मेरा रंग और गहरा होगा।”

मैं देर तक चुपचाप सोचता रहा।

देशप्रेम शायद
सिर्फ सीमा पर खड़े सैनिक की
बंदूक में नहीं होता,
वह हमारे भीतर
चुपचाप जलती हुई
ईमानदारी की उस लौ में भी होता है,
जिसे कोई नहीं देखता ।

किसी मजबूर का हक न छीनना,
सड़क पर कचरा न फेंकना,
कमज़ोर की आवाज़ बनना,
अपने अधिकार के साथ
अपने कर्तव्य को भी याद रखना,
और असहमति के क्षण में भी
सामने वाले को
अपने ही देश की धड़कन समझना।

इस स्वतंत्रता दिवस
मैं कोई बड़ा संकल्प नहीं लेता।
बस इतना चाहता हूँ कि
जब तिरंगा हवा में लहराए
तो मेरे भीतर भी कुछ न झुके।
न मेरा सत्य,
न मेरी संवेदना,
न मेरी मनुष्यता,
और न मेरा भारत।

क्योंकि
देश केवल एक भूगोल नहीं,
वह उन करोड़ों धड़कनों का नाम है
जो अलग-अलग होकर भी
एक ही आकाश के नीचे
धड़कती हैं।

जय हिन्द।

आजाद हैं हम : प्रीति साहू

आजाद हैं हम, आजाद हैं हम, कह-कहकर तुम इतराते हो,
क्या कीमत थी इस आज़ादी की, कभी यह सोच भी पाते हो?
खाते हो, पहनते हो, रहते हो, चाहे जहाँ नज़र तुम आते हो,
अभिमान से तुम इस आज़ादी का पूरा लुत्फ़ उठाते हो।
मैं यह नहीं कहती, गर्व न करो, मौज मनाओ—आज़ाद हैं हम,
पर याद रखो उस कीमत को, जिस पर आज़ादी हमने पाई है।
महसूस करो इतिहास के उन पन्नों को,
जिनमें आज़ादी ने बलिदानों को माँगा था।
सोचो, जो भगत सिंह ने हँसते-हँसते फाँसी का फंदा झूला था,
उस उम्मीद भरी हँसती आँखों का क्या मोल तुम चुका पाओगे?
जब चंद्रशेखर ने खाई थी कसम—
“ज़िंदा अंग्रेज़ों के हाथ नहीं आएँगे,”
मारी खुद को गोली, दिया बलिदान—
क्या तुम इसे याद रख पाओगे?
थी वह रानी लक्ष्मीबाई, जिसने अंग्रेज़ों को भी झुकाया था,
युद्ध लड़ी थी मर्दानी और वीरगति को पाया था।
हज़ारों वीरों ने दिया था अपने प्राणों का बलिदान,
बताओ ज़रा, क्या रख पाओगे उनके खून के एक कतरे का भी मान?
क्या भूल गए हो उस कीमत को, जिस पर आज़ादी तुमने पाई है?
जिन्होंने तुम्हारे पूर्वजों की आत्मा उनके तन से भगाई है,
करते हो तुम उनकी सराहना—क्या लाज ज़रा तुम्हें आई है?

देख लें तुम्हें आज अगर वे, तो उनकी आँखों में आँसू होंगे,
क्या इसीलिए दिया था बलिदान, जो तुमने देश की गति बनाई है?
वास्तविक आज़ादी तुम शायद उस दिन पा जाओगे,
जब रखोगे मान अपनों के बलिदानों का
और परतंत्रता को कभी भूल नहीं पाओगे।

जूही गुप्ते की कविताएँ

उनहत्तर पल!

एक और जंग छिड़ी हुई है
आज़ादी के लिए
अगर कलम लेकर लिखने
की न सही तो
फोन में टाइप करने की
उफन कर बह चुके विचारों के,
बचे-खुचे अवशेष खुरचने की
दिल ओ दिमाग के उस पतीले से
जिस पर ढक्कन है
रोज़मर्रा की भेड़ चाल का,
पशोपेश के अविरत काल का।
सुकून, फुरसत बड़े अल्फाज़ हैं
कम से कम दो बार चाय पीने की आज़ादी।
रात न गुज़रे
किसी एक्सेल शीट के साए में ,
सुबह न हो
क्लॉड की टास्क लिस्ट से
कुछ उकेर सकूं ऐसा
कि कागज़ मुस्कुरा उठे
दुस्साहस कर दूं
वो सब कुछ कहने का
जो उन चार लोगों से बचा रक्खा है
जिनका नाम कोई नहीं जानता
पर डरते-डराते सब हैं
मुँह बिचकाकर न रहे शब्द
ओढ़ कर निकलें बेबाकी
दबी न रहे ज़ुबान , बेहतरी की होड़ में
किसी खाली रविवार की राह तकते।
दो सौ दिनों के

राइटर्स ब्लॉक की बेड़ियाँ टूटे
स्वाधीन हो मेरी लेखनी,
उनहत्तर पल के लिए ही सही।

इस तिरंगे में कुछ बात तो है !

“मेरा वास्ता एक दिन के अवकाश से” 
कह आई थी ऑफिस में अंदाज़ से 
सज्ज बाज़ार!! पर्व की शुरूआत तो है
इस तिरंगे में कुछ बात तो है !
साथ पड़े थे गाजर-मूली-गोभी
रंग उनके देख मुस्कुरा बैठी मैं भी
खाने में स्वाधीनता का स्वाद तो है
इस तिरंगे में कुछ बात तो है !
आज़ादी के किस्से किताबों में बंद हुए
भाषण और वो गीत थोड़े नापसंद हुए
सफ़ेद यूनिफार्म की यादें ,’सौगात’ तो है
इस तिरंगे में कुछ बात तो है
नीला पासपोर्ट या हो क्रिकेट संग्राम
विदेशों से “मिस यू इंडिया” के ऐलान
“भारतीय” कहलाने के गर्वित हालात तो हैं
इस तिरंगे में कुछ बात तो है
राष्ट्रगान की धुन कानों में पड़ते ही
व्हाट्सएप्प पर झंडे का इमोजी आते ही
आँखों में सैलाब-ए -जज़्बात क्यों है?
इस तिरंगे में कुछ बात तो है
समस्याएँ तो हर घर में होती है
पर स्वादिष्ट सबसे माँ की रोटी है
जगमगाती अस्सीवीं वर्षगाँठ तो है
इस तिरंगे में कुछ बात तो है

केसरिया इतिहास सूर्योदय गाता है
“हरा होगा शुभ्र प्रयास”, दोहराता है
स्वप्निल कल का आगाज़ तो है
इस तिरंगे में कुछ बात तो है

प्रसन्नता के दीपक : सौरभ शर्मा

न डरो न डगमगाओ,
अविचलित,अटल, सत्कर्मी बनजाओ।
मानो कुछ ही पल अंधियारी के मेघ,
वर्षा के होते ही छट जाएंगे।
न मानो हार चाहे जो मुसीबत,
हम सब बनेंगे प्रसन्नता के दीपक ।

मृत्यु के अंचल मे, हम सब बंधे हैं,
जाना कब किसको ये कर्म तैय करे हैं।
वक्त है खराब, पर हौसला भी है साथ,
हर पल सुनहरा , खुशी का है हाथ।
जियेंगे-जियेंगे हम फिर जियेंगे,
न लगने देंगे , भय की ये दीमक ।
हम सब बनेंगे प्रसन्नता के दीपक।

आंसू के झरने , निर्बलता का प्रतीक,
कायर नहीं हम, हासिल करेंगे जीत।
है घनी रात काली तो क्या हुआ?
हम सभी तो हैं सूरज हो किरण रोशनी की,
करना वही ! जो हुआ नहीं अभी तक,
हम सब बनेंगे प्रसन्नता के दीपक।

हम अभिनव राष्ट्र के निर्माता,
स्वराज अधिकार है कहलाता।

गिरिराज शिखर नभ में जिसके,
हम साथी हैं पगतल उसके।
रहे भारतवर्ष सदियों सदी तक,
हम सब बनेंगे प्रसन्नता के दीपक।

न बनो मत्तगज मतवाले ,
तुम बनो आर्य से रखवाले ।
वाणी विराम की ओर करूं,
ये कर्मभूमी यही जीऊं – मरूं।
पहचान यही खुशियों की कीमत,
हम सब बनेंगे प्रसन्नता के दीपक।

फिर आया स्वतंत्रता दिवस : मीरा ठाकुर

फिर आया स्वतंत्रता दिवस,
चारों ओर छाई तिरंगे की हरियाली,
लोग दे रहे हैं एक-दूजे को
बधाई और बधाई।
याद करें सब जन
स्वतंत्रता की उस लड़ाई के
वीर पुरुषों और नारियों को,
गाएँ गीत सभी अब
रानी, ऊधम और आज़ाद की—
गाथाएँ उन वीरों की गाएँ,
जो बने स्वतंत्रता के परवाने।
पर क्यों रह जाए
उनका त्याग और बलिदान
केवल इतिहास के पन्नों में?
क्यों भूलें हम उनके
दिए हुए बलिदानों को?
क्या हक़ हमारा नहीं बनता
देश की सुरक्षा में तैनात
कमांडो के साहस को बचाने का?
संस्कृति और उसकी अस्मिता की
रक्षा का संकल्प निभाने का?
भले ही न देनी पड़े हमें
कोई बड़ी परीक्षा,
पर देश के प्रति
अपना कर्तव्य तो निभाएँ।
माना, अब स्वतंत्र हैं हम,
पर अपने ही विचारों की बेड़ियों के
बंधक क्यों हैं हम?

क्यों न तोड़ दें उन्हें,
क्यों न स्वयं को मुक्त करें,
और स्वतंत्र हो जाएँ
सही अर्थों में हम?
आओ,
एक नया भारत बनाएँ—
जहाँ स्वतंत्रता केवल उत्सव न हो,
बल्कि हर मन की चेतना बन जाए।

क्या तुम सहमत हो? : नरेन्द्र ग्रोवर “आनन्द मुसाफ़िर”

मुझे तो लगता है
क्या तुम सहमत हो?
पूर्वज हमारे हमसे अधिक
स्वाभिमानी थे
पुरुषार्थी थे शत्रु बोध
में ज्ञानी थे
प्रताप, शिवाजी की
बलिदानी भूल गए हम
जीवन और स्वतंत्रता
ऋण है उनका भूल गए हम
मुझे तो लगता है
क्या तुम सहमत हो?

प्राण लहू से सिंचित धरती
सौंप गए
फांसी पर दी जान
वतन को सौंप गए
एक अंधेरी रात
बंटी माँ भारती
स्वार्थ की खातिर
बुलाये, बैठाये, पाले, पोषित किये
दुश्मन बाहर, दुश्मन अंदर
फिर पाठ पढ़ाया
भाई चारे का, सहनशीलता का
कटने दिया सिर्फ
हिन्दू जात को
पर शत्रु को भरसक उकसाया
Socialism और Secularism
कोने से ला कर चिपकाया
मुझे तो लगता है
क्या तुम सहमत हो?

साफ और सपष्ट है उनके इरादे
चलायमान करते
बहत्तर हूरों के वादे
हम धूमिल आशाओं और
कायरता को पहनाएं
सहिष्णुता के लबादे
कोई तो सच बोल मुझे बता दे
जो मेने देखा , तुमने भी देखा
अपनी आंखो से
गर झूठ है तो समझा दे
मुझे तो लगता है
क्या तुम सहमत हो?

गर तुम सहमत हो
ध्वजा उठाओ
शस्त्र संभालो
भीड़तंत्र की ताकत
मंदिर से हर मंगलवार
निकालो
जुम्मे को मंगल से
टकरा लो
छोड़ बांसुरी सुदर्शन चक्र
उठा लो
मुझे तो लगता है
क्या तुम सहमत हो?

पंजाबी के प्रसिद्ध कवि पाश की कविता: भारत (हिंदीअनुवाद)।

भारत—

मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द
जहाँ कहीं भी प्रयोग किया जाए
बाक़ी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं
इस शब्द के अर्थ
खेतों के उन बेटों में हैं
जो आज भी वृक्षों की परछाइयों से वक़्त मापते हैं
उनके पास, सिवाय पेट के, कोई समस्या नहीं
और वह भूख लगने पर अपने अंग भी चबा सकते हैं
उनके लिए ज़िन्दगी एक परम्परा है
और मौत के अर्थ हैं मुक्ति

जब भी कोई समूचे भारत की ‘राष्ट्रीय एकता’ की बात करता है
तो मेरा दिल चाहता है
कि उसकी टोपी हवा में उछाल दूँ
और उसे बताऊँ कि—
भारत का अर्थ किसी दुष्यंत से संबंधित नहीं है
बल्कि उस खेत में है
जहाँ अन्न उगता है
और जहाँ सेंध लगती है

मैं कहीं भी रहूँ : डॉ.शैलजा सक्सेना

मैं कहीं भी रहूँ पर तेरे पास हूँ
आदि से अंत तक तेरी श्वास हूँ।

पंचमी रंग की, दीप की अल्पना
भेज राखी, करूँ गर्व से कल्पना
कृष्ण का जन्म हो, या हो राम का
ज्ञान तप से मैं काटूँ सभी जल्पना,
रंग तिरंगे का माथे लगाया मैंने
न भूलूँ कभी वह अभ्यास हूँ॥

मैं कहीं भी रहूँ, तेरे पास हूँ…
जब सरयू उमड़, कर रही आरती
जब घाटी ने केसर हवा को किया
जब परदे उठे, बेडियाँ तोड़ कर
जब किसी ने विश्वास नया सा दिया
मैं वहीं थी, वहीं थी, हर एक पल,
तेरे प्रेम डूबी उपन्यास हूँ॥

मैं कहीं भी रहूँ, तेरे पास हूँ….
मुझ में पींगें भरे, मेंहदी वाली हवा
तो रण भेरी बजाएँ, हवा सरहदीं
खून में आँधियाँ क्रोध की उठ चलें
जलाते हैं जब घर मेरा अलहदी
मौन हूँ, तो हुंकार भी देश की,
कर्मयोगी लिखित संन्यास हूँ॥

मैं कहीं भी रहूँ, तेरे पास हूँ,
आदि से अंत तक तेरी श्वास हूँ॥

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