विशेष विमर्श में प्रगति टिपणीस के यात्रा-वृत्तांत ‘बनारस की कुछ बात है ऐसी’
लखनऊ से ताल्लुक़ रखने वाली प्रगति टिपणीस कम से कम तीस वर्षों से मॉस्को में निवास कर रही हैं। वह पेशे से इंजीनियर हैं; लेकिन, पिछले कई वर्षों से साहित्यिक और व्यावसायिक अनुवाद के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने ‘आईसेक्ट पब्लिकेशन, भोपाल’ से प्रकाशित पुस्तक ‘रूस की चयनित रचनाओं का संकलन और संपादन किया है। साथ ही, वह ऑनलाइन पत्रिका ‘अनन्य-रूस’ की संपादक भी रही हैं। वह रूस की सबसे पुरानी भारतीय संस्था ‘हिंदुस्तानी समाज, रूस’ की महासचिव भी हैं। उनकी कविताओं में प्रकृति की आमद सुहानी लगती है। – डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र

बनारस की कुछ बात है ऐसी…
वाराणसी की गलियों में घूमते-घूमते आया यह ख़याल
सदियों से बनी हुई है हस्ती इसकी, क्या है ऐसा कमाल?
क्या होता होगा वह आलम जब शहनाई की दिलकश तान
का जादू घोलते होंगे बैठे चारपाई पर बिस्मिल्लाह खान
और मंदिरों की घंटियों और आरती के स्वरों की धुन
से मिलती होगी मस्जिद से निकलती अज़ान की गूँज
जब थमती होगी हथकरघा से निकलने वाली मधुर खड़खड़ाहट
और गूंजती होगी बिरजू महाराज के घुंघरुओं की खनखनाहट
गंगा की लहरों के अंतर्मन में न जाने समाएं हैं कितने गीत
शब्द और अर्थ हो सकते हैं उनके अनेक, पर है एक संगीत।
हम प्लैट्फ़ॉर्म नम्बर 9 से 1 की तरफ़ जाने के लिए पुल पर चढ़े ही थे कि नीचे से किसी ने ज़ोर से पुकारा ‘पीली कोठी’। आवाज़ काफ़ी तेज़ थी और हम भी पीली कोठी पहुँचने की कोशिश में लगे हुए थे। पुल से नीचे झाँका तो पान चबाता, मुस्कुराता हुआ छोटी क़द-काठी का एक लड़का हाथ हिला रहा था। जब तक हम कुछ कहते, वह सीढ़ियाँ चढ़कर पुल पर पहुँच चुका था। मिलते ही बोला आपको पीली कोठी 20-25 मिनट में पहुँचा दूँगा। हम सब एक सुर में बोल उठे, दूसरे रिक्शावाले यह कह कर जाने तक को तैयार नहीं हैं कि वहाँ पहुँचने में दो-ढाई घंटे
लगेंगे और तुम कहते हो बीस मिनट। ग़ुलाम बशीर नामक लडके ने कहा कि आप मेरी बात मानिए, मैं आपको वहाँ पहुँचा दूँगा।
हम चार महिलाएँ – संगीता, पारुल, राशि और मैं – वाराणसी पहुँचे थे और हमारा पहला मक़सद बनारसी साड़ियाँ ख़रीदना था। पीली कोठी में अदनान की दुकान हमारी पहली मंज़िल थी। जब कई क्या, सभी रिक्शावालों ने वहाँ जाने से इंकार कर दिया था और हमें पुल के दूसरी तरफ़ से रिक्शा पकड़ने के लिए भेज दिया था, ऐसे में ग़ुलाम की बात मान लेने का ही हम सबका दिल चाहा। हम चल दिए उसे अपना सारथी मान। पर हम चार थे, एक रिक्शे में कैसे समाते। ग़ुलाम बोला, आपमें से कोई एक आगे बैठ जाइए और तीन पीछे। उसकी बातों और बात करने के ढंग में इतनी मिठास और अपनापन था कि हम उस पर भी तैयार हो गए। तब, यूँ शुरू हुई हमारी ‘फ़ेरारी राइड’ काशी की गलियों की।
हम कैंट इलाक़े में ठहरे थे और वहाँसे थोड़ा बाहर आते ही हमने बनारस की तंग सड़कों पर गाड़ियों का जंगल देखा। ऐसा मालूम पड़ता था कि हम उसमें फँसे ही रह जाएँगे। लेकिन ग़ुलाम को जैसे गाड़ियों के बीच से बिना किसी खरोंच निकल जाने का हुनर आता था। सब खड़े थे और हम उड़े जाते थे। हवा के झोंके, रोमांचभरी सवारी और ग़ुलाम की साफ़दिली और चुटीली बातों पर हम सब हँसती जा रही थीं। कई बार हमने उसे धीरे और संभल कर चलने की हिदायत भी दी, तब वह बोला- आप लोग आराम से बैठिए, मैं जल्दी ही आपको आपकी मंज़िल पर पहुँचा दूँगा। हमने भी चिंता छोड़ दी और ऑटो रिक्शा सवारी और बनारस के समाँ का लुत्फ़ उठाने लगीं।
ग़ुलाम अपनी बात पर खरा उतरा, 25 मिनट में हम अदनान को फ़ोन कर उसकी दुकान पर पहुँचने का पता पूछ रहे थे। चंद मिनटों बाद साड़ी की दुकान से फ़रज़ान आया और हमें वहाँ का रास्ता दिखाने लगा। यूँ शुरू हुआ हमारा वाराणसी की संकरी गलियों का सफ़र। उन हर कुछ क़दम पर मुड़ती गलियों में दोपहर की चिलचिलाती गरमी में हमने ज़िंदगी के तमाम रंग देखे। लकड़ी की पट्टियों और रबर की गेंदों से खेलते भावी विराट कोहली और मुहम्मद शमी देखे, चारा खाती बकरियाँ, घरों के चबूतरों पर अपनी बातों में मशगूल बच्चियाँ और देखे कुछ बच्चे–किताबों की दुनिया में खोए हुए। हर तरफ़ से कट-कट रेशम बुनने की आवाज़ें आ रही थीं। दुकान के बाहर हमने एक खिड़की से झाँका तो पाया कि छोटे-छोटे कमरों में कितनी शदीदगी से सभी की मनपसंद बनारसी साड़ियाँ बनाई जा रही हैं। जुलाहे पूरी तन्मयता से काम में जुटे थे। एक बार हम दुकान में दाख़िल हुए तो उसके बाद वक़्त कैसे गुज़रा उसका पता ही न चला। हमारी आँखों के सामने हर रंग, डिज़ाइन, फ़ैशन की साड़ियाँ आती गईं। बनारसी साड़ियाँ कई बुनाइयों में आती हैं और उनको जानना और समझना इतना आसान नहीं होता। लम्बे समय तक सुंदर साड़ियों के समंदर में डूबे रहने के बाद हमने बड़ी कठिनाई से कुछ साड़ियाँ चुन ही लीं।
दुकान से निकलकर गलियों के जाल से हम जैसे ही बाहर आये, गुलाम हमारा इंतज़ार कर रहा था| हमने कचौड़ी और चाट खाने, लस्सी पीने, गंगा-घाट जाने और शाम की आरती देखने की अपनी सभी इच्छाएं उसके सामने रख दीं| उसने भी अपने शांत अंदाज़ में सब कुछ संभव है कह दिया| हाँ, हमें एक और साड़ी की दुकान भी जाना था| खैर, हमने अपना अगला पड़ाव डाला, मशहूर चाट और लस्सी की दुकान पर, जहां पेट पूजा कर हमने आगे का रुख किया| पेट और मन तृप्त हो जाने के बाद हम साड़ी की और खरीद करने के लिए हमें सुझाई गयी दूसरी दुकान
के लिए निकले। इस दुकान को ढूंढने में हमें थोड़ा समय लगा और अनजान गलियां ऐसी लगीं मानो वे भूलभुलैया के भटकीले रास्ते हों। आखिरकार, हम पहुंच गए अपने गंतव्य स्थान पर। यह दुकान थोड़े सजीले इलाके की एक आलीशान कोठी में थी। वहां पर बड़े अदब और तहज़ीब से ज़फर ने हमारा इस्तेकबाल किया और उतने ही सब्र और इत्मीनान से हमें एक से बढ़कर एक साड़ियां दिखाने लगा। हम अपनी अधिकतर खरीदारी तो कर चुके थे, लेकिन दो साड़ियां हमें यहाँ बहुत ही पसंद, जिन्हें हमने खरीद लिया। बात यह तय हुई कि साड़ियों की फिनिशिंग वगैरह अगले दिन दोपहर तक हो जाएगी और हम उन्हें फिर ले सकेंगे।
बनारस जाने के अपने मक़सद को हम लगभग पूरा कर चुके थे। शाम भी हो चुकी थी। गर्मी का प्रकोप थोड़ा घट गया था और अब सबके दिलो-दिमाग में सिर्फ एक ही बात घूम रही थी- गंगा की तरफ जाना और विश्व-विख्यात घाटों पर टहलना। गुलाम को हम अपना यह प्लान बता चुके थे, जैसे ही हम रिक्शे तक पहुंचे, वह बोला कि गंगा पर नौका-विहार का इंतज़ाम हो चुका है।
तदनंतर, अपने अंदाज़ में जल्दी ही गाड़ी को तेज़ी से टेढ़ी-मढ़ी सड़कों और गलियों पर दौड़ाते हुए उसने एक जगह पहुँच कर गाड़ी रोक दी और बोला, “लीजिए, पहुँच गए घाट।“ एक संकरी गली से निकलकर जैसे ही हमने हनुमान घाट की सीढ़ियों से उतरते हुए बहती गंगा का नज़ारा देखा, हर किसी का दिल ख़ुशी से झूम उठा, कोई तो पानी पर फैली डूबते सूरज की लालिमा के सौंदर्य पर मोहित था, कोई पावन गंगा का दर्शन पाकर खुद को धन्य मान रहा था तो किसी की दिनभर की थकान नदी से आ रहे ठंडी हवाओं के झोंके में जैसे रफूचक्कर हुए जा रही थी। हम जब घाट पर पहुंचे तो नाव और मुस्कान के साथ गोपाल हमारा इंतज़ार कर रहा था।
गोपाल ने बड़े चाव से हमें घाटों के नाम और उनका महत्त्व बताना शुरू किया। पहले तो वह नाव अस्सी घाट की तरफ ले कर चला। वही अस्सी घाट जो बनारस का दिल है, जहाँ से उठी हवा पूरे शहर का मिज़ाज तय करती है। कहते हैं सुबह उस जगह पर पाई जाने वाली रौनक का कोई मुक़ाबला नहीं है। ख़ैर, हमारी क़िस्मत में उस दिन उसकी एक झलक पाना ही था। हमने अपनी नाव से ही उन सभी विश्व- विख्यात घाटों को देखा जिनकी महिमा और महत्त्व का वर्णन कर पाना संभव नहीं। हम शाम को दशाश्वमेघ घाट पर होने वाली आरती के लिए समय से थोड़ा
पहले पहुँच गए। हम तो घाटों और चारों तरफ फैली छठा के अनुपम सौंदर्य में डूबे हुए थे और पता ही न चला कि कैसे सभी नौकाएं एक जाल में बुन गईं। आरती
शुरू हुई, बहुत हद तक यह एक मंच की प्रस्तुति के समान लगती है; लेकिन, उस परिवेश में जिसका आस्था, धर्म और आध्यात्म से सम्बन्ध सदियों से रहा है, इस आरती को एक अद्भुत सम्मोहन प्रदान करता है। एक घंटे की यह आरती मिनटों में समाप्त हुई जैसी प्रतीत होती है। आरती के साथ-साथ आठ-दस वर्षीया एक छोटी बालिका ने हमारा ह्रदय जीत लिया। वह नावों से बने जाल पर अपनी सीधी पीठ और बेधड़क चाल से चलती लोगों को गंगा में चढ़ाने के लिए फूल और दिए बेच रही थी। इस बात में कोई संदेह नहीं कि घर की आर्थिक स्थिति के कारण वह
यह काम कर रही थी। लेकिन, उसे अपने और अपने परिवार के बारे में किसी भी प्रकार की सहानुभूतिपूर्ण बातें नहीं सुननी थीं और पूछने पर कहती थी की गली के बच्चों के साथ रोज़ाना एक जैसे खेल-खेल कर वह ऊब चुकी है और नावों पर यूं चलना और दौड़ना उसे अधिक भाता है। गोपाल ने बच्ची और अपने काम के प्रति अत्यंत उत्तम व्यवहार का प्रदर्शन किया। हमें ऐसा लगने लगा था की हमसे मिलने वाला हर शख्स पहले वाले से जैसे थोड़ा बेहतर हो।
आरती समाप्त हुई, हम घर लौटे और गुलाम बशीर हमें बनारसी पान खिलाकर सुबह वापिस आने का वादा कर चला गया। अगले दिन हमने अपनी फेहरिस्त में लिखे दूसरे कामों को शुरू किया, जैसे काशी विश्वनाथ और संकट-मोचन मंदिरों का दर्शन, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की सैर, वहीँ पास के चौराहे पर बुढ़िया की दूकान की लस्सी और कचौड़ी खाना, वापिस अदनान की दुकान जाना तथा कुछ और खरीदारी करना। हमारे सब काम गुलाम जी की कृपा से यथासमय होते चले गए। बहरहाल, शुरू हुए इस रोमांचक सफर का अंत तो होना ही था। हमने लंच उसी गेस्ट- हाउस पर किया जहां हम ठहरे हुए थे और एयरपोर्ट ड्रॉप करने के लिए हमारा वाहन चालक उपलब्ध ही था। इस बार, उसने चार लोगों के साथ-साथ जहाज़ के केबिन में जा सकने वाले चार स्ट्रोलर बैग भी अपनी जादुई रिक्शा में फिट कर दिए। फिर क्या था हमने अपनी उस ‘फ़ेरारी’ पर आखिरी यात्रा पूरी की और पहुँच गए समय से अपने गंतव्य पर। कुछ भारी मन से हमने गुलाम को अलविदा कहा और बढ़ गए टर्मिनल की तरफ।
जब थोड़ी फुरसत हुई और सोचा एक हवा के झोंके की तरह गुज़र गए दो दिनों के बारे में, तो एक बार फिर इस बात पर विश्वास पक्का हुआ कि लोग बुरे नहीं है, मुआ यह ज़माना बुरा है। हम बनारस कई शंकाओं और आशंकाओं के साथ गए थे। हमारा न तो वहाँ कोई जानकार था और न ही कोई हमारे स्वागत या विदाई के लिए होने वाला था। लेकिन फिर लौटते समय यह उदासी क्यों थी जैसे कि अपनों से बिछुड़ कर जा रहे हों? जिस कमाल के बारे में जानने की जिज्ञासा शुरू से थी, उसका इस मन की उधेड़बुन में हल मिल गया। हमें जितने भी लोग मिले थे उन दो दिनों में, उनका नाम और काम भले कुछ भी रहा हो, उनका धर्म एक था- अपने मेहमानों का पूरा ख़याल रखना और अपने बेहतर हिस्से से उनका परिचय करवाना। मेरे हिसाब से शायद इसी को इंसानियत कहते हैं और यही शायद हमारे समाज का तानाबाना है।
