वह देश चोखा – जिसमें चाय का खोखा (हास्य-व्यंग्य) : अक्षय राज शर्मा

कभी दुनिया में दो बड़े सवाल हुआ करते थे—चीन क्या खाता है और भारत क्या नहीं खाता?
फिर एक तीसरा सवाल पैदा हुआ—
चाय कहाँ उगती है?
और चौथा सवाल अंग्रेजों ने पैदा किया—चाय कहाँ उगती है, यह पता चल गया; अब इसे उगाने वाला कौन होगा?
यहीं से इतिहास ने करवट ली।
कहते हैं, चीन चाय के लिए प्रसिद्ध था और भारत अपनी आध्यात्मिकता, योग, वेदांत और शाकाहार के लिए।
चीन में चाय की प्याली उठी तो दुनिया ने कहा—“वाह! क्या पेय है!”
भारत में चाय की प्याली उठी तो किसी ने पूछा—“भाई, यह शाकाहारी है या मांसाहारी?”
यह सब देख-सुनकर चाय ने अपना माथा पीट डाला।
उसने कहा—“मैं तो पत्ती हूँ!”
शाकाहारी बोले—“पत्ती है तो हमारी।”
मांसाहारी बोले—“दूध डालो तो हमारी।”
चीनी बोले—“हमारी तो पहले से है।”
अंग्रेज चुपचाप बोले—“तुम सब लड़ो, बागान हम लगाएँगे।”
चाय की झाड़ी और साम्राज्य की झाड़ी
1815 के आसपास अंग्रेजों को असम की सीमा के पास कुछ ऐसी झाड़ियाँ दिखाई दीं, जिनमें उन्हें चाय की संभावना नज़र आई। खबर कलकत्ता पहुँची तो अंग्रेजों की आँखों में अचानक वही चमक आई, जो आजकल किसी व्यापारी की आँखों में ‘स्टार्टअप आइडिया’ सुनकर आती है।
एक अंग्रेज अधिकारी बोला—“क्या यह चाय है?”
दूसरे ने कहा—“पता नहीं।”
—“तो पता लगाओ।”
—“क्यों?”
—“क्योंकि अगर चाय है तो व्यापार होगा।”
—“और अगर व्यापार होगा?”
—“तो साम्राज्य मुस्कुराएगा।”
उधर असम की धरती चुपचाप देख रही थी। उसे क्या पता था कि उसकी एक छोटी-सी पत्ती भविष्य में इतनी बड़ी आर्थिक कहानी लिखने वाली है कि दुनिया भर के लोग सुबह उठकर उसे कप में डुबोकर इतिहास पीने लगेंगे।
बर्मा आया, अंग्रेज आया और चाय बीच में आ गई
1824 में बर्मा और अंग्रेजों के बीच युद्ध हुआ। बर्मा ने पूर्वोत्तर में अपना प्रभाव बढ़ाया। अंग्रेजों को चिंता हुई कि कहीं मामला बंगाल तक न पहुँच जाए।
अंग्रेजों ने सोचा—“पहले सीमा बचाओ।”
फिर किसी ने धीरे से पूछा—“और चाय?”
अंग्रेज बोले—“सीमा भी बचाएँगे और चाय भी।”
भयंकर युद्ध हुआ। विजय मिली। 1826 में यांडबू की संधि हुई। पूर्वोत्तर पर अंग्रेजी प्रभाव बढ़ा।
लेकिन इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना देखिए—लड़ाई ज़मीन के लिए हुई थी, मगर आने वाले समय में उसी ज़मीन ने चाय से अंग्रेजों की जेब भर दी।
असम की धरती ने शायद पहली बार सोचा होगा—“मेरे पेड़ तो पत्तियाँ उगा रहे थे, ये लोग साम्राज्य उगा रहे हैं!”
रॉबर्ट ब्रूस और वह छोटी-सी पत्ती अंग्रेज-बर्मी युद्ध के समय रॉबर्ट ब्रूस नामक एक नौसैनिक अधिकारी ब्रह्मपुत्र क्षेत्र में था। उसकी नज़र कुछ ऐसी झाड़ियों पर पड़ी, जो चाय जैसी थीं। उसने नमूने इकट्ठे किए और कलकत्ता के बोटेनिकल गार्डन में भेजे।
वहाँ पुष्टि हुई—“हाँ, यह चाय है।”
इतिहास ने कहा—“वाह!”
अंग्रेजों ने कहा—“बहुत अच्छा!”
व्यापारी ने कहा—“कितने एकड़?”
और चाय की पत्ती ने कहा—“भाइयो, मैं अभी पौधा ही हूँ, मुझे बही-खाता मत बनाइए!”
लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।
चीन बनाम भारत : चाय की अंतरराष्ट्रीय कुश्ती
अब चीन और भारत की तुलना होने लगी। एक साहब बोले—“चीन चाय का पुराना देश है।”
दूसरे बोले—“भारत भी पीछे नहीं।”
तीसरे बोले—“लेकिन चीन मांसाहारी है।”
चौथे बोले—“भारत शाकाहारी है।”
चाय ने पूछा—“इससे मेरा क्या संबंध?”
साहब बोले—“बहुत संबंध है।”
चाय बोली—“कैसे?”
—“क्योंकि हम तय करेंगे कि तुम्हें कौन पिएगा।”
चाय बोली—“मुझे तो बस कोई प्यार से पी ले।”
लेकिन मनुष्य को प्यार से पीने की चीज़ को भी विवाद का विषय बनाने में महारत हासिल है।
किसी ने कहा—“चाय भारतीय संस्कृति है।”
दूसरे ने कहा—“नहीं, यह चीनी संस्कृति है।”
तीसरा बोला—“नहीं, यह अंग्रेजों की देन है।”
चाय ने कप के भीतर से आवाज़ लगाई—“भाइयो! मेरा जन्म चाहे जहाँ हुआ हो, मुझे लोकप्रिय तुम सबने मिलकर बनाया है।”
शाकाहारी भारत की महान चाय
भारत में शाकाहार पर बहस छिड़ी।
एक सज्जन बोले—“हम शाकाहारी हैं।”
दूसरे ने पूछा—“चाय?”
“चाय भी।”
“दूध?”
“हाँ।”
“चीनी?”
“हाँ।”
“तो फिर सुबह पाँच बजे से चार कप क्यों?”
सज्जन बोले—“यह भोजन नहीं, भावना है।”
पीछे से चायवाला बोला—“साहब, भावना का हिसाब बाद में करिए, पहले पाँच कप के पैसे दीजिए।”
साहब बोले—“देश के लिए जान दे सकता हूँ।”
चायवाला बोला—“पहले मेरे लिए दस रुपये दे दीजिए।”
देशभक्ति अचानक शांत हो गई।
चीन की थाली, भारत की थाली और चाय का खोखा
अब किसी ने घोषणा कर दी—“चीन मांसाहारियों का देश है और भारत शाकाहारियों का!”
चाय ने पूछा—“क्या पूरी दुनिया में हर चीनी नागरिक एक जैसा खाता है?”
“नहीं।”
“क्या हर भारतीय एक जैसा खाता है?”
“नहीं।”
“तो फिर मुझे क्यों दोनों देशों की थाली का प्रवक्ता बना रहे हो?”
(कोई उत्तर नहीं।)
चाय ने कहा—“भाइयो! भोजन से राष्ट्र की पहचान पूरी नहीं होती। राष्ट्र मनुष्यों से बनता है और मनुष्य अपनी-अपनी थाली से।”
चायवाला बोला—“वाह! आज चाय में दर्शन ज़्यादा है, दूध कम।”
असली खोखा
एक दिन किसी ने पूछा—“चाय का सबसे बड़ा आविष्कार क्या है?”
चायवाले ने कहा—“चाय की दुकान।”
“क्यों?”
“क्योंकि यहाँ आदमी पाँच रुपये की चाय पीकर पाँच करोड़ की राजनीति करता है।”
“और?”
“यहाँ बेरोज़गार अर्थशास्त्री बन जाता है।”
“और?”
“यहाँ किसान विदेश-नीति समझाता है।”
“और?”
“यहाँ डॉक्टर पोषण-विशेषज्ञ बन जाता है।”
“और?”
“यहाँ शाकाहारी मांसाहारी को समझाता है कि क्या खाना चाहिए।”
“और मांसाहारी?”
“वह शाकाहारी को समझाता है कि क्या नहीं खाना चाहिए।”
“फिर?”
चायवाला मुस्कुराया—“फिर दोनों एक ही प्लेट में बिस्कुट डुबोकर चाय पीते हैं।”
वह देश चोखा!
एक विदेशी पर्यटक ने भारत की चाय की दुकान देखकर पूछा—“यहाँ क्या मिलता है?”
चायवाला बोला—“चाय।”
“और?”
“बहस।”
“और?”
“इतिहास।”
“और?”
“राजनीति।”
“और?”
“आयुर्वेद।”
“और?”
“शाकाहार-मांसाहार का विवाद।”
“और?”
चायवाला बोला—“सबसे महँगी चीज़—राय!”
विदेशी ने पूछा—“राय कितने की?”
चायवाला बोला—“मुफ़्त।”
“और चाय?”
“दस रुपये।”
विदेशी ने सिर हिलाया—“अब समझा, यह देश चोखा है।”
चायवाला बोला—“क्यों?”
विदेशी ने कहा—“क्योंकि यहाँ चाय महँगी है, राय मुफ़्त है और हर आदमी अपने आपको विशेषज्ञ समझता है।”
यह सुनकर चायवाला हँस पड़ा। फिर उसने केतली चढ़ाई और बोला—
“चीन ने दुनिया को चाय दी, असम ने उसे बागान दिया, अंग्रेजों ने व्यापार दिया और भारत ने उसे खोखा दिया।
अब दुनिया चाय पीती है और हिंदुस्तान चाय पर बहस करता है।
यही है—वह देश चोखा,
जिसमें चाय का खोखा!”

चेहरे पर मुस्कान लाने के साथ-साथ यह व्यंग्य पाठक को एक गहरी और विचारोत्तेजक बात कह जाता है। इतिहास, राजनीति और समाज की जटिलताओं पर यह व्यंग्य अत्यंत सटीक, रोचक और मनोरंजक ढंग से प्रहार करता है। हास्य के आवरण में गंभीर प्रश्न उठाना इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। – तितिक्षा शाह

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