दिन विशेष (कविता) में अनूप भार्गव की कविताएँ
“न तो साहित्य का बड़ा ज्ञाता हूँ, न ही कविता की भाषा को जानता हूँ, लेकिन फ़िर भी मैं कवि हूँ,क्योंकि ज़िन्दगी के चन्द भोगे हुए तथ्यों और सुखद अनुभूतियों को, बिना तोड़े मरोड़े,ज्यों कि त्यों कह देना भर जानता हूँ ।” ये पंक्तियाँ हृदय से कवि और व्यवसाय से कंप्यूटर सलाहकार अनूप भार्गव की हैं। उन्हें वर्ष 2021 में विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस द्वारा विश्व भर में हिन्दी की गतिविधियों को संचालित करने के लिए वैश्विक समन्वयक नियुक्त किया गया। अमेरिका में रहने वाले अनूप भार्गव सालों-साल से हिंदी के प्रचार प्रसार में अथक रूप में जुटे हैं। न्यूयॉर्क स्थित भारतीय कौंसलावास ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर हिंदी पत्रिका प्रकाशित करना तय किया, जो अनन्य नाम से प्रकाशित हुई,जिसके आप प्रबंध संपादक हैं। – स्वरांगी साने

कविता बनी
टूटते मूल्यों
और विश्वासों की
शृंखला में जब
खुद की खुद से न बनी
कविता बनी
कल्पना की उड़ान में
सपनों के जहान में
मिट्टी के घरोंदे बनाते
जब उँगलियाँ सनी
कविता बनी
फूलों से गंध चुरा
तितली से रंग
अहसास के समंदर में
सीपियाँ चुनी
कविता बनी
बात मीठी कही
बात मन से कही
ढली शब्दों में
जब चाशनी
कविता बनी
कुछ कहा न सुना
सिर्फ़ देखा किए
मूक थे होंठ
फिर भी सुनी
कविता बनी
सिर्फ़ अपनी नही
पीर जग की सही
पूरे युग की व्यथा
शब्दों में जनी
कविता बनी
कुछ तो करना है
कुछ तो करना है
ये माना कि मेरी
एक आवाज़ के उठ जाने से
शायद कुछ नहीं होगा
लेकिन ये भी तय है …
मेरे इस वक्त चुप रह जाने से
आने वाली पीढियों तक
यकीनन कुछ नहीं होगा ।
तुम्हारे शब्द मुझ तक पहुँच ही कहाँ पाते हैं ?
तुम्हारे शब्द मुझ तक पहुँच ही कहाँ पाते हैं ?
अक्सर जमाने की
ज़बरदस्ती ओढाई गई
तहज़ीब की चाशनी में
फ़िसल के लौट जाते हैं ,
तुम्हारे शब्द मुझ तक पहुँच ही कहाँ पाते हैं ?
तुम्हारे होठों के गोल होने से शुरु हो कर
शब्दों के मेरे कान तक पहुँचने का समय
एक युग के समान लगता है ,
किताबों में पढा था ,
प्रकाश की गति ध्वनि से तेज हुआ करती है ,
शायद इसीलिये
तुम्हारे आँखो से कहे बोल
तुम्हारी आवाज़ से पहले ही
मेरी आँख की कोर तक पहुँच कर ठहर जाते है ।
तुम्हारे शब्द मुझ तक पहुँच ही कहाँ पाते हैं ?
