दिन विशेष व्यंग्य – गुरुकुल का रहस्य – विक्रम-वेताल : कमलेश कँवल

“राजन, नीचे बाईं ओर दृष्टि डालिए। अद्भुत दृश्य है!” विक्रम की पीठ पर लदे वेताल ने कहा।
विक्रम ने नीचे देखा और चौंककर बोला, “अरे! यह तो तबेला है। ये शिशु यहाँ क्या कर रहे हैं?”
वेताल ने आँखें बंद कीं और कुछ क्षण मन की आँखों से देखने के बाद बोला, “राजन, तबेला न कहें। जंबू द्वीपवासी क्रोधित हो जाएँगे। यह इनका गुरुकुल है। इन्होंने अद्भुत प्रगति की है। यहाँ इंसान और जानवर साथ-साथ प्रसन्नतापूर्वक विद्यार्जन करते हैं।”
“वाकई! अविश्वसनीय प्रगति है,” विक्रम ने कहा।
दोनों आगे उड़ने को हुए ही थे कि वेताल बोला, “राजन, दृश्य दिलचस्प है। क्यों न इसी ग्राम में थोड़ा विश्राम कर लें? थकान भी दूर हो जाएगी और यह रहस्य भी खुल जाएगा कि गुरुकुल में शिक्षण कैसे होता है।”
“चलो, इसी ग्राम में उतरते हैं।”
दोनों अदृश्य होकर ग्राम में उतर गए। गुरुकुल के सामने हथियारबंद रक्षक तैनात थे।
विक्रम बोला, “वेताल, इस गणराज्य का राजा महान है। बच्चों की सुरक्षा के लिए ऐसी व्यवस्था! वाह!”
दोनों गुरुकुल में दाखिल हुए। एक ओर गाय-भैंसें बँधी थीं, दूसरी ओर उनका पौष्टिक आहार रखा था। जर्जर टीन से ढके एक दालान में कुछ बच्चे बैठे थे।
विक्रम ने चारों ओर देखा, “वेताल, गाँव इतना बड़ा है, फिर गुरुकुल में बच्चे कम और पशु अधिक क्यों हैं?”
वेताल ने तत्काल अपने चैटजीपीटी से पूछा। उत्तर पढ़कर मुस्कराया, फिर बोला, “राजन, तुम बहुत प्रश्न करते हो। दिमागी नक्सल हो क्या? तुम्हारे सारे प्रश्नों के उत्तर मैं नहीं दे सकता। ऐसा करते हैं, मैं नारद बन जाता हूँ और तुम्हारे प्रश्न ग्रामवासियों से पूछ लेते हैं।”
इतना कहते ही वेताल ने पत्रकार का वेश धारण कर लिया। अदृश्य विक्रम उसके साथ हो लिया।
सामने एक ग्रामीण स्त्री दिखाई दी। वेताल ने पूछा, “बहनजी, गुरुकुल में इतनी सुरक्षा क्यों है?”
स्त्री बोली, “भैया जी, कुछेक तिलचट्टे कल स्कूल की बिल्डिंग तोड़ने आए रहे। हम सब मिलके पहले उनकी कटाई किए रहे, फिर ससुरों को भगा दिए रहे।”
वेताल चौंका, “स्कूल तोड़ने के लिए क्या-क्या सामान लाए थे?”
“उनको सामान की जरूरत ही नहीं थी। स्कूल की दीवारें इतनी कमजोर हैं कि ससुरा घूरकर देख लेते तो खुदै ढह जातीं।”
“तुम्हारे बच्चे हैं?”
“हैं।”
“इसी स्कूल में पढ़ते हैं?”
“कहाँ! यहाँ कौन पढ़ाई करता है? प्राइवेट स्कूल में जाते हैं। बस आती है, ले जाती है।”
तभी पीछे से आवाज आई, “यहाँ तो सिर्फ करगिल वालों के बच्चे पढ़ते हैं।”
“करगिल?”
“अरे, बाहर बस्ती दिख रही है न! हम लोग उसे करगिल कहते हैं। सब छोटी जाति वाले वहीं रहते हैं।”
“छोटी जाति?”
“हाँ, एससी-एसटी वाले।”
वेताल ने पूछा, “और आप लोग?”
“हम सब सवर्ण हैं। कोई अग्रवाल, कोई पटेल। चार-दो घर ठाकुरों के भी हैं।”
“स्कूल की पढ़ाई से संतुष्ट हैं?”
ग्रामीण हँस पड़ा, “अरे साहब! हम तो यहाँ के मास्टरों से भी कहते हैं—इन पर मेहनत करना बेकार है। आराम से आओ-जाओ, कोई कुछ नहीं कहेगा।”
तभी पीछे से दूसरी आवाज आई—
“यदि इनके बच्चे पढ़-लिख गए तो हमारे खेतों में मजूरी कौन करेगा?”
यह सुनते ही वेताल को जैसे साँप सूँघ गया।
वह तत्काल अदृश्य हुआ और विक्रम के साथ आकाश में उड़ चला।
दोनों गंभीर थे।
विक्रम ने वेताल की ओर देखा, “आज प्रश्न नहीं पूछोगे?”
“नहीं।”
दोनों दुःखी मन से अवंतिका नगरी की ओर उड़ते रहे।
इस बार कोई पहेली नहीं थी।
क्योंकि प्रश्न बहुत बड़ा था—ये जंबूद्वीपवासी क्या थे और क्या हो गए?
