दिन विशेष व्यंग्य : “हम उत्सवधर्मी लोग” – विजयानन्द विजय

नयी दिल्ली
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हम भारतीय बड़े मस्तमौला टाइप के लोग हैं, एकदम केयर फ्री और टेंशन फ्री।चाहे मंहगाई हो, बेरोजगारी हो या किसी भी तरह की दुश्वारी हो, हम टेंशन बिल्कुल भी नहीं पालते हैं। चाहे सोने-चांदी के दाम बढ़ जाएं, साग-सब्जी, तेल-दाल, आटे, पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छू लें, गैस सिलिंडर की भयंकर किल्लत हो जाए या रूपया रसातल में चला जाए, अपनी बला से। अपने राम का क्या जाता है ? हम तो घंटों लाईन में लग जाएंगे, हमें फुर्सत-ही-फुर्सत है। वैसे भी, आजकल खाने और सोने के सिवा कोई काम है भी तो नहीं। नोटबंदी के समय एटीएम की लाईन में लगने के बाद हम लाईन एक्सपर्ट और परफेक्ट तो हो ही चुके हैं। कहीं भी, किसी चीज की लाईन लगवा लो, हमें कोई दिक्कत नहीं है। हम लाईन में लगे-लगे मर जाएंगे, पर उफ्फ़ तक नहीं करेंगे। हम कष्ट सहने, बर्दाश्त करने, झेलने और धीरज के हिमालय हैं। शहंशाह हैं।
हम अपना दिमाग और बुद्धि बहुत बचाकर रखते हैं भाई, बड़े-बड़े कामों के लिए। फालतू की चीजों में हम इसे खर्च या मिस यूज नहीं करते हैं। कोरोनाकाल याद है न ? हमसे ताली-थाली-ड्रम-डिब्बा जो चाहे पिटवा लो। मोबाइल की लाईट जलवाकर गो-कोरोना-गो करवा लो, हमें कोई परेशानी नहीं है। दिमाग और बुद्धि का इस्तेमाल इस तरह के काम में हमने न कभी किया है, न कभी करेंगे। आप आदेश दो बस, फिर देखो। विश्वास न हो, तो गैस संकट पर फिर से ताली-थाली पिटवाकर देख लो। थाली-ड्रम-डिब्बा पिचका न दिया और अपनी हथेलियों को लहूलुहान न कर लिया, तो कहना। भाई, हम इसे राष्ट्रीय पर्व की तरह मनाते हैं। फालतू तर्क-वितर्क नहीं करते। आपदा में भी उत्सव मनाते हैं। हमारे इस विशिष्ट गुण को पूरी दुनिया जानती है।
विश्वास नहीं हो रहा ? अरे भाई, देखो, हम हर पांच साल में एक बार चुनाव की परीक्षा देते हैं। वोट देते समय हम लाजिकल नहीं होते। नेता जो भी आसमानी चुनावी वादे करते हैं और जुमले उछालते हैं, उसे हम एक कुशल क्रिकेटर की तरह डाइव मारकर कैच कर लेते हैं – चाहे हम स्लिप में खड़े हों या फारवर्ड शार्ट लेग में, चाहे लांग लेग में या बाउंड्री पर। नेता जी चाहे बाउंड्री से बाहर की हांक लें, हम बड़ी कुशलता से उसे लपक लेते हैं। बड़े प्यार से उनके हर गुनाह, भ्रष्टाचार और कुकर्म माफ करके सत्ता की चाभी थमा देते हैं। फिर चाहे वे हमें फटकारें, दुत्कारें या लतियाएं, हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता। हम इज़्ज़त -बेइज्जत के फालतू चक्कर में पड़ते ही नहीं हैं। टेंशन लेते ही नहीं हैं। धूल झाड़कर फिर खड़े हो जाते हैं और जयकारे लगाते रहते हैं। आप पूछेंगे कि हम इतने बेफिक्र कैसे हो सकते हैं, तो बता दें कि बेवजह की चिंता-फिक्र करके बीपी, शुगर के मरीज बनकर मरने से अच्छा है कि बिंदास जियो। मस्ती में जियो।
हमारा हृदय बहुत विशाल है। अपने पाकेट से हम चवन्नी भी खर्च नहीं करते हैं। मगर कोई नेता अगर अपनी रैली या जुलूस में हमें बुलाए, तो बस मीट-मुर्गा-पूड़ी-कचौड़ी-दारु पर ही हम नारे और जयकारे लगाकर गर्दा उड़ा देते हैं। इन बेचारे नेताओं पर हमें बहुत दया आती है, जब चुनाव के समय वे बेचारे घर-घर जाकर वोट की भीख मांगने लगते हैं तो। हमारा कोमल और मुलायम हृदय उनके हाथ जोड़ने, अनुनय-विनय करने और चरण वंदना से पिघल जाता है और हम उन्हें वोट दे देते हैं। जिता देते हैं। वोट देने में कोई पैसा थोड़े न लगता है ?
हम वो शख्शियत हैं, जो धूल को आंधी और राई को पर्वत बनाने की ताकत रखते हैं। पूरी दुनिया में हमारी कोई मिसाल नहीं है। भले ही हमें स्कूल-कालेज-हास्पिटल-सड़क-पुल न मिले, मगर हम मत का दान करने में कोई कंजूसी और कोताही नहीं बरतते। हम बड़े संतुष्ट लोग हैं। हमेशा खुश रहते हैं। हमारे नेताओं ने हमें सिखाया है कि कुछ भी बोलकर या वादा करके फिर पलट जाने या चुप हो जाने में कोई बुराई नहीं है। न ही कोई बेइज्जती है। विपक्ष में रहकर बड़ी-बड़ी बातें करने, हांकने और लंबे-लंबे तीर छोड़ने में जो मजा, उत्साह, उफान और जोश आता है न, वो कुर्सी मिल जाने पर नहीं आता। कुर्सी मिलने पर घिग्घी बंध जाती है। जो जनता उनके वादों पर रीझकर उन्हें जिताती है, वही कमबख़्त आ जाती है सवाल पूछने के लिए कि नेताजी, आपने तो ये सब वादे किए थे, बताओ कब पूरे कर रहे हो ? भला बताइए, नेता जी को और कुछ काम है कि नहीं? वे एक-एक को बताते फिरें कि ये किया, वो किया ? रात-दिन के विकास कार्यों से फुर्सत मिले, तो न बताएं ! हमने उनसे यह विलक्षण विद्या अच्छी तरह सीख ली है और अपने घरों में इसका सफलतापूर्वक प्रयोग करने लगे हैं। परिवार में ज्यादा सवाल पूछने वालों और विरोध करने वालों को हम घर से निकालने और संपत्ति से बेदखल करने की नोटिस थमा देते हैं। फिर वे हमेशा के लिए चुप हो जाते हैं। ऐसी रामबाण औषधि का आविष्कार करने के लिए देश के कर्णधार नेताओं का कोटि-कोटि आभार है।
निकम्मापन, बातों को फेंकना और लपेटना तथा इज्जत-बेइज्जत से ऊपर उठकर जीना हमारा वह विशेष और दिव्य गुण है, जो किसी भी अन्य प्रजाति में नहीं पाया जाता। क्योंकि इन चीजों पर हम जितना सोचेंगे, उतना टेंशन होगा और शरीर में उतना ही रोग बढ़ेगा। इसलिए अपना स्वास्थ्य ठीक रखने के लिए हम टेंशन कभी लेते ही नहीं। अपनी नाकामियों, विफलताओं और तर्कहीनता का उत्सव बड़े धूमधाम से मनाने वाले हम उत्सवधर्मी लोग हमेशा खुश रहते हैं।आप लोग भी सीख लीजिए और सुखी रहिए।
