दिन विशेष कविता में डॉ. जमुना कृष्णराज की कविता “मेरी मातृभूम”

मेरी मातृभूमि! इस भूमि की उपज बनी मैं,
इसकी गोद में पली-बढ़ी।
इसके बाग-बगीचे में मैं खेल-कूद कर हुई बड़ी॥
इसके जल से सिंचित, मेरी इस अन्न से भूख मिटी,
इसके उपवन हरे-भरे-से,
जिनसे मुझमें स्फूर्ति भरी॥
इसके पशु-पक्षी के कलरव गूँज रहे मेरे कानों में,
इसके बाँस से निकले सुर की गुनगुनाहट मेरे अधरों में॥
इसके स्वर्ण, रजत से मेरे बने अनेक हैं आभूषण,
पीतल, ताँबे, इस्पात के पत्तल,
सब इस भूमि की रज के कण॥
राम, कृष्ण, गौतम बुद्ध, सूर, कबीर और गुरु नानक—
इस पुण्य भूमि के हमारे पूर्वज बने
हमारे आदर्श के मानक॥
भक्त मीरा, सीता, सावित्री सब इस कोटि की आदर्श बनीं,
प्राणों के लाले पड़ने पर भी
अपने प्रण पर डटी रही॥
मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर सब इसकी भव्य इमारतें हैं,
धार्मिक सहिष्णुता के द्योतक बन
इसकी शान बढ़ाते हैं॥
क्लिंटन, बुश, ओबामा सब इस पुण्य भूमि को पहचान गए,
कारगिल के युद्ध में वीर भी
इसकी रक्षा हेतु बलिदान हुए॥
स्वतंत्र भारत के कई वारिस तारे बन चमकते हैं,
अपनी देन से नाम कमाते,
इस संसार में खूब महकते हैं॥
हे भारत माँ! हमेशा है तुमसे पाया मैंने जो बहुत कुछ,
प्रकट करूँ आभार अपना,
फिर भी मेरा हर प्रयास बहुत तुच्छ॥
जैसे जहाज से उड़ता पंछी फिर जहाज पर आता है,
संसार के हर कोने में जाऊँ,
फिर भी मेरा मन यहीं भाता है॥
मन की बात प्रकट करूँ अपनी अब जो मेरी चिर अभिलाषा है,
अगले जन्म का अवसर पाऊँ तो
तेरी कोख में ही हो—यही आशा है॥
