खोज ईश्वर की
ईश्वर को खोजते फिरते हैं
ईश्वर कहाँ है? ईश्वर कैसा है?
जिस मूर्ति की पूजा करते हैं
क्या ईश्वर बिल्कुल वैसा है?
देश, धर्म, जाति के आधार पर
ईश्वर का विभाजन करते हैं
उस अनंत असीम परम शक्ति को
सीमाबद्ध करके हम रखते हैं
करते हैं प्रार्थना उस से जब तब
और बहुत से प्रश्न भी करते हैं
समझते हैं पृथक अपने से उसको
और शिकायतें भी करते हैं
क्या सचमुच जाना है हम ने
उस ईश्वर का कैसा है रूप
या बिन जाने बस यूं ही हम
नित पूजा करते रहते हैं?
क्या खोजा ईश्वर को हमने
कभी किसी पुष्प के अंदर
उसके रंग, उसकी कोमलता
और उसकी सुगंध के अंदर?
क्या खोजा ईश्वर को हमने
किसी उड़ती तितली के अंदर
उसके चमकीले रंगों और
पंखों पर चित्रकारी के अंदर?
क्या खोजा ईश्वर को हमने
कभी चमकते सूर्य के अंदर
उसके उज्ज्वल प्रकाश, ऊष्मा
और उसकी लालिमा के अंदर?
क्या खोजा ईश्वर को हमने
कभी चाँद-सितारों के अंदर
उनकी धवल चाँदनी और
उनकी शीतलता के अंदर?
क्या खोजा ईश्वर को हमने
सावन के काले मेघों के अंदर
उस चमकती चंचल दामिनी
और वर्षा की बूंदों के अंदर
क्या खोजा ईश्वर को हमने
लहलहाते खेतों के अंदर
गीली मृदा की सौंधी महक
और उसकी उपजाऊ शक्ति के अंदर
क्या खोजा ईश्वर को हमने
पक्षियों के घोंसलों के अंदर
उनकी कार्य कुशलता और
उनके अद्भुत शिल्प के अंदर
क्या खोजा ईश्वर को हमने
विभिन्न पशु-पक्षियों के अंदर
उनके आकर्षक रंगों और
उनकी बोलियों के अंदर
क्या खोजा ईश्वर को हमने
उस नील गगन के अंदर
उसके असीम विस्तार और
उसकी निस्तब्धता के अंदर
क्या खोजा ईश्वर को हमने
विशाल सागर के अंदर
कभी उसके शांत स्वरूप में
और कभी उच्छृंखल लहरों के अंदर
क्या खोजा ईश्वर को हमने
अपने आप के अंदर
आती जाती श्वासों के मध्य
उस गहरे मौन के अंदर
खोजती जाती हूँ ईश्वर को
कोई अंत नज़र नहीं आता है
है कण-कण में उपस्थिति उसकी
हर जगह नज़र वह आता है
*****
-अदिति अरोरा
