कृतज्ञता
जो अपने आहार
या अस्तित्व के लिए
दूसरों पर निर्भर रहते हैं
परजीवी कहलाते हैं
प्रायः इस वर्गीकरण के अंदर
जीव-जंतु या वनस्पति ही
क्यों आते हैं?
कितना आश्रित है मानव
फिर भी दंभ लिए इठलाता है
रहता पल-पल निर्भर औरों पर
फिर भी स्वयं को सक्षम कहलाता है
न करता स्वयं का भोजन उत्पन्न
न अपना कपड़ा बुन सकता है
न बना सकता अपना घर स्वयं
एक-एक ईंट जोड़ने को मजदूर खोजता है
होते कितने कुशल कारीगर पक्षी
स्वयं कर लेते निज नीड़ का निर्माण
बना लेते पेड़-पौधे भोजन अपना
और कर देते मानव को भी दान
रोटी, कपड़ा और मकान
ये मूलभूत आवश्यकताएँ भी
नहीं कर सकता स्वयं अकेले पूरी
आश्रित है इन सबके लिए भी
वृषभ से लेकर कृषक तक
कपास से लेकर बुनकर तक
है निर्भर न जाने किस-किस पर मानव
जन्म से लेकर मृत्यु तक
धन की खनक क्या आई
स्वयं को विशाल समझ बैठे हैं
कितने अवलंबित और परजीवी हैं
कदाचित यह भूल बैठे हैं
देखना कभी यह सोचकर
प्रातः से लेकर रात्रि तक
छोटे-छोटे से कार्यों के लिए भी
कितने निर्भर हैं पूरे दिन दूसरों पर
न है कोई छोटा और न बड़ा कोई
सबकी अपनी भागीदारी है
जीवन में आने वाला हर कोई
असीम कृतज्ञता का अधिकारी है
हैं माला के मोती से सब जुडे़ हुए
करना होगा अहसास यह
धन, बुद्धि, पद और क्षमता की
खंडित करनी होगी दीवार यह
कृतज्ञता से नत मस्तक होकर
करना अपना प्रकट आभार तब
एक दूसरे के अस्तित्व से
बंधे हुए हैं हम प्राणी सब
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-अदिति अरोरा
