
स्वप्न
स्वप्न आते हैं
कबूतरों की तरह
मन की मुंडेर पर बैठ जाते हैं
फड्फड़ाते हैं
कलम जाल कैद कर पाये जब तक
उड़ जाते हैं
फिर आते हैं कभी
कभी नहीं भी आते हैं
और जितने आते हैं
सब पकड़े नहीं जाते हैं!
*****
– निखिल कौशिक
हिंदी का वैश्विक मंच

स्वप्न आते हैं
कबूतरों की तरह
मन की मुंडेर पर बैठ जाते हैं
फड्फड़ाते हैं
कलम जाल कैद कर पाये जब तक
उड़ जाते हैं
फिर आते हैं कभी
कभी नहीं भी आते हैं
और जितने आते हैं
सब पकड़े नहीं जाते हैं!
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– निखिल कौशिक