सब बिज़ी हैं! जी, सभी व्यस्त हैं ऐसा भी लिखा जा सकता था किन्तु वह यथार्थ का परिमार्जित संशोधित रुप होता अर्थात् व्याकरणीय छन्नी से छानकर आदर्श की मिलावट के साथ प्रस्तुत किया गया एक ऐसा सत्य जिसे यथावत् रखने के उपक्रम में अशुद्धिओं के साथ ही ज्यों का त्यों परोस दिया गया है। वैसे आप सभी बुद्धिजीवी हैं तो प्रश्न कर सकते हैं कि प्रयोजन तो दोनों ही वाक्यों में सिद्ध हो रहा है तो फिर भाषायी शुद्धता का यह अनावश्यक उपक्रम क्यों? सही भी है क्योंकि यदि हमारे पास इतना अतिरिक्त समय होता तो फिर यह लिखने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती कि हम सब बिज़ी हैं। वैसे भी बात तो सही है न कि इस अंग्रेज़ीदां दुनिया में हम सब बिज़ी हैं। आप, मैं, पड़ोस के शर्मा जी, मिसेस ली, मिस्टर चान, मिस चुआ… बस इसमें नाम जोड़ते चलिए क्योंकि नाम, चेहरे और जगह भले ही अलग-अलग क्यों न हो किन्तु परिस्थिति सभी की एक ही जैसी है – सब बिज़ी हैं!
अभाव का रोना हम मनुष्यों का जन्मजात स्वभाव है। जो है जितना है उतने में ही संतुष्ट हो जाते तो आज हम इतनी प्रगति कैसे कर पाते और कैसे कह पाते कि जनाब हम सब बिज़ी हैं! हमारे पास समय की कमी है क्योंकि हमें दिन के चौबीस घंटों में छत्तीस काम करने हैं जिनमें से छह काम को छोड़कर शेष तीस काम जीवनयापन हेतु अनिवार्य नहीं है किन्तु फिर भी महत्त्वपूर्ण है। महत्त्वपूर्ण इसीलिए क्योंकि अस्तित्व की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति होने के बाद हम ऐसी अनावश्यक जटिलताओं के चक्र में फँसते चले जाते हैं जो हमारे सीधे-साधे मन को जलेबी सा उलझा कर रख देता है। जैसे ये सामाजिक संजाल जो हमारे जी का जंजाल बन चुका है और हमारे बिज़ी होने की सबसे बड़ी वजह बन गया है।
कार्यालय की उठापटक में, सहकर्मियों की गिटपिट में, रसोईघर की खिटपिट में, बिन मौसम मुसीबतों की होने वाली बरसात की टिपटिप में भी हमारी ऊँगलियाँ गाहे-बेगाहे मोबाइल के स्क्रीन पर बलखाती हुई हमें एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जहाँ की माया हमें मोह लेती है। इस छोटे कद की मोबाइल के सामने बड़े-बड़ों के शीश झुक जाया करते हैं। सिंगापुर के मेट्रो में, बसों में, सड़कों पर, चमचमाती दुकानों में हर जगह कंधे पर शान से तनी हुई गर्दन पर गर्वीले शीश की जगह मोबाइल-माया के सामने हथियार डाले निहत्थे सैनिकों की तरह लटकते सिरों के कई सिरे दिख जाया करते हैं। मोबाइल की स्क्रीन को टकटकी लगाकर निहारता हुआ कोई आत्ममुग्धता के मोहपाश में जकड़ता चला जाता है तो कोई चुगलखोर चाची बनकर दूसरों की ज़िंदगी में ताक-झाँक कर रहा होता है, कोई अपने आभासी अस्तित्व पर दुनिया भर की मुहर पाने की आकुलता में छटपटा रहा होता है तो कोई ख़ुद से बेख़बर हो दुनिया भर की ख़बर ले रहा होता है।
आजकल हम इसी आभासी दुनिया में अधिक व्यस्त होते जा रहे हैं क्योंकि यहाँ न तो न तो सम्बन्धों की जटिलता है, न सेवा-सत्कार की औपचारिकता है और न कर्तव्यनिर्वहन का उत्तरदायित्व। असली ज़िन्दगी की जटिलताओं से दूर एक ऐसा माया-संसार जहाँ जाने से मन को सुकून मिलता है, अहं को प्रशंसाओं का पोषण मिलता है, मित्र-संख्या में हो रही उत्तरोत्तर वृद्धि को देखकर मैत्री-भाव को संतोष मिलता है और हमें मिलता है परिचितों और परिजनों से मिलकर बना हुआ एक ऐसा आभासी परिवार जो हमारी प्रसन्नता में कभी अंगूठा दिखाकर, कभी गोल-गोल मुँह फाड़कर तो कभी रक्तिम आभावान हृदय चिह्न से हमारे आभासी स्नेहकोश को संवर्धित करता रहता है। अपनी व्यस्त दिनचर्या में से समय निकालकर अपना आभासी स्नेह, शुभकामना, शुभाशीष और प्रोत्साहन देने वाले ऐसे सहृदय मित्रों के कारण ही तो मुखपुस्तक की महत्ता आज भी बनी हुई है। समझदार के लिए तो संकेत ही पर्याप्त है किन्तु स्पष्टता के लिए बता देती हूँ कि यह मुखपुस्तक और कुछ नहीं बस दादाजी के छाते की घुमावदार छड़ी और बीच में जुड़ाव की एक ऐसी रेखा है जिसे जब से देखा है तभी से वह हमारी ज़िंदगी का एक ऐसा हिस्सा और हर दिन बाँचने वाला क़िस्सा सा बन चुका है कि अब तो इससे एक-दो दिन की जुदाई का संताप झेलना भी कठिन होता जा रहा है। इसे न देखें तो चैन हमें आता नहीं है, एप हैं तो बहुतेरे परन्तु तेरी तरह कोई और मन को भाता नहीं है। इस स्थिति के लिए एक और गीत के बोल याद आ गये – ओ साथी रे! तेरे बिना भी क्या जीना…। वैसे जीना तो इसके बिना भी संभव है किन्तु हम कैसे जी रहे हैं इसे अपने परिचितों तक प्रचारित-प्रसारित करने हेतु यह एक उपयोगी साधन है जिसे साधने में सभी व्यस्त हैं। अब तो इसने कई बन्धु-बान्धव भी बना लिये हैं। तस्वीरों की त्वरित सेवा, संदेशों के आदान-प्रदान का लोकप्रिय माध्यम सभी इसी के परिवार के सदस्य हैं जिनकी तकनीकी सहायता के कारण ही हम अपने वृहत्तर परिवार से जुड़ सके हैं। अब सभी से अधिक जुड़ते चले जा रहे हैं तो समय का अभाव होना तो स्वाभाविक ही है।
नौ से पाँच की दिनचर्या बीते समय की बात थी अब इसमें इतना विस्तार आ चुका है कि दिन और रात की सीमाएँ धुँधली पड़ती जा रही हैं। जीवन की विस्तृत होती परिधि में अब रोटी, कपड़ा और मकान के साथ-साथ सेहत, सौन्दर्य, सफलता, सम्मान, स्वीकार्यता, सर्वोत्कृष्टता की आकांक्षा अपने पाँव पसारती जा रही है। समय मुट्टी में बंद रेत की तरह फिसलता जा रहा है और साथ ही फिसलती जा रही है कई अतृप्त आकांक्षाएँ जो हमें समय की गति के साथ संतुष्ट नहीं रहने दे रही हैं। हम तेज़ भाग रहे हैं क्योंकि कम समय में हमें अधिक दूरी तय करनी है। अपनी झोली में अधिक से अधिक समेटने की चाह हमें घड़ी की सूईयों के साथ एक अनचाही प्रतिस्पर्धा हेतु उकसाती जा रही है और हम व्यस्त से व्यस्ततर होते चले जा रहे हैं।
हम बिज़ी होते जा रहे हैं अपने मस्तिष्क में भरने वाली उन अनगिनत अनचाही सूचनाओं के अनावश्यक संचय से जिन पर विचार-विमर्श करने में वह कोमल सी घुमावदार गुलाबी जान व्यस्त होती जा रही है। प्रमाद की जगह अवसाद और सम्वाद की जगह विवाद की जड़ें गहरी होती जा रही हैं जो हमारे सुकून के पलों को अपने शिकंजे में कसती चली जा रही है। अधिक सम्पर्क जहाँ एक ओर अधिक लगाव का कारक बन रहा है तो वहीं दूसरी ओर अधिक दुराव का उत्प्रेरक भी। इसी दुराव और मनमुटाव से होने वाले तनाव से मुक्ति की युक्ति ढूँढने में हम व्यस्त से व्यस्ततम होते चले जा रहे हैं। ज़िंदगी की पटरी पर दौड़ती रेलगाड़ी की आपाधापी ही क्या कम थी कि अब इसमें ट्रेडमिल की क़दमताल भी शामिल होती जा रही है। लैपटॉप के की-बोर्ड पर आवश्यक ई-मेल संदेशों का उत्तर देती ऊँगलियों की खटखटाहट क्या कम थी कि अब इसमें सामाजिक संजाल वाले एप पर टैप करने वाली ध्वनियाँ और नये संदेशों के आगमन की आहटें मन-मस्तिष्क पर सतत् सचेष्ट और सतर्क रहने का अनावश्यक दबाव बनाती जा रही है। सुकून सिमटता जा रहा है और व्यस्तता पसरती जा रही है हमारे उस चौबीस घंटे वाले दैनिक जीवन में जहाँ पहले काम के घंटे बँटे हुए होते थे। हर कार्य का नियत समय हुआ करता था और साथ ही उसे करने की मर्यादा भी निर्धारित हुआ करती थी।
अब इन मर्यादाओं की डोर ढीली पड़ती जा रही है और अपनी-अपनी मर्ज़ी के मालिक बन बैठे हैं। सुविधाओं की बढ़ती उपलब्धता में समय, सुकून और संतोष का सिमटना हमारे लिए सचेत करने वाला संकेत है कि कहीं कुछ तो है जो ठीक नहीं है। कहीं कुछ ऐसी कड़ियाँ अवश्य हैं जो हमसे छूटती जा रही हैं। ऐसी कड़ियाँ जो हमें समय की सीमाओं से बाँधकर रखने के बाद भी हमारी व्यस्तता पर अंकुश बनाये रखती थी। हमें तलाश है घड़ी-घड़ी सचेत करने वाली इस गुमशुदा कड़ी से जुड़ी हुई उस दैनिक घड़ी की जिसकी सूईयों की ताल हमारे जीवन के कदमताल से मेल खाती है। उनकी गति में परस्पर विरोधाभास न होकर सामञ्जयस्य हो।
एक भिन्न अर्थ में देखा जाये तो व्यर्थ होने से बेहतर है व्यस्त होना क्योंकि यह इस बात का द्योतक है कि आप कितने महत्त्वपूर्ण हैं। आपकी उपस्थिति कितने बड़े वर्ग को प्रभावित करती है और वह कितने लोगों के लिए कितनी आवश्यक है। जब जीवन में व्यस्तता नहीं रहती तो फिर मन का सूनापन और एकाकीपन का भाव गहराता चला जाता है। अनावश्यक धारणाएँ मन में घर करती चली जाती हैं। जब दिमाग़ के घोड़े दौड़ना बंद करके आलस्यग्रसित होकर सुस्ताने बैठ जाते हैं तो ऐसे में सकारात्मक के स्थान पर नकारात्मक भाव प्रबल होने लगते हैं। व्यस्त होना मन के सूरज के अस्त होने से लाख गुणा बेहतर स्थिति है किन्तु व्यस्तता के पाटों के बीच पिसकर जीवन का उत्साह पस्त न हो जाये इसका ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है। समय-प्रबंधन और संतुलन की जितनी आवश्यकता है आज के समय में है उतनी संभवत: पहले कभी नहीं रही होगी। हम बहुधा भावनाओं के आवेग में समय के प्रवाह के साथ बहते चले जाते हैं और इसीलिए संतुलन खो बैठते हैं। अनुशासित मन व्यस्त दिनचर्या में भी समय का आवंटन न्यायोचित ढंग से कर पाता है तो वहीं एक आवेगी मन समय के विस्तार को समेट नहीं पाता है।
क्या आवश्यक है और किसे प्राथमिकता देनी है इसका विवेकपूर्ण निर्णय कर लेने से हमारे जीवन की व्यस्तता सुव्यवस्थित हो सकती है। किस कार्य के लिए कितना समय आवंटित करना है इसका न्यायोचित निर्धारण कर लेने से जीवन में संतुलन लाना संभव है। जीवन की बेहतरी के लिए तकनीक का सीमित और सटीक उपयोग करना सीखना भी हमारी व्यस्त दिनचर्या को पटरी पर लाने के लिए आवश्यक है। अति सर्वत्र वर्जयेत् अर्थात् अति सभी जगह वर्जित है और इसी अति पर अंकुश लगाने हेतु संतुलन एवं प्रबंधन की आवश्यकता होती है। व्यस्त रहिए किन्तु मस्त रहिए क्योंकि पस्त हौसलों से जीवन की ऊँची और लम्बी उड़ान भर पाना संभव नहीं है।
–आराधना झा श्रीवास्तव, सिंगापुर
