दृश्य: सुबह – डॉ. शैलजा सक्सेना ( कविता )
हवा शान्त है,
रात बरसता मेह रुक गया,
सड़कें पानी पीकर लेटीं,
पत्ते सभी नहाये दिखते,
सूरज भी अब बदन पौंछ कर,
आने की तैयारी में लगा हुआ है।
चुन्नू कोने में बैठा है,
माँ से झगड़ा कर रूठा है!
रोटी, सब्जी नहीं चाहिये,
सैंडविच से मन ऊबा है,
पिज़्ज़ा, पास्टा नहीं बनाती,
रोज़ वही खाना देती हैं॥
माँ उलझी है,
कमरे-कमरे, बिखरी-बिखरी, इसे उठाती, उसे सँभाले,
खाना-कपड़ा सब पकड़ाती
नखरे सबके उठा रही है,
माँ उलझी है॥
आज देर फिर हो जायेगी,
बॉस सुनाएगी फिर दसियों
दिन भर झिड़की सुनते-सुनते
मन खट्टा फिर हो जायेगा,
किसे सुनाऊँ?
सबको अपना काम चाहिये!
मुझको भी आराम चाहिये
चाय घूँट भर पी लेने को,
पल भर का विश्राम चाहिये!
पर चुन्नू फिर रूठा है,
इनके कपड़े, उलटे-सुलटे
गुड़िया बाल बिखेरे बैठी,
घड़ी दौड़ती पागल जैसी
भीतर जैसे मेह गरजता …..!!
बाहर,
लेकिन हवा शांत है,
हवा शान्त है॥
