पेड़ सब हरे होते हैं ( कविता ) : मंजु गुप्ता

पेड़ सब हरे होते हैं
हरा होना कितनी बड़ी बात है, जानते हो ?
धूप, ताप, आँधी, बरसात, पतझड़ सहते हुए, तूफ़ान झेलते हुए
बार- बार झड़कर हरा होना, सिर्फ़ पेड़ों की विशेषता
विधाता का दिव्य वरदान
पेड़ों का यह हरापन काश हम में भी उतर जाए
हम भी सीख लें उनकी तरह हर हाल में हरा होना
हरे रहना यानी खुश रहना
अपने आत्म में डूब प्रसन्न रहना
परम आनंदित हो झूमना, लहराना
जब तक पैरों के नीचे ज़मीन है और
ऊपर नीला आसमान
हवा साँस ले रही है, चाहे उसका चलना महसूस न हो
तो भी उसका होना
क्या जीने के लिए पर्याप्त नहीं ?
किस मृगतृष्णा में उलझ भाग रहे हैं हम
इस अंधाधुंध चूहादौड़ से परे होकर
ज़रा ठहर कर, कुछ देर रुककर यदि हम भी पेड़ हो जाएं
कुछ देर के लिए ही सही तो हमारा होना, हमारा जीना
सार्थक हो जाए, सफल हो जाए हमारा होना
आदमी का पेड़ हो जाना यानी हरा हो जाना
ताज़ा हो जाना, नया- नकोर हो जाना, खिल जाना भीतर से बाहर तक
कितनी बड़ी बात है
काश, हम पेड़ हो पाते
पेड़ जैसा जीवन जीवन जी पाते
हरे हो पाते.

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