महादेवी वर्मा के रेखाचित्र ‘नीलकंठ’ में राष्ट्रीयता : डॉ. संध्या सिलावट


वर्षा की पहली बूँद अभी धरती तक पहुँची भी नहीं है। दूर क्षितिज पर मेघों की गहरी परतें उमड़ रही हैं। हवा में भीगी मिट्टी की गंध घुलने लगी है। अचानक किसी वृक्ष की ऊँची डाल से एक तीखी, किंतु मधुर पुकार सुनाई देती है। अगले ही क्षण एक मयूर अपने रंग-बिरंगे पंखों का विराट मंडल फैलाकर नृत्य करने लगता है। उसकी हर भंगिमा में उल्लास है, हर कदम में लय है और हर कंपन में प्रकृति का संगीत। यह दृश्य केवल सौंदर्य का नहीं है। यह भारत का दृश्य है।
शायद इसी कारण भारतीय मानस ने हजारों वर्षों से मोर को केवल एक पक्षी नहीं माना; उसे उत्सव, ऋतु, धर्म, कला, लोक-संस्कृति और सौंदर्य का प्रतीक बनाया। यही वह पक्षी है जिसे स्वतंत्र भारत ने अपना राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया। किन्तु प्रश्न यह है कि क्या राष्ट्रीय पक्षी केवल सरकारी घोषणा से राष्ट्रीय बन जाता है? या उसकी राष्ट्रीयता उस संस्कृति से जन्म लेती है जिसने सदियों तक उसे अपने गीतों, चित्रों, मंदिरों और साहित्य में स्थान दिया? इस प्रश्न का सबसे सुंदर उत्तर हिंदी साहित्य की अमर रचनाकार महादेवी वर्मा देती हैं।
उनके रेखाचित्र ‘नीलकंठ’ को पढ़ते समय ऐसा नहीं लगता कि हम किसी मोर की जीवन-कथा पढ़ रहे हैं। लगता है मानो भारत की आत्मा हमारे सामने चल रही हो-कभी रंगों में, कभी करुणा में, कभी साहस में और कभी मौन में।
राष्ट्रीयता शब्द सुनते ही सामान्यतः मन में स्वतंत्रता संग्राम, क्रांतिकारी आंदोलन, वीरगाथाएँ, सीमा की रक्षा और राजनीतिक चेतना का विचार आता है। निस्संदेह यह राष्ट्रीयता का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। किन्तु भारतीय राष्ट्रीयता का एक दूसरा आयाम भी है, जो तलवार से नहीं, संवेदना से निर्मित हुआ है। यह वही राष्ट्रीयता है जिसमें-पेड़ देवता बन जाते हैं, नदियाँ माता बन जाती हैं, गाय परिवार का सदस्य बन जाती है और मोर राष्ट्रीय पक्षी। महादेवी वर्मा इसी राष्ट्रीयता की साहित्यकार हैं। उन्होंने राष्ट्र को किसी राजनीतिक मंच पर नहीं खोजा। उन्होंने उसे खेतों में खोजा। आँगन में खोजा। पक्षियों के पंखों में खोजा। घायल जीवों की करुण आँखों में खोजा।
भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा परिचय उसकी करुणा है। यदि किसी राष्ट्र का नागरिक किसी असहाय जीव की पीड़ा से व्यथित नहीं होता, तो उसका राष्ट्रप्रेम अधूरा है। महादेवी वर्मा इसी अधूरेपन को पूर्ण करती हैं।
नीलकंठ की कथा किसी महल से आरंभ नहीं होती। न किसी वन से। न किसी राजसी उपवन से। वह आरंभ होती है एक साधारण-सी चिड़ियों की दुकान से। महादेवी वर्मा स्टेशन से लौट रही हैं। अचानक उन्हें चिड़ियों की दुकान का ध्यान आता है। वहाँ पहुँचने पर चिड़ियावाला उन्हें बताता है कि दो नन्हे मोर-शावकों को चिड़ीमार पकड़कर लाया है। लोग उन्हें खरीदकर मार डालेंगे, क्योंकि मोर के पंजों के औषधीय उपयोग का भ्रम फैला हुआ है। वह करुणा से प्रेरित होकर उन्हें बचाना चाहता है। लेखिका दोनों पक्षियों को खरीदकर अपने साथ ले आती हैं। यह प्रसंग देखने में बहुत छोटा लगता है। परंतु यहीं से महादेवी की राष्ट्रीयता का वास्तविक आरंभ होता है। राष्ट्र की पहचान केवल सैनिकों की वीरता से नहीं होती। राष्ट्र की पहचान इस बात से भी होती है कि उसके नागरिक किसी असहाय प्राणी के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। महादेवी वर्मा मोरों को खरीदती नहीं हैं-वह उसे जीवन देती हैं। यही भारतीय संस्कृति है।
घर पहुँचने पर लोग उनका उपहास करते हैं। कोई कहता है-“ये तो तीतर हैं।” कोई कहता है-“आप ठगी गईं।” उस समय महादेवी वर्मा सहज किंतु अत्यंत गहरी बात कहती हैं-“मोर के क्या सुरखाब के पर लगे हैं? है तो पक्षी ही।” यह वाक्य केवल उत्तर नहीं है। यह भारतीय राष्ट्रीयता का दर्शन है। क्योंकि यहाँ मूल्य किसी जीव की उपयोगिता से नहीं, उसके अस्तित्व से निर्धारित होता है। वह मोर है इसलिए प्रिय नहीं। वह जीव है इसलिए प्रिय है। यही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है। आज का उपभोक्तावादी समाज हर वस्तु का मूल्य उसकी उपयोगिता से आँकता है। महादेवी वर्मा प्रत्येक जीव का मूल्य उसके जीवन से आँकती हैं। यही राष्ट्रीयता है।
महादेवी वर्मा दोनों पक्षियों को अपने अध्ययन-कक्ष में रखती हैं। पिंजरे का द्वार खोल देती हैं। सत्तू और पानी रखती हैं। वे नन्हे पक्षी कभी मेज के नीचे छिपते हैं, कभी अलमारी के पीछे, कभी रद्दी कागजों की टोकरी को अपना घर बना लेते हैं। धीरे-धीरे वे घर के सदस्य बन जाते हैं। लेखिका अपनी बिल्ली ‘चित्रा’ से उनकी रक्षा करती हैं और उनके लिए पूरे कमरे की व्यवस्था बदल देती हैं। यह दृश्य अत्यंत साधारण लगता है। किन्तु वास्तव में यही भारत की सांस्कृतिक चेतना है। जहाँ मनुष्य अपने सुविधा-क्षेत्र को छोड़कर दूसरे जीव के लिए स्थान बनाता है। राष्ट्रीयता का आरंभ इसी साझेदारी से होता है।
दोनों छोटे-छोटे पक्षी बड़े होने लगते हैं। महादेवी वर्मा उनके शारीरिक विकास का ऐसा सूक्ष्म चित्र खींचती हैं कि पूरा दृश्य आँखों के सामने जीवित हो उठता है। “नीलाभ ग्रीवा। ऊँची कलगी। चमकती आँखें। इंद्रधनुषी पंख। गरिमामयी चाल।“ उनकी भाषा चित्रकार की कूची बन जाती है। वह लिखती हैं कि उसका कायाकल्प ऐसा था मानो इल्ली तितली बन गई हो। उसके पंखों पर इंद्रधनुषी रंग खिल उठते हैं और उसकी प्रत्येक भंगिमा सौंदर्य तथा सुकुमारता से भर जाती है।
परंतु यहाँ एक महत्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य है। महादेवी वर्मा केवल रंगों का वर्णन नहीं कर रहीं। वे भारतीय सौंदर्य-दृष्टि का चित्र बना रही हैं। भारतीय संस्कृति में सौंदर्य कभी अहंकार नहीं बनता। वह विनम्रता का रूप लेता है। नीलकंठ के सौंदर्य में भी कोई प्रदर्शन नहीं है। वह जितना सुंदर है, उतना ही सरल।
लेखिका मोर का नाम रखती हैं-नीलकंठ। मोरनी का नाम-राधा। यह नामकरण भी संयोग नहीं है। ‘नीलकंठ’ शब्द भारतीय संस्कृति में शिव की स्मृति जगाता है। ‘राधा’ प्रेम, समर्पण और माधुर्य की प्रतीक हैं। अर्थात् महादेवी वर्मा पक्षियों का नाम भी भारतीय सांस्कृतिक चेतना से जोड़ती हैं। यही कारण है कि उनके रेखाचित्रों का प्रत्येक पात्र भारतीय जीवन-मूल्यों का प्रतिनिधि बन जाता है।
आज राष्ट्रीयता पर असंख्य पुस्तकें लिखी जा रही हैं। लेकिन यदि कोई पूछे कि उसका पहला पाठ कहाँ मिलता है, तो उत्तर होगा-महादेवी वर्मा के घर में। जहाँ एक घायल जीव अतिथि नहीं, परिवार बन जाता है। जहाँ अध्ययन-कक्ष चिड़ियाघर नहीं, आश्रय बन जाता है। जहाँ पंखों की फड़फड़ाहट भी घर की धड़कन बन जाती है। और जहाँ एक साहित्यकार यह सिद्ध कर देती है कि राष्ट्र का निर्माण संविधान से पहले संस्कार करते हैं।
“जिस राष्ट्र की संस्कृति निर्बलों की रक्षा करना सिखाती है, वही संस्कृति वास्तव में जीवित रहती है। महादेवी वर्मा का ‘नीलकंठ’ इसी जीवित संस्कृति का प्रतिनिधि है।”
समय के साथ नन्हा-सा मोर केवल आकार में ही नहीं बढ़ता, उसके व्यक्तित्व में भी अद्भुत विस्तार आता है। महादेवी वर्मा लिखती हैं कि उन्हें स्वयं पता ही नहीं चला कि कब नीलकंठ ने अपने आपको उनके जीव-जंतुओं का ‘सेनापति और संरक्षक’ नियुक्त कर लिया। सुबह होते ही वह कबूतरों, खरगोशों और अन्य जीवों को एकत्र करता, उन्हें भोजन तक ले जाता और उनकी रखवाली करता। यदि कोई अनुशासन भंग करता, तो अपनी तीखी चोंच से उसे दंडित भी करता, परंतु उसी के साथ उसका प्रेम भी उतना ही गहरा था।
यहाँ महादेवी वर्मा केवल एक पक्षी का व्यवहार नहीं लिख रहीं। वे भारतीय नेतृत्व की उस अवधारणा को सामने रखती हैं जिसमें नेतृत्व अधिकार का नहीं, उत्तरदायित्व का नाम है। भारतीय राष्ट्रीयता का आदर्श शासक वही है जो सबसे पहले रक्षक हो। राम हों, कृष्ण हों या अशोक हों भारतीय परंपरा नेतृत्व को संरक्षण से जोड़ती है। नीलकंठ भी अपने छोटे-से संसार का वैसा ही संरक्षक है। यह प्रसंग हमें बताता है कि राष्ट्रीयता केवल अपने अधिकारों की रक्षा नहीं, बल्कि अपने से निर्बल के जीवन की रक्षा का संकल्प भी है।
नीलकंठ संस्मरण का सबसे मार्मिक और सबसे अर्थपूर्ण प्रसंग वह है जब एक विषधर साँप जाली के भीतर प्रवेश कर जाता है। सारे जीव भयभीत होकर भाग जाते हैं। एक नन्हा खरगोश साँप के मुँह में फँस जाता है। उसकी चीख इतनी क्षीण है कि कोई सुन भी नहीं पाता। किन्तु ऊपर झूले पर विश्राम कर रहे नीलकंठ के कान उस करुण पुकार को पहचान लेते हैं। वह एक झपट्टे में नीचे आता है। वह बिना सोचे-समझे साँप पर आक्रमण नहीं करता। पहले उसके फन को पंजों से दबाता है ताकि खरगोश को चोट न लगे, फिर अपनी पैनी चोंच से बार-बार प्रहार करता है। साँप अधमरा होकर खरगोश को छोड़ देता है। इसके बाद नीलकंठ पूरी रात उस घायल शिशु खरगोश को अपने पंखों के नीचे छिपाकर ऊष्मा देता रहता है। यह दृश्य केवल रोमांचक नहीं है। यह भारतीय राष्ट्रीयता की आत्मा है। युद्ध इसलिए नहीं कि किसी को पराजित करना है।
युद्ध इसलिए कि किसी असहाय की रक्षा करनी है। यही कारण है कि महादेवी वर्मा इस प्रसंग के बाद लिखती हैं कि अब समझ में आता है कि कार्तिकेय ने अपने वाहन के रूप में मयूर को ही क्यों चुना होगा। वह लिखती हैं कि मयूर ‘कलाप्रिय वीर’ है, केवल हिंसक नहीं। इन कुछ शब्दों में भारतीय संस्कृति का पूरा दर्शन समाहित है। भारत शक्ति की पूजा करता है, परंतु केवल उस शक्ति की जो संरक्षण का माध्यम बने।
विश्व की अनेक संस्कृतियों में वीरता और सौंदर्य अलग-अलग माने गए हैं। महादेवी वर्मा के यहाँ दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। जिस चोंच से नीलकंठ विषधर के टुकड़े कर सकता है, उसी चोंच से वह महादेवी की हथेली पर रखे भुने चने अत्यंत कोमलता से उठाता है। विदेशी अतिथि उसके व्यवहार से इतने प्रभावित होते हैं कि उसे ‘परफेक्ट जेंटलमैन’ कह देते हैं। यह प्रसंग केवल हास्य उत्पन्न नहीं करता। यह बताता है कि भारतीय राष्ट्रीय चरित्र में वीरता कभी कठोरता नहीं बनती। वह संवेदनशील रहती है। शक्ति और कोमलता का यह अद्भुत संतुलन ही भारतीय संस्कृति की विशेषता है।
यदि किसी एक दृश्य में महादेवी वर्मा की राष्ट्रीयता सबसे अधिक जीवित दिखाई देती है, तो वह नीलकंठ का वर्षा-नृत्य है। जैसे ही मेघों की आहट मिलती है, नीलकंठ और राधा बेचैन हो उठते हैं। बादलों की गर्जना उनके लिए मानो मृदंग बन जाती है। बिजली की चमक दीपशिखा बन जाती है। और वर्षा की रिमझिम ताल बन जाती है। महादेवी वर्मा लिखती हैं कि मेघ जितने अधिक गरजते, नीलकंठ का नृत्य उतना ही तीव्र हो जाता। वर्षा रुकने पर दोनों एक-दूसरे के पंखों पर जमी बूँदों को चोंच से हटाते रहते। यह वर्णन केवल प्रकृति का नहीं है। यह भारतीय लोक-संस्कृति का जीवंत उत्सव है। भारत में वर्षा केवल मौसम नहीं है। वह खेती है। वह लोकगीत है। वह सावन है। वह झूले हैं। वह कजरी है। वह मोर का नृत्य है। महादेवी वर्मा का नीलकंठ इस पूरी सांस्कृतिक परंपरा का प्रतिनिधि बन जाता है।
जीवन केवल आनंद नहीं होता। उसमें संघर्ष भी होता है। एक दिन महादेवी वर्मा फिर उसी चिड़ियावाले के पास पहुँचती हैं। वहाँ उन्हें एक घायल मोरनी दिखाई देती है। उसके पंजे निर्दयता से बाँध दिए गए हैं और वह खड़ी भी नहीं हो सकती। महादेवी उसे भी घर ले आती हैं, उपचार करती हैं और उसका नाम रखती हैं-कुब्जा। यहाँ फिर वही राष्ट्रीयता दिखाई देती है जो किसी जीव में भेद नहीं करती। नीलकंठ सुंदर है। राधा सुंदर है। किन्तु कुब्जा विकलांग है। फिर भी महादेवी की करुणा उसके प्रति कम नहीं होती। भारतीय संस्कृति सदैव यही सिखाती रही है कि समाज की महानता इस बात से नहीं आँकी जाती कि वह शक्तिशाली के साथ कैसा व्यवहार करता है, बल्कि इस बात से कि वह दुर्बल के साथ कैसा व्यवहार करता है।
महादेवी वर्मा नीलकंठ और राधा के संबंध को कभी मनुष्य की तरह नहीं लिखतीं, फिर भी उनके बीच का अपनापन अत्यंत मानवीय प्रतीत होता है। राधा नीलकंठ के नृत्य के चारों ओर अपनी मंथर गति से घूमती है। वह उसके सौंदर्य की पूरक बनती है। दोनों वर्षा का आनंद साथ लेते हैं। दोनों साथ-साथ पंख सुखाते हैं। दोनों एक-दूसरे के पंखों की बूँदें हटाते हैं। यह दृश्य भारतीय दाम्पत्य की उस परंपरा का प्रतीक है जहाँ प्रतिस्पर्धा नहीं, सहभागिता होती है। राष्ट्रीयता केवल राजनीति नहीं होती। वह परिवारों की संस्कृति से भी निर्मित होती है। महादेवी वर्मा इसी सांस्कृतिक राष्ट्रीयता की साहित्यकार हैं।
कुब्जा के आने के बाद नीलकंठ का संसार बदलने लगता है। राधा और कुब्जा के बीच संघर्ष बढ़ता है। राधा के अंडे नष्ट हो जाते हैं। घर का वह वातावरण, जो कभी प्रेम और उल्लास से भरा था, धीरे-धीरे तनाव से भर उठता है। नीलकंठ का स्वभाव भी बदलने लगता है। वह कई बार जालीघर छोड़कर वृक्षों की शाखाओं पर जाकर बैठ जाता है। लौटता तो अवश्य है, पर उसकी चाल में पहले जैसी गरिमा नहीं रहती और उसकी आँखों में एक अजीब-सी शून्यता उतर आती है।
महादेवी वर्मा यहाँ कोई टिप्पणी नहीं करतीं। वे केवल दृश्य दिखाती हैं। यही एक श्रेष्ठ रेखाचित्रकार की पहचान है। पाठक स्वयं समझ जाता है कि केवल मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी भी संबंधों के टूटने का दुःख अनुभव करते हैं। यहीं महादेवी वर्मा की राष्ट्रीयता का एक और आयाम खुलता है-जिस राष्ट्र की संस्कृति पशु-पक्षियों की भावनाओं का सम्मान करती है, वह मनुष्य की संवेदनाओं को भी गहराई से समझती है।
एक दिन प्रातः महादेवी वर्मा जब जालीघर पहुँचती हैं, तो देखती हैं कि नीलकंठ अपने पंख फैलाए उसी प्रकार बैठा है जैसे वह छोटे-छोटे खरगोशों को अपने पंखों में छिपाकर बैठता था। वे उसे पुकारती हैं, पर वह नहीं उठता। नीलकंठ मर चुका होता है।
महादेवी लिखती हैं कि उसकी मृत्यु का कारण उन्हें कभी ज्ञात नहीं हो सका। उसके शरीर पर न कोई घाव था, न बीमारी का कोई चिह्न। यह मृत्यु केवल शरीर की नहीं, मानो एक जीवंत संबंध के समाप्त हो जाने की थी। यहाँ महादेवी वर्मा रोती नहीं हैं। वह विलाप नहीं करतीं। वह नीलकंठ को अपने शाल में लपेटती हैं और उसे संगम ले जाती हैं। जब गंगा की धारा में उसका शरीर प्रवाहित होता है, तब उन्हें प्रतीत होता है कि उसके पंखों की चंद्रिकाओं से प्रतिबिंबित होकर गंगा की विस्तृत जलराशि स्वयं एक विराट मयूर में बदल गई है। यह दृश्य हिंदी साहित्य की सबसे सुंदर बिंब-रचनाओं में से एक है।
यहाँ गंगा केवल नदी नहीं है। नीलकंठ केवल पक्षी नहीं है। दोनों मिलकर भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बन जाते हैं। एक ओर राष्ट्रीय नदी। दूसरी ओर राष्ट्रीय पक्षी। दोनों का यह मौन मिलन भारतीय संस्कृति की विराटता को मूर्त रूप देता है।
नीलकंठ की मृत्यु के बाद सबसे अधिक मार्मिक दृश्य राधा का है। वह कई दिनों तक निश्चेष्ट बैठी रहती है। आषाढ़ के मेघ छाते हैं। वर्षा आती है। वही ऋतु, जिसमें कभी दोनों साथ नाचा करते थे। किन्तु अब राधा अकेली है। वह कभी झूले पर बैठती है, कभी अशोक की डाल पर, और अपनी केका से मानो नीलकंठ को पुकारती रहती है।
