क्वेरियम की मछलियां : अलका निगम

कभी देखी हैं
एक्वेरियम की मछलियां,
कुछ कुछ स्त्रियों सी ही तो होती हैं।
रंग बिरंगे लिबास में लिपटी,
कोई सोने से लदी गोल्ड फिश सरीखी,
तो कोई स्टार फ़िश सरीखी।
अपनी ज़द के अंदर रहती
अपने हिस्से की मिली
नपी तुली ऑक्सीजन की मात्रा पर जीतीं
ये मछलियों सी स्त्रियां।
जीवन के खारे पानी के समंदर में
एक अदद मीठे पानी के सोते को
तलाशती ये स्त्रियां।
इस दुनिया के तिलस्म में
एक अदद जादू की झप्पी को
तरसती ये स्त्रियां।
रिश्तों की गिरह में
जकड़ी हुई ये स्त्रियां,
उनसे निकलना नहीं चाहतीं
न ही मर्यादा भंग करना चाहती हैं।
ये तन से नहीं,
मन से तृप्त होना चाहती हैं।
ये खुद बिखरी होकर भी
रिश्तों को समेटे रखती हैं,
अपने कदमों को घर की चौखट के
अंदर ही मोड़े रखती हैं।
और अंततः एक दिन…
ये बाहर निकलती हैं उस एक्वेरियम से
भावहीन,निस्तेज, निष्प्राण और हो जाती हैं मुक्त,
क्योंकि खत्म हो जाती है
उनके हिस्से की ऑक्सिजन।
बहुत कुछ एक्वेरियम की मछलियों सी
होती हैं ये स्त्रियां।
