शब्द उगने लगे, लेखन शुरू हो गया : देवेन मेवाड़ी

क्या बहुत लिखकर लेखक बन जाने की अभिलाषा रही?
कतई नहीं। एक साथी का सवाल याद आता है, जो वे हर साल एक शहर में सम्मेलन में भेंट होने पर पूछते थे। उनका स्थायी सवाल था—“कितनी पुस्तकें लिख चुके हैं आप? साठ-सत्तर से तो अधिक हो गई होंगी अब तक।”

मैं इधर-उधर की बातें करके उनका सवाल टाल देता था।

अगले साल मिलते तो फिर वही सवाल पूछते, किताबों की संख्या कुछ बढ़ाकर।

जब तीसरे साल भी उन्होंने फिर वही सवाल पूछा तो मुझसे रहा नहीं गया। मैंने जवाब दिया और कहा—“मित्र, आप हर साल यही सवाल पूछते हैं। बात यह है कि मैं किलो-क्विंटल के हिसाब से नहीं लिखता, न हर साल किताबों की संख्या बढ़ाने के लिए लिखता हूँ। सच तो यह है कि मैं जीवन में एक ऐसी किताब लिखना चाहता हूँ, जिसे पाठकों का खूब प्यार मिले। जिसे हजारों पाठक पढ़ें। वह कौन-सी किताब होगी, मैं नहीं जानता। उस किताब को लिखने के अभ्यास में ही समझ लीजिए, मेरे हाथ से चंद किताबें लिख गई हैं।”

वे मुँह फेरकर दूसरी ओर देखने लगे। मैं जानता था, वे कई साथियों को बड़े गर्व से बताते थे कि उनकी पुस्तकों की संख्या सौ पहुँचने वाली है।

दोस्तो, मेरा सच यह है कि मैं केवल लिखने के लिए नहीं लिखता। न लिख-लिखकर किताबों का ढेर जमा करना चाहता हूँ। न धनार्जन के लिए लिखता हूँ। हालाँकि पारिश्रमिक या रॉयल्टी के रूप में एक रुपया भी मिल जाए तो बहुत खुशी होती है। धनार्जन के कई और तरीके भी थे, जिनसे अच्छा धन कमाया जा सकता था। लेकिन, वह कभी मेरा लक्ष्य ही नहीं रहा। मुझे तो लिखकर लेखक बनना था, इसलिए समर्पण के साथ वह लिखता रहा, जिसे मैं अपने पाठकों को बताना चाहता था और अब भी बता रहा हूँ। उन स्मृतियों और जिज्ञासाओं के बारे में, जो मेरी हैं और मेरी ही तरह मेरे पाठकों की भी हो सकती हैं।

लेकिन, मेरा लिखना कैसे शुरू हुआ? इस बारे में सोचता हूँ तो कभी वे आसमान में एक साथ बहुत बड़े झुंड में उड़ते कबूतरों जैसे सैकड़ों मलया पक्षी याद आ जाते हैं, या कॉसमॉस के वे रंग-बिरंगे मनमोहक फूल, या आसपास उड़ती तितलियाँ! या मिट्टी में बोए वे बीज, जो नमी-पानी से अंकुरित होकर किसी दिन सहसा सिर उठाकर मिट्टी से बाहर झाँकने लगते और फिर नई पत्तियों की कोमल हथेलियाँ हवा में हिलाने लगते। कभी गर्मियों के तपते दिनों में आसपास के चीड़ वनों से उड़कर आते, हवा में नाचते-तैरते वे चीड़ के एक-पंखी बीज याद आ जाते हैं, जिन्हें हम अपने कॉलेज के लंबे-चौड़े खेल के मैदान में पकड़ लेते थे! और, गाँव में घंडियाली की बेल के वे श्वेतकेशी, बेहद हल्के बीज यानी थिसिल-डाउन याद आ जाते, जो हमारे देखते ही देखते भुर-भुर-भुर हवा में उड़कर न जाने किन अनजान जगहों की यात्राओं पर निकल पड़ते! वैसे ही जैसे कवि आर्थर मेसी की ‘थिसिल-डाउन’ कविता में निकलते थे—

थिसिल-डाउन तैरता है हवा में, हवा में,
जब कभी हवा बहती है,
और हवा ही बता सकती है हमें कि कहाँ, हाँ कहाँ, जाएगा वह पंखदार
थिसिल-डाउन।

बचपन में अपनी पाठ्य-पुस्तकों में पढ़ी उन प्यारी कविताओं के बिंब गाहे-बगाहे मन में जुगनुओं की तरह जगमगाते रहते। आज भी जगमगाते हैं वे।

जूनियर हाईस्कूल में अंग्रेजी की किताब में किसी अनाम कवि की नर्सरी राइम भी पढ़ा करते थे हम—

द नॉर्थ विंड डथ ब्लो,
एंड वी शैल हैव स्नो,
एंड व्हॉट विल द रॉबिन डू देन,
पुअर थिंग!

बेचारी रॉबिन। वह कविता अंग्रेजी में थी, यह तो कभी ध्यान में ही नहीं आया, लेकिन उत्तर दिशा से आने वाली उस ठंडी हवा और हिमपात की छाप मन पर गहरे अंकित हो गई। वह कविता याद आती और जिज्ञासा के बीज अंकुरित होने लगते। अहा, वह नन्ही रॉबिन चिड़िया सर्दी से बचने के लिए पंखों के भीतर सिर छुपाकर बैठी रहती होगी। और, अबाबील? वह तो कब की गर्म मैदानी इलाकों की ओर उड़ गई होगी! और, नन्हा मूषक तो गुड़ी-मुड़ी होकर लंबी नींद में सो गया होगा। मधुमक्खी अपने छत्ते में दुबक गई होगी। और बच्चे? वे तो पाठ पढ़ने के बाद खूब उछल-कूद कर शरीर में गर्माहट ले आते होंगे!

लेकिन, यह क्या? यह तो वही हाइबरनेशन यानी शीत-निद्रा थी, जो मुझे मेरी विज्ञान की किताब में पढ़ाई जा रही थी। फर्क था तो केवल अंदाज-ए-बयाँ का। कविता में वही बात कवि बता रहा था और किताब में साइंस टीचर। यानी, पाठ का वही विज्ञान कवि की कविता में कितना मजेदार लग रहा था! तो, विज्ञान भी तो इसी तरह सरस और रोचक भाषा में लिखा जा सकता है?

तो दोस्तो, मैंने साहित्य की रसीली भाषा में विज्ञान लिखने का मन बना लिया और उसी राह पर चल पड़ा। आगे चलकर उसी उत्तरी, ठंडी बर्फीली हवा को याद करके ‘शीत-निष्क्रियता’ समझाते हुए विज्ञान का सरस लेख लिख दिया!

मन के आकाश में उड़ते मलया पक्षियों को याद किया और महाकवि तुलसीदास की पंक्तियाँ ‘जानि शरद ऋतु खंजन आए’ गुनगुनाते हुए किताब के बर्ड माइग्रेशन यानी पक्षियों के प्रवास को भी सरस भाषा में समझाकर लेख लिखा।

इस साहित्य और विज्ञान के मेल से वे लेख लिख तो दिए, लेकिन उन्हें भेजूँ कहाँ?

तब इंडियन प्रेस, इलाहाबाद से छपने वाली विज्ञान की लोकप्रिय पत्रिका ‘विज्ञान जगत’ याद आई। संपादक थे ला मार्टीनियर, लखनऊ में जीव विज्ञान के प्रोफेसर आर. डी. विद्यार्थी। उन्हें पत्र लिखा—“मैं लोगों को विज्ञान की बातें बताने के लिए सरल भाषा में विज्ञान के रोचक लेख लिखना चाहता हूँ। लेकिन, उन्हें छापेगा कौन? ये दो लेख लिखकर आपको भेज रहा हूँ। मैं नहीं जानता, ये आपको कैसे लगेंगे।”

जीवन में कभी-कभी कुछ ऐसा हो जाता है कि उससे जीवन की भावी दिशा तय हो जाती है।

वही हुआ। कुछ दिनों बाद मुझे ‘विज्ञान जगत’ के संपादक का पत्र मिला।

मेरे पत्र के उत्तर में उन्होंने अंग्रेजी में लिखा था—“तुम्हारे दोनों लेख मिले। मैं उन्हें अप्रैल-मई 1965 संयुक्तांक में प्रकाशित कर रहा हूँ। विज्ञान के लेख लिखते रहना। उन्हें मैं छापूँगा। और हाँ, यह बात सदा याद रखना कि हो सकता है तुम कल एक विज्ञान लेखक बनो।”

उत्तर पाकर मैं खुशी से झूम उठा। सोचने लगा, क्या सचमुच मैं भी एक विज्ञान लेखक बन सकता हूँ? प्रोफेसर आर. डी. विद्यार्थी के उन शब्दों ने मेरे भीतर विज्ञान लेखन की लौ जगा दी। उनके उन शब्दों ने मुझे विज्ञान लेखक बना दिया।

शेष इतिहास है। मैं नियमित रूप से अपनी रुचि के विषयों पर विज्ञान के लेख लिखने लगा, जो देश की अग्रणी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे। धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, नवनीत, कादम्बिनी, दिनमान, रविवार, विज्ञान लोक, विज्ञान प्रगति, आविष्कार, नवभारत टाइम्स, दैनिक हिंदुस्तान, जनसत्ता… और भी अनेक पत्र-पत्रिकाएँ। छपते-छपते विज्ञान लेखक के रूप में पहचान बनती गई। धीरे-धीरे विज्ञान की जिज्ञासाओं के उत्तर देने के लिए विज्ञान की किताबें भी लिखने लगा। विज्ञान लेखन के लिए राष्ट्रीय स्तर के कुछ सम्मान और पुरस्कार भी हासिल हो गए।

और, इस तरह दोस्तो, कालाआगर गाँव का यह जिज्ञासु लड़का विज्ञान लेखक बन गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »