‘द’ डिक्टेटर का समापन भाषण : सूरज प्रकाश

मुझे खेद है, लेकिन मैं शासक नहीं बनना चाहता। यह मेरा काम नहीं है। किसी पर भी राज करना या किसी को जीतना नहीं चाहता। मैं तो किसी की मदद करना चाहूँगा, अगर हो सके तो—यहूदियों की, गैर-यहूदियों की, काले लोगों की, गोरे लोगों की।

हम सब एक-दूसरे की मदद करना चाहते हैं। मानव होते ही ऐसे हैं। हम एक-दूसरे की खुशी के साथ जीना चाहते हैं—एक-दूसरे की तकलीफों के साथ नहीं। हम एक-दूसरे से नफ़रत और घृणा नहीं करना चाहते। इस संसार में सभी के लिए स्थान है और हमारी यह समृद्ध धरती सभी के लिए अन्न-जल जुटा सकती है।

जीवन का रास्ता मुक्त और सुंदर हो सकता है, लेकिन हम रास्ता भटक गए हैं। लालच ने आदमी की आत्मा को विषाक्त कर दिया है—दुनिया में नफ़रत की दीवारें खड़ी कर दी हैं। लालच ने हमें जहालत में, खून-खराबे के फंदे में फँसा दिया है। हमने गति का विकास कर लिया, लेकिन अपने आपको गति में ही बंद कर दिया है। हमने मशीनें बनाईं, मशीनों ने हमें बहुत कुछ दिया, लेकिन हमारी माँगें और बढ़ती चली गईं। हमारे ज्ञान ने हमें सनकी बना छोड़ा है; हमारी चतुराई ने हमें कठोर और बेरहम बना दिया है। हम बहुत ज़्यादा सोचते हैं और बहुत कम महसूस करते हैं। हमें बहुत अधिक मशीनरी की तुलना में मानवीयता की ज़्यादा ज़रूरत है। चतुराई की तुलना में हमें दयालुता और विनम्रता की ज़रूरत है। इन गुणों के बिना जीवन हिंसक हो जाएगा और सब कुछ समाप्त हो जाएगा।

हवाई जहाज़ और रेडियो हमें आपस में एक-दूसरे के निकट लाए हैं। इन्हीं चीज़ों की प्रकृति ही आज चिल्ला-चिल्लाकर कह रही है—इंसान में अच्छाई हो; चिल्ला-चिल्लाकर कह रही है—पूरी दुनिया में भाईचारा हो, हम सबमें एकता हो। यहाँ तक कि इस समय भी मेरी आवाज़ पूरी दुनिया में लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुँच रही है—लाखों-करोड़ों हताश पुरुष, स्त्रियाँ और छोटे-छोटे बच्चे—उस तंत्र के शिकार लोग, जो आदमी को क्रूर और अत्याचारी बना देता है और निर्दोष इंसानों को सींखचों के पीछे डाल देता है। जिन लोगों तक मेरी आवाज़ पहुँच रही है—मैं उनसे कहता हूँ—‘निराश न हों।’ जो मुसीबत हम पर आ पड़ी है, वह कुछ नहीं, लालच का गुज़र जाने वाला दौर है। इंसान की नफ़रत हमेशा नहीं रहेगी, तानाशाह मौत के हवाले होंगे और जो ताकत उन्होंने जनता से हथियाई है, जनता के पास वापस पहुँच जाएगी और जब तक इंसान मरते रहेंगे, स्वतंत्रता कभी खत्म नहीं होगी।

सिपाहियो! अपने आपको इन वहशियों के हाथों में न पड़ने दो। ये आपसे घृणा करते हैं—आपको गुलाम बनाते हैं—जो आपकी ज़िंदगी के फ़ैसले करते हैं, आपको बताते हैं कि आपको क्या करना चाहिए, क्या सोचना चाहिए और क्या महसूस करना चाहिए! जो आपसे मशक्कत करवाते हैं—आपको भूखा रखते हैं—आपके साथ मवेशियों का-सा बरताव करते हैं और आपको तोपों के चारे की तरह इस्तेमाल करते हैं। अपने आपको इन अप्राकृतिक मनुष्यों, मशीनी मानवों के हाथों गुलाम मत बनने दो, जिनके दिमाग मशीनी हैं और जिनके दिल मशीनी हैं! आप मशीनें नहीं हैं! आप इंसान हैं! आपके दिल में मानवता के प्यार का सागर हिलोरें ले रहा है। घृणा मत करो! सिर्फ वही घृणा करते हैं जिन्हें प्यार नहीं मिलता—प्यार न पाने वाले और अप्राकृतिक!

सिपाहियो! गुलामी के लिए मत लड़ो! आज़ादी के लिए लड़ो! सेंट ल्यूक के सत्रहवें अध्याय में यह लिखा है कि ईश्वर का साम्राज्य मनुष्य के भीतर होता है—सिर्फ एक आदमी के भीतर नहीं, न ही आदमियों के किसी समूह में ही, अपितु सभी मनुष्यों में ईश्वर वास करता है! आप में! आप सब व्यक्तियों के पास ताकत है—मशीनें बनाने की ताकत, खुशियाँ पैदा करने की ताकत! आप लोगों में इस जीवन को शानदार, रोमांचक गतिविधि में बदलने की ताकत है। तो—लोकतंत्र के नाम पर—आइए, हम ताकत का इस्तेमाल करें—आइए, हम सब एक हो जाएँ। आइए, हम सब एक नई दुनिया के लिए संघर्ष करें। एक ऐसी बेहतरीन दुनिया, जहाँ सभी व्यक्तियों को काम करने का मौका मिलेगा। इस नई दुनिया में युवा वर्ग को भविष्य और वृद्धों को सुरक्षा मिलेगी।

इन्हीं चीज़ों का वादा करके वहशियों ने ताकत हथिया ली है। लेकिन वे झूठ बोलते हैं! वे उस वादे को पूरा नहीं करते। वे कभी करेंगे भी नहीं! तानाशाह अपने आपको आज़ाद कर लेते हैं, लेकिन लोगों को गुलाम बना देते हैं। आइए, दुनिया को आज़ाद कराने के लिए लड़ें—राष्ट्रीय सीमाओं को तोड़ डालें—लालच को खत्म कर डालें, नफ़रत को दफन करें और असहनशीलता को कुचल दें। आइए, हम तर्क की दुनिया के लिए संघर्ष करें—एक ऐसी दुनिया के लिए, जहाँ विज्ञान और प्रगति इन सबको खुशियों की तरफ ले जाएगी। लोकतंत्र के नाम पर आइए, हम एकजुट हो जाएँ!

हन्नाह! क्या आप मुझे सुन रही हैं?

आप जहाँ कहीं भी हैं, मेरी तरफ देखें! देखें, हन्नाह! बादल बढ़ रहे हैं! उनमें सूर्य झाँक रहा है! हम इस अँधेरे में से निकलकर प्रकाश की ओर बढ़ रहे हैं! हम एक नई दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं—अधिक दयालु दुनिया, जहाँ आदमी अपनी लालच से ऊपर उठ जाएगा, अपनी नफ़रत और अपनी पाशविकता को त्याग देगा। देखो हन्नाह! मनुष्य की आत्मा को पंख दे दिए गए हैं और अंततः ऐसा समय आ ही गया है, जब वह आकाश में उड़ना शुरू कर रहा है। वह इंद्रधनुष में उड़ने जा रहा है। वह आशा के आलोक में उड़ रहा है। देखो हन्नाह! देखो!

(स्रोत: चार्ली चैप्लिन की आत्मकथा मेरा जीवन से)

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