गुरुदत्त : एक शापित गंधर्व – नेहा भांडारकर

दिनांक: 9 जुलाई, 1925 को बंगलुरु में जन्मे, गुरु दत्त का नाम सुनते ही इंडियन सिनेमा के एक अनोखे, रहस्यमयी और टैलेंटेड आर्टिस्ट की इमेज़ उभर आती है। उन्होंने हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर में डायरेक्टर, एक्टर और प्रोड्यूसर, तीनों भूमिकाओं को दक्षतापूर्वक निभाया। उनकी फिल्मों ने दर्शकों को उदासी का एक ख़ूबसूरत एहसास दिया–एक ऐसा एहसास जो असलियत के साये से आया था, लेकिन कलात्मक चमक से रोशन था।
गुरु दत्त का काम भारतीय सिनेमा तक ही सीमित नहीं था। उनके पास अनुभव था–कोमल भावनाओं का, अकेलेपन के अंधेरे कोनों से निकलकर दिल को छू लेने वाली आहों का। उन्होंने अपना करियर एक एक्टर के तौर पर शुरू किया, लेकिन उनका असली मक़सद डायरेक्शन था।
गुरु दत्त के डायरेक्शन का तरीका अपने समय से बहुत आगे था। उन्होंने प्रकाश और छाया का इस्तेमाल सिर्फ़ विज़ुअल प्रजेंटेशन के लिए नहीं, बल्कि भावनाओं की गहरी जटिलता, पेचीदगी को विज़ुअल रूप देने के लिए किया। फोटोग्राफी की ख़ूबसूरती, डायलॉग का मतलब और म्यूज़िक की दिल को छू लेने वाली रिदम, ये सभी चीज़ें उनकी फ़िल्मों की आत्मा थीं।


अपने विज़ुअल प्रेजेंटेशन में प्रकाश और छाया (लाइट-शैडो) का इस्तेमाल करने के पीछे एक सुंदर कहानी है। गुरु दत्त की दादी नित्य शाम को दिया जलाकर आरती करतीं थी जबकि चौदह वर्षीय गुरु दत्त दिये की रोशनी में दीवार पर अपनी उँगलियों की विभिन्न मुद्राओं से तरह-तरह के चित्र बनाते रहते थे। यहीं से उनके मन में कला के प्रति संस्कार जागृत हुआ। हालांकि वे अप्रशिक्षित थे, फिर उनकी यह कला परवान चढ़ी और उन्हें सारस्वत ब्राह्मणों के एक सामाजिक कार्यक्रम में इसी कला के लिए उस जमाने में पाँच रुपये का नकद पारितोषक प्राप्त हुआ।
जब गुरु दत्त 16 वर्ष के थे तो उन्होंने वर्ष 1941 में पूरे पाँच साल के लिये 75 रुपये वार्षिक छात्रवृत्ति पर अल्मोड़ा जाकर नृत्य, नाटक और संगीत की शिक्षा लेनी शुरू की। वर्ष 1944 में जब द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण उदय शंकर इण्डिया कल्चर सेण्टर बन्द हो गया तो गुरु दत्त वापस अपने घर लौट आये थे। यद्यपि आर्थिक कठिनाइयों के कारण वह स्कूल जाकर अध्ययन तो न कर सके; परन्तु रवि शंकर के अग्रज उदय शंकर की संगत में रहकर उन्होंने कला व संगीत के कई गुण अवश्य सीखे। यही गुण आगे चलकर कलात्मक फिल्मों के निर्माण में उनके लिये सहायक सिद्ध हुआ। गुरुदत्त को इंडिया का ‘ऑर्सन वेल्स’ कहा जाता है। एक बहुमुखी कलाकार के रूप में उन्होंने फिल्मों में एक्टर, डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, कोरियोग्राफर और राइटर के तौर पर अनेकानेक भूमिकाएं निभाईं।
उनके द्वारा फ़िल्मों में कलात्मकता पर विशेष ध्यान दिए जाने के कारण उनकी फिल्मों की गणना विश्व-स्तरीय फिल्मों की श्रेणी में की जाती है। इसी वज़ह से सिनेमा-प्रेमी उनकी फिल्मों के आज भी दीवाने हैं। गुरु दत्त, शोहरत की चोटी पर पहुँचे तो थे; मगर उन्होंने अपनी निजी ज़िन्दगी ने बर्बादी के मंज़र भी देखे थे। उन्हें शराब की लत पडी हुई थी जिसके प्रभाव में उन्होंने नींद की गोलियाँ खाकर आत्महत्या कर ली थी। भले ही, उनकी अपनी ज़िन्दगी और फिल्मों पर हार और त्रासदियों के काले साये छाए रहे हों, अपनी फिल्मों में रोमांचकता और कल्पनाशीलता का भरपूर प्रयोग करते हुए वह भारतीय सिनेमा को ऊँचाइयों तक ले गए। दिनांक: 10 अक्टूबर, 1964 को केवल 39 साल की उम्र में उनकी अचानक मौत हो गई; उनकी मौत का रहस्य हमारे मन में आज भी एक अनसुलझा सवाल पैदा करता है।

बहरहाल, उनकी प्रतिभा-छटा आज भी हमें आश्चर्य से सराबोर करती है जो समय के साथ कभी फीकी नहीं पड़ेगी। उनके फैन्स, स्टूडेंट्स, स्कॉलर्स और डायरेक्टर्स की पीढ़ियाँ उनकी फिल्मों से प्रेरणा लेती रहेंगी। गुरु दत्त एक नाम नहीं, एक जीवन्त एहसास है। आर्टिस्ट के मन में खोए हुए शब्दों, अनकहे सवालों और अनकही कहानियों की एक रहस्यमयी निशानी।
बतौर निर्देशक, उनकी पहली फिल्म थी ‘बाज़ी’ जो 1951 में रिलीज़ हुई थी। उनकी अगली फिल्म ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’ एक हल्की-फुल्की रोमांटिक फिल्म थी। इसके अतिरिक्त, ‘बाजी’, ‘आरपार’ और ‘सीआईडी’ तथा उन फिल्मों के गानों के जादू ने हम पर आज भी सम्मोहिनी डाल रखी है। उनकी हिट हुईब फिल्म, ‘चौदहवीं का चाँद’ में मुस्लिम समाज का यथार्थ चित्रण है। इसके शीर्षक गीत को दोबारा फिल्माया गया था, जबकि इस श्वेत-श्याम फिल्म को रंगीन फिल्म में रूपांतरित किया गया था। उनकी क्लासिक फिल्मों में ‘प्यासा’, ‘कागज़ के फूल’ और ‘साहिब बीवी और ग़ुलाम’ को शुमार किया जाता है। अधिकतर उनकी फिल्मों के गाने उनकी पत्नी गीता दत्त गाती थी। गीता दत्त के कुछ अमर गाने हैं–‘जाने वो कैसे लोग थे’ (प्यासा), ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए’ (प्यासा), ‘हम आपकी आँखों में’ (प्यासा) और ‘बाबूजी धीरे चलना’ (आर-पार) आदि। इन अमर गानों के साथ-साथ उनके इन मधुर गानों की खनक कभी कम नहीं होगी–‘सुन सुन सुन ज़ालिमा’, ‘उधर तुम हसीन हो’, ‘कभी आर, कभी पार’।
उल्लेखनीय है कि यद्यपि गुरु दत्त और गीता दत्त, दोनों पति-पत्नी फिल्म जगत बेहद मशहूर थे, तथापि उनके रिश्तों में खटास थी। गुरु दत्त का असली नाम वसंत कुमार पादुकोण था। उनका जन्म कर्नाटक के मैंगलोर में हुआ था। उनकी मातृभाषा कोंकणी थी। उनकी माँ वासन्ती को बहुत भाषाएं आती थीं। वह घर पर प्राइवेट ट्यूशन के अलावा लघुकथाएँ लिखतीं थीं और बंगाली उपन्यासों का कन्नड़ भाषा में अनुवाद भी करती थीं। पिता कोलकाता में ही नोकरी करते थे। इसलिए बंगाली संस्कृति का उनपर गहरा प्रभाव था और लगाव भी। इसलिए उन्होंने अपना नाम वसंतकुमार से गुरु दत्त रखा था ऐसा कहा जाता हैं। फिल्म के लिए एक्टर चुनने से लेकर सिल्वर स्क्रीन पर अलग-अलग भाषाओं और कल्चर को दिखाने तक, उनकी माता वासन्ती ही गुरु दत्त की मेंटर थीं। फिल्म इंडस्ट्री में गुरु दत्त का सफर उन्हें पहले कोलकाता और फिर मुंबई ले गया। चूँकि गुरु दत्त ने उदय शंकर के इंस्टीट्यूट से ट्रेनिंग ली थी, इसलिए उन्हें ओपेरा और बैले दोनों कलाओं की अच्छी जानकारी थी। उन्होंने अपनी फिल्मों में न केवल डांस और म्यूजिक में बल्कि डायलॉग्स में भी इनकी लय को पकडा था।
गुरु दत्त भारतीय सिनेमा में आत्मकथात्मक फिल्में देने वाले अहम डायरेक्टर थे। उन्होंने ऐसे नायकों को फिल्मों में प्रदर्शित किया, जो ख़ुद को बर्बाद करने की राह पर चलते हुए अपनी ज़िंदगी का दर्द बयां करते हैं। इसके अतिरिक्त, उनकी फिल्मों में सामाजिक सच्चाई का कारुणिक और भयानक रूप भी दिखाया गया है। गुरु दत्त अपने फिल्मी पात्रों को खूबसूरत जगहों पर नहीं भेजते। ‘सुन सुन सुन ओ ज़ालिमा’ और ‘जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी’ जैसे दिलकश गीत गैरेज़ और ऑफिस में शूट किए गए थे। गुरु दत्त ने अपने डायलॉग में बम्बइया हिंदी का इस्तेमाल किया है। मुंबई के मराठी, पारसी, गुजराती, ईसाई और मुस्लिम समुदायों के किरदारों को इस हिंदी के ज़रिए दिखाते हुए, गुरु दत्त का दयालु, इंसानियत वाला नज़रिया अक्सर आम लोगों की ज़िंदगी, उनके प्यार और उन जगहों को प्रदर्शित करते समय साफ दिखता है जहाँ उनका प्यार पनपता है, जैसे ऑफिस, गैरेज़ और सादे घर।

गुरु दत्त ने विमल मित्र के उपन्यास पर बनी फिल्म ‘साहिब, बीवी और ग़ुलाम’ में सामंती व्यवस्था, सामन्तवाद, धन-लोलुपता में जमींदारों की छोड़ी हुई ज़िंदगी, मंदिरों का संरक्षण, झोपड़ियों में रहने वाली औरतें, जमींदारों के सोने के पिंजरों में कैद छोटी बहू जैसी बदनसीब औरतें, उस समय का जुल्मी ब्रिटिश राज, उसके खिलाफ़ बगावत करने वाले आज़ादी पसंद भारतीय, ब्रह्मो समाज, रोटी के व्यापार में भी अपनाई जाने वाली जुल्मी जाति व्यवस्था, कट्टर एकतरफा राष्ट्रवाद का विरोध, और चुटकी भर सिंदूर से औरत की इच्छा पूरी होने का अंधविश्वास, इन सब को सही तरह से दिखाया गया है, जिससे फिल्म को एक बड़ा सोशियोलॉजिकल डायमेंशन मिलता है। इसलिए, यह फिल्म सिर्फ़ एक ट्रेजेडी नहीं है बल्कि आज के समाज का इतिहास भी दिखाती है।
गुरु दत्त की फिल्म ‘कागज के फूल’ क्लासिक आर्ट का नमूना है। यद्यपि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई तथापि ऑर्टिस्टिक लेवल पर यह दुनिया के फिल्म चार्ट में सर्वोपरि है। यह एक ऐसी फिल्म है जिसमें कोई कमर्शियल मसाला नहीं है, सिर्फ म्यूज़िक और इमेज़ हैं और उनकी अपनी सारी सृजनशील क्षमताओं और मेहनत के बावज़ूद यह पूरी तरह से फ्लॉप हो गई है। वी.के. मूर्ति का कैमरा, अबरार अल्वी के डायलॉग और गीता दत्त के गाने इस फिल्म की ताकत हैं।

‘कागज़ के फूल’ की कहानी खुद गुरु दत्त की ज़िंदगी की कहानी है। एक शादीशुदा फिल्म डायरेक्टर जो अपनी पत्नी से पहले ही अलग हो चुका है, और फिर उसकी
जिंदगी में शांति नाम की एक बहुत ही खूबसूरत, अच्छे स्वभाव वाली एक्ट्रेस आती है। उनके बीच प्यार बढ़ता है लेकिन आखिर में उन्हें अलग होना पड़ता है।

इस फिल्म में सिनेमास्कोप का इस्तेमाल, रोशनी और परछाई का खेल, जैसे ‘वक़्त ने किया’ गाने की लाइटिंग डिज़ाइन बस कमाल की है। बूढ़ा फिल्म डायरेक्टर अपने पुराने स्टूडियो में आता है और उसकी शानदार ज़िंदगी फ्लैशबैक में सामने आती है। वह गाना है – ‘बिछड़े सभी बारी बारी’

गुरु दत्त की फिल्म प्यासा (1957), जो बॉक्स ऑफ़िस पर हिट रही, आज भी लाखों फिल्म प्रेमियों के दिलों में एक खजाना है। दिलीप कुमार के मना करने के बाद गुरु दत्त ने माला सिन्हा, वहीदा रहमान, रहमान और जॉनी वॉकर के साथ लीड रोल निभाया।
कलकत्ता में सेट यह फिल्म विजय नाम के एक परेशान उर्दू कवि की कहानी बताती है। गुलाबो (वहीदा रहमान), जो एक दयालु वेश्या है और मीना, जो विजय की कॉलेज के समय की प्रेमिका (माला सिन्हा) है, से विजय की मुलाकात के बाद, गुलाबो उसकी कविताएँ छपवाने में उसकी मदद करती है, जिससे उसके काम में सफलता मिलती है और दोनों के बीच रोमांटिक रिश्ता बन जाता है। हालाँकि प्यासा की कहानी का बंगाल से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन गुरु दत्त ने पूरी फिल्म कोलकाता के कैनवस पर शूट की। इस फिल्म में तेल मालिश करने वाले जॉनी वॉकर का दर्शकों को खींचने के लिए गाया गया गाना (‘सिर जो तेरा चकराए..’) भी यादगार था।

	फिल्म 'प्यासा' के गाने अलग-अलग तरह के थे। साहिर लुधियानवी के गीत "जिन्हें नाज़ है हिंद पर, वो कहाँ है' से लेकर सपनों जैसा हल्का-फुल्का लव सॉन्ग 'हम आपकी आँखों में' दर्शकों को चुम्बक की तरह खींचते हैं और इन गीतों के ज़रिए एक गरीब कवि और उसकी अमीर प्रेमिका का एक-साथ फिल्मांकन होता है। इसमें रोमांच पैदा करने वाला वह जोशीला गाना भी है--'ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया..' 

यद्यपि गुरु दत्त एक जीनियस थे तथापि वह इकलौते शापित गंधर्व थे, जो अपनी पर्सनल लाइफ में गलती से इस दुनिया में आ गए थे। गीता और गुरु दत्त की पहली मुलाकात फिल्म ‘बाजी’ की रिकॉर्डिंग के दौरान हुई थी। गीता ने उनकी फिल्म का गाना ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले’ गाया था। उस समय गीता एक स्टॉर सिंगर थीं। इस मुलाकात के बाद दोनों के बीच धीरे-धीरे प्यार पनपा। तीन साल के रिलेशनशिप के बाद 1953 में दोनों ने शादी कर ली। गीता और गुरु दत्त के तीन बच्चे हुए। गीता और गुरु दत्त की ज़िंदगी खुशहाल थी। लेकिन कहा जाता है कि एक्ट्रेस वहीदा रहमान के कारण उनकी ज़िंदगी में तूफान आ गया था। वहीदा ने हमेशा गुरु दत्त से जुड़े सवालों का ज़वाब शांत लेकिन ईमानदार तरीके से दिया है। फिर भी, गुरु दत्त, गीता दत्त और वहीदा रहमान के लव ट्रायंगल और उनकी नाकामी की कहानी हमेशा चर्चा में रही है। गुरु दत्त की आत्महत्या के सिलसिले में वहीदा को हमेशा आरोपियों के कटघरे में डालने की कोशिश की गई है। गुरु दत्त और गीता दत्त को इस दुनिया से गए हुए बहुत समय हो गया है। लेकिन, वहीदा आज भी अपनी ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव पर अपने दो बच्चों, रिश्तेदारों, दोस्तों और जान-पहचान वालों के साथ खुशी-खुशी जी रही हैं। इस शापित गंधर्व के बारे में बस इतना ही कह सकते हैं…
“वो तेरे प्यार का गम एक बहाना था सनम
अपनी क़िस्मत ही कुछ ऐसी थी कि दिल टूट गया।”

…………..

परिचय : नेहा भांडारकर त्रैभाषिक लेखिका, कवयित्री, अनुवादक एवं संपादक हैं। उनकी 18 पुस्तकें प्रकाशित हैं, जिनमें मराठी, हिंदी और अंग्रेजी की मौलिक कृतियों के साथ अंग्रेजी से मराठी अनुवाद भी शामिल हैं। उनकी रचनाएँ विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल हैं तथा उनके साहित्य पर शोध कार्य भी हुआ है। उन्हें महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए हैं। उनके साहित्य का भारतीय भाषाओं के साथ 15 से अधिक विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। वे अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक मंचों से जुड़ी हैं और ‘रीडर्स चॉइस’ पत्रिका के हिंदी एवं मराठी विभाग की संपादक हैं। उनकी कविताओं का फ्रांस और अमेरिका के रेडियो पर प्रसारण भी हुआ है।

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