दिन विशेष : श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेषांक : कान्हा की लीलाएँ, कृष्ण का दर्शन

संपादकीय
श्रीकृष्ण का जीवन प्रेम, सत्य और कर्म का प्रतीक है
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म केवल एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि मानवता के लिए एक शाश्वत संदेश है — जीवन को प्रेम, कर्म और ज्ञान के संतुलन में जीने का। जब हम बालकृष्ण की लीलाओं को देखते हैं — माखन चुराना, गोपियों के साथ हँसी-ठिठोली, कालिय नाग का दमन या गोवर्धन पर्वत उठाना — तो यह केवल चमत्कार नहीं, बल्कि जीवन के गहरे दर्शन की झलक है।
इन लीलाओं में छिपा है जीवन की निर्मलता और शुद्धता का संदेश, जहाँ बालकृष्ण हमें सिखाते हैं कि निष्कपटता ही सच्चे आनंद का स्रोत है। उनका माखन चुराना केवल उनके नटखट बालपन की शरारत नहीं, बल्कि यह भी बताता है कि जीवन का सार ‘माखन’ यानी प्रेम और करुणा में है, जिसे बाँटने से ही सुख मिलता है। गोवर्धन उठाने की लीला हमें सिखाती है कि जब समाज संकट में हो, तो एक व्यक्ति का अदम्य साहस पूरे समुदाय और समाज को बचा सकता है। वहीं रासलीला में कृष्ण का संदेश है — जीवन का नृत्य तभी सुंदर है जब उसमें आत्मा और प्रकृति का सामंजस्य हो। इस विशेषांक का एक भाग ऐसा भी है जिसमें बाल कृष्ण की विभिन्न लीलाओं के पीछे निहित दर्शन को उकेरा गया है.
“वैश्विक हिंदी परिवार” द्वारा प्रकाशित किए गए इस विशेषांक में हम विभिन्न रचनाकारों की रचनाओं को प्रस्तुत कर रहे हैं. इस विशेषांक में कृष्ण-भक्ति के शाखा के प्राचीन कवियों के साथ-साथ कुछ नए रचनाकारों की रचनाओं को भी शामिल किया गया है. अपने बालपन में ही श्रीकृष्ण ने दैत्य-राज कंस द्वारा भेजे गए नकारात्मक तत्त्वों वाले अनेकानेक राक्षसों और दैत्यों का संहार किया. उनका दैवी व्यक्तित्त्व न केवल समाज में सुव्यवस्था का सूत्रपात करने की प्रेरणा देता है, अपितु नकारात्मक तत्त्वों से भी अथक लड़कर उन्हें परास्त करने का संदेश देता है. ऐसी कोशिश की गई है कि यह विशेषांक हमारे पाठकों के लिए ज्ञानवर्धक और सूचनापरक बने तथा हमें अपने गौरवशाली अतीत को सहेजने का एक माध्यम बने. हम इस विशेषांक के कलेवर को आकर्षक बनाने तथा विविधधर्मी रचनाओं से सज्जित करने के लिए अपने संपादक मंडल का आभार प्रकट करते हैं; इस परिवार से जुड़े अनुभवी शख्सियतों के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करते हैं, जिन्होंने इस विशेषांक की परिकल्पना की और संपादक मंडल का सतत् उत्साहवर्धन किया. हमें पूरी उम्मीद है कि साहित्य के पिपासु पाठक इस विशेषांक को हाथों-हाथ लेंगे और अपनी सकारात्मक प्रतिक्रियाओं से हमें अनुगृहीत करेंगे. “वैश्विक हिंदी परिवार” का प्रयास है कि इस जन्माष्टमी पर हर पाठक न केवल भक्ति में डूबे, बल्कि श्रीकृष्ण के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने भीतर के ‘कृष्ण’ को जागृत करे — जो प्रेम, सत्य और कर्म का प्रतीक है। : संपादक-डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र
मधुराष्टकम् : श्री वल्लभाचार्य
मधुराष्टकम्
विष्णुस्तोत्राणि
वल्लभाचार्य
अधरं मधुरं वदनं मधुरं, नयनं मधुरं हसितं मधुरम् ।
हृदयं मधुरं, गमनं मधुरं, मधुराधिपतेरखिलं
मधुरम् ।।१।।
वसनं मधुरं, चरितं मधुरं, वचनं मधुरं वलितं मधुरम्,
चलितं मधुरं, भ्रमितं मधुरं, मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्।।२।।
वेणर्मधुरो रेणुर्मधुरः पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ,
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।।३।।
गीतं मधुरं पीतं मधुरं, भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरम्,
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।।४।।
करणं मधुरं, तरणं मधुरं, हरणं मधुरं, रमणं मधुरम्,
वमितं मधुरं, शमितं मधुरं, मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।।५।।
गुञ्जा मधुरा माला मधुरा यमुना मधुरा वीची मधुरा,
सलिलं मधुरं, कमलं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।।६।।
गोपी मधुरा लीला मधुरा, राधा मधुरा मिलनं मधुरम्,
दृष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।।७।।
गोपा मधुरा गावो मधुरा, यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा,
दलितं मधुरं, फलितं मधुरं, मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।।८।।
|| इति श्रीमद्वल्लाभाचार्य विरचित मधुराष्टकं संपूर्णं || || श्रीकृष्णार्पणमस्तु ||
उधो, मन न भए दस बीस : सूरदास
उधो, मन न भए दस बीस।
एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस॥
सिथिल भईं सबहीं माधौ बिनु जथा देह बिनु सीस।
स्वासा अटकिरही आसा लगि, जीवहिं कोटि बरीस॥
तुम तौ सखा स्यामसुन्दर के, सकल जोग के ईस।
सूरदास, रसिकन की बतियां पुरवौ मन जगदीस॥
धनि यह वृन्दावन की रैनु। : सूरदास
धनि यह वृन्दावन की रैनु।
नंदकिसोर चरावे गैयां बिहरि बजावे बैनु॥
मनमोहन कौ ध्यान धरै जो अति सुख पावत चैनु।
चलत कहां मन बसहिं सनातन जहां लैनु नहीं दैनु॥
यहां रहौ जहं जूठन पावैं ब्रजवासी के ऐनु।
सूरदास ह्यां की सरबरि नहिं कल्पवृच्छ सुरधैनु
सवैया : रसखान
ब्रह्मा मैं ढूँढ्यो पुरानन गानन वेद रिचा सुनि चौगुने चायन।
देख्यो सुन्यो कबहूँ न कितूँ वह कैसे सरूप औ कैसे सुभायन॥
टेरत हेरत हारि पर्यो रसखानि बतायो न लोग लुगायन।
देखौ दुरो वह कुंजकुटीर में बैठो पलोटत राधिका
सवैया : रसखान
मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पशु हौं तौ कहा बस मेरो चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तौ वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरंदर धारन।
जो खग हौं तौ बसेरो करौं मिलि कालिंदी कूल कदंब की डारन
कविता : गोपालशरण सिंह
आते जो यहाँ है, ज-भूमि की छटा वे देख
नेक न अघाते होते मोद-मद-माते हैं।
जिस ओर जाते उस ओर मन भाते दृश्य,
लोचन लुभाते और चित्त को चुराते हैं।
पल भार अपने को भूल जाते हैं वे सदा
सुखद अतीत सुधा सिधु में समाते हैं।
जान पडता है उन्हें आज भी कन्हैया यहाँ,
भैया भैया टेरते हैं गैया को चराते हैं॥
करते निवास छवि धाम घनश्याम भृंग,
उर कलियों में सदा व्रज नर नारी की
कण कण में है यहाँ व्यात दृग सुखकारी,
भजु मनाहारी मूर्ति चुगुल मुरारी है।
किसको नहीं है सुध आती अनायास यहाँ,
गोवर्धन देख कर गोवर्धन धारी की?
न्यारी तीन लाक से है प्यारी जनभूमि यही,
जन मन हारी वृन्दा विपिन बिहारी की॥
भाक्त ब्रजेश की छटा है सब ठौर यहाँ,
लता द्रुमा बल्लियों में और फूल फूल में।
भूमि ही यहाँ की सब काल बतला सी रही,
ग्वाल बाल सग वह लटे इस धूल में।
कल कल रूप में है वधी रक गूँज रहा,
जाके सुना कालत कलिइजा के कूल में।
ग्राम ग्राम घाम घाम में है घनश्याम यहाँ,
किंतु वे छिपे हैं मनु दुकूल में॥
अब भी मुकुद रहते हैं ब्रज भूमि ही में,
देखते यहाँ के दृश्य दृग फेर फेर के।
छिपे उर कुज में है वृदावन वासिया के,
थकते वृथा ही लगा उन्हें हेर हेर के।
चित्त वृतियाँहै सब गोपियाँ उन्हीं की बनी,
रहती उहीं के आस पास घेर घेर के।
आठों थाम सब लोग लते हैं उन्हीं का नाम,
माना हैं बुलाते ‘श्याम श्याम’ टेर टर के॥
वही मंजू वही नहीं कलित कलिदजा है.
ग्राम और घाम की विदीप छबि धाम है।
वही वृंदावन है निकुंज-द्रुम-पुंज भी है,
ललित लताएँ लाल लोचनाभिराम है।
वही गिरिराज गोपजन का समाज वही,
वही सब साज बाज आज भी ललाम है।
व्रज की छटा किले क आता मन में है यही,
अब भी यहाँ ही शुभ-नाम घनश्याम है॥
देते हैं दिखाई सब हृदय अभिराम यहाँ,
सुषमा सभी की सुध दयाम की दिखाती है।
फूलों फूली सुरभित रुचिर द्रुभालियों से,
सुरभि उन्हीं की दिव्य देह की ही आती है।
सुयश उन्हीं का शुक सरिका सुनाती सदा,
कूक कूक कोकिला उन्हीं का गुण गाती है।
हरी भरी दृग-सुखदाई मन भाई मंजु,
यह व्रज-मेदिनी उन्हीं की कहलाती है।
स्रोत :पुस्तक : कवि भारती (पृष्ठ 155) रचनाकार : गोपालशरण सिंह प्रकाशन : साहित्य प्रेस संस्करण : 1953
तू कान्हा हम गोपी सारे (गीत) : पीयूष कांति
तू कान्हा हम गोपी सारे
तेरी कितनी लीलाएं हैं,
जीवन तुझसे प्रेम हमें है
पर सच! कितनी पीड़ाएं हैं…
तेरी धुन पर नाच रहे हैं
प्रेम में तेरे पागल होकर,
तेज हवा में उड़ जाएंगे
हम भी इक दिन बादल होकर,
छूटेगा संसार ये सारा
तन की अपनी सीमाएं हैं,
जीवन तुझसे प्रेम…
जीवन है जब एक सफर तो
फिर क्यों इतना खून-खराबा,
छोड़के सब तर्कों को तू अब
प्रेम की वीणा लेकर आ जा,
आ छेड़े कोई राग ह्रदय का
छोड़के जो भी चिंताएं हैं,
जीवन तुझसे प्रेम…
विरह-मिलन अश्रु-मुस्कानें
सब कुछ है बस खेल-तमाशा,
सांसों की डोरी को थामे रहती
फिर भी कोई आशा,
भवसागर में जीवन-नैया
पतवारे ये आशाएं हैं,
जीवन तुझसे प्रेम…
सर्वव्यापी श्रीकृष्ण : डॉ. आरती ‘लोकेश’
देवकी)-गर्भ में तुम, (यशोदा)-अंक में तुम,
मुख में दिखते ब्रह्मांड तुम्ही हो।
तुम में जड़-मूल, तृण-पत्र तुम में,
अखण्ड वन के सुकाण्ड तुम्ही हो।
गौ-ग्वाल में तुम, ब्रजबाल में तुम,
मटकी भर दधि-माखन तुम हो।
चर-अचर में तुम, चल-अचल तुम में,
नंदबाबा के गृह-आँगन तुम हो।
तुम में संगीत, सुर-ताल में तुम,
मोहना! तुम्ही मुरलीधर हो।
आधार में तुम, शिखर तुम में,
कान्हा! रक्षणा गिरिधर हो।
तुम में है देव, अदेव में तुम,
वसुदेव के वासुदेव तुम्ही हो।
चतु:भूज में तुम, त्रिनेत्र तुम में,
भू-सृष्टि के त्रिदेव तुम्ही हो।
मीरा में तुम, राधामय तुम,
षोडश कला का काव्य तुम्ही हो।
सूक्ष्म भी तुम, विराट भी तुम,
पार्थसारथी संभाव्य तुम्ही हो।
चीर भी तुम, अचीर भी तुम,
कृष्णा के तारनहार तुम्ही हो।
चिंत भी तुम, अचिंत तुम में,
अच्युत के अवतार तुम्ही हो।
धुरी में तुम, घूर्णन में तुम,
गति-लय के चक्रधर तुम्ही हो।
प्रकाश में तुम, तमस तुम में,
इंद्रधनुषी अंशुधर तुम्ही हो।
गीता में तुम, उपदेश में तुम,
परमज्ञान संज्ञान तुम्ही हो।
वरुणा में तुम, करुणामय तुम,
दुष्टों का संधान तुम्ही हो।
विंद में तुम, प्रलय में तुम,
नैया के खेवनहार तुम्ही हो।
विरक्ति तुम, आसक्ति तुम में,
माया का भवसार तुम्ही हो।
कर्म में तुम, कर्त्ता में तुम,
हर क्रिया के करतार तुम्ही हो।
जन्म में तुम, मृत्यु तुम में,
प्राणों के भरतार तुम्ही हो।
आगत तुम में, विगत तुम में,
त्रय कालों का स्वरूप तुम्ही हो।
आरंभ तुम से, अंत तुम में,
अंततोगत्व विश्वरूप तुम्ही हो।
तुम में शांति, रण में तुम,
धर्म हित रणछोड़ तुम्ही हो।
नीरस में तुम, सरस तुम में,
नवरस का निचोड़ तुम्ही हो।
शाश्वत में तुम, क्षणभंगुर तुम,
लीला का शोभित सत्य तुम्ही हो।
निकृष्ट में तुम, धन्य में तुम,
पुण्यफल के कृतकृत्य तुम्ही हो।
अक्षय में तुम, विलय में तुम,
द्वारकाधीश! पर्याप्त तुम्ही हो।
तुम में सब तत्त्व, सर्वस्व आप्त,
जगत में सर्वव्याप्त तुम्ही हो।
राधा और ध्यान-योग : डॉ. आरती ‘लोकेश’
श्याम धन नहीं साधारण, ऊधो! ये अविनाशी नाते,
प्रेम पाहन गढ़ी वह उक्ति, तोड़े से नहीं मिटे मिटाते।
मैं प्रणय का गीत लिखती, वे विरह का राग गाते,
तब भी श्रुतियाँ स्वर जुड़े ये, एक बंदिश थे समाते।
मैं उदय के संग थिरकती, वे अस्तांचल पर भू सजाते,
मोरपर सी बिखरी किरणें, समेट नित भाल पर सजाते।
मैं सागर तरंग सी उठ डूबती, वे डूबते को पार उतराते,
तल तक गिरे को शीश धर, अनिंद्य कर उच्च उठाते।
मैं शालीन लाज रजमूरत, वे चंचल नटखट इठलाते,
कंपित तन लाली हया की, नीलवर्ण तन ढक छुपाते।
मैं शुष्क रस सरल कुसुम, वे रसप्रिय मधुकर कहलाते,
बगिया चुन मन भाव पिरकर, इक सूत्र कंठ-हार बनाते।
मैं ग्राम गोपिका वृष बाला, उन्हें राजसी भोग लगाते,
अभागी के सुभग जगे जो, दुमहलों बसे कुँवर सुहाते।
मैं सौम्य शांत मगन रहाती, वे मुग्ध मनोहर तान सुनाते,
मखमली प्रेम आलापों में, उद्विग्न हिय कुछ बोल जाते।
मैं अभिलाषी दो बाँहों की, जिनमें मुरली सदा थमाते,
थामने प्रेम नयन रथ डोर, कब कर्त्तव्य-पथ को ठुकराते!
मैं विमुक्त कवि परिकल्पना, वे कारागार तम प्रजाते,
निकुंज वासिनी को अमरत्व, देने बेड़ियाँ तोड़ आते।
मैं अपूर्ण वे पूर्ण ब्रह्म सत्य, वे रचे हमें हम उन्हें बनाते
ज्यों नवनीत बसे गौरस में, गिरिधर ब्रज के रंग बसाते,
ऊधो! मैं ऐसी न नादान, तुम ध्यान योग मुझको बतलाते,
कान्हा का ध्यान कान्हा से योग, जीवन-सार हमीं गहाते।
मुरली की तान : शशि पाधा
बंसी ने जब जान ली, राधा मोहन प्रीत
सुर दूजा वो साधे न ,और न गाए गीत|
ब्रज की भोली गोपियाँ, सुन मुरली की तान
घुँघरू बाँधें पाँव में, अधर धरें मुस्कान |
कनक रंग राधा हुई, कारे- कारे श्याम
दोपहरी की धूप से , खेल रही यूँ शाम |
राधा रानी गूँथती वैजन्ती की माल
श्यामा पहने रीझते राधा लाल गुलाल |
ऊधो से जा पूछतीं अपने मन की बात
कान्हा ने विदेस से, भेजी क्या सौगात |
यमुना तीरे श्याम ने, खेली लीला रास
लहर-लहर नर्तन हुआ, कण-कण बिखरा हास |
गुमसुम राधा घूमती, दिल से है मजबूर
हर पंथी से पूछती, मथुरा कितनी दूर|
कोकिल कूजे डार पे, गाये मीठे गीत
ढूँढे सुर में राधिका, बंसी का संगीत |
सोचूँ जग में हो कभी, मीरा-राधा मेल
दोनों सखियाँ खेलतीं, प्रीत-रीत का खेल
पल छिन चुभते शूल से, क्षीण हुई हर आस
कैसे काटे रात दिन, नैनन आस निरास
भजन : आशीष मिश्रा
एक ओर रघुकुल नंदन तौं दूजै कुँज-किशोर लखौ।
एक धरे धनु-बाण सुहावन, दूजै मुरली तान अहौ।
रामचंद्र मरजादा न्यारी, धीर धरम बड़ सीख कहौ।
कान्हा छैल-छबीलौ बाँका, प्रेम रतन राधा रसिहौं।।
राम कौ राज कहाँ सुहावै, पिता-वचन पर बन कौ जावैं।
कन्हैया जन लेत ही कारा, लल्ला कंस कै मार ही धारै।
एकै पत्नी-वर्त को पूजै, दूजे गोपिन रास रचावै।
एकै माखन-बासन तोडै, दूजौ राम अहिल्या तारै।।
राम कौ रथ कौ सारथी मानौ, हनूमान लछीमन हाँकै।
अर्जुन कौ रथ कान्हा खींचै, गोविंद गीता ज्ञान कौ बाँचै।
रघुवर जूठन बेर में अमरित, किसना साग में मेवा पावै।
एकै शबरी बेरइ खावैं, दूजे दीन सुदामा मानै।
दौनौ जग के तारनहारे, दौनौ भगतन लाज बचावै
दौनों सै हरि नाम पूजावै, पद तुलसी, पद मीरा गावै।।
रूप अनेक, पै शक्ति एकै, भेद न मन में ठानौ कोऊ।
ब्रज की भाषा मीठी बोली, सुर-रसखान हैं गावऊँ सोऊँ
चाहे दशरथ-सुत कहि पूजौ, कान्हा पूजौ या कहि दाऊ।
प्रेम की डोरी, सों बाँधि कै, ‘सियाराम’, ‘जय राधे’ गाऊँ॥
गोविन्द दामोदर माधवेति (दोहे) : शार्दुला नोगजा
बाल कृष्ण वट पात पे, पकड़े हाथ ललाम
अंबुज मुख से चूसते, पाँव अँगूठा थाम
माखन ले गोकुल फिरी, प्रेमसिक्त हो नार
‘दूध-दही’ बोले नहीं, ‘माधव’ करे पुकार
ऊखल से कान्हा बँधे, सिसक करें मनुहार
जसुमति मैया खोल दे, मैं छोटो सुकुमार
मिल-जुल गोपा-गोप जन, लें दामोदर नाम
घर-घर गूँजे रात-दिन, नाम कृष्ण अभिराम
चीरहरण दु:शासनी, पाण्डव को धिक्कार
कृष्णा ने रो कर कहा, करो कृष्ण उद्धार
साधारण मानव रहे, जपे कृष्ण जब नाम
करें श्याम उद्धार तो, मिल जाए प्रभु धाम
बाँधी बछड़े पूँछ से, चोटी गोप कुमार
दामोदर! खोलो इसे!, मैया रुष्ट पुकार
भोर हुई बालक चले, बेंत लकुटिया हाथ
गाय चराने ओ सखा, चलो हमारे साथ
जिव्हा मधुरस चाहती, कर माधव गुणगान
मीठा इससे विश्व में, ना कोई मिष्ठान
गज को पकड़ा ग्राह ने, बेबस हुआ अधीर
क्या आओगे नाथ जब, छूटे अधम शरीर
कृष्ण दुखों का अंत हैं, वे ही सुख के सार
जप ले माधव नाम तू, जब छोड़े संसार
गोपाला वंशीधरा, रूपसिन्धु लोकेश
दामोदर मधुसूदना, दीनबन्धु योगेश
कविता : धनंजय कुमार
कृष्ण ने अर्जुन से पूछा
देर क्यों लगती है तुमको
क्यों समझ आती नहीं बातें मेरी?
पार्थ बोला ” मित्र मेरे
मैं समझ लेता
तो गीता ही नहीं होती।
विश्व में, हर युग में
ये संसार अन्धा ही बना रहता,
योग का ये द्वार
पर्दे में छुपा रहता
ज्ञान और विज्ञान की
धुन कौन सुन पाता
संसार में फिर
चेतना का जन्म होने दो
ये वैश्विक जश्न होने दो।
ग़ज़ल : नीलम
बड़ी मस्त बंसी बजाए कन्हैया
रसीले सुरों से रिझाए कन्हैया
जो चाहे सुने वो मोहब्बत के सुर ये
कि इश्क-ए-हकीकी जगाए कन्हैया
नहीं रूप कोई, नहीं रंग कोई
जो चाहो वो सूरत, दिखाए कन्हैया
अदाओं से ऐसे वो करता है बस में
मुसलसल है दिल को छकाए कन्हैया
वही यमुना है और वही हैं हवाएँ
वो राधा को झूला झुलाए कन्हैया
है जश्न-ए-बहाराँ सा आने से उसके
जो ता-थैया-थैया, नचाए कन्हैया
वो जब रास अपना रचाता है ‘नीलम’
डगर हमको घर की भुलाए कन्हैया
डॉ मृदुल कीर्ति : श्रीमद्भगवद्गीता और योग
श्रीमद्भगवद्गीता और योग आज भारत के पर्याय बन चुके हैं! गीता भारतीय मनीषा और जीवन के समग्र आयामों का अद्भुत ज्ञान है, जीवन का संविधान है। कर्म, ज्ञान, भक्ति, वैराग्य और विशेष रूप से निष्काम कर्म का गहन ज्ञान जो जन्म-मरण से निराकरण का एकमेव उपाय हैं।
कर्म, अकर्म और विकर्म का विवेचन
मनुष्यों को कृत कर्मों के प्रति सजग करते हैं।
कुरुक्षेत्र में अर्जुन युद्ध को तत्पर है अपनों को देखकर मोहग्रस्त हो गया अब दो युद्ध हो गए कुरुक्षेत्र और अर्जुन का अन्तर्द्वन्द। इन दोनों द्वन्दों का समायोजन आध्यात्मिक ज्ञान सेअर्जुन को उपदिष्ट किया।अर्जुन के विषाद के क्षणों में उपदिष्ट ज्ञान ही गीता ज्ञान है जिसने सकल मानवता को निष्काम कर्म का दर्शन सिखाया! श्रीकृष्ण से उपदिष्ट गीता का स्थान प्रस्थान त्रयी में है अर्थात् ब्रह्मसूत्र, उपनिषद और गीता भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान ग्रंथों में प्राथमिकता पाते हैं। गीता का आदि शंकराचार्य का भाष्य गूढ़ गर्भिता और आध्यात्मिक मर्म के लिए जाना जाता है।
भगवद्गीता पर विश्व की सर्वाधिक भाषाओं में अनुवाद और भाषा भाष्य लिखे गए। गीता के श्लोकों के काव्यानुवाद भी बहुत हुए हैं। कान्हा (कहाँ नहीं है) का बाल्यकाल ब्रज में रहा अतः मेरा आकर्षण ब्रज भाषा में करने गीता का काव्यानुवाद की प्रेरणा हुई, जो कदाचित प्रथम ब्रज भाषा गीता काव्यानुवाद हैं।
जन्माष्टमी का दिव्य पर्व शुभ हो।
डॉ. सुनील देवधर – श्रीकृष्ण : अवतरण, सच्चिदानंद का
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, योगेश्वर कृष्ण का अवतरण, बालक कृष्ण का जन्म। जन्म ? जो अजन्मा है, अनादि और अनन्त है, उसका जन्म ? हाँ, उसी निराकार का साकार रूप। किन्तु ये जन्म प्रकृति के मनुष्यों के सदृश होते हुए भी नहीं है। तो क्या ये प्रकृति को अधीन करके योग माया से प्रकट होने का प्रमाण है ? प्रमाण ही है, क्योंकि इसके पीछे कारण है, हमारा आपका भी जन्म हुआ है, परन्तु हम इसका कारण नहीं जानते। वो कारण क्या है ? क्या कोई विशेष प्रयोजन था ? जो निर्गुण को सगुण रूप में प्रकट होना पड़ा। निश्चित प्रयोजन या जिसे स्वयं योगेश्वर कृष्ण ने स्पष्ट किया।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदान्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥
(हे भारत, जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृध्दि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ। साधु पुरुषों के उद्धार और दूषित कर्म करनेवालों के नाश के लिए धर्म स्थापना के प्रयोजन से मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।)
और इस तरह अपनी ही रची लीला से बालक कृष्ण ने कारागार में अपनी आँखें खोली, पहरेदार सो गऐ। वसुदेव रातों-रात बालक कृष्ण को लेकर यमुना पार कर गोकुल आ गए। जहाँ प्रतीक्षारत थी माँ यशोदा, उसकी चिरपोषित अभिलाषा पूरी हुई, इसकी गोद हरी हो गई। नन्द को पुत्र मिला, उनके हर्ष का पारावार नहीं। पुत्र जन्म के अवसर पर आमोद-प्रमोद, हर्ष उल्लास का, वातावरण छा गया. ढोल-मंजीरे बज उठे हैं, ललनाएँ सोहर गाती हैं, बधाई का स्वर गूँज उठा है। गरीबों और याचकों के लिए नन्दराज ने रत्न लुटाए। पुत्र जन्म की कोई भी रीति-नीति छूटी नहीं है। चन्दन की लकड़ी का रत्नजड़ित पालना यशोदा के पास पहुँचाया गया है। पालने में शिशु को पौढ़ाकर, अपलक निहारती हैं यशोदा, हल्के-हल्के झोंके देती हैं. कौन झूल रहा है, झुला कौन रहा है, इतनी सुध कहाँ है ?
जसोदा हरि पालने झुलावै, जसोदा हरि पालने झुलावै।
मन झूलत लख लाल मधुर छवि, निरख-निरख बल जावे।
को झूलत अरू कौन झुलावत, महामोद सरसावें।
जसोदा हरि पालने सुलावे…..
इक टक चकित चेत चित झूलत, मन मोहित सुख पावे।
श्याम रूप सुचि रूचिर कसौटी, चित कंचन हि कसावें।
जसोदा हरि पालने झुलावै…..
मधुर हास लालन को लखकर, भूल अपुन को जावे।
ढगिसि रहि कृष्ण कबी जसोदा, परा प्रेम दरसावें।
जसोदा हरि पालने झुलावै…..
माँ के जीवन का सच्चा सुख तब झलकता है जब उसका कुँवर कन्हैया, उसकी गोद में किलकारी भरता है।
माँ यशोदा की तीव्र अभिलाषा है, कितने शीघ्र उसका कन्हैया बोलने लगे, दौड़ने लगे। अभी तक वो अपने कृष्ण कन्हैया के वास्तविक रूप को जानती कहाँ है। पहली बार उसे कृष्ण के वास्तविक रूप का दर्शन तब हुआ जब उनके मुख से मिट्टी उगलवाई। नाराज है यशोदा, कहती है, ‘मोहन काहे न उगली माटी’। मोहन और जोर से मुख बन्द कर लेते हैं। माँ यशोदा हाथ में साँटी उठाती हैं और मोहन का मुख खुल जाता है। अखिल ब्रह्माण्ड, नदी, वन, पर्वत, स्वर्ग, पाताल, धरती. साँटी छूट जाती है हाथ से, माँ यशोदा का मुख खुला का खुला रह जाता है, बालक की भुजा छोड़ देती है, जान जाती हैं मेरा कन्हैया कौन है। माँ यशोदा बौरा जाती हैं क्या ये बालक भगवान है ? नित्य स्वरूप, सच्चिदानन्द यही है ? परम भक्ति को प्रदान करनेवाले पुरुषोत्तम यही है ? उत्तर सकारात्मक ही है, कारण, व्याख्याकारों ने स्पष्ट किया ।
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशस: श्रिय:
ज्ञान वैराग्य योर्युक्त: षऽणामभक्तिम् जन: ।
सम्पूर्ण ऐश्वर्य, अपूर्व बलवीर्य, अक्षय यश, अद्भुत सौन्दर्य, अनन्त ज्ञान और पूर्ण वैराग्य ये 6 गुण जिसमें विद्यमान हैं और सतत् विद्यमान है और जो इनका अधिष्ठाता है, वो भगवान् है। और ये सभी गुण श्री कृष्ण में सतत् रूप से प्रवहमान हैं। वे गोपियों के कृष्ण हैं और योगियों के भी कृष्ण हैं। वे रसरूप मुरली मनोहर भी हैं और विश्वरूप परमेश्वर भी। योग इतना कि गोवर्धन को धारण करते हैं, मात्र एक अंगुली पर. और श्रेय देते हैं ग्वालों को कि सबने लकुटी लगाकर सहारा दिया। विराट दावानल को मुठ्ठी में भर लेते हैं और पी जाते हैं। श्रीकृष्ण अपनी इस क्षमता को अनदेखा रखना चाहते हैं। वे अपने ऐश्वर्य को बार-बार झुठलाते हैं, इसीलिए कि वे सहज मानवीय प्रेम का आस्वाद कम नहीं करना चाहते। श्रीकृष्ण की शक्ति तो ब्रजवासियों का अपार प्यार है। लोक में रमने से अधिक गहरा होता है लोक से रमना. लोक मंगल से अधिक गहरा है लोकरंजन, यह रंजन ही लोक को लोकातीत बना देता है. यह सनातन वृन्दावन रचता है, और उसमें सनातन विहार रच देता है। फिर तो पनघट पर, यमुना तट पर, वंशीवट में प्रेम का रस निरन्तर बरसता ही रहता है। झूले पड़ जाते हैं डाल-डाल पर श्रीकृष्ण छुपाए नहीं छुपते। और न छुपता है, श्रीकृष्ण के लिए उमड़ता प्यार झूलने आ जाती है राधा, देह मन हो जाता है, और मन हो जाता है मन मोहन। श्रीकृष्ण बंसी फूँक देते हैं गोपांगनाओं का प्यार प्रकाशित हो उठता है। जब देह में श्रीकृष्ण भरते हैं. सिन्धु के लिए सरिता तट तोड़ देती है।
अपने जीवन में श्रीकृष्ण सतत् दो विरोधी धारणाओं के साथ चलते हैं। वे आदर्श प्रेमी भी हैं और निष्काम कर्मयोगी भी। उनका जीवन सतत संघर्षमय है परन्तु इस संघर्ष में कहीं राग या द्वेष उत्पन्न नहीं होता। उनकी मुरली के स्वर का अर्थ है, निष्काम में कामना का उदय हो जाना।
कर्म की आवश्यकता न होते हुए भी लोक कल्याण के लिए कर्म में प्रवृत्त हो जाना। कुरुक्षेत्र में युध्द से अर्जुन का पलायन, कर्महीनता की स्थिति थी। श्रीकृष्ण के लिए सबसे सरल था कि वे अर्जुन की बात से सहमत हो जाते। किन्तु श्रीकृष्ण अर्जुन के सभी सन्देहों का समाधान करते हैं और उसे विश्वास दिलाते हैं कि युध्द से विमुख हो जाना जीवन से विमुख हो जाने के समान है। योगीराज कृष्ण के सामने नाना शंकाएँ, विविध जिज्ञासाएँ अर्जुन ने व्यक्त की थी। उसने पूछा था –
हे जनार्दन, जिसे आप सर्वश्रेष्ठ योगी मानते हैं वैसा मैं भी बन सकता हूँ क्या ?
हे पार्थ, तुम मुझमें ही आसक्त मनवाले होकर और मेरा ही आश्रय लेकर नि:सन्देह मेरे समग्र रूप को जान जाओगे। उस समग्र रूप को जानने के लिए मैं तुम्हे विज्ञान सहित ज्ञान सम्पूर्णता से बताऊँगा, जिसे जानकर फिर तुम्हारे लिए इस मनुष्य लोक में कुछ भी जानना शेष नहीं रहेगा।
जब ऐसी बात है, तब फिर सब मनुष्य आपके समग्र रूप को क्यों नहीं जान लेते ?
हजारों में से कोई एक मनुष्य अपने कल्याण के लिए यत्न करता है उन यत्न करनेवाले साधकों में कोई एक ही मेरे समग्र रूप को तत्व से जानता है।
आपको न जानने में मुख्य कारण क्या है ?
हे भरतवंशी मुझे न जानने में मुख्य कारण है राग और द्वेष से उत्पन्न होनेवाला द्वन्द्वमोह. इसी द्वन्द्वमोह से मोहित सम्पूर्ण प्राणी संसार में जन्म-मरण को प्राप्त होते रहते हैं।
अनन्त है श्रीकृष्ण का चरित्र, अगाध है उनका गीतोपदेश. एक धर्मग्रन्थ के रूप में भगवद्गीता व्यक्ति की इच्छा-शक्ति को पूरी स्वतन्त्रता प्रदान करती है। साथ ही हर स्वेच्छाचारी कर्म को वर्जित करती है। गीता जीवन का सत्य उद्घाटित करती है, वो जीवन का अध्याय है। जो पाठकों या साधकों के मानसिक क्षितिज को और अधिक व्यापक कर सकता है. इसके अध्ययन के बाद कोई भी रूढ़िवादी और विज्ञान विरोधी धर्म के सीमित सांकेतिक चौखटों में बन्द होकर नहीं रहना चाहेगा।
गीता में स्वयं श्रीकृष्ण ने जीवन और जगत् का सारतत्व सारे विश्व के नागरिकों के लिए प्रस्तुत किया है। मात्र भावना का आवेग या कल्पना की उड़ान किसी चरित्र या ग्रन्थ को कालजयी नहीं कर सकती। श्रीकृष्ण काल से परे हैं, काल उनसे ही उपजता है। भारतीय मानस में लौकिक अलौकिक के बीच कृष्ण ही है। वे सबके हैं, इसीलिए विलक्षण हैं, और इसीलिए मोहक हैं। बिसारे नहीं बिसरते. वसुदेव देवकीनन्दन घर-घर के नन्दन हैं, हर माँ का लाल उसकी गोद में खेलता बालकृष्ण है। यदि ऐसा न हो तो संसार असहनीय हो जाए, संसार को जीवित जगत बनाने में यही बालरूप सहायक है।
मुनिया की दुनिया : स्वरांगी साने
पता है आज मुनिया के स्कूल में ‘ट्रेडिशनल डे’ (परंपरागत दिवस) था…मतलब ‘ट्रेडिशनल’ होना अब ‘वन्स इन अ व्हाइल’ (कभी-कभी होने वाली घटना) बन गया है। अलबत्ता मुनिया आज राधा बनकर सज-धज कर स्कूल गई थी। स्कूल से लौटी…और माँ ने उस पर आते ही सवाल दागा कि बैठक कक्ष की दीवार पर स्केच पेन (रंग) किसने चलाया?
मुनिया राधा रानी पर चढ़ा था स्याम रंग…और मुनिया ज्यों-ज्योंकहने लगी…मुझे त्यों-त्यों कविवर सूरदास याद आने लगे…
मैंने नहीं किया (मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो)
मुझे तो सुबह-सुबह ही आपने स्कूल भेज दिया था (भोर भयो गैयन के पाछे, मधुवन मोहि पठायो।)
और अब देखो, अभी तो आ रही हूँ ( चार पहर बंसी बन भटक्यो, साँझ परे घर आयो॥)
मेरे तो हाथ भी देखो कितने छोटे हैं, इतनी ऊँचाई पर मैं कैसे चितरा (आड़ी-तिरछी लकीरें) सकती हूँ? ( मैं बालक बहिंयन को छोटो, छींको किहि बिधि पयो।)
ये कल शाम दीदियाँ (वह अपनी दीदी को इसी नाम से बुलाती है) और बाकी सहेलियाँ खेल रही थीं, उन्होंने ही मेरे हाथ पर भी स्केच पेन चला दिया था (ग्वाल बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो॥)
आई (माँ) तुम भी इनकी बातों में आ गई… ( तू जननी मन की अति भोरी, इनके कहे पतिआयो।)
तुम तो ऐसे डाँट रही हो, जैसे मैं आपकी मुनिया ही नहीं, किसी और की बेटी हूँ ( जिय तेरे कछु भेद उपजि है, जानि परायो जायो॥)
अब मैं कल से स्कूल भी नहीं जाऊँगी, कट्टी ( यह लैं अपनी लकुटि कमरिया, बहुत हिं नाच नचायो।)
उसकी इस भोली अदा को देख उसकी माँ भी हँस दी और उसे गले से लगा लिया (‘सूरदास तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो॥)
… यानी कि बच्चे तो बच्चे होते हैं, वे न स्त्री होते हैं, न पुरुष…आज भी राधा वैसा ही स्वाँग धरती है, जैसा सालों पहले कृष्ण ने किया होगा…हर दिन नटखट और चंचल है मुनिया… भला उसे ‘ट्रेडिशनल डे’की क्या ज़रूरत!
धुंध के पार यात्रा बृज भूमि की : शैल अग्रवाल
राधा-कृष्ण के निश्छल शाश्वत प्रेम की अनगिनित लीलाओं की साक्षी रही है बृजभूमि। बरसाने की वह बृषभान लली और नन्दगांव के छलिया मनमोहन आज भी इस क्षेत्र के कण-कण में बसते ही नहीं,गूंजते हैं। उनके प्रेम की महक से आज भी गमकता है यह तुलसी वन, कभी माथे पर लगा चंदन बनकर, तो कभी होठों पर भजन बनकर। जन्मभूमि और कर्मभूमि है यह कृष्ण की जो 64 कलाओं से परिपूर्ण थे। योगेश्वर कृष्ण थे। एक ग्वाले के रूप में बचपन बिताया पर अप्रतिम योद्धा और द्वारिकाधीश बने, गीता के रूप में जीने का बेहद व्यवहारिक सार्थक दर्शन व संदेश दिया। आजभी आते ही रहते हैं श्रद्धालु यहाँ और खो जाते हैं इनकी कथाओं और लीलाओं में। भक्तों का जन सैलाब उमड़ा ही रहता है बारहों महीने, कभी चौरासी कोस की परिक्रमा देता तो कभी चौरासी खंबों के भ्रम में उलझा-भटका।
राग-रस भरा वह कालिंदी तट.. जहाँ कभी कंदुक लीला और कालिया मर्दन किया था इन्होंने, या फिर कदंब के पेड़ पर गोपियों का वह चीर हरण…किसका मन नहीं करता कि एकबार जाकर देखे नंदगांव और गोकुल, माखनचोर गोपाल का नटखट बचपन…उसकी क्रीडास्थली बरसाना और बृंदावन। बांसुरी से गूंजता बंसी बट, अनगिनित रास लीलाएँ…जितनी गोपियाँ उतने ही कृष्ण। और फिर कर्तव्य की पुकार आते ही बांसुरी छोड़, चक्र धारण करके कृष्ण का वह मथुरा की ओर प्रस्थान। मधुर वह गौरवमय इतिहास, सूरदास, मीराबाई व रसखान जिसे गाते न अघाते थे…जिस भूमि के कागा तक को अहोभाग्य माना रसखान ने क्योंकि वह हरि हाथों से माखन रोटी ले गया था। भरी पड़ी हैं ऐसी अनगिनित रचनाएँ दोहे और पदावलियाँ। भावविह्वल रसखान तो यहाँ तक लिख गए –
मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी कूल कदम्ब की डारन॥
बदल कर भी तो कुछ नहीं बदला आज भी यहाँ, मीलों पहले से मन कृष्णमय होने लगा था मेरा। इनकी कथाओं ने, पदों ने बचपन से ही आकर्षित किया था और चाह थी यहाँ आने की,बांके बिहारी से मिलने की। राधा रानी के बरसाने और कृष्ण के नन्दगांव जाने की। सब ने कहा, तीन दिन बहुत हैं इस के लिए, पर मन नहीं माना और पूरे हफ्ते का कार्यक्रम बन ही गया अंततः इसबार भारत भ्रमण के दौरान, दिसंबर 2015 की एक गुनगुनी सुबह, हम टैक्सी में बैठकर दिल्ली से मथुरा हाइवे की तरफ मुड़ ही लिए ।
वाकई में यह यात्रा, आम नहीं , खुद की और पूरे इतिहास की, धार्मिक परंपराओं, लोकगीत और उन कथाओं की कौतुकमय तलाश थी… जिन्हे मां और दादा-दादी आदि के मुंह से बारबार सुना व जिया था बचपन में। रास्तेभर मन य़थार्थ और कल्पना के ताने-बानों पर कई-कई मोहक स्वप्न रचता रहा।…
मथुरा के बाद से जगह-जगह माइक पर भजन आदि का शोर और कोने-कोने मशरूम सी उगती नई-नई इमारतें, जिनपर लगे बोर्ड जो जमीन या फ्लैट खरीदते ही बृजवासी बना देने का दावा कर रहे थे, दिखाई और सुनाई देने लगे। इन्हें देखकर होठों पर मुस्कान आ गई,परन्तु आँखें दुखी थीं। क्योंकि मेरे सभी पूर्वज और माता पिता बृजवासी ही थे पीढ़ी-दर-पीढी पर मैं बनारसी थी। अपने परिवार का पहला सदस्य जो बनारस में पैदा हुआ था । भोले बाबा का प्रसाद था। आसपास की सारी हरियाली करीब-करीब पूरी कि पूरी निगल चुकी थीं ये इमारतें। कितना बदल चुका था कृष्ण के समय से ही नहीं. बचपन से भी बृज, बृज ही क्या पूरा भारत, यहाँ तक कि हम खुद भी तो… सब कुछ ही तो व्यापार और विज्ञापन ही था-फिर यह खोज , यह अपेक्षा क्यों बृज से ही ? देहली मथुरा हाइवे पर दौड़ती कार और सड़क, दोनों ही आरामदेह और भारत के हिसाब से अति आधुनिक थे। बृंदावन का वह पांचतारा होटल भी, जो अगले पांच दिन के लिए हमारा घर था, राजाओं के महलों जैसा- हर तरह की सुख सुविधाओं से भरपूर। …अब ऐसे में उस गाय चराते, बांसुरी बजाते, रास रचाते कृष्ण और उसके समय को कैसे और कहाँ ढूँढ व महसूस कर पाउंगी- नहीं जानती थी। अतीत को पुनः पूरी प्रामणिकता के साथ जीवित कर पाना कल्पना में भी,इतना सहज और आसान भी तो नहीं, विशेषकर तब जब सारी बातें मात्र पढ़ी और सुनी-सुनाई ही हों। अंदर ही अंदर आस्था और बुद्धि का द्वंद लगातार चल रहा था। जिज्ञासु मन ने परन्तु अभी हार नहीं मानी थी और मन में उछाह लेती उमंग को अद्भुत चैन मिला,जब कमरे में प्रवेश करते ही, परदे खोलते ही खिड़की पर बैठे 10-12 मोहक तोतों के झुंड ने स्वागत किया । कंक्रीट के उस जंगल में भी,प्रकृति अपनी पूरी छटा के साथ उपस्थित थी। सामने फैली अनंत तक जाती-सी वह लम्बी सड़क और अगल-बगल के खेतों पर शाम के हलके धुंधलके के साथ रहस्यमय धुंध की बिछी सुरमई चादर,परन्तु खुले आसमान में डूबते सूरज ने गजब के सुनहरे और सिंदूरी रंग बिखेर रखे थे,जो बीच-बीच में गहरी सलेटी लकीरें पड़ जाने के कारण और भी आकर्षक लग रहा था । आँखें कभी डूबते सूरज की लाली निहारतीं तो कभी उस नीले-काले और सिंदूरी-सुनहरे आकाश में खो जातीं। दृश्य अज्ञात का रहस्यमय आश्वासन और संदेश देता-सा ही लगा। मानो रेशा-रेशा कह रहा हों ‘मैं हूँ और सदा रहूंगा। बदलूंगा नहीं। सदियों से यही हूँ और यहीं रहूँगा।‘
प्राचीन और अर्वाचीन के इस विरोधाभास के बीच बहुत कुछ बिखरा पड़ा है, जो अपरिवर्तनीय ‘उस’ का आभास दे ही देता है। समझा ही देता है कि बस मन की आंखें चाहिएँ ‘उसे’ जानने, ढूंढने और समझने के लिए ।
थकान और संशय खुद ब खुद उड़ गए और मन पूरी तरह से प्रकृति से जुड़ गया। आश्वास्त था कि अगले पांच दिन विशेष और यादों की धरोहर ही होंगे।
होटल के गाइड डेस्क से सुबह सर्व प्रथम निधिवन जाने की सलाह मिली । उनका मानना था कि इसे दिन में ही देख लेना ठीक है। अंधेरे में कोई नहीं देख पाया इसे। शाम होते ही बन्द हो जाता है मंदिर। जिसने भी रात में वहाँ रहने की कोशिश की,सुबह उसका शव ही मिला है या फिर वह अंधा, बहरा और गूंगा हो जाता है, कुछ भी कहने और बताने में असमर्थ । विश्वास तो नहीं हुआ पर शायद ऐसा क्या था निधि वन में, जानने की जिज्ञासा और रोमांच ही था कि सुबह 10 बजे निकलकर भी शाम के छह बज तक ही निधिवन पहुँच पाए।
पहले पास का चीरघाट, कालिया-मर्दन और यमुना की आरती देखी फिर लंच लेने के बाद और आसपास के एकआध मंदिर व आश्रम देखने के बाद ही वहाँ पहुंच पाए। कोना-कोना घूमने की ललक में समय का अनुमान ही नहीं रहता।
अब मन में धुकधुक थी। घंटेभर में ही मंदिर बंद होने वाला था और आरती का भी वक्त हो चला था। अतः गाइड और पतिदेव दोनों ने ही जल्दी-जल्दी देखने का आग्रह किया। पहली नजर में तो सब साधारण और अन्य मंदिरों जैसा ही लगा । वही गली के मोड़ से लेकर मुख्यद्वार तक मूर्तियों और खेल-खिलौने व प्रसाद सामग्री से सजी छोटी-छोटी दुकानें और पंक्तिबद्ध बैठी भीख मांगती सिरमुड़ी वृद्धाएँ,जो मन में करुणा और अवसाद जगा रही थीं । परन्तु सबको ही अनदेखा करते तेज कदमों से हम शीघ्र ही निधि वन जा पहुंचे।
कक्ष और मंदिर तो विशेष नहीं थे परन्तु वन के हिस्से में घूमते हुए वनतुलसी के आपस में गुथ्थम गुत्थ रूप ने एक सिहरन-सी अवश्य पैदा की। वृक्षों का आकार और रूप लुभावना था पर उनपर बिखरा सिंदूर और भी रहस्यमय बना रहा था उन्हें । पूछते ही कि बड़े सुंदर हैं यह पेड़ –कौन से हैं? गाइड ने जबाव दिया-राधे-राधे, बृक्ष नहीं, गोपिकाएं हैं ये,दिन में तो जंगली तुलसी,रात में सजी-धजी कृष्ण के साथ रास रचाती गोपिकाएं। यही तो खासियत है इस मंदिर की। आज भी रात में बांसुरी की तान और घुंघरुओं की छनछन सुनी जा सकती है यहाँ। –शाम होते-होते पक्षी, बंदर आदि, सभी खाली कर देते हैं वन को। यह घुंघुरुओं और बांसुरी की आवाज सुनी तो कइयों ने है,पर देख कोई कुछ नहीं पाया है। निधि वन में तुलसी का हर पेड़ जोड़े में है। इसके पीछे यह मान्यता है कि जब राधा संग कृष्ण वन में रास रचाते हैं तब यही जोड़ेदार पेड़ गोपियां बन जाती हैं। जैसे ही सुबह होती है तो सब फिर तुलसी के पेड़ में बदल जाती हैं। साथ ही एक अन्य मान्यता यह भी है की इस वन में लगे जोड़े की वन तुलसी की कोई भी एक डंडी नहीं ले जा सकता। लोग बताते हैं जो भी ले गए वो किसी न किसी आपदा का शिकार हो गए। इसलिए कोई भी इन्हें नहीं छूता। वन के आसपास बने मकानों में खिड़कियां नहीं हैं। यहां के निवासी बताते हैं कि शाम सात बजे के बाद कोई इस वन की तरफ नहीं देखता। जिन लोगों ने देखने का प्रयास किया या तो अंधे हो गए या फिर उनके ऊपर दैवी आपदा आ गई। जिन मकानों में खिड़कियां हैं भी, उनके घर के लोग शाम सात बजे मंदिर की आरती के वक्त अपनी खिड़कियाँ बन्द कर लेते हैं। कइयों ने तो ईंटों से अपनी खिड़कियाँ बन्द करवा ली हैं। ’
पुनः पूछने से न रोक पाई खुद को- ‘सबूत क्या है फिर इन बातों का ?’
‘सबूत।’, इस बार वह रहस्यमय ढंग से हंसा – ‘रंगमहल में सुबह बिस्तर पर सलवटें मिलती हैं, दातुन गीली मिलती है। और भोग की तश्तरी खाली।‘
तो क्या भुतही जगह है? चाहकर भी नहीं पूछा। ऐसा सोचना भी आस्था और धार्मिक भावों को ठेस लगाना था। किवदंती हो या अफवाह या सच्चाई, बिना गहरी जांच-पड़ताल के जान पाना संभव नहीं। आस्था और अंधविश्वास के इन छोटे-छोटे फूलों को महकते रहने के लिए रहस्यों का बने रहना भी तो जरूरी है । तुरंत ही वह मेरे मनोभावों को पढ़ गया और रहस्य को और भी गहराते हुए बोला –‘ बांकेबिहारी की लीला है सब। बहुत चमत्कारी और स्वयंभू मूर्ति है। यहीं इसी जगह तो प्रकट हुए थे बांकेबिहारी। तानसेन के गुरु हरिदास को सपना दिया था कि कुँए से निकालो हमें और मंदिर बनबाओ। तब उनके वंशजों ने ही यह बांकेबिहारी का भव्य मंदिर बनवाया था। हरिदास की भी समाधि है यहाँ पर,इसी आहते में और साथ में अन्य कई साधुओं की भी जिन्होंने प्रभु दर्शन की जिद में रात यहाँ बिताई और अपने प्राण तजे।‘
कुछ सोचता-सा वह दोनों हाथ ऊपर उठाकर फिर जोर से बोला –‘ प्रेम से बोलो- राधारानी की जय।‘ हमने भी राधारानी की जय बोली और बंसी चोर राधारानी की छवि मन में लिए तुरंत ही मंदिर से बाहर निकल आए। मन में एक सवाल यूँ ही उमड़ता-घुमड़ता रहा, यदि वाकई में प्रभु के दर्शन और बैकुंठ जाना इतना आसान है, तो फिर मुश्किल कहाँ थी !…
अगले दिन हम बृंदावन की कुंज गलियाँ, इस्कान मंदिर, बांके बिहारी मंदिर व प्रेम मंदिर घूमने निकले।
वही उत्सुकता और उमंग थी मन में भी और कदमों में भी। जगह-जगह परिक्रमा देते लोगों के झुंड दिखे। आँखें मिलते ही एकाध ने हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की भी कहा,वरना बृज में तो चारोतरफ राधे-राधे की ही गूंज है। भीड़भाड़ इतनी कि पैदल चल पाना मुश्किल उन सकरी गलियों में। सामने से एक बारात आती भी मिल गई और औटो वाले ने गाड़ी रोककर हमें एक किनारे खड़ा कर दिया । पता चला, तुलसी और केशव की बारात है यह। याद आया,तुलसी का एक नाम बृंदा भी तो है तभी तो यह बृंदावन कहलाया।
बारात रुकी तो मठ के दरवाजे पर द्वाराचार होने लगा और रही-सही गली भी पूरी बंद हो गई। जाने कितना वक्त लगे इसे… निश्चय किया गया कि आगे बांकेबिहारी के मंदिर तक का मार्ग पैदल ही तय करते हैं। औटोवाला यहीं पर खड़ा हमारा इंतजार करेगा।
…
बृंदावन विधवाओं के आश्रम के लिए भी मशहूर है। यहाँ पर पुरुष और बच्चों के अनुपात में इन विधवाओं की संख्या कहीं अधिक है और हर जगह मंदिरों के साथ-साथ ये भी दिखाई दे जाती हैं। मन खिन्न हुआ जा रहा था अपने समाज की एक और कमजोरी,बुजुर्गों के प्रति इस उदासीनता को देखकर और पूरा बृंदावन, जो कि आनंदवन का प्रतीक है, उदास करुणा से भरा प्रतीत होने लगा था- ‘क्या इनका अपना कोई नहीं है?’ मन से बारबार यही आवाज उठती और फिर तुरंत ही इस संसार की, रिश्तों की निरर्थकता, स्वार्थ लोलुपता भी समझ में आने लगती। निरर्थक और कूड़े का ढेर ही तो हैं लाचार बुजुर्ग। अब इनकी किसे जरूरत है?…सजा संवारकर संभालने का,पूजने का वक्त कहाँ है अब युवाओं की व्यस्त दिनचर्या में!…
कभी-कभी पूरा अजूबा ही लगते हैं ये धर्म स्थान भी। स्मृतियाँ ही तो निर्धारित करती हैं हमारी पसंद-नापसंद को। भीड़भाड़ और मौज मस्ती देखकर कई बार लगा कहीं यह बृंदावन इन विदेशियों के लिए सस्ते पर्यटन स्थल में तो परिवर्तित नहीं होता जा रहा…भारत का बेनीड्रोम, या फिर दूसरा गोवा, जहाँ सस्ता खाना, नाच गाना और आध्यात्म, सभी तरह के मनोरंजन की भेलपुरी उपलब्ध रहती है … पूर्व का आध्यात्म और पश्चिम का उन्मुक्त आनंद, सभी कुछ? पर कई यूरोपियन वहाँ थे जो बड़ी श्रद्धा से वैदिक संस्कृति को जी रहे थे। उसमें रच-रम गए थे। साथ-साथ मांगते-समझाते जो युवक बांके बिहारी के मंदिर के द्वार तक चला आया था, वह खुद को हिन्दू धर्म का विद्यार्थी बता रहा था और किताबें खरीदने के लिए पैसे चाहिए थे उसे। एक को देते ही कई आ गए फिर तो वहाँ, गोरे-काले, छोटे-बड़े सभी तरह के, अलग-अलग वजहें लेकर। एक को तो बेटी की शादी करनी थी, इसलिए कम-से-कम 25 हजार रुपए चाहिए थे। भारत के अंदर यह भीख मांगने का नया व रोचक अंदाज दिखा। पहले अधिकतर को खाने और पेट भरने के लिए ही पैसे चाहिए होते थे। क्या वाकई में अब पर्यटक या श्रद्धालु इतने पैसे देकर जाने लगे हैं ! विश्वास नहीं हो पा रहा था।…
…
बांकेबिहारी के मंदिर के अंदर बेतहाशा भीड़ थी। पुलिस अपने बेटन के साथ भीड़ का संचालन कर रही थी और दर्शन की सुविधा जेब के भारीपन के अनुसार ही थी। धक्कम-धक्का और भीड़ की रेलमपेल चारो तरफ। हमारी दुविधा को समझते हुए पुलिस वालों ने ही आगे बढ़कर रास्ता बनाया और मिनटों में भीड़ को पार करते हुए हमें बांके बिहारी के आगे ले जाकर खड़ा कर दिया।
काले पत्थर की वह मूर्ति आँख मिलते ही मानो सजीव हो उठी थी। कहीं कुछ सम्मोहन अवश्य ही था उस मूर्ति में। आँख भरकर देख तक पाएँ, इसके पहले ही पुजारी ने परदा खींच दिया और प्रसाद लेते तुरंत ही हम बाहर निकल आए। श्रद्धालुओं की भीड़ अंदर-बाहर, चारोतरफ बेहद लम्बी और बेचैन कर रही थी।
गली से निकलते ही बृजवासी की मशहूर दुकान दिख गई और औटोवाले की खास फरमाइश पर हमने वहाँ की मशहूर खुरचन व पेड़े लिए जिनके स्वाद ने तुरंत बचपन और माँ की याद दिला दी।
अगला पड़ाव बृंदावन का खूबसूरत इस्कान मंदिर था। यहाँ का दृश्य बांके बिहारी के मंदिर से भिन्न था। खुली चौड़ी सड़क पर मंदिर स्थित था इसलिए भीड़भाड़ के बावजूद घुटन नहीं थी यहाँ। घुसते ही खाने-पीने की दुकान, गिफ्ट स्टोर और रेस्टोरेंट दिखे और मंदिर के अंदर लोग आनंदमग्न झूमते, नाचते नजर आए। मंदिर में साफ-सफाई का भी विशेष ध्यान रखा जा रहा था और धार्मिक पुस्तक की दुकान में भी बृहत व रोचक संग्रह था। मूर्तियों का फूलों से श्रृंगार भी बेहद रुचिपूर्ण और कलात्मक। बेचैनी व रहस्यात्मकता की जगह यहाँ की भीड़ शांत और नियंत्रित थी। हवा के साथ आती गुलाब के फूलों और धूपबत्ती की मिलीजुली महक को न सिर्फ हम महसूस कर पाए, अपितु उसकी शीतल सुगंध का भरपूर आनंद भी लिया। यहाँ की एक और चीज मन को भाई, हर पांच मिनट पर पुजारीजी खुद ही उठकर भगवान के सिंहासन की झाड़ू और साफ सफाई कर रहे थे।
शाम होने को आ रही थी और चार बजे से बगल का प्रेम मंदिर भी खुलने वाला था। हमें बताया गया था कि इसकी बिजली की रंगीन सजावट ही यहाँ का प्रमुख आकर्षण है। भीड़ बहुत होती है और प्रतीक्षा करते श्रद्धालुओं की कतार बेहद लम्बी, अतः जल्दी ही पहुंचना होगा। आरती के वक्त दुबारा लौट आएँगे यहाँ,ऐसा सोचकर हम प्रेममंदिर की ओर बढ़ लिए।
प्रेम मंदिर का जैसा वर्णन था, वैसा ही था- आधुनिक बृंदावन का एक खास व प्रमुख पर्यटन-स्थल जैसा। बिद्युत संचालित कृष्णलीला पर आधारित मूर्तियाँ और रंगीन बत्तियों व ट्यूबलाइट की सजावट ने मेले जैसा वातावरण पैदा कर रखा था यहाँ पर। प्रसाद के अलावा आइस्क्रीम और गुब्बारे बिक रहे थे और रंगबिरंगी रोशनी से झिलमिल करती बगल की झील में नौका-बिहार की भी सुविधा थी। फलतः दौड़ते भागते बच्चे भी दिखे यहाँ पर।
सफेद संगमर्मर से बना यह मंदिर भव्य और आधुनिक सजावट से भरपूर तो था ही. अंदर की मूर्तियाँ भी बेहद आकर्षक थीं। इतनी खूबसूरत राधारानी अभी तक कहीं और नही देखी थीं, पर तस्बीरें खींचना पूर्णतः निषिद्ध था। सात बजने को हुए तो एकबार फिर हम इस्कॉन मंदिर में वापस आ गए जहाँ पर आरती शुरु हो चुकी थी और वातावरण अभिभूत करने वाला था। रोमांचित और नतमस्तक हमने भी कुछ पल उस श्रद्धा और आनंद के संगम में डुबकी लगाई, कुछ तस्बीरें खींची और आज रात का खाना इनके यहाँ ही, निश्चय करते, वहीं रेस्टोरेंट में जा बैठे। डोसे के बाद बृज का गाढ़ा कुल्हण का दूध याद आया, तो वह भी पी लिया। फिर अंदर से जो बेचैनी हुई वह बिल्कुल ही जानलेवा थी। प्रण किया कि अब और बहकना नहीं। और दूध तो दोबारा बाहर कभी हरगिज ही नहीं पीना, क्योंकि चीनी अब भी मुठ्ठी भरकर ही डाली जाती है यहाँ पर। …
अगला दिन कोसीघाट और यमुना किनारे बिताया। कहने को तो कंस के छोटे भाई कोसी का वध हुआ था यहाँ पर परन्तु जगह बेहद रोमांटिक और दर्शनीय थी। लाल पत्थर से बना यमुना का घाट आज भी बेहद आकर्षक और अपनी संपूर्ण प्राचीन गरिमा को लिए हुए है। लम्बे भूलभुलैया से बने कौरीडोर में विदेशी पर्यटक और धूनी लगाए, या चरस पीते साधु, सभी मिल जाते हैं। बाहर यमुना के किनारे उन बुर्जों पर बैठना मन को अद्भुत शांति से भर रहा था। इस जगह को छोड़कर कहीं भी उस असीम विस्तार की अनुभूति नहीं हुई थी, जो राधा-कृष्ण की रासलीला और बंसीबट की कल्पना मात्र से मन में उमड़ती है। पास के बंसी बट और चीरघाट तो बस प्रतीक चिन्ह जैसे ही लगे और कालिया मर्दन की जगह तो इतनी छोटी थी कि पूर्णतः गरिमाहीन।
इस खिन्नता की एक वजह शारीरिक और मानसिक थकान व ऊब भी हो सकती है जो धीरे-धीरे तन मन पर फैलने लगी थी। वैसे भी बृंदावन में मंदिरों की फेहरिश्त ढाई हजार से अधिक है। सबको घूम पाना संभव नहीं। हाँ राधावल्लभ मंदिर न जा पाने का दुख रहेगा। कहते हैं कृष्ण के पदचिन्ह हैं इस मंदिर में।
अगले दिन गोवर्धन, मथुरा, बरसाना, नंदगांव और गोकुल घूमना था अतः दिन को विराम देते हुए, होटल जाने से पहले पुनः इस्कान की आरती देखने जा पहुंचे, जो कि हमारे रास्ते में ही पड़ता था।
गाइड के हिसाब से एक दिन में ये सब जगहें घूम लेना संभव था, परन्तु इसके लिए सुबह सात बजे ही चलना होगा हमें। उसकी यह बात मान लेना शायद हमारी इस यात्रा की सबसे बड़ी भूल थी।
अगली सुबह गाइड व ड्राइवर के साथ ठीक सात बजे हम दोनों कार में थे।
पहला पड़ाव गोवर्धन पर्वत पड़ा , जिसे कृष्ण ने तर्जनी पर उठाकर इंद्र के कोप से बृज वासियों और पशु पक्षियों की रक्षा की थी। इस मंदिर में दूध चढ़ाने की प्रथा है, इसके पहले कि आपत्ति कर पाऊँ और कहूँ कि दूध बाहर खड़े किसी गरीब बच्चे को पिला देंगे, पतिदेव और पंडा मंदिर के अंदर थे। बाहर आए तो मन बना कि हम कार से ही गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करेंगे। बचपन में मां से सुना था कि हर वर्ष वह यह परिक्रमा देती थीं। एकबार तो उन्होंने लेट कर भी दी थी, हमें मौका मिला है तो कार से ही सही, इसी बहाने कुछ और दर्शनीय स्थल देखने को मिलेंगे। पूरे बृज की परिक्रमा 84 कोस की है और यह गिर्राज जी की परिक्रमा ७ कोस की यानी लगभग २१ किलोमीटर की। मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थल आन्यौर, राधाकुंड, कुसुमसरोवर, मानसी गंगा, गोविंद कुंड, पूंछरी का लोटा, दानघाटी इत्यादि हैं। परिक्रमा में राजस्थान का वह डीग गांव भी शामिल है, जो मां का ननसाल था । अब अपनी इस ललक का असली रहस्य समझ में आने लगा, पर मुझे तो किसी का नाम पता कुछ भी नहीं पता था। बस इतना पता था कि डीग गांव का एक प्रमुख पढ़ा लिखा परिवार था वह। जिसने राजस्थान को एक चीफ मिनिस्टर और कई जज व वकील दिये। पर,ये अतीत के वे पन्ने थे जिनपर वक्त की बहुत धूल चढ़ चुकी थी। डीग गांव का जो हिस्सा देखा, वह अन्य राजस्थान के गांवों जैसा ही लगा। नीले दरवाजों के साथ साफ-सुथरे, लिपे-पुते घर और सफेद चूना पुती दीवारों पर भित्ति चित्रकारी । वह किला,जो राजा सूरजमल ने बनवाया था और बेहद खूबसूरत था, जिसके बारे में माँ बताती थी, उसे देखने या उसके बारे में पूछने की तो हिम्मत ही नहीं हुई। हम परिक्रमा पर थे, पर्यटन पर नहीं और रिश्तेदारों को ढूंढने का वक्त तो हरगिज ही नहीं था अपने पास । पतिदेव थोड़ी सख्त आवाज में याद दिलाने का एक भी मौका न चूकते।
रास्ते में पड़ा कुसुम महल बेहद खूबसूरत था। कहते हैं राधा की प्रिय सहेली के लिए इसे कृष्ण ने खुद अपने हाथों से बनाया था।
परिक्रमा पूरी करते ही हम अड़ींग पहुंच गए, यानी कि मेरी अपनी ननसाल।
ड्राइवर से सड़क पर एकतरफ गाड़ी रुकवाकर सामने की दुकान में दौड़ती-सी जा पहुंची और पूछने लगी-‘क्या आप श्यामसुंदर नंबरदार जी की दुकान या घर का पता बता सकते हैं मुझे?‘ किससे मिलना चाहती हैं आप?’ डेस्क के पीछे से ही आवाज आई। ‘ उनके बेटे ओम प्रकाश जी,या केदारनाथ जी से,जो भी हों…’अचानक वह अपनी जगह से उठ खड़े हुए,‘कौन शैला, तुम?मैं मुरली।‘
एक लम्बे अरसे के बावजूद भी उन्होंने मुझे पहचान लिया था।
‘अरे, मुरली भैया…’ मुंह से बस इतना ही निकला उस वक्त। मैं हर्षातिरेक से छलकी आँखों से उन्हें देखे जा रही थी और वह मुझे। मामा के जुड़वा बच्चे थे मुरली और लीला, मुझसे छह महीने छोटे। वहाँ उस सड़क पर आसपास की सभी घर दुकानें मामा और उनके परिवार की ही निकलीं, जो अब काफी बढ़ चुका था और मैं बावली अपनों के बीच खड़ी होकर अपनों का ही पता पूछ रही थी।
अचानक ही उनकी आंखों में दुख के बादल घिर आए । ‘ओमी भाईसाहब तो साल भर पहले ही गए और उनके तीन महीने बाद ही केदार भैया भी।… ‘
मैं सदमे में थी । जिनसे मिलने आई थी, उन्ही के बारे में ये खबरें …वह भी तब, जब पिछले पचास साल में हमारी यह दूसरी या तीसरी ही मुलाकात थी ।
‘और लीला…?’
‘लीला भी नहीं रही। अभी महीने भर पहले ही वो भी…। ‘
बस अब और कुछ नहीं पूछना और जानना था मुझे।
‘और भाभी?’
‘भाभी हैं। घर नहीं चलोगी? अपनी तीनों भाभियों से नहीं मिलोगी ? ‘
अब मैं चुपचाप उनके पीछे सिर झुकाए चल रही थी। अचानक भरे पूरे परिवार के बीच खड़ी थी और यादें बांध से छूटी नदी की तरह चारो तरफ से घेरने लगी थीं। न चाहते हुए भी पंद्रह-बीस मिनट में ही भारी मन से परिवार से विदा ली और हम आगे बढ़ गए। वक्त की निर्ममता का, किसी के लिए ठहरता नहीं यह, इस बात का पूरा अनुभव हुआ उस पल। उदास हाथ में लड्डू लिए खड़े मुरली भैया के लड़्डू का टुकड़ा डॉक्टर पति की नाराजगी के बाद भी मुंह में डालकर बिना पीछे देखे, चुपचाप कार में आ बैठी। वहाँ कुछ देर और न रुक पाने का जितना दुख उन्हें था,उतना ही मुझे भी तो।
आधा दिन बीत चुका था और मथुरा एक विकसित व बड़ा शहर था। गाइड ने आगे का कार्यक्रम अब अपने हाथ में ले लिया। बोला, द्वारिकाधीश का मंदिर और विश्राम घाट आदि देखने का तो वक्त नहीं है अब अपने पास, सीधे कान्हा की जन्मस्थली ही चलते हैं।
कुछ ही मिनटों में हम उस जेल के आगे खड़े थे जहाँ कंस द्वारा देवकी और वासुदेव को बंदी बना कर रखा गया था और जहाँ द्वापर में देवकीनंदन का जन्म हुआ था।
यहाँ की सुरक्षा व्यवस्था कड़ी थी और परिसर बड़ा व श्रद्धालुओं की कतार काफी लम्बी। पर जेल के अंदर की देखरेख अच्छी थी और आज भी सबकुछ बहुत अच्छी तरह से ज्यों-का-त्यों संजोया हुआ व प्रदर्शित था। विश्वास ही नहीं हो रहा था हम इतिहास के उस पल के साक्षी हो रहे हैं, लकड़ी के उस उठे स्थान को तो दो तीन बार हाथ से सहलाया और महसूस किया जहाँ कृष्ण जन्मे थे।
मथुरा छोड़ते ही तय किया गया कि नंदगांव को छोड़, अब सीधे बरसाने चला जाए। नंदगांव अगली बार सही, संतोष कर लिया था हमने भी और हम बरसाने की ओर ही चल पड़े।
कहते हैं ब्रज में निवास करने के लिये स्वयं ब्रह्मा भी आतुर रहते थे और श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का आनन्द लेना चाहते थे। अतः उन्होंने सतयुग के अंत में विष्णु से प्रार्थना की थी कि आप जब ब्रज मण्डल में राधा जी एवं अन्य गोपियों के साथ दिव्य रास-लीला करें तो मुझे भी उन लीलाओं का साक्षी बनायें एवं अपनी वर्षा ऋतु की लीलाओं को मेरे शरीर पर संपन्न करके मुझे कृतार्थ करें। ब्रह्मा की इस प्रार्थना को सुनकर भगवान विष्णु ने कहा -“आप ब्रज में जाकर वृषभानुपुर में पर्वत का रूप धरिये। पर्वत होने से वह स्थान वर्षा ऋतु में जलादि से सुरक्षित रहेगा और उस पर्वतरूप आपके शरीर पर मैं ब्रज गोपिकाओं के साथ अनेक लीलाएं करुंगा और आप उन्हें प्रत्यक्ष देख सकेगें। इन पर्वतों पर श्री राधा-कृष्ण जी ने अनेक लीलाएँ की हैं।
बरसाना में ब्रह्मा आज भी पर्वत के रूप में विराजमान हैं। पद्म पुराण के अनुसार यहाँ विष्णु और ब्रह्मा नाम के दो पर्वत हैं जो आमने सामने खड़े हैं। दाहिनी ओर ब्रह्मा पर्वत और बायीं ओर विष्णु पर्वत।
राधारानी का महल और मंदिर उंची पहाड़ी पर स्थित है। इसके पहले कि हम कुछ जाने या समझें, पंडा पालकी वाले को बुला और कुछ कहूँ , इसके पहले ही बोला, बैठ जाओ बहन, गरीब लोगों को चार पैसे मिल जाएंगे। अब तो पालकी में बैठना ही था और वहीं से रास्ते भर पड़ती उन छोटी-छोटी स्मृति चिन्हों की दुकानों को ललचाई नजर से ही देखती रही, जिनमें घूमना पर्यटन का आनंद दुगना कर देता है। वैसे तो अच्छा ही था क्योंकि वाकई में हमारे पास वक्त नहीं था।
महल सुंदर था और छोटी-छोटी वे सैकड़ों सीढ़ियाँ एक वैभव पूर्ण राजसी छटा लिए हुए थीं। बाहर का दृश्य भी मनोरम था। सीढ़ियाँ चढ़ते ही बाहर एक खुला चबूतरा था जिसपर बताया गया कि राधा-कृष्ण का रास होता था यहाँ। मंदिर की मूर्ति के बारे में गाइड ने कहा कि ध्यान से देखें तो राधा कृष्ण मुस्कुराते हुए लगेंगे।
…
अब हम गोकुल की तरफ चल पड़े थे। रास्ते में एक और पंडे को फोन करके बुलवा लिया था गाइड ने। सोचा, मित्र होगा, गोकुल तक की लिफ्ट चाहिए होगी…असली राज तो बाद में ही खुला।
यह नया पंडा रसिक था और बात-बात में बिहारी और रसखान के पद उद्ध्रत कर रहा था। रास्ते में रसखान की कब्र थी सामने पहाड़ी पर, उँगली के इशारे से उसने दिखायी। मन में ध्यान आया तो फिर सूरदास भी यहीं- कहीं आसपास होंगे, तो गाइड ने बताया, नहीं, सूरदास ने गोवर्धन के पास पारसौली गांव में शरीर तजा था। क्षेत्र अभी भी हरा भरा था और आधुनिक विकास से अछूता ।
गोकुल में घुसते ही कई गोशालाएँ और वृद्धाश्रम दिखे। मंदिर और विशेष कर वह मार्ग जहाँ से वासुदेव कृष्ण को जमुना से होते हुए लेकर आए थे, आज भी रमणीय है। मंदिर के अंदर खड़े चौरासी खंबों को कहा जाता है बृह्मा ने खुद अपने हाथों से बनाया था इन्हें और आजतक कोई भी इनकी गिनती नहीं कर पाया है, कभी एक ज्यादा तो कभी एक कम ही गिनने में आते हैं। मुख्य कक्ष जहाँ यशोदा मैया कृष्ण के साथ सौरी में रही थीं, उसके कपाट बंद थे और सामने वरांडे में श्रद्धालुओं की भीड़ बैठी हुई थी। शायद कोई कथा चल रही थी वहाँ पर। पंडों के इशारे पर हम भी वहीं बैठ गए। थोड़ी देर में वे सभी उठकर चले गए। अब वे हमें उस मुख्य कक्ष के अंदर लेकर गए। जहाँ दो पुजारी पहले से थे।
हमसे श्रद्धापूर्वक पूजा करवाई गई और आरती करने का भी सौभाग्य मिला। अंत में उन्होंने कहा जो चाहें दान कर दें और यहाँ पर 51 हजार, 25 हजार या फिर 11 हजार रुपए का ही दान दिया जाता है। सोच क्या रही हूँ,मैं भी बढ-चढ़कर दान करूँ। जशोदा मैया का रूप हूँ, राधारानी का रूप हूँ,घर परिवार ऐसे ही हरा भरा बना रहेगा।
असमंजस में पति की ओर देखने लगी। इनकी आस्था तो थी, पर यूँ अंधभक्ति नहीं। धौंस, दबाव या लालच में आने का तो सवाल ही नहीं उठता था। हमें यूँ सोचते देख, पंडे ने भी अपनी वाणी का पूरा सुर ही बदल लिया। मखौल उड़ाता-सा बोला, सिर्फ घूमना-फिरना, मंहगे-मंहगे होटलों में ठहरना ही तीर्थयात्रा नहीं। आगा-पीछा संवारने के लिए कुछ दान-दक्षिणा भी जरूरी है। आवाज का मास्टराना लहजा अच्छा नहीं लगा और तुरंत ही बोल पड़ी – आपकी बात सही है। पर, संसार रूपी इस धुंध के उस पार क्या है…पाप, पुण्य क्या है? कोई भी तो नहीं जानता, न आप, न मैं । फिर ये दान धर्म सब श्रद्धानुसार होते हैं, जोर जबर्दस्ती से नहीं।‘
पर्स से थोड़े पैसे गायों के चारे के लिए रखकर और प्रणाम करके हम उठ खड़े हुए । अब वह दूसरा पंडा हमें छोड़, गधे के सिर से सींग की तरह जाने कहाँ गायब हो गया था ।
…
दिन समापन की ओर था। गाइड ने बताया था कि जमुनापार ही बंसीबट है । वहाँ तो अवश्य ही जाना था। परन्तु बृंदावन की गलियों से घुमाते , जिस जगह को बंसीबट कहकर दिखाया गया हमें, वहाँ एक आहते में बस प्रतीक ही प्रतीक दिखे, कल्पना में बसे उस रमणीय बंसीबट जैसा तो कुछ भी नहीं था वहाँ।… शाम धुंधला चुकी थी और यह हमारी सातवीं शाम थी बृज और बृंदावन में। उस होटल में जिसका खाना बहुत ही स्वादिष्ट था और तारीफ करो तो मैनेजर तुरंत कहता हमारे यहाँ के सभी रसोइये किसी-न-किसी राज घराने में काम कर चुके हैं। बी क्लास तो कुछ संभव ही नहीं यहाँ पर। मन ही मन कई बार प्रण किया कि भगवान ने चाहा तो शीघ्र ही फिर कभी। कुछ निजी वजहें और भी थीं बृज के प्रति इस अदम्य आकर्षण की। पूर्वजों और ननिहाल की अनगिनित स्नेहपगी स्मृतियाँ बिखरी पड़ी थीं इस रज में। हाइवे पर गाड़ी दौड़ रही थी और उससे भी तेज मन, खुशियों की पेंगे लेता , स्मृतियों में डूब-उतरा रहा था पलपल…जाने क्या-क्या छूटा जा रहा था और जाने क्या-क्या साथ चल रहा था। मन के छुपे कोनों से मुस्कुराते कुछ चेहरे स्वतः ही उभरने लगे… माँ, बाबूजी, दादा दादी और मामा-मामी…। मन जानता था कि इस यात्रा के दौरान हम अड़ींग से गुजरेंगे… वहीं रहते थे मामा। माँ का मायका था अड़ींग। हर वर्ष ही जाया करती थीं माँ और हम महीने के अंत में बाबूजी के साथ उन्हें लेने। तब सुबह-सुबह अपने ही कमरे में माँ से बाहर से ताला लगवाकर खुद को बन्द करवा लेते थे मामा-मामी, फिर माँ कहतीं, यदि यह बताशे मिला दूध झट से नहीं पिया तो मामा-मामी आकर पी जाएँगे। वो दोनों, वहीं बन्द कमरे की खिडकी पर खड़े-खड़े हमें हंसते हुए मां के हाथों से दूध पीते देखते रहते और हम दूध का गिलास खतम होते ही किलककर वापस उन्ही की गोद में जा बैठते… उनके लाड़ दुलार में डूबे-भीगे।… रोज का ही खेल था यह भी।
आज झोली में पड़ी ये चन्द यादें ही पर्याप्त हैं आजीवन गमकने के लिए। …गांव किनारे, बांध पर सुबह-सुबह नहाने जाना, फिर गीली मिट्टी से घंटों तरह तरह के खिलौने बनाते रह जाना। बंजारिनों को अपनी रंगबिरंगी पोशाकों में सिर पर कलसी पर कलसी रखे पानी लेने जाते देखना विस्मित आँखों से… सूरज की निकलती और डूबती रोशनी में उनके रंग-बिरंगे गोटे लगे लहगों का लहरों सा झिलमिलाना, शादी ब्याहों पर उनका वह घर के दरवाजे आकर सामूहिक घूमर नृत्य -कुछ भी तो नहीं भूल पाया है बावरा मन।
बृज की यादों में बेसवाँ गांव का भी विशेष महत्व है। कहते हैं विश्वामित्र ने बसाया था इसे और हमारे बाबा-दादा और उनके पूर्वज यहीं से थे। प्रति वर्ष अड़ींग आने से पहले बाबूजी एकबार,तीर्थयात्रा की सी श्रद्धा के साथ पीछे छूटे उस बेसवाँ के पूर्वजों के बन्द पड़े मकान को अवश्य ही खोलते थे। पूरा बचपन बीता था उनका वहाँ पर। आंगन में नीम के नीचे बने चबूतरे पर 10-पंद्रह मिनट बैठना और फिर बताना कि यहीं बैठकर पूरी पढ़ाई किया करता था मैं, एक रात तो चोर भी उतर आया था इसी डाल के सहारे, पर डरा नहीं था मैं। फिर आंखों में सबकुछ समेटे-समेटे वापस ताला लगाकर लौट आना। अड़ोसी पड़ोसियों का वह स्नेह जो जिद करके चाय नाश्ता वहीं ले आते थे आहट मिलते ही, वह धरनीधर तालाब… चन्द मकानों की बस्ती का छोटा-सा गांव, सबकुछ आज भी तो ज्यों-का त्यों ही चित्रांकित है स्मृति पटल पर। खो जाया करती थी मैं भी उनके साथ उनकी यादों में। अभी तक बस इतना सा और यही परिचय था बृज से मेरा। बचपन में कई बार गई थी, परन्तु नानी के गांव अड़ींग और पितामह के गांव बेसवाँ जाकर ही यह यात्रा समाप्त हो जाती थी। और किसी चीज के लिए कभी वक्त ही नहीं रहा। हाँ, दाऊजी जाने का अवश्य मौका मिला था एकबार, जो कि चाची के मायके वैरनी गांव के पास है और एक बार गिरिराज जी भी गई थी माँ के साथ। सारे पूर्वज और उस पीढ़ी के सभी परिवार के सदस्य इसी भूमि से हैं मेरे। माँ, दादी और पिताजी के मुंह से कई रोचक कहानियाँ सुन रखी थीं, विशेषकर बृंदावन नंदगांव और बरसाने के बारे में और मन कल्पना के पंख लगाकर अक्सर ही उन गलियों में घूम आता था। एक सम्मोहन एक जादू-सा था बृज के गीत कथा और यादों में, जिसे ढूंढने और पाने को यायावरी मन सदा ही उत्सुक और बेचैन रहा। और इस बार तो जाना पहचाना ही नहीं, अनदेखे अनजाने या सुने सुनाए को भी, राधा रानी का बरसाना और कृष्ण के गोकुल, मथुरा को सच में जी लिया था , भले ही स्वाति की बूंदों की तरह बूंद-बूंद ही सही।…
श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर गाए जाने वाले गीत-लोकगीत : डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कारागार की अंधेरी कोठरी में हुआ था, जहाँ चारों ओर क्रूर मथुरा-नरेश कंस के अत्याचार के कारण भय और बंधन का वातावरण था। जब देवकी और वसुदेव के घर बालकृष्ण प्रकट हुए, तो वह अंधकारमय कारागार दिव्य प्रकाश से आलोकित हो उठा। कृष्ण का जन्म केवल एक दिव्य बालक का अवतरण नहीं था, बल्कि आशा, प्रेम और धर्म की पुनर्स्थापना का संदेश था। कृष्ण जन्म केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि जीवन के उत्सव का प्रतीक है। यह पर्व हमें आनंद, प्रेम, भक्ति और लोक-संस्कृति की गहराई से जोड़ता है।
कृष्ण जन्म के अवसर पर गाए जाने वाले सोहर, बधाई गीत, झूला गीत और सावन गीत भारतीय लोक-संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं। इन गीतों में, भावनाओं का वह प्रवाह है जो पीढ़ियों से जनमानस को कृष्ण के जन्मोत्सव की आनंदमयी अनुभूति कराता आया है। सोहर गीतों में जन्म की खुशी और उल्लास झलकता है, बधाई गीतों में भक्तों का सामूहिक उमंग और आशीर्वाद, झूला गीतों में बालकृष्ण की लीलाओं का मधुर चित्रण और सावन गीतों में ऋतु की रसमयता के साथ कृष्ण की बाल छवि का सजीव आह्वान। लोक शब्दावलियों और लोक अभिव्यक्तियों से स्नात जब इन गीतों की स्वर-लहरियाँ गूंजती हैं, तो लगता है मानो कारागार की दीवारें टूटकर संपूर्ण जगत आनंद और भक्ति में डूब गया हो, संपूर्ण वातावरण कृष्णमय हो उठा हो। इन गीतों को ढोलक, मंजीरा, हारमोनियम और तालियों के साथ सोहर, झूला गीत की लोकधुन में प्रस्तुत किया जाता है। इनमें लोक संस्कृति झंकृत होकर जनमानस को हर्षोल्लास के
यही इन गीतों का उद्देश्य है—दु:ख के बीच आशा जगाना, अंधकार में प्रकाश फैलाना और जीवन को कृष्ण-भक्ति से सराबोर करना।
यहाँ कुछ ऐसे ही लोक गीतों, बधाई गीतों परंपरागत गाए जाने वाले गीतों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं:
सोहर
अरे आजु नंद के अंगना, बाजे बधइयाँ रे,
यशोदा के अँखियन में, झलके ललनैयाँ रे।
आधी राति भइल, गोकुल मुसकाइल,
नंद भवन में कान्हा जनम लिहलें,
देव लोक से फूल बरसलें,
गूँजे मंगल गान रे।
अरे आजु नंद के अंगना, बाजे बधइयाँ रे,
यशोदा के अँखियन में, झलके ललनैयाँ रे।
माथे मोर मुकुटवा, अधरन मुरलिया,
नन्हे-नन्हे पाँवन में पायलिया,
नयनन में कजरवा सोहे,
मुख पर मधुर मुसकान रे।
नंद बाबा लुटावें धन-सोना,
ग्वाल-बाल सब नाचें,
दूध-दही की मटकी फूटे,
गूँजे जय-जयकार रे।
नंद के घर आनंद भयो,
जय कन्हैया लाल की!
यशोदा मैया धन्य भइलीं,
जय नंदलाल की!
कृष्ण जन्मोत्सव गीत ( ब्रज की लोकधुन पर )
आजु नंद के द्वार बधाई,
यशोदा मैया हँसी-हँसी आई।
जग में भयो उजियारो रे,
नंद घर जन्मे नंदलाल॥
मथुरा में अँधियारी राती,
कारागार में छाई ज्योति।
देवकी के आँगन हरष भयो,
प्रकटे हरि बनि बालक मोती।
नंद के घर आनंद भयो रे,
जय कन्हैया लाल की॥
बाबा नंद बजावैं नगाड़ा,
ग्वालन गावत मंगल गाना।
दूध-दही की मटकी ल्याईं,
बरसै प्रेम सुहाना।
आजु नंद के द्वार बधाई,
यशोदा मैया हँसी-हँसी आई॥
रोहिणी मैया मंगल गावैं,
गोप-गोपियाँ नाचत आवैं।
कोऊ लायौ माखन-मिसरी,
कोऊ मोहन पै फूल चढ़ावैं।
ब्रज में बाजै ढोल मृदंगा,
गूँजै जय-जयकार॥
कजरारे नैना, मुख मुसकावै,
छोटी-सी अँगुरी मन हरषावै।
पीताम्बर की छवि अति प्यारी,
देखत ही मन मोहन भावै।
नंदलाला की छवि निराली,
मोहे लागै अति प्यारी॥
देव सबै अंबर से आवैं,
फूलन की बरखा बरसावैं।
ब्रह्मा, शंकर, नारद गावत,
हरि के गुण सब मिलि गुनगुनावैं।
धन्य भयो ब्रजधाम हमारा,
धन्य भयो संसार॥
यशोदा झुलावैं लाल कन्हैया,
लोरी गावैं धीरे-धीरे।
“सो जा मेरे नंदकिशोरा”,
मुसकावैं नंद के छीने।
लल्ला मेरे, लल्ला प्यारे,
तुम बिन कौन सहारे॥
आँगन-आँगन दीप जलैं हैं,
घर-घर मंगल गीत सुनैं हैं।
आजु भयो ब्रज धन्य सुहावन,
हरि अपने घर खेलैं हैं।
आजु नंद के द्वार बधाई,
यशोदा मैया हँसी-हँसी आई।
जग में भयो उजियारो रे,
नंद घर जन्मे नंदलाल॥
बोलो—नंद के आनंद भयो!
जय कन्हैया लाल की!
हाथी घोड़ा पालकी!
जय कन्हैया लाल की!
मंगल गीत
आजु भयो नंद के घर उजियारा
आजु भयो नंद के घर उजियारा,
आए हैं श्रीकृष्ण मुरारी।
चहुँ ओर बजे मंगल बाजे,
हरषित भई ब्रज की नर-नारी।
कारागार में जन्मे कन्हैया,
लेकर आए जग में उजियारा।
धर्म बचाने, प्रेम सिखाने,
आए जग के पालनहारा।
यमुना की लहरें झूम उठीं,
शेषनाग ने छाया धारी।
गोकुल पहुँचे नंददुलारे,
महकी सारी फुलवारी।
आजु भयो नंद के घर उजियारा,
आए हैं श्रीकृष्ण मुरारी।
राधे-राधे नाम पुकारो,
जय हो कृष्ण मुरारी!
ब्रज की लोकधुन में रसिया गीत
मैया के आँगन कान्हा आए
मैया के आँगन कान्हा आए,
आजु गोकुल में बाजे बधाई।
नंद के द्वारे मंगल गाए,
देवों ने भी खुशियाँ मनाई।
ललना नंदलाल, अति सुंदर लाल,
साँवरे मुख पर चंदा मुसकाए।
कजरारी अँखियाँ, घुँघराली अलकियाँ,
देखत ही मन हरषाए।
ग्वालिन आईं दधि-माखन लाई,
कहतीं—लाला को नजर न लग जाए।
कोई झुलाए, कोई दुलराए,
कोई कन्हैया को लोरी सुनाए।
मैया के आँगन कान्हा आए,
आजु गोकुल में बाजे बधाई।
राधा-कृष्ण की होरी (गीत)
होरी खेलें राधा संग श्याम,
बरसाने में मची रे धूम।
रंग बरसे, प्रेम बरसे,
झूमे सारा ब्रजधाम॥
बरसाने की गलियन सजी हैं,
उड़त गुलाल अबीर।
राधा रानी सखियन संग आईं,
मन में उमंग अधीर।
कान्हा ने मुसकाय के देखा,
छूट गई सबकी लाज।
रंग में रंग गई राधा प्यारी,
श्याम बने मनराज॥
होरी खेलें राधा संग श्याम,
बरसाने में मची रे धूम।
रंग बरसे, प्रेम बरसे,
झूमे सारा ब्रजधाम॥
पिचकारी भर लाए नंदलाला,
रंग भरे नंदगाँव।
राधा पर जब रंग उड़ाया,
हँस उठीं ब्रज की छाँव।
सखियाँ बोलीं—“ठहरो कान्हा,
आज न बच पाओगे!”
रंग भरे दो घड़े उठाकर,
श्याम को खूब नहाओगे॥
लाल गुलाबी पीत रंगों से,
भीग गई ब्रज की डगर।
मुरली की धुन, ढोलक की थापें,
नाचे गोपी-ग्वाल उधर।
राधा बोलीं—“श्याम हमारे,
रंग न इतना डालो!”
कान्हा बोले—“प्रेम का रंग है,
जितना चाहो पालो!”॥
होरी खेलें राधा संग श्याम,
बरसाने में मची रे धूम।
रंग बरसे, प्रेम बरसे,
झूमे सारा ब्रजधाम॥
यमुना तट पर साँझ हुई जब,
थमा गुलाल का शोर।
राधा-श्याम निहारें चुपके,
मन में प्रेम की भोर।
तन के रंग तो धुल भी जाएँ,
मन का रंग न जाए।
राधा के संग श्याम का प्रेम ही,
जग को प्रेम सिखाए॥
होरी खेलें राधा संग श्याम,
बरसाने में मची रे धूम।
रंग बरसे, प्रेम बरसे,
झूमे सारा ब्रजधाम॥
राधे-राधे बोलो रे,
श्याम-श्याम बोलो रे,
प्रेम के रंग में डूबे,
सारा ब्रजधाम॥
रास रचैया लोक गीत
रास रच्यो श्याम यमुना के तीर,
नाचे राधा संग गोपियाँ, मन भयो अधीर।
रास रच्यो श्याम, रास रच्यो श्याम,
मुरली की धुन सुन मोहे लागी लगन अपार।
यमुना तट पर चाँदनी छाई,
फूलन की बरखा अंबर से आई।
मंद-मंद मुसकाए नंदलाल,
देखत ही राधा भई निहाल।
मुरली बाजे मधुर-मधुर,
झूम उठ्यो ब्रज सारा।
रास रच्यो श्याम यमुना के तीर,
नाचे राधा संग गोपियाँ, मन भयो अधीर।
पीताम्बर पहने श्याम सलोने,
मोर मुकुट सिर, नैन हैं कोने।
कानन में कुंडल झिलमिल करें,
अधरन पर मुरली मधुर स्वर भरें।
राधा की पायल छन-छन बोले,
प्रेम के दीप हृदय में डोले।
श्याम बने हैं प्रेम के सागर,
राधा बनीं प्रेम की धारा।
रास रच्यो श्याम यमुना के तीर,
नाचे राधा संग गोपियाँ, मन भयो अधीर।
कदंब की डाली फूल सजाए,
मधुप बनन में गीत सुनाए।
गोपिन आईं सुध-बुध खोकर,
श्याम मिलें तो जाएँ सँवर।
एक-एक मन में एक ही चाह,
श्याम हमारे, श्याम ही राह।
प्रेम की ऐसी अद्भुत लीला,
जिसका पार न पाया कोई।
राधा बोली—“श्याम हमारे,
तुम बिन सूने नैन बेचारे।
तुम हो जीवन, तुम ही प्राण,
तुमसे ही मेरी पहचान।”
श्याम हँसे और मुरली बजाई,
प्रेम-सुधा की धार बहाई।
राधा-श्याम के प्रेम का जग में,
आज भी गूँजे जय-जयकारा।
नाचे वृंदावन, गाए ब्रजधाम,
राधे-राधे बोले हर धाम।
मन मंदिर में दीप जलाओ,
राधा संग श्याम को पाओ।
प्रेम जहाँ हो, वहीं हैं श्याम,
राधा में बसते घनश्याम।
रास रच्यो श्याम यमुना के तीर,
नाचे राधा संग गोपियाँ, मन भयो अधीर।
राधे-राधे! श्याम मिलादे!
राधे-राधे! श्याम मिलादे!
बाल लीलाएँ : डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र

भारतीय संस्कृति में श्रीकृष्ण केवल एक आराध्य देव नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक रंग और प्रत्येक भाव और लोक मंगल के अद्भुत प्रतीक हैं। वह कहीं बालकृष्ण बनकर माँ यशोदा की गोद में मुस्कराते हैं, कहीं ग्वाल-बालों के साथ अरण्य-विहार करते हैं, कहीं माखन चुराकर गोपियों को रिझाते-लुभाते हैं तो कहीं अत्याचार-दुराचार एवं अहंकार का विनाश कर धर्म की स्थापना करते हैं। श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव इसी बहुरंगी व्यक्तित्व की स्मृति का महापर्व है जिसे अर्यावर्त ही नहीं, विश्व के कोने-कोने में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

भाद्रपद, कृष्ण-पक्ष की अष्टमी की मध्यरात्रि में मथुरा-नरेश कंस के कारावास में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। उस समय कंस के कुशासन से चारों ओर अत्याचार, आतंक और भय का वातावरण था। उसके घोर आतंक से प्रजा त्रस्त थी। उसने अपनी बहन देवकी और बहनोई वसुदेव को कारागार में क़ैद कर रखा था, क्योंकि एक आकाशवाणी के अनुसार, उसे पता चला कि देवकी का आठवाँ पुत्र उसका वध करेगा। इसलिए, भगिनी देवकी की हर संतान की हत्या कर देता था। ऐसी विषम परिस्थिति में भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण आशा, धर्म और न्याय के प्रकाश के रूप में हुआ।

देवकी के आठवें पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण के जन्म के पश्चात वसुदेव उन्हें लेकर यमुना पार करते हुए गोकुल रातो-रात पहुँचे। उन्होंने नंद बाबा के घर यशोदा के पलंग पर बाल कृष्ण को चुपके से डाल दिया तथा वह यशोदा की नवजात बालिका-शिशु को लेकर वापस कारावास में लौट आए और बालिका को उसकी गोद में डाल दिया। वसुदेव ने यह सब कुछ कृष्ण को बचाने के लिए किया था। यहीं से आरंभ होती है उस दिव्य बालक की अद्भुत कथा, जिसने आगे चलकर समूचे भारतीय मानस को प्रेम, भक्ति, करुणा और धर्म का संदेश दिया।

नंद के आँगन में हर्षोल्लास का वातावरण
गोकुल में जब नंद के घर बालकृष्ण के आगमन का समाचार फैला तो समूचा गोकुल आनंद से झूम उठा। नंद बाबा के घर बधाइयाँ गाई जाने लगीं। गोप-गोपियाँ मंगलगीत गाने लगीं। घर-घर दीप जले और ऐसा लगा मानो स्वयं आनंद ने बालक का रूप धारण कर नंद के आँगन में जन्म लिया हो।
यशोदा के लिए कृष्ण केवल ईश्वर नहीं थे। वह उनके लाल थे—उनकी आँखों का तारा, उनके हृदय का टुकड़ा थे। कृष्ण की बाल मुस्कान, उनकी किलकारियाँ और उनकी चंचल आँखें यशोदा के जीवन का सबसे बड़ा सुख का स्रोत बन गईं।

बालकृष्ण की चंचलता
कृष्ण की बाल लीलाओं में सबसे आकर्षक उनका नटखटपन है। वे कभी आँगन में घुटनों के बल रेंगते हुए दिखाई देते हैं, कभी ग्वाल बालों के साथ मस्ती में खेलते हैं और कभी अपनी बाल-सुलभ शरारतों से समस्त गोकुलवासियों को हैरान-परेशान कर देते हैं।

कृष्ण की बाल लीलाओं में सबसे आकर्षक उनका नटखटपन है। वे कभी आँगन में घुटनों के बल रेंगते हुए दिखाई देते हैं, कभी ग्वाल बालों के साथ मस्ती में खेलते हैं और कभी अपनी बाल-सुलभ शरारतों से समस्त गोकुलवासियों को हैरान-परेशान कर देते हैं।
कृष्ण की सबसे प्रसिद्ध बाल लीलाओं में माखन-चोरी का विशेष स्थान है। यशोदा और गोकुल की अन्य गोपियाँ घरों में माखन मटकी में छिपाकर रखतीं, लेकिन कृष्ण और उनके सखा किसी न किसी प्रकार उसे ढूँढ़ निकालते। कभी कृष्ण स्वयं माखन खाते, कभी अपने मित्रों को खिलाते और कभी बंदरों को भी बाँट देते।
जब गोपियाँ यशोदा के पास शिकायत लेकर पहुँचतीं तो कृष्ण भोले बन जाते। उनकी आँखों की शरारत और चेहरे की मासूमियत देखकर शिकायत करने वाली गोपियाँ भी अपनी हँसी रोक नहीं पातीं।
माखन-चोरी की यह लीला केवल एक बाल क्रीड़ा नहीं मानी जाती। भक्ति-परंपरा में माखन को मन की निर्मलता का प्रतीक माना गया है। जिस प्रकार दूध को मथकर माखन निकाला जाता है, उसी प्रकार साधना और प्रेम से मनुष्य के भीतर से निर्मल प्रेम प्रकट होता है। कृष्ण का उस माखन को चुराना मानो भक्त के निर्मल हृदय को अपने प्रेम से जीत लेना है।
मटकी फोड़ने वाला नटखट कान्हा
कृष्ण अकेले माखन नहीं चुराते थे। वह अपने ग्वाल-बाल मित्रों की टोली बनाकर गोपियों के घर पहुँचते। ऊँचाई पर लटकी मटकी तक पहुँचने के लिए सभी बाल सखा एक-दूसरे के कंधों पर चढ़ते और मटकी फोड़ देते। मटकी टूटती, माखन बिखरता और गोपियों के घर में हँसी-ठिठोली का वातावरण बन जाता। कृष्ण की यही चंचलता उन्हें जन-जन का प्रिय बनाती है। वह किसी राजमहल के दूर बैठे देवता नहीं, बल्कि गोकुल के घर-आँगन में खेलने वाले अपने ही घर के बालक हैं।

पूतना-वध : बालक में छिपी दिव्यता
कंस को जब पता चला कि देवकी का आठवाँ पुत्र जीवित है और कहीं गोकुल में पल रहा है, तो उसने उसे मारने के लिए अनेक राक्षस भेजे। उनमें पूतना भी थी। पूतना सुंदर स्त्री का रूप धारण करके गोकुल पहुँची। उसने अपने स्तनों पर विष लगाकर बालकृष्ण को दूध पिलाने का प्रयास किया। किंतु कृष्ण ने उसके प्राण ही हर लिए। पूतना अपने वास्तविक राक्षसी रूप में आकर धरती पर गिर पड़ी।

इस लीला में एक गहरा संदेश निहित है। बाहरी रूप कितना ही आकर्षक क्यों न हो, यदि उसके भीतर विष है तो उसका अंत निश्चित है। कृष्ण सत्य और पवित्रता की शक्ति के रूप में उस विष का अंत करते हैं।
शकटासुर और तृणावर्त वध
बालकृष्ण की एक अन्य लीला शकटासुर-वध की है। कहा जाता है कि कंस ने शकटासुर को भेजा, जिसने एक भारी शकट अर्थात् गाड़ी का रूप धारण किया। बालकृष्ण ने अपने छोटे-से पैर के स्पर्श से उसे उलट दिया और उसका अंत कर दिया।

इसके बाद तृणावर्त नामक असुर ने कृष्ण को अपने साथ आकाश में ले जाने का प्रयास किया। वह भयंकर बवंडर बनकर आया। किंतु कृष्ण ने उसका गला पकड़ लिया और उसका वध करके उसे धूल चाटा दिया।
इन कथाओं में बालकृष्ण का रूप भले ही अत्यंत छोटा और असहाय दिखाई देता है, लेकिन उनकी शक्ति असीम है। यही विरोधाभास कृष्ण की बाल लीलाओं को अद्भुत बनाता है—वह बालक भी हैं और परम शक्ति भी।
यशोदा और कृष्ण : वात्सल्य का अद्वितीय संसार

श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं में माँ यशोदा और कृष्ण का संबंध सबसे अधिक हृदयस्पर्शी है। एक ओर यशोदा कृष्ण को डाँटती हैं, उन्हें बाँधने का प्रयास करती हैं, उनके माखन खाने पर नाराज होती हैं; दूसरी ओर वही कृष्ण की एक मुस्कान पर सब कुछ भूल जाती हैं। दामोदर-लीला इसी वात्सल्य की चरम अभिव्यक्ति है। कृष्ण की शरारतों से परेशान होकर यशोदा उन्हें रस्सी से बाँधना चाहती हैं। किंतु प्रत्येक बार रस्सी थोड़ी छोटी पड़ जाती है। अंततः माँ के प्रेम के आगे स्वयं भगवान बँध जाते हैं। यह प्रसंग भक्ति-साहित्य का अत्यंत मार्मिक प्रतीक है, अर्थात् ईश्वर को शक्ति से नहीं, प्रेम से बाँधा जा सकता है।
मुँह में ब्रह्मांड
कृष्ण की एक अत्यंत अद्भुत बाल लीला तब सामने आती है जब यशोदा से यह उपालम्भ किया जाता है कि कृष्ण ने मिट्टी खाई है। यशोदा उनसे मुँह खोलने को कहती हैं। कृष्ण मुँह खोलते हैं और यशोदा को उसमें सम्पूर्ण ब्रह्मांड दिखाई देता है—धरती, आकाश, पर्वत, नदियाँ, सूर्य, चंद्रमा और समस्त सृष्टि। क्षणभर के लिए यशोदा भय से विस्मित हो जाती हैं। लेकिन अगले ही क्षण मातृत्व की ममता उस दिव्य अनुभव पर भारी पड़ जाती है। वह फिर अपने लाल को उसी वात्सल्य से देखने लगती हैं। यह प्रसंग बताता है कि परम सत्ता जब प्रेम के बंधन में आती है, तो भक्त और भगवान के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है।

यमलार्जुन उद्धार
दामोदर-लीला से जुड़ी एक अन्य प्रसिद्ध कथा यमलार्जुन वृक्षों के उद्धार की है। कृष्ण को जब ओखली से बाँधा गया तो वह उसे खींचते हुए दो विशाल वृक्षों के बीच से निकलने लगे। ओखली के अत्यधिक दबाव और आघात के कारण दोनों वृक्ष गिर पड़े और उनमें बँधे दिव्य प्राणियों का उद्धार हुआ। इस लीला में कृष्ण के बालरूप के साथ उनका करुणा और उद्धारक रूप भी प्रकट होता है।
कालिय-मर्दन : विष से मुक्ति का संदेश
यमुना में कालिय नामक विषधर नाग का निवास था। उसके विष से नदी का जल दूषित हो गया था और गोकुलवासी भयभीत रहते थे। बालकृष्ण यमुना में उतर गए और कालिय के फनों पर नृत्य करने लगे। अंततः कालिय का अहंकार टूट गया और उसने कृष्ण की अधीनता स्वीकार कर ली। वह यमुना का परित्याग कर अन्यत्र किसी नागलोक को गमन कर गया। कालिय-मर्दन केवल एक विषधर नाग के पराजय की कथा नहीं है अपितु यह अहंकार, विष-वमन और नकारात्मकता पर प्रेम, साहस और धर्म की विजय का प्रतीक है। तदनन्तर, कृष्ण, कालिय के आतंक से गोकुलवासियों और यमुना नदी को मुक्त करते हैं। कृष्ण कालिय का वध न करके, उसे क्षमादान देते हुए अन्यत्र प्रवास करने का आदेश देते हुए उसे सुधरने का अवसर देते हैं। इस प्रकार इस कथा में श्रीकृष्ण के चरित्र में दंड के साथ करुणा भी दिखाई देती है।

ग्वाल-बालों के साथ कृष्ण
कृष्ण की बाल्यावस्था का सबसे सुंदर पक्ष उनका अपने सखाओं के साथ सहज जीवन है। वह गाय चराने जाते, बाँसुरी बजाते, खेलते, वन में घूमते और अपने मित्रों के साथ भोजन करते। विभिन्न प्रकार की अद्भुत क्रीड़ाएं करते। कृष्ण ने कभी अपने दिव्य स्वरूप का अहंकार नहीं किया। वह अपने सखाओं के साथ उसी प्रकार घुल-मिल जाते जैसे कोई सामान्य बालक अपने मित्रों के साथ रहता है। यही कृष्ण की विशेषता है—उनके व्यक्तित्व में दिव्यता और सहजता का अद्भुत समन्वय है।

गोवर्धन-लीला : प्रकृति और लोकजीवन का संदेश
कृष्ण की बाल-लीलाओं में गोवर्धन-धारण का विशेष महत्व है। गोकुलवासी इंद्र की पूजा की तैयारी कर रहे थे। कृष्ण ने उन्हें समझाया कि हमारे जीवन का आधार प्रकृति, पर्वत, वन, गौधन और वर्षा का प्राकृतिक चक्र है। इसलिए गोवर्धन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। इंद्र को यह बात अपने अपमान के रूप में लगी और उन्होंने घनघोर वर्षा कर दी। तब कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका पर उठा लिया और समस्त ब्रजवासियों को उसके नीचे आश्रय दिया। इस लीला में कृष्ण केवल चमत्कार करने वाले देवता नहीं, बल्कि समाज को प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश देने वाले लोकनायक के रूप में दिखाई देते हैं।
बाँसुरी और ब्रज का प्रेम
कृष्ण की बाँसुरी का स्वर ब्रज की आत्मा बन गया। उनकी बाँसुरी सुनकर गोपियाँ, ग्वाल-बाल, पशु-पक्षी और समूचा ब्रज जैसे सम्मोहित हो उठता था। कृष्ण की बाँसुरी का संगीत बाहरी कानों से अधिक हृदय से सुना जाता है। वह प्रेम का संगीत है, आत्मा का संगीत है और उस अनंत सत्ता की पुकार है, जो मनुष्य को संसार की सीमाओं से ऊपर उठकर अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने के लिए बुलाती है।
बाल-लीलाओं का जीवन-दर्शन
श्रीकृष्ण की बाल-लीलाएँ केवल मनोरंजन की कथाएँ नहीं हैं। उनमें जीवन के अनेक गहरे संदेश छिपे हुए हैं। माखन-चोरी हमें निर्मल हृदय का महत्व बताती है। पूतना-वध बाहरी आकर्षण के पीछे छिपे विष से सावधान करता है। दामोदर-लीला बताती है कि प्रेम ईश्वर को भी बाँध सकता है। कालिय-मर्दन अहंकार और विष पर विजय का संदेश देता है। गोवर्धन-लीला प्रकृति और पर्यावरण के प्रति कृतज्ञता सिखाती है। ग्वाल-बालों के साथ कृष्ण की मित्रता, समानता और सहजता का संदेश देती है। इस प्रकार, कृष्ण की बाल लीलाओं में जीवन का संपूर्ण दर्शन दिखाई देता है। वह हँसना सिखाते हैं, खेलना सिखाते हैं, प्रेम करना सिखाते हैं और अन्याय के सामने निर्भीक होकर खड़े होना भी सिखाते हैं।
जन्माष्टमी : आनंद और आस्था का पर्व
जब जन्माष्टमी की रात्रि आती है तो मंदिरों में घंटियाँ बजती हैं, घर-घर भजन-कीर्तन होते हैं, झाँकियाँ सजती हैं और आधी रात को कृष्ण-जन्म का उत्सव मनाया जाता है। उनके जन्म के पश्चात ‘छठी’ और ‘बरही’ का उसी तरह आयोजन किया जाता है, जिस प्रकार से सनातनी परिवारों में बच्चे के जन्म पर इनका आयोजन किया जाता है। भक्त “नंद के घर आनंद भयो” जैसे बधाई गीतों के साथ अपने हृदय में कृष्ण के आगमन का स्वागत करते हैं। वास्तव में कृष्ण का जन्म केवल मथुरा के कारागार में नहीं हुआ था। कृष्ण का जन्म तब भी होता है जब किसी निराश हृदय में आशा जागती है, जब अन्याय के विरुद्ध साहस पैदा होता है, जब मन में प्रेम का दीप जलता है और जब मनुष्य अपने भीतर की नकारात्मकता को त्यागकर सत्य और करुणा का मार्ग अपनाता है।
श्रीकृष्ण का बालरूप भारतीय लोकमानस में सदियों से इसलिए जीवित है क्योंकि उसमें जीवन की सहजता, प्रेम की मधुरता, बालपन की निश्छलता और दिव्यता का अद्भुत संगम है। वह यशोदा के कान्हा हैं, नंद के लाल हैं, ग्वाल-बालों के सखा हैं, गोपियों के प्रिय हैं और समस्त मानवता के मार्गदर्शक हैं। उनकी बाल लीलाएँ हमें यह संदेश देती हैं कि जीवन में आनंद का संचार हो, हृदय में प्रेम का वास हो, व्यवहार में सरलता का संपाक हो, प्रकृति के प्रति सम्मान हो और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने का साहस हो। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा जब हम अपने भीतर के अंधकार को मिटाकर प्रेम, सत्य, करुणा और धर्म का प्रकाश प्रज्वलित करें। आइए, इस जन्माष्टमी पर हम केवल कृष्ण की झाँकी न सजाएँ, बल्कि अपने हृदय को भी ऐसा पवित्र बनाएँ कि उसमें बालगोपाल मुस्करा उठें।
