
नीटू भैय्या
– हर्ष वर्धन गोयल (सिंगापुर)
कुछ वर्ष पूर्व मुझे एक बहुत ही शक्तिशाली विधि का ज्ञान हुआ। जिसके द्वारा हम अपने मन की स्थिति और विचार प्रक्रिया पर नियंत्रण प्राप्त कर सकते हैं। न्यूरो लिंग्विस्टिक प्रोग्रामिंग अर्थात मानसिक निर्देश भाषा अथवा सरल शब्दों में कहे तो अपने व्यवहार को समझ कर अपने मन में वांछित प्रणाली को रोपित करना, जिससे हम अपने विचार और उससे उत्पन्न होने वाला भाव, उसके प्रभाव और लम्बे समय में अपने स्वाभाव में आमूल परिवर्तन कर सकते हैं। यह एक प्रकार की जादुई विधि-सी प्रतीत होती है, जो हमारे जीवन के दृष्टीकोण को पूरी तरह से बदल सकती है।
आइए, वास्तिविक कथा यहाँ से प्रारम्भ होती है। हमारे छोटे चाचा जी के बड़े पुत्र का नाम था नीटू, पूरा नाम नरेंद्र मोहन अग्रवाल.. प्यार से हम नीटू कहते थे और चिढ़ाने के लिए नीटू भैय्या, बहुत मस्त स्वाभाव के थे हमारे नीटू भैय्या।
एक बार सुबह-सुबह नीटू भैय्या हमारे घर आये उसके हाथ में नमकीन का पैकेट था, बोलै “सब लोग मुँह नमकीन कर लो”
हम सब अचम्भित थे, मैंने मुँह नमकीन कर लो वाला वाग्धारा वाक्य पहली बार सुना था, हमने पूछा क्या हुआ नीटू भैय्या? आज सूरज कहा से निकला है, जो मुँह नमकीन करा रहे हो?
नीटू भैय्या अपनी सुपरिचित शैली में बोले “सब पास हो जाते है तो मिठाई खिलाते हैं, मैं फेल हो गया हूँ इसलिए नमकीन खिला रहा हूँ इसमें नया क्या है, मीठे का विपरीत नमकीन ही होता है ना?”
उनको पास-फेल कि कोई चिंता नहीं थी हम सबका उस दिन हँसते-हँसते बुरा हाल हो गया था।
फिर यह हमारे परिवार में यह एक मुहावरा सा बन गया जिसका भी परीक्षा का परिणाम आना होता हम पूछते आज मिठाई बटेगी या नमकीन?
समय-समय पर उनकी शरारतों के अनेको समाचार हमें मिलते रहते थे, वह हमारे लिए किसी कॉमिक पात्र के सुपर हीरो से कम नहीं थे।
समय के साथ-साथ हम सभी बड़ी कक्षा में आ गए थे नीतू भैय्या भी दसवीं कक्षा में आ गए थे और उनकी शरारतों का स्तर भी बहुत अधिक बढ़ गया था।
हमारे पिताजी का स्वाभाव बहुत कड़क था और मम्मी अक्सर कहती थी कि पिताजी को तो मिलिट्री में कमांडर होना चाहिए था।
उनके पास हर एक समस्या का समाधान था और प्रायः उनके समाधान कुछ कठोर प्रतीत होते थे, किन्तु एक दम राम-बाण की तरह सटीक होते थे।
एक दिन चाचा को पिताजी से बात करते सुना की नीटू भैय्या कीअंगूठा चूसने की आदत अभी तक नहीं गयी है और चाचाजी उनका समाधान पूछ रहे, हमें तो यह पहले से पता था, किन्तु चाचा की चिंता थी कि वह बड़ा हो गया है उसके यह आदत छूट जानी चाहिए।
हम मन ही मन डर रहे थे कि पिताजी अब क्या उपाय करेंगे…मन में उत्सुकता कम थी और अधिक डर था।
हर रविवार के दिन के तरह, जब हम सब बच्चे खेल रहे तो पिताजी ने नीटू भैय्या को अपने पास बुलाया… दिल्ली में हमारे घर के पीछे हमारा अपना बहुत बड़ा प्लाट था जिसमे हमने जामुन, अमरुद आदि के कई पेड़ लगाए हुए थे और क्यारी बनाकर कनेर, गैंदे आदि के पौधे लगाकर उसे एक उपवन का रूप दिया हुआ था। घर के पीछे बने इस उपवन की लगभग 5 फुट ऊंची चारदीवारी थी उस दिन पिताजी ने नीटू भैय्या को लपक कर उठाया और दीवार पर बैठा दिया और बोले जब तक मैं ना बोलू उतरना मत, हां यदि तुम चाहो तो अंगुठा चुस सकते हो, उसके लिए कोई मनाई नहीं है।
सुबह का समय था नीटू भैय्या पहले तो बड़े खुश हुए… पिता जी के जाते ही उन्होंने अंगूठा मुँह में दे दिया और चुसने लगे..और हमें चिढ़ाने लगे, उन्हें ऊंची जगह पर बैठ कर, उन्हें बड़ा मजा सा आ रहा था।
धीरे धीरे सूरज चढ़ गया लगभग घंटा भर में उनकी आवाज सुनाई दी …ताऊ जी क्या मैं अब उतर जाऊँ?…
पिता जी कमरे में से ही बोले… थोड़ा अंगूठा और चुस लो…
पिता जी के डर से वह दीवार से कूद भी नहीं सकता था… 10 बजते-बजते वह रोवानिया हो गया…. उनकी समझ में आ गया कि ताऊ जी ने क्यों कहा अंगूठा चुस लो, उसने फिर हिम्मत जुटा कर कहा “ताऊ जी क्या मैं अब उतर जाऊँ…”
पिता जी ने फिर वही उत्तर दिया … थोड़ा अंगूठा और चुस लो…
अब वह गिड़गिड़ाने लगे, बोले…ताऊ जी मुझे और अंगूठा नहीं चूसना है .. क्या मैं उतर जाऊँ…”
पिता जी ने फिर कहा …बेटा अब तुम दसवीं में आ गए हो। तुम बहुत बहुत पढ़ाई करनी है, जितना अंगूठा चूसना है आज चूस लो…
फिर क्या था धूप और गर्मी से परेशान नीटू भैय्या के दिमाग कि घंटी बज गयी, उन्होंने तुरंत अंगूठा मुँह से निकाल रोते हुए बोला “ताऊ जी अब में कभी भी अंगूठा नहीं चूसूंगा मुझे उतार लीजिये। प्लीज, वह जोर-जोर से रोने लगे।
पिता जी भी इसी उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे थे वह तुरंत आ गये और स्वयँ ही उसे सहारा दे कर उतर लिया पहली बार नीटू भैय्या को हमने इतने जोर से रोते देखा, वह पिताजी से लिपट कर वह बहुत रोए, फिर बोला,ताऊ जी आपने मेरी गन्दी आदत छुड़वा दी। सभी बच्चे मुझे चिढ़ाते थे, पापा मुझे डांटते रहते थे अब से मैं कभी भी अगूंठा नहीं चूसूंगा।
मेरी माँ भी शायद इसी बात की प्रतीक्षा कर रही थी, वह तुरंत ही गर्म-गर्म तैयार नाश्ता ले आयी,उसकी पसंद के आलू के परांठें, दूध के साथ मिठाई में गर्म-गर्म जलेबियाँ, हमारा पारिवारिक इतिहास इस बात का साक्षी है कि उसके बाद नीटू भैय्या ने कभी भी अगूंठा नहीं चूसा और हमारे उकसाने पर भी हंसी में टाल दिया। आज नीटू भइया हमारे बीच नहीं है किन्तु आज भी उनकी बात स्मरण कर मन रोमांचित हो जाता है।
पश्चात्य जगत के लिए न्यूरो लिंग्विस्टिक प्रोग्रामिंग एक नयी विधा हो सकती है किन्तु एशिया के लोगों और प्राचीन सभ्यताओं को ये बहुत पहले ज्ञात था कि मन के भाव द्वारा ही हमारी पांच कर्मेन्द्रियाँ और पांच ज्ञानेन्द्रियाँ नियंत्रित होती है और मानसिक मानचित्र में हमारे आंतरिक विचार, ध्वनियाँ, स्पर्श संबंधी जागरूकता, आंतरिक उत्तेजना, स्वाद और गंध आदि सम्मिलित होते हैं। यदि हम अपने इस मानसिक मानचित्र को समझ लें, उसमें विभिन्न विधियों द्वारा परिवर्तन कर सकें तो, हमारा व्यवहार, हमारी सोंच और दृष्टीकोण बदल जाते हैं।
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