मुखौटों का बाज़ार ( व्यंग्य ) : डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
मुखौटों का बाज़ार ( व्यंग्य ) : डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ लाइब्रेरी की पुरानी लकड़ी की महक के बीच सुधीर चश्मा ठीक करते हुए एक पुरानी फाइल पलट रहे…
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मुखौटों का बाज़ार ( व्यंग्य ) : डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ लाइब्रेरी की पुरानी लकड़ी की महक के बीच सुधीर चश्मा ठीक करते हुए एक पुरानी फाइल पलट रहे…
कमरा नंबर 302 – डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ (व्यंग्य) उस ओयो होटल की गलियाँ किसी भूलभुलैया जैसी थीं, जहाँ रोशनी भी डरी-सहमी सी अंदर आती थी। बाहर बोर्ड पर…
पछतावा – डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ( व्यंग्य ) शहर के सबसे बड़े मल्टी-स्पेशालिटी अस्पताल के आईसीयू वार्ड के बाहर वेटिंग एरिया में एक अजीब सी गंध थी फिनाइल…
“साख पर बट्टा”- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ उस दिन घर के स्टोर-रूम के सबसे अंधेरे कोने में, जहाँ मकड़ियों ने अपनी नई रियासत बसाई थी, एक दिल दहलाने वाला…
उमरावनगर में कुछ दिन – व्यंग्य बकरी, मुर्गी, और फटी कमीजें बस में जहाँ मैं बैठा था, वहाँ बकरी न थी, मेरे पास बैठे आदमी की गोद में सिर्फ मुर्गी…
प्रेम की बिरादरी – व्यंग्य उनका सबकुछ पवित्र है । जाति में बाजे बजाकर शादी हुई थी । पत्नी ने 7 जन्मो में किसी दूसरे पुरुष को नहीं देखा ।…
पछतावा (व्यंग्य) शहर के सबसे बड़े मल्टी-स्पेशालिटी अस्पताल के आईसीयू वार्ड के बाहर वेटिंग एरिया में एक अजीब सी गंध थी फिनाइल और मरती हुई उम्मीदों का कॉकटेल। सुमित वहां…
खादी पंखों वाली आत्मा (व्यंग्य) सत्ता की रीढ़ जितनी लचीली होती है, चापलूसी के सुर उतने ही मधुर सुनाई देते हैं। उस दोपहर महामहिम की कचहरी में एक ऐसी ही…
स्टैप्लर (व्यंग्य) बजाज साहब की मेज पर वह बिल्कुल आखिरी कोने में पड़ा रहता था। एक ऐसा अनाम कैदी, जिसकी तरफ कोई मुस्कुराकर देखता भी नहीं था। क्रोमियम की उसकी…
लिव-इन रिलेशनशिप (व्यंग्य) उस फ्लैट की दीवारों पर लगे आधुनिक चित्रों में रंग तो बहुत थे, पर चमक गायब थी। विवान और समायरा आमने-सामने बैठे थे, जैसे किसी युद्ध के…
यादों की अर्थी (व्यंग्य) वह दोपहर किसी सड़ी हुई कढ़ी जैसी चिपचिपी थी। कार के भीतर का तापमान और मेरी पत्नी सुजाता के तेवर, दोनों ही चालीस डिग्री के पार…
पुनर्जन्म का आधार कार्ड (व्यंग्य) बेलतारा गांव के राजनीति विशारद ‘लल्लन बाबू’ ने जब इस बार प्रधानी का बिगुल फूँका, तो उन्होंने ‘स्मार्ट सिटी’ और ‘मुफ्त बिजली’ के घिसे-पिटे वादों…
हवालात-ए-हुस्न (व्यंग्य) जैसे ही मैंने थाने के हवालात-ए-हुस्न में कदम रखा, वहां की आबोहवा में न्याय की खुशबू कम और थर्ड डिग्री की महक ज्यादा थी। दरोगा जी अपनी कुर्सी…
दुख-विनिमय केंद्र (व्यंग्य) चंदनपुर गांव के महान रणनीतिकार ‘झपटल बाबू’ ने जब इस बार प्रधानी का पर्चा भरा, तो उन्होंने विकास के सारे पुराने मापदंडों को खूँटी पर टांग दिया।…
स्मार्ट-गोबर (व्यंग्य) रामपुरिया गांव के स्वयंभू वैज्ञानिक ‘गबड़ू लाल’ ने जब प्रधानी के चुनाव में कदम रखा, तो उन्होंने पारंपरिक विकास की बलि चढ़ा दी। उनका चुनावी मुद्दा था—’गोबर का…
डिजिटल उपवास (व्यंग्य) धरमपुरा गांव के स्वघोषित समाजशास्त्री ‘फरेब सिंह’ ने जब प्रधानी के चुनाव में अपनी दावेदारी पेश की, तो उन्होंने गांव वालों को एक नया और डरावना सपना…
बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना (व्यंग्य) कहावत है— “बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना”, पर यहाँ तो अब्दुल्ला ने बाकायदा ‘को-ऑर्ड’ सेट पहना है और रील बनाने के लिए दीवाना हुआ…
ठलुआई का लायसेंस (व्यंग्य) शहर के उस कोने में जहाँ नालियों का पानी और दर्शनशास्त्र की बातें एक साथ सड़ती हैं, वहाँ एक पुराने बरगद के नीचे ‘मूर्ख शिरोमणि’ सभा…
कागज के शेर और समोसे का फेर(व्यंग्य)-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ शहर की धूल फाँकती एक तंग गली के आखिरी छोर पर ‘साहित्यिक पुनरुत्थान परिषद’ का बैनर ऐसे लटक रहा…
मैकाले की आत्मा डॉ. रवि शर्मा ‘मधुप’ मैकाले तो आम आदमी की तरह वक्त आने पर नश्वर देह को त्यागकर इस संसार से कूच कर गए। परंतु आत्मा तो अजर-अमर…