दृश्य: वर्षा – डॉ. शैलजा सक्सेना ( कविता )

आज धूप की मुठ्ठी बाँधे
सूरज बादल पीछे दुबका
और हवा की बन आई है
घर-घर 
जा कर चुगली करती।
 
सूरज व्याकुल देख रहा है
पर बादल का परदा भारी
उस पर बरखा 
बरस-बरस कर तड़-तड़ 
धरती से बतियाती।
 
रामू झुग्गी भीतर भीगे,
मुनिया थर-थर 
काँप रही है
ताप चढ़ा मुनिया की माँ को
चूल्हा तक जलना भारी है।
 
मुन्ना बुड़-बुड़ 
बोल रहा है
सूरज ताप दिखाने आओ,
आसमान में 
जगमग हो कर
तकिया-बिस्तर आन सुखाओ॥

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »